Gretchen McCulloch
भाषा के नए नियम सीखो
दो लफ्जों में
हम सब जानते हैं कि अंतर्जाल यानि इंटरनेट ने समाज को काफी हद तक बदल दिया है। यह किताब "बिकौज इंटरनेट" इंटरनेट के कारण आए एक बड़े और महत्वपूर्ण बदलाव के बारे में बात करती है, जो है दुनियाभर में फैली ऑनलाइन संस्कृति के कारण अंग्रेजी भाषा में आया बदलाव! इस पुस्तक के पाठों में आप जानेंगे कि कैसे इंटरनेट ने नए भाषायी नियमों का निर्माण किया है; पुराने नियमों को नए रंग-रूप में रंगा है और साथ ही साथ लेखन के क्षेत्र में लोकतंत्र की स्थापना की है यानी लोगों को अपने खुद के शब्द बनाने की छूट दी है । इसके साथ ही साथ आप इमोजी, मीम और इंटरनेट के ट्रेंड से भी रूबरू होंगे।
यह किताब किसके लिए है?
* उन लोगों के लिए जो अंग्रेजी भाषा में पिछले कुछ सालों से आए बदलावों की तरफ आकर्षित हुए हैं।
* अडिग व्याकरणवेत्ता जो अभी भी अंग्रेजी के पुराने व्याकरण के नियमों को पकड़े बैठे हैं।
* अभिभावक जो अपने बच्चों के द्वारा किये गए अजीब से शब्दों वाले संदेशों को समझने में परेशानी महसूस करते हैं।
लेखक के बारे में?
ग्रेटचेन मैककुलोच एक लेखिका, पत्रकार, भाषाविद होने के साथ -ही- साथ डिजिटल संस्कृति एवं इंटरनेट भाषाओं में विशेष रुचि रखने वाली महिला हैं । वह "वायर्ड" पत्रिका के लिए एक स्थायी भाषाओं से संबंधित स्तम्भ भी लिखती हैं। इसके साथ ही साथ वह "ऑल थिंग्स लिनगुसटिक" नाम का ब्लॉग भी चलाती हैं और "लिनगुथीसियासम" नामक पॉडकास्ट की सह-निर्माता भी हैं। और यह उनकी पहली किताब है।
यह किताब आपको क्यों पढ़नी चाहिए
इंटरनेट से अंग्रेजी भाषा में आए बदलावों को समझिए
भाषा सदैव एक निर्माणाधीन भवन की तरह होती है। एक भवन अपने मालिकों की बहुत ही जरूरी आवश्यकता को पूरा करता है और मालिक भी इसके बदले साल-दर-साल मकान पर कुछ छोटे-बड़े बदलाव करते रहते हैं। पीढ़ी दर पीढ़ी ये बदलाव मकान के अनुरूप ढल जाते हैं। और अगर उस मकान में कई साल पहले रहने वाला कोई व्यक्ति उसे लंबे समय बाद देखता है तो उसके लिए उस मकान को पहचान पाना काफी मुश्किल हो जाता है।
हम किसी इमारत में कितना बदलाव हुआ है इसका पता उसके वर्तमान रूप को उसके पुराने रूप से तुलना करके आसानी से लगा सकते हैं और ऐसा ही हम भाषा के संबंध में भी कह सकते हैं । सामान्यतया एक अंग्रेजी का विद्यार्थी भी केवल शेक्सपियर के 400 साल पुराने नाटको को ही समझ पाता है। ज्योफ्री सौसर के द्वारा 600 साल पहले लिखे गए नाटक "द कैडबरी टेल्स" को समझ पाने के लिये किसी व्यक्ति को विश्वविद्यालय स्तर के अंग्रेजी ज्ञान की जरूरत होती है। अंग्रेजी की जड़ें इन चीजों पर टिकी हैं मगर इसका ढांचा पूरी तरह नवीन है।
भाषायी बदलावों को समाज में दिखने में सदियाँ बीत जाती हैं। मगर पिछले कुछ दशकों से इसमें एक अजीब सी बात होने लगी है- अंग्रेजी बहुत तेजी से बदल रही है। लेकिन क्यों? कारण है अंतर्जाल ।
