You're Not Listening

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Kate Murphy
सुनना क्यों ज़रूरी है?

दो लफ़्ज़ों में
साल 2020 में रिलीज हुई किताब “यू आर नॉट लिसनिंग” सीधे तौर पर आपका ध्यान ले जायेगी एक ऐसे संवेदनशील मुद्दे पर जिसे कई बार नज़र अंदाज कर दिया जाता है. हमारे आराध्यों ने कहा भी है कि आपको बोलने से पहले एक बेहतर श्रोता होना चाहिए. सुनने की काबिलियत पर ही बेस्ड है ये किताब. इस किताब में आपको प्रोफेशनल श्रोताओं के एग्जाम्पल भी मिलेंगे, साथ ही साथ ऐसी सकारात्मक प्रैक्टिकल एप्रोच से आप रूबरू होंगे, जिससे आपको कम्युनिकेशन के बेहतर तरीके सीखने में मदद मिलेगी. इसके साथ ही पाठक ये भी सीखेगा कि बेहतर बोलने से ज्यादा अच्छा सुनना क्यों ज़रूरी है. 

ये किताब किसके लिए है?
- ऐसे कपल जिन्हें अपनी कम्युनिकेशन बेहतर करनी हो.
- पत्रकार से लेकर प्रोफेशनल लिसनर और बिजनेस प्रोफेशनल. 
- हर उस शख्स के लिए जो बेहतर कम्युनिकेशन चाहता हो.

लेखक के बारे में
केट मर्फी पेशे से एक प्रोफेशनल पत्रकार हैं, जिनका ताल्लुक टेक्सास में पड़ने वाले ह्यूस्टन शहर से है. न्यूयॉर्क टाइम्स जैसे पब्लिकेशन में इनके कई आर्टिकल्स प्रकाशित होने के बाद और सैंकड़ों इंटरव्यू लेने के बाद इन्होनें अपने आपको एक बेहतर श्रोता बनाया है. इसी के साथ आपको रूबरू करवा दें कि न्यूयॉर्क टाइम्स के अलावा भी कई प्रतिष्ठित पब्लिकेशन जैसे कि ‘द इकोनॉमिस्ट’ में भी इनके आर्टिकल पब्लिश होते रहते हैं.

आज के दौर में अच्छा सुनने वाले मुश्किल से मिलते हैं
अगर आप से हम ये कहें कि अच्छा बोलना आसान है बल्कि बेहतर सुनना मुश्किल, तो क्या आप भरोसा करेंगे? लेकिन ये वाकई सच है, आप तब तक अच्छे वाक्ता नहीं बन सकते जब तक आप बेहतर श्रोता ना हों. एक बात और, अच्छा सुनना एक तरह चमत्कारिक प्रक्रिया है, क्योंकि कभी आप गौर करियेगा कि जब आप किसी को बेहतर ढ़ंग से सुनने लगते हैं, तो वो व्यक्ति भी आपको तवज्जो देने लगता है. भले ही वो शख्स आपका बेस्ट फ्रेंड हो या फिर कोई अजनबी हो लेकिन सिर्फ उसे सुनने की ही प्रक्रिया से आप दोनों के बीच में एक विशेष संबंध स्थापित हो जाता है, जिसे लफ्जों पर बयां कर पाना भी मुश्किल ही है. 

लेकिन आज के सोशल मीडिया के दौर की एक दुखद बात ये है कि लोग हर चीज तुरंत और छोटा चाहते हैं, वो किसी से कम्युनिकेशन भी फटाक से खत्म करना चाहते हैं, इसका परिणाम ये हो रहा है कि सुनने की कला खत्म होती जा रही है. 

लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि अगर चुनौती भयानक है तो हम पीछे हट जाएं, चुनौतियों का सामना करने के बाद ही कोई सिकंदर तैयार होता है, इसीलिए कई प्रोफेशनल लिसनर आज के दौर में भी इस कला से लोगों को लगातार रूबरू करवाने में लगे हुए हैं. उसी का एक प्रयास ये किताब भी है जिससे आप एक बेहतर श्रोता बनेंगे, श्रोता बनने के बाद आप अपने आस-पास बेहतर पॉजिटिव माहौल भी क्रिएट करेंगे और एक उम्दा शख्सियत बनकर भी दुनिया के सामने आयेंगे. 

