13 Things Mentally Strong Parents Don’t Do

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13 Things Mentally Strong Parents Don’t Do

Amy Morin
अपने बच्चों की आगे बढ़ने में मदद करें

दो लफ्जों में
साल 2017में किताब ‘13 थिंग्स मेंटली स्ट्रौंग पैरेंट्स डोंट डू’ रिलीज हुई थी. ये किताब पैरेंट्स को सीखाती है कि कैसे अपने बच्चों की आगे बढ़ने में मदद करें? आपने कभी सोचा है या फिर आपने खुद से कभी सवाल किया है कि आपके बच्चे असल में चाहते क्या हैं? अगर नहीं किया तो ये किताब आपको खुद से सवाल करना भी सिखाएगी. आज की भागती दौड़ती जिंदगी में अपने बच्चों को सही दिशा देना वाकई में एक चैलेंज है. ये किताब आपको उस चैलेंज को फेस करना सिखाएगी. साथ ही साथ ये भी बताएगी कि आप अपने बच्चों के सही मार्गदर्शक कैसे बन सकते हैं?

  ये किताब किसके लिए है
- ऐसे लोग जो अभी-अभी पैरेंट्स बने हों 
- ऐसे सभी लोग जिनको पैरेंटिंग एडवाइस की जरुरत हो 
- ऐसे लोग जिनको बच्चों की साइकोलॉजी में इंटरेस्ट हो 

लेखक के बारे में
लेखिका Amy Morin एक साइकोथैरेपिस्ट होने के साथ ही साथ क्लिनिकल सोशल वर्कर और प्रोफेशनल साइकोलॉजी इंस्ट्रकटर भी हैं. इनकी लिखी किताब ‘13 थिंग्स मेंटली स्ट्रौंग पैरेंट्स डोंट डू’ बेस्ट सेलिंग नॉवेल में शुमार है.

मेंटली स्ट्रांग पैरेंट्स ज़िम्मेदारी को समझते हैं
फ्रेडरिक डगलस ने एक बार कहा था कि, "टूटे हुए पुरुषों की तुलना में मजबूत बच्चों का निर्माण करना आसान है" तो जब तक बच्चे आपकी छत के अंदर हैं, आपकी जिम्मेदारी बनती है कि आप उन्हें सही दिशा की तरफ बढ़ने में मदद करें. क्या आप ऐसा कर पा रहे हैं?

सभी पैरेंट्स चाहते हैं कि उनके बच्चे का भविष्य बेहतर से बेहतर बन सके. लेकिन क्या आपको मालुम है कि एक रिसर्च में ये निकलकर सामने आया है कि बच्चे का फ्यूचर उतना ही अच्छा होता है. जितनी अच्छी उसे बचपन से सीख दी जाती है. इसका मतलब साफ़ है कि आपको पता होना चाहिए कि पैरेंटिंग कैसे करनी है? क्या आपको ये पता है? अगर पता है तो अच्छी बात है. लेकिन थोड़ा सा भी कन्फ्यूजन अगर आपके दिमाग में हो तो ये किताब आपके लिए ही लिखी गई है. इस किताब को पढ़कर आपका एप्रोच सही हो जायेगा. जब आपका एप्रोच सही हो जायेगा तब आपसे वो गलतियां भी नहीं होंगी जो अभी हो रही हैं.

एक और लाज़मी सा सवाल आपके दिमाग में आना चाहिए, वो ये है कि इस किताब के चैप्टर्स में जो लिखा है, उसके पीछे का तर्क कहां से आया है? इसका जवाब है कि इस किताब को लिखने से पहले लेखिका ने काफी ज्यादा रिसर्च की थी. रिसर्च के साथ ही लेखिका ने अपने बहुत से क्लाइंट का रिव्यु भी लिया था. अपनी पूरी रिसर्च का सार लेखिका ने इस किताब में डाल दिया है.