वार्तालाप के आधुनिक ऑनलाइन साधनों ने भाषाई बदलावों के एक ऐसे नए युग की शुरुआत की है जहां पर कि आप अपने खुद के व्याकरण के नियम, वर्तनियाँ और वाक्य-रचना का निर्माण करने उन्हें कुछ ही वर्षों में लोकप्रिय बना सकते हैं। इस पुस्तक के पाठों में हम इंटरनेट संस्कृति के बारे में गहराई से जानने वाले हैं और अंतर्जाल पर जन्में कुछ भाषाई बदलावों के बारे में पढ़ने वाले हैं-
1. क्यों समयांतराल आक्रामक नतीजे लाता है।
2. "लोल" (lol) शब्द किसने बनाया। और,
3. क्यों 'मीम' इंटरनेट से भी पुराना है।
इंटरनेट ने औपचारिक लेखन पर लगाम लगाई है
'लेखन' शब्द को सुनते ही एक पल के लिए हमारे दिमाग में किताबें, अखबार और पत्रिकाएं जैसी चीजें आने लगती हैं। हममें से ज्यादातर लोगों ने अपनी पढ़ाई के कौशल को इन्ही साधनों से पाया और पैना किया है और हमारे लेखन के कौशल को बेहतर बनाने में स्कूल में लिखे गए हमारे निबंध और परीक्षा पत्रों का महत्वपूर्ण स्थान है।
उपरोक्त सभी माध्यमों में कोई दिक्कत नहीं है मगर इन सबमें एक बात आम है, जो है कि ये सभी माध्यम औपचारिक लेखन से संबंधित हैं।
औपचारिक लेखन का मतलब केवल गंभीर राजनैतिक और गहन शैक्षिक आलेखों से नहीं होता- कोई भी आलेख जो तरीके से लिखा गया हो और उससे एक तत्काल सुरुचि और रचनात्मक फ़्लो निकलता हो। इसमे आत्म-सम्पादन भी आता है- शायद आपको दसवीं कक्षा के अपने निबंध लिखने में एक संपादक जैसा आनंद न आया हो मगर जब आप उसे लिख रहे होंगे तब आप भाषा के नियम, वर्तनी, व्याकरण और वाक्य-विन्यास के प्रति पूरी तरह सजग होंगे।
बहुत लंबे वक्त तक हम जो भी पढ़ते रहें हैं वह सब औपचारिक तरीके से ही लिखा जाता था। क्योंकि उस समय लिखने के लिए स्याही और पेपर के साथ ही साथ पैसा भी लगता था और कोई भी आदमी पैसे लगाकर गलत वर्तनी और समझ में न आने वाले वाक्य नहीं लिखना चाहता है। लेकिन चीजें बदली पिछली सदी में, जब फोन और इंटरनेट का आगमन हुआ।
इन तकनीकों के कारण लोगों की रोजाना ज़िंदगी में लिखी जाने वाली चीजों की मात्रा में नाटकीय ढंग से वृद्धि हुई और आम लोगों के लिए भी लेखन रोजमर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बन गया। फोन पर की जाने वाली बातचीतों की जगह धीरे-धीरे ईमेल और मेसेजों ने ले ली। हजारों लोगों तक अपनी आवाज पहुंचाने के लिए अब आपको पहले की तरह किसी संपादक के दफ्तर का दरवाजा खटखटाने की जरूरत नहीं हैं। आप इंटरनेट पर खुद का एक ब्लॉग बनाकर हजारों लोगों तक अपनी बात पहुंचा सकते हैं।
अपनी रोजमर्रा की ज़िंदगी में प्रयोग होने वाले इन मेसेजों के लिए लोगों ने लेखन की एक अलग विधा का प्रयोग किया, जो थी- अनौपचारिक लेखन ।
यह ऐसा तत्काल और अचैतन्यपूर्ण लेखन है जिसे ना हममें से ज्यादातर लोगों ने कभी स्पर्श किया और ना ही कभी किसी पत्र-पत्रिका के संपादक ने। जब भी इंटरनेट के चैट रूमों में वार्तालाप करते हैं तो यह बहुत ही ज्यादा प्राकृतिक, अनौपचारिक और संवादी होता है- ठीक वैसे ही जैसे कि हम बोलते समय करते हैं।
लेखन की अनौपचारिक विधा के इस्तेमाल में आई इस त्वरित वृद्धि के कारण वार्तालाप की प्रकृति के साथ-ही-साथ भाषा भी बदल गई।