अगर हम आज के दौर की बात करें तो आज कल ट्रेंड में है पब्लिक स्पीकिंग की ट्रेनिंग देना, कई प्रोफेशनल भी इस फील्ड में हैं, लेकिन कोई भी ये नहीं बताता है कि अच्छा सुना कैसे जाए? हम लगातार अपने आपको सोशल मीडिया की तरफ अग्रसर करते जा रहे हैं, वहां भी हम सिर्फ बोलते ही हैं. लेकिन मेरा आपसे एक ही सवाल है, वो ये है कि कब आपको किसी ने अच्छे से सुना था? या फिर क्या आपको याद है कि आपने कब अपने किसी करीबी को ध्यान से सुना था?

मोबाइल और कम्प्यूटर के इस दौर में जब हम एक दूसरे से ज्यादा अच्छे से कनेक्ट हो चुके हैं, तब भी एक अजीब सी बात ये है कि लोगों के अंदर अकेलापन और उनकी जिंदगी में सूनापन भी बढ़ चुका है. ये भी सोचने वाली बात है, लेकिन क्या आप इस पर विचार करते हैं? आज हम अपने जानने वाले से ज्यादा अच्छी तरह से और ज्यादा आसानी से कनेक्ट हो सकते हैं, लेकिन फिर भी क्यों हैं ये दूरियां, फिर क्यों कोई किसी को सुनने को तैयार नहीं है, ऐसी कौन सी भड़ास है जो लोगों को निकालनी है, क्यों लोग अकेले होते जा रहे हैं?

अगर हम इसी को दूसरी शब्दों में कहें तो वो ये होगा कि लोगों को महत्त्व नहीं मिल रहा है, जो वो चाहते हैं या जैसा उनको चाहिए, आपको बता दें कि साल 2000 में माइक्रोसॉफ्ट कम्पनी ने एक अध्ययन करवाया, उसकी रिपोर्ट में निकलकर सामने आया है कि लोगों का एक दूसरे को अटेंशन देने के समय में भारी गिरावट देखने को मिली, ये गिरावट 12 सेकंड से 8 सेकंड में आ गई है. इसका ठीकरा हम किसके सर पर फोड़ेंगे? दुनिया में चारों तरफ बहुत सी ऐसी चीजें हैं जिसने आपको कैद करके रखा हुआ, उसमें से एक वस्तु आपका फोन भी है.

इस पूरे सेंटेंस की गहराई में अगर हम पहुँचने की कोशिश करें तो एक बात निकलकर सामने आती है कि हमें अपने आस-पास के लोगों के लिए और सेंसिटिव होने की ज़रूरत है, हमें उन पर फोकस करने की जरुरत है, हमें उनको सुनने की जरुरत है. इस किताब के लेखक बताते हैं कि इस दुनिया में जहां आपने अपने आपको गैजट्स में कैद कर लिया है, वहां आपके आस-पास सभी लोग बेहद खुबसूरत और दिलचस्प हैं, देर बस इस बात कि है की आप उनसे सही सवाल तो करिए?

अब सवाल ये उठता है कि आप ऐसा करेंगे कैसे? इसका जवाब भी आपको इस बुक के लेखक ही बताएंगे कि बेहतर श्रोता कैसे बनते हैं.

सुनने की अद्भुत क्षमता आपकी लोगों को समझने में मदद करेगी
मिलिट्री इंट्रोगेशन हो या फिर थैरेपी प्रोफेशनल इनमें अच्छा सुनना एक कला की तरह होता है. किताब के लेखक खुद एक पत्रकार हैं और उन्हें मालुम है कि सुनकर ही बस कैसे किसी भी इंटरव्यू को क्रैक किया जा सकता है. पत्रकार होने के बावजूद वो फंस सी गयीं जब वो नाओमी हेंडरसन (Naomi Henderson) से मिलीं.  

उनके फील्ड के लोग उन्हें नाओमी (Naomi) के नाम से जानते थे, लेकिन उनके पास 50 वर्ष से भी ज्यादा का अपने फील्ड का अनुभव था, या तो यूं कहें कि नाओमी अपने काम में माहिर थीं, वो 6 हजार से भी ज्यादा ग्रुप में जुड़ी हुई थीं, 50 हजार से भी ज्यादा लोग उन्हें जानते थे. 