आपको चारों तरफ फैला हुआ फिटनेस का जाल नजर आता होगा. हर तरफ ये बताया जा रहा है कि आप अपने बच्चे को फिजिकली फिट कैसे रखें? लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि फिजिकल फिटनेस के अलावा भी एक फिटनेस होती है. इसे इमोशनल फिटनेस कहा जाता है. इसी को आजकल मेंटल हेल्थ के रूप में भी जाना जाता है. हमेशा पैरेंट्स के सामने एक सवाल खड़ा रहता है कि वो कैसे अपने बच्चे को इमोशनली स्ट्रांग बनाए? 

इस सवाल का जवाब तो इस किताब में आपको मिल जायेगा, लेकिन उससे पहले आप इमोशनल स्ट्रांग होने का फायदा समझ लीजिये. एग्जाम्पल के तौर पर हम समझते हैं कि ‘किसी घर की छत उतनी ही मजबूत होती है, जितनी मज़बूत उसकी नींव पड़ी होगी.’ इमोशनल हेल्थ उसी नींव की तरह होती है. अगर आप अपने बच्चे को इमोशनल स्ट्रांग  बनायेंगे तो फ्यूचर में आने वाली सभी प्रोब्लेम्स को वो हंसते हुए हैंडल कर लेगा.

अब पहले सवाल पर आते हैं कि बच्चे को इमोशनली मजबूत कैसे बनाएं? उसके लिए सबसे पहले तो आप खुद एक हेल्दी लाइफ स्टाइल को फॉलो करिए. अपने अंदर बदलाव लेकर आइये. जब आप सही रास्ते में होंगे. तभी आप सही परवरिश दे पायेंगे.

आम तौर पर एक बात देखी जाती है कि बच्चों की गलतियों पर मां-बाप पर्दा डालने की कोशिश करते हैं. सबसे पहले तो आप ये काम बंद कर दीजिये. आज से ही आपके बच्चे को पता चलना चाहिए कि उससे क्या गलती हुई है. इस सबक से वो सुधरेगा भी और इमोशनली स्ट्रांग भी होगा.

यहां पर हम अब एक और एग्जाम्पल देखते हैं. एक कोडी नाम का लड़का है. उसकी उम्र 14 वर्ष है. कोडी के टीचर्स ने उसके पैरेंट्स से बताया कि वो शांत रहता है और पढ़ाई में ध्यान भी देता है. फिर भी उसके ग्रेड्स में सुधार नहीं होता. शायद इसे एडीएचडी बीमारी है. इस पर कोडी के पैरेंट्स का क्या रिएक्शन रहा होगा? उन्होंने इस बात को मान लिया और टीचर्स से कहा कि बाकी स्टूडेंट्स की अपेक्षा इसे कम काम दिया करें. रिसर्च करने वालों के अनुसार पैरेंट्स की ये एप्रोच गलत थी. उन्हें अपने लड़के के ऊपर भरोसा दिखाना चाहिए था. जैसा कि बाद में कोडी के पैरेंट्स ने किया. उसके वर्क लोड में कमी नहीं आने दी, उसे एहसास दिलाया कि वो बाकियों की ही तरह है. इस एप्रोच के बाद कोडी के अंदर काफी ज्यादा इम्प्रूवमेंट देखने को मिला. उसके ग्रेड्स भी पहले से बेहतर हो चुके थे.

जो पैरंट्स खुद मेंटली स्ट्रौंग होते हैं. वो कभी भी अपने बच्चों को जिम्मेदारी से भागना नहीं सिखाते हैं. बल्कि डटकर उसका सामना करना सिखाते हैं.

फाइनली अपने बच्चे को आप सिखाइए कि वो ट्रू थॉट्स के साथ आगे बढ़े और ब्लू थॉट्स का चुनाव कभी ना करे. ब्लू थॉट्स वाले लोग मतलब ऐसे लोग जो हर बात की जिम्मेदारी दूसरे के कंधे पर डाल देते हैं.

अपने बच्चे को डर से लड़ना सिखाइए
अगर आपको ऐसा लगता है कि आप अच्छे माता-पिता नहीं हो तो भी आपको चिंता करने की ज़रूरत नहीं है. क्योंकि आपकी ही तरह 94 परसेंट लोगों को ऐसा ही लगता है. आखिर ऐसा हो क्यों रहा है? लोगो को पता है कि उनकी पैरेंटिंग में कमी है लेकिन फिर भी वो उस कमी को ठीक क्यों नहीं कर रहे हैं?