शब्दों के लघु रूप लिखना (ऐक्रोनिम) औपचारिक लेखन में जगह बचाने का एक आम तरीका होता है, जैसे- नासा, नाटो । अनौपचारिक लेखन के बढ़ते प्रचलन के साथ ही लोगों ने इसी चीज को, जगह और समय दोनों बचाने के उद्देश्य से, काफी अलग चीजों के लिए उपयोग करना शुरू कर दिया है। आज के इस इंटरनेट के दौर में ज्यादातर लोग "बाइ द वे" लिखने की जगह बी. टी. डब्ल्यू और "ओह माइ गॉड" के स्थान पर ओ.एम.जी का प्रयोग करना ज्यादा अच्छा समझते हैं।
इस तरह आज हमें नए शब्दों के लिए किसी प्राधिकारी जैसे-शिक्षक या फिर शब्दकोश संपादक पर निर्भर नहीं रहना पड़ता। इंटरनेट के आने से हम अपनी अभिव्यक्तियों के नए रूपों की खुद खोज करने वाले बन चुके हैं।
इंटरनेट भाषाविज्ञान एक नया और उमंग से भरा क्षेत्र है
यू.एस.ए में पूरब से लेकर पश्चिम तक सैर पर निकलिए। न्यूयॉर्क और वाशिंगटन के लोगों को आप कार्बोनिकृत पेय पदार्थों को "सोडा" कहते सुनेंगे। जब आप और पश्चिम की तरफ बढ़ेंगे और डेट्राइट और यूटाह के बीच पहुंचेंगे तो आप लोगों को इसे "पॉप" कहते सुनेंगे। इसके बाद जब आप एरिज़ोना और कैलिफोर्निया पहुंचते हैं तो यह फिर से "सोडा" कहा जाने लगता है। क्या आप बता सकते हैं कि ऐसा क्यों है?
अगर यह बात आपको आकर्षित करती है तो आप शायद एक अच्छे भाषाविद बन सकते हैं। भाषाविद वे लोग होते हैं जो जानने की कोशिश करते हैं कि लोग इतनी अलग-अलग कैसे वार्तालाप कर लेते हैं।
उन्नीसवीं सदी के मध्य तक भाषाविद इस बात पर काम कर रहे थे कि भाषा क्यों बदलती है और हमारे अभिव्यक्ति के तौर-तरीकों को कौन-सी चीज प्रभावित करती है। और भाषाविदों के इस काम को बहुत ही आसान बनाया है एक आधुनिक उपकरण ने, जो कि है- इंटरनेट ।
इंटरनेट के आगमन ने भाषाई शोध को कई तरह से प्रभावित किया है। पहले भाषाविदों को विश्लेषण के लिए लोगों की व्यक्तिगत बातचीतों को रिकॉर्ड और उन्हें लिप्यंतरित करना पड़ता था जिसमें कि काफी वक्त लग जाता था। साथ ही साथ लोग अध्ययनकर्ता की मौजूदगी में थोड़ा झिझकते थे और स्वाभाविक रूप से वार्तालाप नहीं कर पाते थे। मगर आज इंटरनेट के कारण भाषाविदों के पास विश्लेषण करने के लिए करोड़ों सोशल मीडिया पोस्टें और लिखित संदेश हैं जो कि बिना किसी झिझक के, स्वाभाविक और अनौपचारिक तरीके से लिखे गए होते हैं।
चलिए पहले कुछ सिद्धांतों के बारे में जानने की कोशिश करते हैं जो बताते हैं कि लोग अलग-अलग तरीके से वार्तालाप क्यों करते हैं। और फिर जानने का प्रयास करेंगे कि कैसे इंटरनेट ने भाषा विविधता को और ज्यादा मजबूत करने में सहयोग किया है।
पहला सिद्धांत है- "संघ का प्रभाव"। लोग अपनी भाषाई आदतों को अपने चारों ओर के सामाजिक तंत्रों से लेते हैं चाहे वह परिवार हो या फिर दफ्तर जहां वे रोजाना काम करते हैं। उत्तरी आयरलैंड में 1970 के दशक के दौरान भाषाविद लेसली मिलरॉय ने वहाँ के लोगों में "कार" के कुछ-कुछ "कैर" में बदलते हुए उच्चारण का विश्लेषण किया। बेलफ़ास्ट के एक समुदाय में, जो कि अभी इस बदलाव को अपना ही रहा था, लेसली ने पाया कि इस बदलाव को यहाँ पर यहीं रहने वाली कुछ जवान महिलाओं ने लाया था। ये सभी लड़कियां कस्बे की एक ही दुकान में काम करती थी और उस दुकान के स्टाफ और वहाँ आने वाले ग्राहक इस शब्द को पहले से ही इस्तेमाल में ला रहे थे।