नाओमी में कुछ तो ख़ास था, जो उन्हें बाकियों से अलग बनाता था, कोई भी उनसे बात करता तो काफी सहज महसूस करता था, आखिर ऐसी कौन सी ख़ास बात नाओमी के अंदर थी, वो बात थी, उनका सहज स्वभाव, उनका फोकस, उनके पास हमेशा दूसरों के लिए समय रहता था. उनके चेहरे के भाव ही ये बताने को काफी रहते थे कि उन्हें आपकी बात सुनने में दिलचस्पी है, यही कारण था कि सभी ग्रुप के लोग अपनी बात उनसे कहना चाहते थे.

सन 1940 के दौर से ही फोकस ग्रुप एक बड़े व्यवसाय के तौर पर फल-फूल रहा था. लेकिन हाल ही के दिनों में उन्हें बिग डेटा रिसर्च से काफी कम्पटीशन मिल रहा था, इसके पीछे का कारण ये था कि बिग डेटा भी क्वालिटेटिव रिसर्च से फोकस ग्रुप की ही तरह क्वांटटेटिव रिसर्च की तरफ शिफ्ट कर चुके थे. 

क्वांटटेटिव रिसर्च काफी प्रचलित हो रहा था क्योंकि ये आपके सवाल का सीधा जवाब देता था, लेकिन इस प्रोसेस की एक खामी भी थी कि सवाल के इतर का जवाब इसके पास नहीं होता था. 

क्यों और कैसे का जवाब इस प्रोसेस के पास नहीं मिल सकता था. यहां अब हम आपसे जिक्र करना चाहेंगे मैथ्यू सैलगेनिक (Matthew Salganik) का, ये हैं कौन? ये हैं प्रिंसटन विश्वविद्यालय के सोशियोलॉजी के प्रोफेसर, इन्होने एक एक्सपेरिमेंट किया, इन्होने डेटा सेट कम्पेयर किया एक दारु पिए हुए आदमी की हरकतों से जो एक लैम्प पोस्ट के नीचे अपनी खोई हुई चाभी खोज रहा था. 

नाओमी (Naomi) यहां कहती हैं कि चाभी तो उसे ऐसी जगह भी मिल सकती है, जहाँ मिलने की उसने उम्मीद भी ना की होगी. क्या पता किसी सफाई कर्मचारी से चाभी दूसरी जगह चली गयी हो, इस बात से निष्कर्ष निकालने की कोशिश की जा रही थी, कि हमें हमेशा अपने नजरिये को कई बार बदलकर देखना चाहिए, अपने फोकस को हमेशा दूसरे की बात सुनने में भी लगाना चाहिए, सवाल का जवाब हमें कहीं से भी मिल सकता है. 

एक अच्छा श्रोता होने के लिए आपको लोगों को समझना पड़ेगा. हमेशा देखा गया है कि काफी जिज्ञासु लोग ही बेहतर श्रोता हुए हैं, गैरी नोसनर एफ.बी.आई से सेवानिवृत ऑफिसर इस बात को प्रूव भी करते हैं.

नोसनर की एक आदत हुआ करती थी, कि जब भी वो होटल्स में रुका करते थे तो वहां मौजूद बार में जाते थे और किसी भी अंजान आदमी से बात करने लगते थे. इस बातचीत के पीछे कारण कोई इन्वेस्टिगेशन करना नहीं होता था, बल्कि उनके अंदर जिज्ञासा होती थी दूसरे अंजान आदमी को जानने की, इस तरह उन्हें कई बार कुछ अच्छी बातें भी पता चल जाती थीं, जैसे कि एक बार की बात है, जब उनकी मुलाक़ात एक सेल्स मैन से हुई, उसने उन्हें रस्सी पर चलने की कला के बारे में बताया, इस कला को नोसनर ने सीखा भी था. 

इसी जिज्ञासा उन्हें काफी मदद उनके प्रोफेशन में भी की थी, नाओमी की तरह ही जो कि एक फोकस ग्रुप एक्सपर्ट थी, लोग उसके पास आकर अपनी चीज़ें शेयर करते थे, क्योंकि वो उन्हें सुना करती थी. 