इस सिचुएशन से एक चीज का जन्म होता है. किसका? गिल्ट का, और इसी गिल्ट की वजह से पैरेंट्स अपने बच्चों की हर डिमांड पूरी करने में लग जाते हैं. इसको हम जॉय के केस से समझने की कोशिश करते हैं. जॉय के बेटे का नाम मीका है. वह काफी ओवर वेट है. उसका वज़न जंक फ़ूड की वजह से बढ़ गया था. अपने बेटे को देखकर जॉय को काफी गिल्ट हुआ करता था. उस दिन ये गिल्ट और बढ़ गया जिस दिन मीका जंक फ़ूड खाने के लिए रोने लगा और भीख मांगने लगा. तब जॉय को एहसास हो गया था कि उसके बच्चे के इस हालात का जिम्मेदार कोई और नहीं है बल्कि वही है.

अब यहां सवाल ये उठता है कि आखिर गिल्ट को मैनेज कैसे करें? सबसे पहले तो ये समझिये कि ये गिल्ट आपके लिए अलार्म की तरह है. ये अलार्म आपको बताने के लिए बजा है कि अभी भी समय है सुधर जाओ. जैसे कि जॉय को अपनी गलत पैरेंटिंग का एहसास हुआ और उन्होंने सुधरने का फैसला कर लिया. 

जैसे ही आपके बच्चे अपने किशोरावस्था में पहुंचे, उनसे आप बात करिए कि अब उन्हें अपने कम्फर्ट जोन से बाहर आना चाहिए, अब समय आ गया है कि वो बाप की ऊँगली छोड़कर खुद का रास्ता तय करें. उम्र के इस पड़ाव में आप दोस्त बनकर अपने बच्चे के साथ खड़े रहिये. उसे सही मार्ग दर्शन दीजिये. उसी तरह का मार्ग दर्शन जैसा भगवान कृष्ण ने अर्जुन को दिया था. आप अपने बच्चे के सारथी बनिए. आप अपने बच्चे को नई स्किल सीखने में मदद करिए.

अपने बच्चे के सामने एक शानदार उदाहरण सेट करिए. अधिकतर पैरेंट्स की ये कोशिश होती है कि वो अपने बच्चे को एहसास दिलाते हैं कि वो उनके युनिवर्स का सेंटर पॉइंट है. आप बताइए, ये आईडिया कैसा रहेगा कि पैरेंट्स बच्चे को ये एहसास दिलाने की कोशिश करें कि वो पूरे ब्रह्मांड का सेंटर पॉइंट है? 

आप चाहते हैं कि आपका बच्चा खुद के ऊपर भरोसा करे इसमें कोई बुराई नहीं है. लेकिन आप उसे ये एहसास क्यों दिलाते हो कि वो सबसे अलग है. सबसे अलग होने के एहसास के परिणाम काफी भयानक हैं.

इसको एक उदाहरण से समझने की कोशिश करते हैं. कैरल और टॉम की एक बेटी है ब्रिटनी, जिसको उन्होंने पूरी छूट दी हुई है. ऐसी छूट कि जिसकी कोई सीमा नहीं है. इस छूट की वजह से ब्रिटनी के अंदर ये भावना आ गई कि वो स्पेशल है. एक दिन जब ब्रिटनी के पापा उसके कॉलेज गये तो उन्हें पता चला कि बाकी बच्चे उनकी बेटी को मीन समझते हैं. तब जाकर उन्हें एहसास हुआ कि इसके पीछे तो उन्ही की गलती है. ब्रिटनी के अंदर कभी भी उन्होंने ये बीज बोया ही नहीं कि उसे दूसरों की इज्जत करनी चाहिए.

अगर आप अपने बच्चे से खुश हो, तो उसकी मेहनत की तारीफ़ करो, उसे प्रोत्साहित करो लेकिन कभी भी उसके अंदर घमंड के बीज मत बोना. क्योंकि उसे काटना आपको ही पड़ेगा.

आपने इस अध्याय में परवरिश के दो और गुण सीख लिए हैं.

