The Longevity Project

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The Longevity Project

Howard S. Friedman, PhD, and Leslie R. Martin, PhD
हेल्थ और लांगिविटी पर हुई 80 सालों की रिसर्च की एक तस्वीर

दो लफ्जों में
साल 2012 में आई ये किताब जानी मानी टरमन स्टडी के आसपास घूमती है। इसमें लोगों के एक ग्रुप को अस्सी साल जितने लंबे समय तक स्टडी किया गया। इसका मकसद था ये पता लगाना कि ऐसी कौन सी आदतें और लाइफस्टाइल हैं जो लंबे समय तक जीने में मदद करती हैं। ये किताब बताती है कि शादी करने के भी कुछ नुकसान हो सकते हैं और आप अपनी जिंदगी को बढ़ाने के लिए क्या कर सकते हैं। 

ये किताब किनको पढ़नी चाहिए
• जो लोग एक लंबी जिंदगी जीना चाहते हैं
• जो लोग एक सही हेल्थ एडवाइस चाहते हैं
• मेडिसिन और साइकोलॉजी के स्टूडेंट्स 

लेखकों के बारे में
डॉ. फ्रीडमैन, कैलीफोर्निया यूनिवर्सिटी में साइकोलॉजी के प्रोफेसर हैं। हेल्थ और लांगिविटी की फील्ड में किए गए उनके काम के लिए उनको ढेरों बड़े अवार्ड्स मिल चुके हैं। इनकी लिखी दूसरी किताबों में Health Psychology और The Self-Healing Personality जैसे नाम शामिल हैं। लेस्ली आर मार्टिन, ला सिएरा यूनिवर्सिटी में साइकोलॉजी की प्रोफेसर हैं। उनको भी अपनी रिसर्च और टीचिंग के लिए काफी अवार्ड्स मिले हैं। वो डॉक्टर-पेशेंट रिलेशनशिप को बेहतर बनाने के तरीकों के लिए जानी जाती हैं। उन्होंने ऐसे रास्ते भी दिखाए हैं जहां हम अपनी सोच और बर्ताव में बदलाव करके लंबी और हेल्दी लाइफ जी सकते हैं।

Conscientiousness पर बने रहना उम्र बढ़ाने का एक बेहतरीन तरीका है।
साल 1921 में अमेरिकन साइकोलॉजिस्ट डॉ. लुइस टरमन ने एक स्टडी की शुरुआत की जिसे जेनेटिक स्टडी ऑफ जीनियस कहा गया। इसका मकसद था ये पता लगाना कि किसी के जीनियस होने के पीछे क्या वजह होती है। इसमें उन बच्चों के डेवलपमेंट पर नजर रखी जानी थी जो अपनी उम्र से ज्यादा तेज दिमाग या ग्रोथ वाले थे। टरमन ने लगभग हर वो जानकारी इकट्ठी की जो उनको जरूरी लगी। जैसे उन बच्चों के पास कितनी किताबें थीं और वो कितनी देर खेलकूद में बिताते थे। समय बीतने के साथ डेटा का ढेर लग गया। ये स्टडी टरमन के गुजर जाने के बाद भी जारी रही। जब लेखकों ने 1990s में इस पर काम करना शुरू किया तो उनको अपने इंट्रेस्ट की बहुत चीजें देखने को मिलीं। उनको इसके डेटा से उस सवाल के जवाब का रास्ता नजर आने लगा जो इंसान सालों से पूछते रहे हैं यानि लंबी जिंदगी जीने के लिए क्या करें। यहां मजेदार बात ये है कि आपकी उम्र पर आपकी पर्सनालिटी का भी बड़ा असर पड़ता है। लेकिन ये तो बस एक वजह है। इस स्टडी से ऐसी और भी ढेरों वजह सामने आईं। 

 

इस किताब को पढ़कर आप जानेंगे

• सही रास्ते पर चलने से आपकी उम्र कैसे बढ़ती है

• शादी करके महिला से ज्यादा पुरुष की उम्र क्यों बढ़ती है

• भगवान पर यकीन रखने से उम्र लंबी कैसे हो सकती है 

 

तो चलिए शुरू करते हैं!