इसी को आगे ले जाते हुए आपको एक और जिज्ञासु इंसान से मिलवाते हैं, इनका नाम है ‘बैरी मैक मेनस’ ये भी एक इंटेलीजेन्स एजेंट हैं. 9/11 के हमले के बाद, तब सी.आई.ए की तरफ से बैरी मुख्य इन्वेस्टिगेटर के तौर पर काम कर रहे थे. इस दौरान पाकिस्तानी मूल के वैज्ञानिक से उन्होंने पूछताछ की, अंदेशा ये था कि उस वैज्ञानिक का कनेक्शन ओसामा बिन लादेन से था. उनका तरीका बड़ा सिंपल सा था, वह बस ध्यान से वैज्ञानिक की बातों को सुनते थे, उसकी बातों पर फोकस करते थे, ऐसा करने से वैज्ञानिक उनके प्रति ऐसा सजग हो गया कि उसने अपनी पूरी कहानी उन्हें बता दी, ओसामा के साथ अपने संबंध भी इनको बता दिए. 

ये एग्जाम्पल सेट करता है कि हर बार बस कुछ कहना ज़रूरी नहीं होता है, कभी-कभी आपका सुनना भी इतना कुछ कर जाता है कि हर एक मुसीबत का हल निकल जाता है, इसलिए बोलने से पहले सुनने की कला इंसान को सीखनी चाहिए.  इसको और समझने के लिए हम ये सोचते हैं कि मान लीजिये आपके किसी दोस्त ने अपनी नौकरी खो दी है? अब वो कितना डिस्टर्ब होगा, उसे बस बहुत कुछ किसी से शेयर करना होगा, जो उसे ध्यान से सुन सके, जी हां बस सुन सके, कई बार आप बस किसी को सुनकर ही उसकी दिक्कतों को कम कर सकते हैं. दिस इज द पॉवर ऑफ़ लिसनिंग.

कभी ये मत दिखाओ कि आप वह जानते हो जो सामने वाला क्या कहने वाला है
आप किसी से भी बात करें, हो सकता है आप उसे पहले से जानते हों, हो सकता है वो आपसे पूरी तरह से अंजान हो, अधिकतर लोग अंजान लोगों से ही बात करना पसंद करते हैं.

करीबियों से बात करने पर बायस्ड नेस हो सकती है, मनोचिकित्सक जूडिथ कोच इस बारे में बताते हैं कि वो काफी समय से कपल से बातें कर रहें हैं, कपल्स उनसे रिलेशनशिप इश्यु को लेकर भी बात करते हैं. उन्होंने ओब्सर्व किया है कि कपल जो बातें एक दूसरे भी नहीं कहते हैं वो बातें उन्हें बताते हैं, कई ऐसी समस्याएं हैं जो उन्होंने सिर्फ सुनकर ही उस समस्या को खत्म किया है. 

जूडिथ बताते हैं कि दिक्कत यहां आती है कि हम सोच लेते हैं कि हम अपने पार्टनर को अच्छे से जानते हैं, लेकिन रिलेशनशिप जैसे-जैसे पुरानी होती है, दिक्कते बढ़ती ही जाती हैं, एक बात हमें समझनी चाहिए कि आपका पास्ट कभी भी आपके प्रेजेंट का इलाज नहीं हो सकता है. लोग अपने पार्टनर से लगातार बोल-बोल कर ही प्रॉब्लम सॉल्व करना चाहते हैं, लेकिन ऐसे हल नहीं निकलने वाला, हमें समझना पड़ेगा कि अब वक्त आ गया सुनने का, एक बार दिल से अपने ख़ास को सुनकर तो देखिये, सारी दिक्कतें खत्म हो जाएँगी.

एक बात और यहां गौर करने वाली ये है कि लोग सुनना तो चाहते हैं, अधिकतर लोग अजनबियों को सुनना चाहते हैं, लेकिन उसको सुनने से पहले ही वो अपनी मानसिकता तय कर चुके होते हैं कि अगर कोई इंसान गे है तो उसकी सोच क्या होगी, आदमी है तो ऐसे बोलेगा, औरत है तो ये सोचती होगी, इस जगह से है तो इसकी ऐसी सोच होगी, लेकिन यहां पर हमको एक चीज समझनी चाहिए, जो हमें लेखक समझाने की कोशिश में हैं कि हर इंसान अपने आप में एक जादू की तरह है, जिसके पास आपके लिए बहुत कुछ नया है, ज़रूरत है तो बस नजरिया बदलने की, एक बार बदलकर देखिए, आप खुद दुनिया बदल सकते हैं. 