मिलरॉय के इस अध्ययन में अन्य बात निकलकर सामने आई जो थी, कमजोर और मजबूत संबंधों के प्रभाव को लेकर। ये समाजशास्त्र के शब्द हैं जो आपके अन्य लोगों के साथ रिश्तों को लेकर बनाई गई हैं- मजबूत संबंध परिवार और करीबी दोस्तों के साथ तथा दुर्बल संबंध दूर के परिचितों के साथ। मिलरॉय ने पाया कि बहुत सारे कमजोर संबंध होने से भाषाई बदलाव ज्यादा होता है क्योंकि आपको अलग-अलग लोगों के साथ अलग-अलग तरीके से बात करनी पड़ती है। वहीं दूसरी तरफ मजबूत संबंधों के साथ आप बात करने के अलग-अलग तरीके नहीं ढूंढते हैं यानि आप स्वाभाविक रूप से बातचीत करते हैं।
इस सिद्धांत से इस चीज का विश्लेषण करना आसान हो जाता है कि इंटरनेट किस तरह से भाषाई बदलाव की रफ्तार को बढ़ाता है। इंटरनेट कमजोर संबंधों का एक समूह है जिसमे सभी तरह के सोशल नेटवर्क, फोरम और चैट रूम आते हैं जो दूर के यानि जो आपके करीबी नहीं हैं, सगे-संबंधियों से जुडने के काम आते हैं । उदाहरण के लिए ट्विटर भाषाई बदलावों का एक मुख्य इंटेरनेटिया स्त्रोत है क्योंकि यह आपको उन लोगों को फॉलो करने के लिए प्रेरित कर्ता है जिन्हें कि आप जानते तक नहीं हैं (जैसे- कोई बड़ा या सफल आदमी)
मगर किस तरह के लोग इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं और वे पहली बार कब इंटरनेट पर ऑनलाइन आए। इसके बारे में हम अगले पाठ में जानने वाले हैं।
इंटरनेट उपयोगकर्ताओं का ऑनलाइन आने के क्रम में विभाजन
इंटरनेट उपयोगकर्ताओं को आसानी से कुछ श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है और कोई व्यक्ति कौन-सी श्रेणी में आता है, इससे उसकी बातचीत की आदतों का पता लगाया जा सकता है।
इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की पहली श्रेणी में वे लोग आते हैं जिन्होंने इंटरनेट की भाषा के विकास में काफी योगदान दिया है। यह वही चीज है जिसे भाषाविद सलिकोको मुफ़वेने "फाउन्डर इफेक्ट" कहते हैं। इसके अनुसार, किसी भाषा का इस्तेमाल करने वाले शुरुआती लोगों का उस भाषा के बाद के विकास पर काफी ---- प्रभाव पड़ता है।
इंटरनेट के पुराने उपयोगकर्ता तब ऑनलाइन आए थे जब इंटरनेट अपनी शिशु अवस्था में था। ये लोग कंप्युटर के उच्च कोटी के जानकार थे क्योंकि उन दिनों कंप्युटर चलाने के लिए बहुत ज्यादा कोडिंग कमांडों और कुछ प्रोग्रामिंग भाषाओं के ज्ञान की जरूरत पड़ती थी।
अब क्योंकि उस वक्त इंटरनेट चलाने के लिए काफी अच्छे तकनीकी कौशल की जरूरत होती थी इसलिए कंप्युटर के क्षेत्र की तरफ उन दिनों केवल वे ही लोग आकर्षित होते थे जिन्हें तकनीक में रुचि होती थी यानि सबमें एक बात समान थी- तकनीक । इंटरनेट प्लेटफॉर्म जो आज हमें पुराने लगते हैं, ये लोग उन्हें इस्तेमाल किया करते थे। यूसनेट जैसी साइट और इंटरनेट चैट रीले जैसा सॉफ्टवेयर इनके कुछ प्रमुख उदाहरण हैं। पुराने इंटरनेट उपयोगकर्ताओं ने "बाइ द वे" के लिए "बी.टी.डब्ल्यू" और "फॉर योर इनफार्मेशन" के लिए "एफ.ह्वाइ.आइ" जैसे प्रतिवर्णी शब्दों यानि एक्रोनिमों का इस्तेमाल किया। इंटरनेट संदेशों में अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए उन्होंने स्माइली फेस :-) और सैड फेस :-( जैसे इमोटिकॉन्स का भी उपयोग किया।