क्या कभी आपके मस्तमौला दोस्तों ने आपकी इस बात के लिए खिंचाई की है कि आप किसी परफेक्शनिस्ट की तरह काम करते हैं और बहुत जिम्मेदार होकर रहते हैं? 
उस वक्त चाहे आपकी जितनी खिंचाई हो जाए पर हर बार आपका हाथ ही ऊपर रहता है। क्योंकि भले ही बाकी लोग उस वक्त मौज मस्ती में लगे हों पर आखिर में आपका काम शांति से निपट जाता है और बाकी लोग हड़बड़ी में इधर उधर भागते और परेशान नजर आते हैं। इसका दूसरा सबसे बड़ा असर पड़ता है आपकी उम्र पर। बच्चों का ईमानदार या जिम्मेदार होना उनकी लंबी उम्र की निशानी है। हालांकि ये क्वालिटीज जिस भी उम्र में अपना ली जाएं आपकी जिंदगी बढ़ा देती हैं। डॉ. टरमन ने रिसर्च में भाग ले रहे लोगों में दो बार उनके बर्ताव की अच्छी तरह स्टडी की। पहली बचपन में और दूसरी उनके बड़े हो जाने पर यानि लगभग 20 साल बाद। इनमें से एक बच्ची थी पेट्रीशिया। वो बचपन से लेकर अपनी उम्र के आखिरी पड़ाव यानि लगभग 90 साल की उम्र तक ऐसी ही रही। 

एक और बच्चा था जेम्स। वो बचपन में तो थोड़ा लापरवाह था पर बड़ा होते होते उसमें बदलाव आए। वो पहले से ज्यादा ध्यान और मन लगाकर काम करने लगा। शुरुआत में जहां उसका conscientious लेवल काफी निचले लेवल पर था वहीं 20 साल बीतते बीतते वो स्कोर टॉप पर आ गया। उसने भी एक लंबी और भरपूर जिंदगी जी। हालांकि रिसर्चर्स अभी तक इस बात का पक्का सबूत नहीं ढूंढ पाए हैं कि ऐसे लोगों में बीमारियों से मरने की संभावना कम क्यों होती है पर वो इसकी तीन वजह बताते हैं। पहली बात तो ये है कि ऐसे लोग स्वभाव से बहुत सेफ मोड में चलने वाले होते हैं और किसी तरह का रिस्क नहीं लेते। इस वजह से वो एक हेल्दी लाइफ जीते हैं। यानि वो स्मोक, ड्रिंक या किसी तरह के नशे की लत में नहीं पड़ते। वो गाड़ी भी तेज रफ्तार से नहीं चलाते। दूसरी वजह दिमाग की बायोलॉजी और केमिस्ट्री से जुड़ी है। रिसर्च बताती हैं कि ऐसे लोगों में सेरोटोनिन का लेवल हाई रहता है। ये एक तरह का न्यूरोट्रांसमीटर है जो मूड सही रखने और "फील गुड" में मदद करता है। इस तरह आप जल्दबाजी में या कोई गलत फैसले लेने से बच जाते हैं। तीसरी वजह होती है मजबूत रिश्ते। चाहे वो घर परिवार या समाज में हों या फिर काम से जुड़े। यानि ऐसे लोग खुश रहते हैं, हेल्दी रहते हैं और अपने आसपास का माहौल भी खुशनुमा रखते हैं। इस वजह से इनको मुश्किलों और तनाव का सामना कम करना पड़ता है और किसी भी जरूरत के वक्त इनको आसानी से मदद मिल जाती है।