इसका निष्कर्ष ये निकलता है कि हमें पहले से कभी किसी को जज नहीं करना चाहिए और ना ही ये सोच लेना चाहिए कि सामने वाला जो बोल रहा है मुझे सब पता है, कई बार आपको अंजान राह पर ही मंजिल मिल जाती है, नहीं भी मिली तो इस खुबसूरत सी दुनिया को देखने और समझने की सीख ज़रूर मिलेगी! जीते रहिये, लोगों को सुनते रहिये!

अब बात करेंगे अलग विचारधारा को सुनने की, यह कठिन होता है लेकिन ज़रूरी भी है. लॉस एंजलस की University of Southern California में एक रिसर्च की गई, साल था 2016, ये रिसर्च थी न्यूरोसाइंस के ऊपर, इस रिसर्च के चौकाने वाले रिजल्ट देखने को मिले, उन्होंने कुछ लोगों के दिमाग को स्कैन किया, जिनके राजनीतिक व्यू और बीलीफ अलग-अलग थे, फिर उनकी सोच को चैलेन्ज किया गया, रिजल्ट आया कि अपने से अलग विचारधारा को दिमाग बर्दाश्त नहीं कर पाता है. 

ड्यूक विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अहमद हरीरी ने इस बारे में कहा है कि मानव दिमाग को आदत होती है अपनी सेफ्टी में रहने की, वो अलग तरह का व्यवहार देखना ही नहीं चाहता है. 

ये एक ऐसी टेंडेंसी है जिसपर हमको काम करने की ज़रूरत है, 1817 में ही कवि जॉन कीट्स ने इस बारे में एक खत में लिखा था कि आपको ज़रूरत है कि आप समय की अनिश्चिता को समझें, मनोवैज्ञानिक भी दिमाग के इस तरह बर्ताव को कॉगनिटिव काम्प्लेक्ससिटी कहते हैं. अगर आपका दिमाग या फिर आप अपने आपको इतना तैयार कर लें कि आप अपने से विपरीत विचारधारा को आराम से सुन लें और समझ सकें तो आप लोगों को बेहतर ढ़ंग से पढ़ सकते हैं. 

इसका ये मतलब नहीं होता कि आप सामने वाले से हर बात पर एग्री करें, अगर आपके विचार उसकी बातों से नहीं मिल रहें हैं तो भी आप दोनों के बीच में एक अच्छी बात-चीत हो सकती है, इसके पीछे का कारण ये है कि आप सामने वाले की बात अच्छे से सुन भी रहे हो और समझ भी रहे हो, आज के दौर में आप देखते होंगे लोग सुनना नहीं चाहते, और वो कोई भी बातचीत बस ये कहकर टाल देते हैं कि ‘मुझे समझ नहीं आ रहा कुछ’ ये तरीका उनका सिर्फ वहां से भाग जाने के लिए होता है. 

बात पूरी करना ही एक मात्र तरीका होता है किसी भी बात-चीत के हल तक पहुँचने का, इसका फायदा ये होता है कि आप सामने वाले को अच्छे से समझ जाते हो, उसके दिमाग को भी पढ़ लेते हो, क्योंकि आप उसको अच्छे से सुन लेते हो. 

इंसानी फितरत होती है कि वो दुनिया को सिर्फ अपने ही चश्मे से देखता है, कभी कोशिश भी नहीं करता ये जानने की, कि सामने वाले दिल में क्या चल रहा है. सबसे पहले ये समझने की ज़रूरत है कि हर चीज के कई एंगल हो सकते हैं. जब आप अपने से अलग लोगों को सुनना शुरू कर देंगे तो आप खुद महसूस करेंगे कि आप रोज नई चीज सीख रहे हैं, आपका व्यक्तित्व रोज नई उचाईयों की तरफ बढ़ रहा है, इसलिए, आगे बढ़िए और अच्छे लिसनर बनिए.