इसके बाद बारी आती है- अर्ध और पूर्ण इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की। इन लोगों ने इंटरनेट 1990 और 2000 के दशक के अंतिम सालों में चालाना शुरू किया, जब इंटरनेट मुख्यधारा में और आसानी से उपलब्ध हो रहा था।
पूर्ण इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की इंटरनेट से मुलाकात स्कूल के दौरान हुई और ये ज्यादातर युवा थे। उन्होंने दोस्तों को और इंटरनेट को साथ में चलाया। इस समूह के लोगों ने इंटरनेट का इस्तेमाल अपने सगे-संबंधियों से बात करने के लिए किया और इसके लिए उन्होंने एम.एस.एन और ए.ओ.एल् जैसी ऑनलाइन सेवाओं का इस्तेमाल किया।
अर्ध इंटरनेट उपयोगकर्ताओं ने भी इंटरनेट का इस्तेमाल लगभग उसी वक्त शुरू किया जब कि पूर्ण उपयोगकर्ताओं ने शुरू किया था मगर इन्होंने इंटरनेट को अपने पेशेवर काम और दूसरी जरूरत के कामों के लिए ज्यादा उपयोग किया जैसे- खबर पढ़ने के लिए आदि। ये चाहे तो अपने करीबी रिश्तों से बहुत ज्यादा वार्तालाप करने के लिए इंटरनेट का इस्तेमाल कर सकते हैं मगर असल में ये अधिकांशत ऐसा नहीं करते हैं। प्राय: ऐसे लोग कुछ खास कंप्युटर प्रोग्रामों या कामों जैसे- फॉटोशॉप, एम. एस. ऐक्सेल में उच्च-प्रशिक्षित होते हैं।
अब आते हैं आखिरी 2 समूह- इंटरनेट के जमाने से पहले के लोग और इंटरनेट के जमाने के बाद जन्मे लोग । 'इंटरनेट के जमाने के बाद के लोगों' में वे लोग आते हैं जिनके लिए इंटरनेट के बिना दुनिया की कल्पना करना मुश्किल है। ये लोग फेसबूक, व्हाट्सप्प, ट्विटर, यूट्यूब जैसी चीजों के साथ बड़े होते हैं और ये चीजें इन्हें विरासत में मिली होती हैं। 'इंटरनेट से पहले के लोगों में वे लोग आते हैं जो इंटरनेट के आने से पहले जन्में थे लेकिन इसमें भरी जानकारी और सुविधाओं के कारण इसकी ओर आकर्षित हुए। बेहद जल्द ही जब इंटरनेट उपयोग करना एक मजबूरी बन गया और बहुत सारे काम इंटरनेट से होने लगे जैसे- पासपोर्ट बनाना, मौसम का अनुमान आदि, तो इन्होंने इंटरनेट का उपयोग करना शुरू कर दिया।
इंटरनेट का अपना एक अनोखा लेखन का ढंग है
ऑनलाइन बातचीत के कारण भाषा में बदलाव आने का एक अच्छा उदाहरण है चिन्हों का कम होता उपयोग।
आज हम एक-दूसरे को एक बातचीत वाले ढंग में संदेश भेजते हैं। भेजे गए और प्राप्त होने वाले सभी संदेश एक ही स्क्रीन पर दिखाए जाते हैं। ऑनलाइन बातचीत करने में लोग "चिन्हों" जैसे- अल्पविराम, पूर्णविराम का उपयोग कम करना पसंद करते हैं। इसके बजाय वे नए वाक्य के लिए नया संदेश लिखना ज्यादा पसंद करते हैं। इंटरनेट के फैलाव के साथ ही वाक्य खत्म होने पर चिन्ह लगाने से लोगों को परेशानी होने लगी और वे निष्क्रिय आक्रामक होते चले गए। 2013 तक कुछ मुख्य प्रकाशनों जैसे- न्यू रिपब्लिक ने भी लेखन के इस ढंग को अपनाना शुरू कर दिया।