हमें मौज मस्ती, हँसने खेलने और खुश होने के बीच का फर्क पता होना चाहिए। खुश होना आपकी अच्छी लाइफस्टाइल पर निर्भर करता है।
कहा जाता है laughter is the best medicine. अगर कभी आपका मन उदास हो या कोई बीमारी हो तो आपने महसूस किया होगा कि थोड़ा हँस बोल लेने से आप अच्छा महसूस करते होंगे। लेकिन इसका उम्र से क्या कनेक्शन है? जबकि टरमन स्टडी में ये देखा गया कि हर वक्त हँसते मुस्कुराते रहने वाले लोग दूसरों से कम जिए। ये बात अजीब लगती है ना। लेकिन यहां समझना ये है कि हँसने और खुश होने में फर्क होता है। स्टडी में ये देखा गया कि चियरफुल रहने वाले बच्चे आगे जाकर दूसरे बच्चों से ज्यादा सिगरेट, शराब और खतरनाक आदतों में लग गए। पॉल का उदाहरण ले लीजिए। बचपन में उसके माता पिता और टीचर उसकी बड़ी तारीफ किया करते थे कि वो पॉजिटिव रवैया रखने वाला और मस्त मौला बच्चा है। इसके बाद भी पॉल अपने साथ के दूसरे शांत या गंभीर रहने वाले साथियों से ज्यादा नहीं जी पाया। हँसी अपनी जगह है पर खुशी तभी आ सकती है जब आपकी लाइफस्टाइल सही हो। एक्सपर्ट्स ये कहते हैं कि अपनी जिंदगी में खुश रहने के लिए आपको टीवी कम देखनी चाहिए, फिजिकली ज्यादा एक्टिव रहना चाहिए, विनम्र रहना चाहिए, दूसरों की मदद करनी चाहिए और रिश्तों में मजबूती रखनी चाहिए। 

इस तरह से आप एक लंबी जिंदगी जी सकते हैं। लेखकों ने अपनी स्टडीज से ये पता लगाया है कि सबसे ज्यादा फायदा आपको तब होता है जब आप अपनी लाइफस्टाइल इस तरह से बदल लेते हैं कि इन चीजों को रोजाना करने के लिए खुद ब खुद जगह बन जाती है। तो हँसने के लिए कोई कॉमेडी शो देखने की जगह आप रोज शाम अपने दोस्तों से मिलकर बातचीत कीजिए। इसमें मजा तो आता ही है पर आपको खुशी भी मिलती है। स्टडी में भाग लेने वाले ज्यादातर लोग खुशी की तलाश में कहीं दूर नहीं गए। लाइफस्टाइल में बदलाव करने पर खुशी खुद ही उनके पास चली आई। उनके रिश्ते मजबूत हुए, सोशल कनेक्शन बने, करियर में मदद मिली। इस वजह से वो खुश रह पाए और एक लंबी जिंदगी जी सके।

जब माता पिता का तलाक होता है तो बच्चों को हिम्मत से काम लेना चाहिए।
तलाक लेने की अपनी वजह होती हैं पर एक बात सब मानते हैं कि इसका सबसे बुरा असर बच्चों पर पड़ता है। इस असर में उम्र भी शामिल है। स्टडीज बताती हैं कि जिन बच्चों के माता पिता का तलाक हो जाता है वो दूसरे बच्चों से लगभग 5 साल कम जीते हैं। यानि बचपन में तलाक जैसे अनुभव से गुजरना जल्दी मृत्यु होने की एक बड़ी निशानी है। इस बात का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि ये सालों बाद होने वाली किसी घटना की तरफ इशारा कर देती है। तलाक की वजह से बच्चों के दिलो दिमाग पर तो असर पड़ता ही है ऊपर से उनमें नशे का शिकार होने की संभावना भी बढ़ जाती है। आमतौर पर ऐसे बच्चों के रिश्ते अपने पार्टनर से अच्छे नहीं बन पाते और इन रिश्तों का अंत भी अक्सर तलाक से होता है। डोना के साथ भी ऐसा ही हुआ। दस साल की उम्र में उसके माता पिता अलग हो गए। डोना और उसका भाई माँ के साथ रहे। कॉलेज जाकर डोना को सिगरेट की लत लग गई। भले ही उसका करियर अच्छा रहा पर शादी नहीं टिकी और उसका भी तलाक हो गया। काम का तनाव तो था ही ऊपर से बच्चों की परवरिश और खर्चों ने उसे और भी परेशान कर दिया। इस तरह उसकी सोशल लाइफ भी खराब हो गई। डोना 59 साल की उम्र में ही दुनिया से चली गई। 