बच्चें गलतियों से ही सीखते हैं
पुरानी कहावत है कि ‘कोयले की खदान से ही हीरा निकलता है.’ क्या आप इस कहावत को सही मानते हैं? अगर मानते हैं तो मानिये लेकिन परफेक्शन का बोझ अपने बच्चों के ऊपर मत डालिए.

बहुत से पैरेंट्स ऐसे होते हैं कि उनके बच्चे समाज के बनाए हुए हर रूल्स में फिट बैठें, हमेशा परफेक्ट हों, लेकिन उनको समझना चाहिए कि परफेक्शन का प्रेशर ही डिप्रेशन जैसी बीमारियों को जन्म दे रहा है. अब समय आ चुका है कि हम मेंटल हेल्थ को लेकर सजग हो जाएँ.

अगर हम सीरियस नहीं हुए तो इसके परिणाम बड़े घातक हैं. 2013 में हुए रिसर्च में ये निकलकर सामने आया है कि कुल आत्महत्याओं में 70 प्रतीशत की उम्र 12-25 साल की थी.

इससे बचने का तरीका?

इससे बचने का तरीका यही है कि आप अपने बच्चों को परफेक्शन के बजाए मेहनत करने के लिए प्रेरित करें, उन्हें बताएं कि गीता में लिखा है कि ‘कर्म आपके हाँथ में है फल नहीं’.

अपने बच्चों को सिखाइए कि जिंदगी मौज में जीना आसान है. हम इसको कठिन ना बनाएं. अगर आपके सामने कोई दिक्कत आ भी रही है तो उसे हल करने की कोशिश करिए. उस दिक्कत से डीमोटिवेट ना हो जाइए. कोई भी दिक्कत आपकी जिंदगी से बड़ी नहीं होती है.

मानसिक तौर पर मजबूत पैरेंट्स बनिए. इस किताब की लेखिका के दोस्त थे. जिनका नाम जूली और माइकल था. जूली और माइकल ने एक दूसरे से तलाक ले लिया था. लेकिन इसका असर उनके बच्चों पर ना पड़े इसलिए माइकल हर छुट्टी वाले दिन डिनर के लिए घर ही आता था.

कुछ ज्यादा बदला नहीं था. लेकिन एक समय आया जब जूली को किसी और के साथ जिंदगी में आगे बढ़ना था. तब उसके सामने एक विकट परिस्थति खड़ी हो गई कि बच्चों को कैसे हैंडल करे?

यही काम अगर उन लोगो ने पहले कर लिया होता तो उनके बच्चे सच्चाई के साथ और मज़बूत बड़े  हुए होते. जब बच्चे देखते हैं अपने माता-पिता को अलग होते हुए, तो लाज़मी सी बात है कि उन्हें अच्छा नहीं लगता है. लेकिन इस सिचुएशन से वो जिंदगी के बारे काफी कुछ सीख भी सकते हैं.

मतलब साफ़ है कि जो बच्चे बचपन से ये नहीं सीख पायेंगे कि दर्द को कैसे झेलना है? उन्हें जवानी में भी इसकी आदत नहीं पड़ेगी. जूली ने सोचा था कि वो सही कर रही है. बच्चों के सामने दूसरी तस्वीर पेश करके,लेकिन उसे सच्ची तस्वीर पेश करनी चाहिए थी. अगर उसने सही तस्वीर पेश की होती तो उसके बच्चे आज इस सिचुएशन के लिए तैयार होते.

जब आप दर्द को समझने लगते हो और उससे डील करने लगते हो बजाय कि उससे भागने के, तो आप एक बेहतर और मज़बूत इंसान बनकर सामने आते हो.

बच्चों को भावनाओं से दूर मत रखिये, उन्हें जिंदगी समझने दीजिये
पैरेंट्स ये चाहते हैं कि उनके बच्चे नेगेटिव माहौल से दूर रहें. लेकिन पैरेंट्स को समझना चाहिए कि बच्चों को सीखना पड़ेगा इस माहौल से भी डील करना. जीवन के सफर में हमेशा समय पॉजिटिव नहीं रहेगा.