इंटरनेट का एक अन्य नियम है- किसी बात पर जोर डालने के लिए या अपना गुस्सा जाहिर करने के लिए बड़े अक्षरों (कैपिटल लेटर्स) का उपयोग करना।
बड़े शब्दों को प्रयोग करने के पीछे कारण यह है कि जब हम ऑनलाइन बातचीत करते हैं तो अपने भाव अभिव्यक्त करने के हमारे पास साधन नहीं होते। बोलते समय जब हमें किसी बात पर जोर देना होता है तो हम शब्दों को ऊंची आवाज में या धीमे-धीमे बोलते हैं और जब हम चिल्लाना चाहते हैं तो हम बस चिल्ला लेते हैं। लेकिन इंटरनेट पर संदेश भेजते हुए हम चिल्ला नहीं सकते या जोर से नहीं बोल सकते। इसलिए शब्दों को बड़ा-बड़ा करके लिखने की शुरुआत हुई।
इंटरनेट के संदेशों में उपयोग किये जाने वाले छोटे-छोटे इमोटिकोंन जैसे- मुस्कान :-) भी काफी जटिल होते हैं। इसे भी इंटरनेट की दुनियाँ में एक चीज की कमी को दूर करने के लिए बनाया गया था और वो चीज थी- "एक प्यारी-सी मुस्कान" । इंटरनेट को प्राकृतिक रूप से बातचीत का स्थान बनाने के लिए यह एक अच्छा कदम था ताकी बातों को उनके भाव के साथ पहुंचाया जा सके।
मगर आजकल की बात थोड़ी-सी अलग है। अगर आपका कोई दोस्त आपको "तू बहुत बुरा है :-)" संदेश भेजता है तो इसमे :-) का मतलब हो सकता है- "यह एक मजाक है" । एक स्माइली का उपयोग बातों को हल्के ढंग में या कहें मजाकिया लहजे में कहने के लिए किया जा सकता है। अगर आपका बॉस आपको "कल देर मत होना :-)" ऐसा संदेश भेजे तो इसका अर्थ है कि वह तुम्हें कल समय पर पहुँचने की बात याद दिला रहें हैं कोई आदेश नहीं दे रहे हैं।
इसी तरह "लोल" या एल्.ओ.एल् (lol) के भी कई अलग-अलग अर्थ हो सकते हैं। लोल को एक पुराने इंटरनेट उपयोगकर्ता वेन पियर्सन ने 1980 में सबसे पहले एक पुराने इंटरनेट चैटरूम में प्रयोग किया था। उस समय इसे लोटपोट होकर हंसने के लिए प्रयोग किया जाता था मगर आज इसका उपयोग किसी चुटकुले की प्रशंसा करने के साथ ही साथ व्यंग्य दर्शाने के लिए भी किया जाता है।
इसका अंतिम उपयोग सबसे महत्वपूर्ण है। लेखन में व्यंग्य दर्शाया पाना बहुत ही कठिन काम है। भाषण में तो हम अपनी आवाज ऊंची करके या फिर अपनी पलकों को मरोड़कर व्यंग्य को आसानी से व्यक्त कर सकते हैं। इंटरनेट की शुरुआत से सदियों पहले 1688 में ब्रिटेन के प्रकृति दार्शनिक जॉन विलकिनस ने "उलटे विस्मयाधिबोधक" का प्रयोग वाक्य के अंत में करके लेखन में व्यंग्य को दर्शाने का प्रयास किया, मगर उनका तरीका ज्यादा लोकप्रिय नहीं हो सका।
व्यंग दर्शाने का तरीका जो लोकप्रिय हुआ, वह था- "व्यंग्यपूर्ण शब्द के ऊपर टाइल्ड (~) चिन्ह लगाना"। जैसे कि अगर आप व्यंग्य कर सकते हैं- "मुझे करेले खाने में ~बहुत~ (~so~) मजा आता है"। लेखन में टाइल्ड चिन्ह का जब बिना किसी बात के प्रयोग किया जाता है तो इसके पीछे का उद्देश्य होता है पाठक को यह बताना कि संदेश में जितनी गंभीरता से कोई बात लिखी गई है वह उतनी गंभीर है ही नहीं। संभवतया "टाइल्ड" चिन्ह को ज्यादा लोकप्रियता इसलिए भी मिली क्योंकि इसकी ऊपर-नीचे जाती लहरें एक व्यंग्य की आवाज को दर्शाती है। जैसे- बह्ह्ह्हुततत (sooo).