बच्चे अपने माता पिता को अलग होने से तो नहीं रोक सकते पर खुद को थोड़ा लचीला बनाकर नुकसान से अपना बचाव कर सकते हैं। इस तरह आप हालात को बेहतर ढंग से स्वीकार कर पाते हैं। लेखकों ने देखा है कि ऐसा रवैया अपनाने वाले बच्चे खुशहाल और लंबी जिंदगी जीते हैं। ये रवैया एडल्टहुड के शुरुआती सालों में डेवलप होता है। अगर आप अपनी जिंदगी से संतुष्ट हैं तो इसे बड़ी आसानी से पा सकते हैं। लेखकों ने देखा कि जो लोग अपनी जिंदगी में हासिल चीजों से खुश थे और ये मानते थे कि वो अपनी ताकत के मुताबिक अच्छी तरह जी रहे हैं वो ज्यादा हेल्दी और लंबी जिंदगी जी पाए।

शादी और तलाक का असर महिलाओं से ज्यादा पुरुषों पर होता है।
शादी दो लोगों का कमिटमेंट है पर आपको ये जानकर हैरानी होगी कि इसका पुरुषों की उम्र पर ज्यादा असर  होता है। शादीशुदा पुरुष, अकेले या तलाकशुदा पुरुषों से ज्यादा जीते हैं। टरमन की स्टडी में भाग लेने वाले जो भी पुरुष शादीशुदा थे वो कम से कम 70 साल तक जिए। लेकिन इस उम्र तक जीने वाले तलाकशुदा लोगों की गिनती इनसे एक तिहाई थी। लेकिन जिन लोगों ने दुबारा शादी की उनमें से कोई भी इस उम्र तक नहीं पहुंचा। लेखकों ने इसकी दो वजह सोचीं। पहली तो ये कि किसी बीमारी के समय पत्नी, पति का पूरी तरह से ध्यान रख सकती है। दूसरी बात ये कि वो अपने पति को बुरी आदतों से दूर करने और हेल्दी आदतों को अपनाने के लिए लगी रहती है। पर ऐसा है तो जिन्होंने दुबारा शादी की उनकी उम्र भी बढ़नी चाहिए थी। लेकिन तलाक काफी गहरे तनाव की वजह बनता है। ऐसे लोगों को समाज के ढेरों सवालों का सामना भी करना पड़ता है और ये सवाल दुबारा शादी कर लेने पर भी पीछा नहीं छोड़ते। इस वजह से नशे जैसी बुरी आदतें भी लग सकती हैं। जबकि जिम्मेदार रहने वाले लोगों की शादियां काफी सफल होती हैं और उनमें तलाक के चांस बहुत कम रहते हैं। 

अब इसी स्टडी में महिलाओं की बात की जाए तो उनमें इस बात का कोई खास फर्क नहीं देखा गया कि वो शादीशुदा हैं या तलाकशुदा। शादीशुदा पुरुषों की उम्र तो बढ़ जाती है पर शादीशुदा महिलाओं में उम्र सिर्फ उनकी बढ़ी जो अपनी शादी से पूरी तरह खुश थीं। यही वजह है कि तलाक लेकर अकेली रहने वाली महिलाएं भी लगभग शादीशुदा महिलाओं जितना ही जी पाईं। टरमन की स्टडी इस बात को गलत साबित करती है कि अगर महिलाएं लंबी उम्र बिताना चाहती हैं तो उनको शादी करनी चाहिए। जबकि ये बात हम एक जमाने से सुनते आ रहे हैं। सच तो ये है कि अगर कोई महिला अपनी जिंदगी से खुश है और उसका अच्छा खासा सोशल सर्कल है तो अकेले रहने में कोई बुराई नहीं है। उनके ऊपर शादी का दबाव नहीं होना चाहिए। हां अगर वो शादी करें और वहां भी उनको खुशी मिले तो उनकी उम्र और भी बढ़ सकती है।