बस ये ध्यान रखिये कि जब आपके बच्चे नेगेटिव इमोशन से डील करना सीख रहें होंगे. तब उन्हें एक सपोर्ट सिस्टम की जरुरत होगी. आप वो सिस्टम बनकर रहिएगा. आपको उन्हें सिखाना पड़ेगा कि इमोशन को कैसे हैंडल करना है?

इमोशन चाहे पॉजिटिव हो या नेगेटिव इंसान का स्थिर रहना बहुत ज़रूरी होता है. आप अपने बच्चों को वो स्थिरता सिखाइए. पेन स्टेट ने अपनी रिसर्च में पाया है कि 5 साल की उम्र में जिन बच्चों को ज्यादा सोशल एक्सपोजर मिलता है. वो बच्चे अपने जीवन में जल्दी सेटल होते हैं.

यहां सवाल ये है कि इमोशनल इंटेलीजेंस आप अपने परिवार को कैसे समझाएं?

इसका सिंपल सा जवाब है बात करिए फैमिली से, एक टेबल पर बात करने बस से दो देशों के मुद्दे सुलझ जाते हैं. ये तो परिवार है. पहले आप अपनी भावनाओं को अपने बच्चों के साथ शेयर करिए. फिर आप देखेंगे कि आपके बच्चे भी अपने दिल के जज्बात आपसे शेयर कर रहें होंगे.

उनको बताइये कि अपसेट होना भी नॉर्मल है. उनको मूड बूस्टर सिखाइए. इससे फायदा ये होगा कि उनको पता चल जाएगा कि एक इमोशन से बंधकर नहीं रहना है.

डीसिप्लीन और पनिशमेंट के बीच का अंतर समझिये. एक बच्चे की सही परवरिश करने के लिए बहुत ऊर्जा की जरुरत होती है. अगर ये उर्जा आपके अंदर नहीं होगी तो आप अपने बच्चों के ऊपर चिलाओगे, उन्हें पनिशमेंट दोगे. पनिशमेंट का भी एक तरीका होता है. अगर आप किसी बच्चे पर ज्यादा ही चिल्लाते हो तो उसके अंदर कई बुरी क्वालिटी भी आ सकती हैं. जैसे कि वो हो सकता है कि ज्यादा गुस्सा करने लग जाए.

इसलिए सबसे ज़रूरी है कि आप डीसिप्लीन और पनिशमेंट के बीच का अंतर समझ लीजिये. आपको अपने बच्चे को सामाज में कैसे रहना है. वो सिखाना पड़ेगा. लेकिन इसके लिए पनिशमेंट  का औजार आप नहीं उठा सकते हैं. 

हेल्दी डीसिप्लीन का औज़ार आप उठाइये. बच्चे को बताइए कि समाजिक ढांचा कैसा होता है? 

अब एक सवाल और आपके सामने खड़ा है कि कहां से आप शुरू करेंगे?

इसका जवाब है कि आप एक लिस्ट बनाइए. उसमे नोट डाउन करिए कि आपके बेस्ट बॉस कौन-कौन रहे हैं? वो इतने अच्छे लीडर कैसे बने थे? उनकी खूबियों को अपने बच्चे को सिखाइए.

एक बात और आप गांठ बांध लीजिये कि आपको कभी शॉर्ट कट नहीं लेना है. भले ही छोटा रास्ता कितना लुभावना हो, लेकिन आपको हमेशा सही रास्ते पर चलना है. यही बात आप अपने बच्चे के जहन में डाल दीजिये.

बच्चे की सही परवरिश के लिए बहुत मेहनत चाहिए. इसलिए अभी अपने आपको रिचार्ज करिए. दोस्त के साथ कॉफ़ी पीजिये. जब एनर्जी आ जाए तो बच्चे से बात करिए. उसकी मदद करिए उसके गोल्स में, उसको सजेस्ट करिए कि वो वेकेशन में कम से कम एक किताब खत्म किया करे. आपके सामने आपका बच्चा है और उसके सामने उसकी जिंदगी. ये अनमोल है.