अच्छा सुनना है तो पहले अच्छे सवाल करना सीखिए
आपने देखा होगा कि एक अच्छा श्रोता हमेशा उस बातचीत में कम बोलता है जिसमे वो सुन रहा होता है, लेकिन गौर करने वाली बात ये है कि वो जो भी बोलता है सटीक बोलता है.

चार्ल्स डर्बर बोस्टन कॉलेज में सोशियोलॉजी पढ़ाते हैं, वो कहते हैं कि किसी भी बातचीत की प्रतिक्रिया को दो तरीकों से हम देख सकते हैं. एक है सपोर्ट तरीका और दूसरा है शिफ्ट तरीका, समझिये अगर कोई आपको अपनी किसी दिक्कत के बारे में बताता है और आप उस दिक्कत को अपने किसी एग्जाम्पल से रिप्लेस करके उससे बात करते हो तो उस तरीके को कहते हैं शिफ्ट तरीका, और अगर आप उसकी दिक्कत को सुनकर उसके प्रति अपनी सम्वेदना व्यक्त करते हो, या फिर कोई सवाल करते हो, तो उसे सपोर्ट तरीका कहते हैं. 

जैसा कि आपने देखा ही होगा कि अधिकतर लोग शिफ्ट तरीके का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन जो लोग अच्छे श्रोता होते हैं वो हमेशा सपोर्ट तरीके का इस्तेमाल करते हैं, ये ध्यान रखते हुए कि सामने वाले को ये महसूस ना हो कि आप कोई फॉर्मेलिटी कर रहे हो.

जो पहला तरीका है जिसे शिफ्ट कहा गया है, उसका मतलब ये नहीं है कि आप सेल्फिश हो, कभी-कभी सच में लोग फिक्रमंद भी होते हैं, लेकिन एक अच्छा लिसनर हमेशा कोशिश करता है कि वो बेस्ट तरीके से कैसे सामने वाले की मदद कर सके.

एक क्रिस्चियन ग्रुप है जिसका नाम है क्वाकर्स, उन्होंने सिर्फ और सिर्फ लोगों को सुनने के लिए एक कमेटी का गठन किया है, इस कमेटी का नाम है ‘क्लियरनेस कमेटी’. इस कमेटी ने कुछ लोगों को चुना है जो कई लोगों की दिक्कतों को अच्छे से सुनते हैं और सपोर्ट सिस्टम के माध्यम से उसे हल करते हैं. 

लोगों को बस ये सिखाना कि असल में सुनते कैसे हैं, ये भी एक बहुत बड़ा काम है, क्योंकि आज के दौर में बस सबको बोलना ही है, लेकिन उन्हें सुनने वाला कौन है? क्या कभी किसी ने ये सवाल किया है, अगर किया होता तो जवाब पहले ही मिल जाता, सुनना एक आर्ट है, जिसको सीखने में पूरी एक उम्र गुजारनी पड़ती है.

हर जगह, कई लोग यही चाहते हैं कि वो बोलकर पूरी महफिल लूट लें, सभी उनकी तारीफ करते रहें, कॉमेडी शो भी हो तो कॉमेडियन भी जोक्स की बहार लगाकर खुद को शहंशाह से कम नहीं समझता है, लेकिन यहां हमें ये समझना पड़ेगा कि सबसे बड़े वो लोग हैं जो आपको सुन रहे हैं. सुनना भी एक बोहोत बड़ी स्किल है. 

डायरेक्टर मैट होवडे एक ट्रेनिंग प्रोग्राम चलाते हैं, ये शुरूआती दौर के स्टोरी टेलर्स के लिए होता है, यहां लोग कहानियां सुनाते हैं, होवडे कहानी और कहानीकार दोनों के बीच का अंतर भी बताते हैं. 

वो बताते हैं कि कहानीकार होने के लिए भी आपको बेहतर सुनना सीखना पड़ेगा, क्योंकि अगर आप ये नहीं सीख पाओगे तो आप बेसिक चीज से ही भटक जाओगे, आपके अंदर ज्ञान की कमी हो जाएगी. पहले सुनिए फिर सुनाने के लिए तैयार हो जाइए. 