एक लंबी जिंदगी जीने के लिए सोशल होना रिलीजियस होने से कहीं ज्यादा जरूरी है।
ज्यादातर लोग ये मानते हैं कि अगर आप धर्म को फॉलो कर रहे हैं तो यकीनन आपकी उम्र में बढ़त होती है। लेकिन ये इतना भी सच नहीं है। एक स्टडी ये बताती है कि सेहत या उम्र पर अगर धर्म का कोई भी असर हुआ है तो उसकी वजह वो इंसान खुद था न कि उसकी तरफ से की जा रही प्रार्थनाएं। वैसे भी धर्म को लेकर लोगों की अलग-अलग तरह की सोच थी। जैसे लिंडा पक्की आस्तिक थी। जॉन शायद ही कभी चर्च जाता था और डोना ने उम्र बढ़ने के साथ-साथ धर्म से दूरी बना ली। इन तीनों में लिंडा और जॉन ने तो लंबी जिंदगी बिताई पर डोना इनसे काफी पहले ही गुजर गई। हां ये भी सच है कि धर्म आपकी सेहत ठीक रखने में बहुत मदद करता है। इसके पॉजिटिव असर होते हैं। पर इसकी बड़ी वजह होती है वो कम्यूनिटी और सोशल लाइफ जिसमें एक धार्मिक इंसान वक्त बिताता है। 

स्टडी में पुरुषों ने धर्म से ज्यादा अपने परिवार और करियर को महत्व दिया क्योंकि उन्होंने अपनी सोशल लाइफ की जिम्मेदारी अपनी पत्नियों पर डाली हुई थी। महिलाओं के लिए धर्म से जुड़ी हुई सोशल एक्टिविटीज और गेदरिंग बहुत मायने रखती थीं। डोना जैसी महिलाएं जो इन चीजों से दूर होती जाती हैं वो अकेलापन महसूस करती हैं और अक्सर खुद को निगेटिव विचारों से घिरा पाती हैं। जबकि टरमन स्टडी ये साबित कर चुकी है कि मजबूत सोशल कनेक्शन आपको लंबी उम्र जीने में मदद करते हैं। जॉन तो बिल्कुल भी धार्मिक नहीं था वो भी लंबी जिंदगी जी पाया क्योंकि उसके पास बहुत बड़ा सोशल नेटवर्क था और उसे इसके लिए किसी धार्मिक समूह की जरूरत नहीं थी। स्टडी से एक और बात सामने आई कि किसी ग्रुप या एक्टिविटी में नाम लिखा देना ही काफी नहीं है। आपको फायदा तभी मिलेगा जब आप इसमें पूरी तरह भागीदारी निभाएंगे और लोगों से जुड़ेंगे। यानि फेसबुक पर एक हजार दोस्त होने से ज्यादा अच्छा है रियल लाइफ में कुछ दोस्त हों जिनके साथ आप उठते बैठते रहें और हर सुख दुख बांटें।

लंबी जिंदगी जीने के बहुत से रास्ते हैं और कुछ आसान तरीकों की मदद से आप अपना रास्ता खुद बना सकते हैं।
आपने कुछ लोगों के उदाहरण देखे और अब आप सोच रहे होंगे कि ये सारे उदाहरण हैं तो बहुत अच्छे लेकिन मेरे लिए सबसे अच्छा रास्ता क्या है? असल में ऐसा कोई एक कॉमन रास्ता नहीं है जो सबके लिए काम करता हो। लेकिन दो नाम लिए जा सकते हैं। इनको हम ज्यादा और कम सफर वाली सड़क कहेंगे। पेट्रीशिया नाम की वो समझदार बच्ची जो 90 साल तक जिंदा रही, वो पहला रास्ता लेने का एक बेहतरीन उदाहरण है। उसने अपने जीवन में सावधानी रखी, शादीशुदा जिंदगी को भी संभाले रखा और मजबूत रिश्ते बनाए रखे। अपने जैसे दूसरे लोगों की तरह पेट्रीशिया को अच्छी तरह प्लान करके काम करना पसंद था। उसने अपने रिश्ते निभाने और उनको बनाए रखने के लिए मेहनत की और इन सब बातों ने उसकी जिंदगी बढ़ाने में मदद की। जैसा इसके नाम से पता चलता है कम सफर वाली सड़क एक बहुत ही अलग रास्ता है। ये ऐसे लोगों के लिए है जो बहुत ज्यादा ज्यादा घुलना मिलना पसंद नहीं करते। एम्मा का उदाहरण लीजिए। उसने शादी नहीं की और अपना पूरा फोकस अपने करियर, दोस्तों और परिवार पर रखा। ऐसे लोग जिन पर वो हर अच्छे बुरे समय में पूरी तरह भरोसा कर सकती थी। एम्मा ने भी एक भरपूर जीवन जिया और शादी को कभी भी ऐसी चीज के तौर पर नहीं देखा जो उसकी जिंदगी को पूरा करती हो। इसकी जगह वो खुशमिजाज और एक्टिव बनी रही और अपने हर पल का मजा उठाया। 