वैल्यूज और एक्शन का मैच होना ज़रूरी है
मानसिक तौर पर जो पैरेंट्स मजबूत होते हैं वो अपने बच्चे की जिंदगी के फैसलों को लार्ज पर्सपेक्टिव में देखते हैं. वो हमेशा ये गौर करते हैं कि क्या उनका बच्चा सही रास्ते पर है?

इस सीनेरियो को हम एग्जाम्पल के साथ समझते हैं. एक 15 साल का लड़का है. जिसका नाम आप कुछ भी रख सकते हैं. वो एक एंट्रेंस एग्जाम में नकल करते हुए पकड़ा जाता है. उस एग्जाम से उसे बाहर कर दिया जाता है.

उसके पैरेंट्स को समझ में नहीं आता कि इसने नकल क्यों की? ऐसी क्या गलती हो गई उनकी परवरिश में, जब उस बच्चे से जानने की कोशिश हुई तो जवाब आया कि उसके माता-पिता सोसाइटी में स्टेट्स बना रहे, इसलिए बस उस एग्जाम की बात करते थे. इस बात से उसको क्लियर करने का इतना प्रेशर आ गया कि उसने नकल का सहारा ले लिया था.

इस बात से उस बच्चे के पैरेंट्स ने अपने पांव पीछे खीचे और ये आश्वस्त किया कि एक्शन और वैल्यूज का मैच होना ज़रूरी है. साल 2014 में हार्वर्ड यूनिवर्सिटी ने एक अध्ययन किया था. इस अध्ययन में 80 प्रतीशत स्टूडेंट्स ने बताया कि उनके पैरेंट्स व्यवहार से ज्यादा अचीवमेंट को वैल्यू देते हैं.

अगर आप वैल्यूज को महत्त्व देना बंद कर देंगे तो आप क्या ही अपने बच्चे की सही परवरिश करेंगे?

अब समय है कि आप अपने बच्चे के अंदर कुछ वैल्यूज डालिए. ये इतना आसान काम नहीं है. क्योंकि वैल्यूज से ही करैक्टर का निर्माण होता है. चरित्र के निर्माण के साथ ही किसी के अंदर लीडरशिप क्वालिटी का जन्म होता है. अगर आप चाहते हो कि बच्चा खुश रहे, सही मायने समझे जीवन के तो उसको वैल्यूज का मतलब समझाइये. इसके साथ ही साथ ये भी बताइए कि वैल्यूज और एक्शन का मेल होना भी बहुत ज़रूरी है. शारीरिक मजबूती तो वो पा जाएगा. आप उसे मानसिक मजबूती प्रदान करिए.

कुल मिलाकर
पैरेंटिंग इतना आसान काम नहीं है कि आप पार्क में जाएंगे और टहल कर आ जाएंगे. पैरेंटिंग बहुत सीरियस काम है. आपको एक करैक्टर का निर्माण करना है. जिसे आपके बाद इस समाज के साथ जीना पड़ेगा. आपको एक लीडर का भी निर्माण करना है. इसलिए कभी भी परवरिश को हल्के में मत लीजिएगा. ये एक फुल टाइम जॉब है. इसलिए आपको सबसे पहले खुद की आदतों को सही रास्ते में लाना पड़ेगा. जब आप खुद सही रास्ते पर चलने लगोगे तो जीवन खुद सही हो जाएगा. पेरेंट्स के तौर पर अपने बच्चों के अंदर वैल्यूज को डालिए. उन्हें बताइए कि जीवन में कठिनाइयों का सामना भी एथिक्स के साथ करना पड़ता है. ये भी बताइए कि राह इतनी आसान नहीं लेकिन मजेदार बन सकती है.

अपने बच्चे को सिखाइए कि कैसे बेहतर इंसान बना जाता है?

उसे बताइए कि कैसे वो हर रोज खुद में इम्प्रूवमेंट ला सकता है? आइडियल जीवन कैसे जिया जाता है. इसकी कोई परिभाषा तो नहीं है. लेकिन अगर आप अपना जीवन एथिक्स के साथ बिताते हैं तो आप समाज के लिए भी बेहतर कर सकते हो और अपने परिवार के लिए भी, इसलिए पैरेंटिंग के महत्व को समझना ज़रूरी है.

 

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