होवार्ड बताते हैं कि बेहतर सुनने की कला के लिए जब हम किसी का लेक्चर सुन रहें हों तो हमे अंदर से शांत भी रहना चाहिए, हमें अति उत्साही नहीं होना चाहिए, अगर ऐसा होगा तो आप आगे की लीग मिस कर दोगे, वो कहते हैं कि आज के समय की दिक्कत ही ये है कि लोग जल्दी सुनकर सब खत्म करना चाहते हैं. शांत रहने से आप डरिए मत, ये शांति आपको एक अच्छे व्यक्तित्व के तौर पर निखारकर सामने लाएगी.

सुनना बहुत कठिन काम है, लेकिन कठिन कार्य से ही सफलता मिलती है
अभी तक हमने जितनी भी बात की उससे आप समझ चुके होंगे कि सुनना सरल तो नहीं है, सुनना सिर्फ आपको तब नहीं है जब दूसरा बोले, बल्कि तब भी है जब आप खुद बोलें, अगर आप कहानी भी सुना रहे हैं तो पहले अपनी जनता की नब्ज़ को पकड़िए कि वो असल में क्या सुनना चाहती है आपसे, आप कहां जा रहे हो, किस राह जा रहे हो, सुनों अपने आपको फिर फैसला करो. अगर आपको अच्छा कम्यूनिकेटर बनना है तो सुनने के साथ बॉडी लैंग्वेज को पढ़ना भी सीखना पड़ेगा, ये भी बेहद ज़रूरी है.

तो अब सवाल उठता है कि अगर आपके पास सुनने की क्षमता कम है तो आप क्या करें? सबसे पहले एक ब्रेक लीजिये, फ्रेश हो जाइए, किसी भी काम की शुरुआत आधी एनर्जी से मत करियेगा, क्यूँ कि सुनना तो एक आर्ट है.

एक बेहतरीन श्रोता बनने के लिए सबसे पहले आपको खुद को अच्छे से जानना होगा, अपनी कमजोरियों को खत्म करना होगा, खुद के ऊपर काम करना होगा, ये एक कठिन रास्ता है, इतना सरल नहीं है कि मिठाई उठायी और खा ली. 

अच्छा सुनने से पहले थोड़ा अच्छा पढ़ने की भी आदत डालिए, ये क्रिया एक दिन की नहीं है, ये पूरी प्रोसेस है, जिसके द्वारा आप एक बेहतर इंसान बनोगे और खुश रहोगे.

कुल मिलाकर
अब आते हैं इस पूरी समरी की समरी पर, ये भी उतना ही ज़रूरी है, जितना इस समरी का एक-एक शब्द था, सुनिए, आज के मॉडर्न दौर में जिसे डिजिटल वर्ल्ड भी कहा जाता है, वहां किसी को भी या फिर किसी के लिए भी सुनने की क्रिया बहुत ज्यादा कठिन है, लेकिन एक बात आप गांठ बांध लीजिये कि अगर आपने इस कला में महारत हासिल कर ली तो फिर चाहे आप पत्रकार हों या सरकारी अधिकारी आपके व्यक्तित्व की एक अलग ही पहचान बनेगी, लोग आपसे जुड़ेंगे, आपको पसंद करेंगे, लेकिन इसके लिए आपको खुद से ईमानदार होना पड़ेगा और उससे भी जिसको आप सुन रहे हैं, इससे आप खुद के लिए भी और पूरे समाज के लिए एक बेहतर माहौल बनाने में कामयाब होंगे. 

आपका व्यक्तित्व भी एक सोने की तरह हो जाएगा, जिसको जितनी बार भी खत्म किया जाए, लेकिन वो कभी खत्म हो ही नहीं सकता, क्योंकि आप आत्मा से मजबूत हो चुके होंगे. 

 

श्रोता बनना है और सवाल है कि शुरुआत कहां से करें तो इसका जवाब है अपने घर से ही करिए, जो आपसे सबसे करीब हो पहले उसे सुनिए, बहुत कुछ नया मिलेगा आपको, कभी आजमाकर देखिएगा. सामने वाले के शरीर से लेकर आवाज तक को सुनने की कोशिश करियेगा, बहुत बड़ी कला आप सीखने वाले हैं, ‘सुनने’ की कला, आप इसके लिए खुद को शुक्रिया भी कहेंगे.


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