हर कोई यूनीक होता है। इसलिए आप कुछ आम बातों को ध्यान में रखकर अपना रास्ता बना सकते हैं। सबसे पहले आपको ये पता लगाना होगा कि आपके लिए क्या सबसे जरूरी और खुशी देने वाली बात है और उसी के हिसाब से तैयारी करें। ये समझ लीजिए कि लंबा जीवन जीने के लिए कड़ी मेहनत, पक्का इरादा और मजबूत रिश्तों की जरूरत होगी। अब आपको डटकर अपने गोल्स पर काम करना होगा ताकि आप उनको अचीव कर सकें और खुद से से संतुष्ट हो सकें। इस तरह आपको accomplishment महसूस होगा। हालांकि ये सब मुश्किल तो होगा पर आप किसी चीज की मदद लेकर खुद को मोटिवेट कर सकते हैं जो आपको हमेशा रेडी, स्टेडी, गो मोड में रखे। हर सुबह आपको जागने की ताकत मिले। इस तरह आपकी लाइफ की क्वालिटी भी बढ़ती है और क्वांटिटी भी।

कुल मिलाकर
सुखी और स्वस्थ जिंदगी जीने का कोई आसान टोटका या फार्मूला नहीं है भले ही आप कोई भी एक्सपर्ट एडवाइज पढ़ या सुन लें। अपने बाद के सालों में अच्छी तरह से जिंदगी का आनंद लेने के लिए बस हेल्दी डाइट और कसरत से काम नहीं चलेगा। अगर आप सच में सौ साल तक जीना चाहते हैं तो कई बातों पर ध्यान देना चाहिए। जैसे कि एक ऐसा करियर बनाना जिसमें आपका मन लगता है, मजबूत सामाजिक रिश्ते बनाना और जिंदगी का कोई गोल ढूंढकर उसे अचीव करके संतुष्ट महसूस करना। 

 

क्या करें?

अपनी उस सोच को बदलें जो आपका नुकसान कर रही है।

अगर कभी कुछ गलत होता है तो आप क्या सोचते हैं? यही कि कोई बात नहीं ये जो कुछ भी हुआ थोड़ी देर की बात है, आगे सब ठीक हो जाएगा। या फिर आप ये सोचने लग जाते हैं कि आपके साथ तो यही होता रहा है। आपकी जिंदगी ही खराब है। टरमन स्टडी में पाया गया कि नेगेटिव सोच रखने वाले लोग कम जी पाते हैं। यानि जाहिर है कि इससे बचने की जरूरत है। अच्छी बात ये है कि अपनी सोच को बदलना आपके हाथ में है। सबसे पहला कदम ये है कि अपने विचारों को पहचानें यानि ये हकीकत नहीं सिर्फ विचार हैं। दूसरा कदम है खुद को "स्टॉप" कहना। लेकिन किसी भी चीज के बारे में सोचना बंद करना काफी मुश्किल है इसलिए आपको नेगेटिव सोच को पॉजिटिव सोच से बदलने की जरूरत है। 

 

येबुक एप पर आप सुन रहे थे The Longevity Project By Howard S. Friedman, PhD, and Leslie R. Martin, PhD. 

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