इमोजियों ने इंटरनेट वार्तालाप में एक खाली जगह को भरा है
हममें से हर कोई किसी ना किसी ऐसे व्यक्ति को जरूर जानता होगा जिसे इमोजी ज्यादा रास नहीं आते। उन्हें पसंद नहीं होता कि बात करते वक्त उन्हें किसी कार्टून का सहारा लेना पड़े। संभवतया उन्हें पुराने जमाने का वही तरीका पसंद हो जब चैट बहुत ही सीधे-सरल हुआ करते थे और वे उसे असरदार बनाने के लिए छोटे-छोटे भावों जैसे-:) का सहारा लेते थे। शायद वे एमोजी को पसंद नहीं करते क्योंकि वे उन्ही चीजों का उपयोग करना पसंद करते हैं जिनका कि वे करते आए हैं। या फिर उन्हें लगता है कि इमोजियों से लेखन में फूहड़पना आता है और भाषा बेकार के चिन्हों से खराब होती है।
कारण चाहे जो हो, इमोजी पॉप संस्कृति का एक हिस्सा हैं।
हालांकि इमोजी की खोज एक जापानी सेलफोन कैरियर कंपनी सॉफ्टबैंक द्वारा 1990 के दशक में की गई थी, मगर यह बात भी सही है कि इमोजियों को वैश्विक स्तर पर पहचान 2010 में एंड्रॉयड और आईफोन में उनके लॉन्च होने से मिली। शुरुआत में केवल 608 इमोजी बनाए गए लेकिन जल्दी-से उनकी संख्या में भारी इजाफा हुआ। आज लगभग सभी बड़ी फोन कंपनियां 2800 से ज्यादा इमोजी ऑफर करती हैं।
लेकिन क्या आप बताया सकते हैं कि क्यों इमोजी हमारी रोजाना ऑनलाइन ज़िंदगी का एक अहम हिस्सा बन गए?
इसका उत्तर इससे पहले वाले सबक (पाठ) में छिपा है, जिसमें हमने जाना था कि कैसे लेखन वार्तालाप को दुर्बल बना देता है। इससे हमारे भाव-शारीरिक भाषा व्यक्त नहीं हो पाती और एक खालीपन सा उत्पन्न हो जाता है। इमोजियों ने उसी खालीपन को भरने का प्रयास किया और इसीलिए ये बहुत ही कम समय में ज्यादा प्रचलित हो गए।
हम दो तरीकों से इमोजियों के बारे में विचार कर सकते हैं-
पहला, एक प्रतीक जेस्चर के रूप में । संक्षेप में कहा जाए, तो जेस्चर या भाव-भंगिमा एक ऐसी शारीरिक मुद्रा होती है जिसे हम अपनी बात को अच्छी तरह रखने के लिए उपयोग करते हैं। जैसे- आप किसी मछली का जिक्र करते वक्त हाथ से इशारा करते हैं "इतनी बड़ी" तो यह इशारा एक जेस्चर हुआ । सिद्धांतशास्त्री उन जेस्चर को ही परिभाषित करते हैं जिनका कुछ विशेष नाम होता है। जैसे- हर हिन्दी बोलने वाले आदमी को पता होता है कि आँख मारने और अंगूठा दिखाने का मतलब क्या होता है। इनका मतलब और परिभाषा शब्दकोश में ढूँढने से आसानी से मिल जाती है। इन्हे प्रतीक जेस्चर (ऐम्बलेम) कहते हैं।
सोशल मीडिया और इंटरनेट समुदाय रे ओल्डेनबर्ग के "थर्ड प्लेस" (तीसरा स्थान) सिद्धांत के शानदार उदाहरण हैं
सन 1989 में जब समाजशास्त्री ओल्डेंनबर्ग ने तकनीक के समाज के ऊपर (खासकर टेलीविजन के) प्रभाव को लेकर थर्ड प्लेस सिद्धांत दिया तो संभवतया उनके दिमाग में दूर-दूर तक कहीं भी इंटरनेट का नाम तक नहीं था।
ऑलदेनबर्ग ने इस शब्द का प्रयोग उन सामाजिक जमावड़ों के लिए किया, जो पहले जमावड़े घर और दूसरे जमावड़े दफ्तर से भिन्न थे। थर्ड प्लेस अपनेपन वाली जगहें होती हैं, जहां पर लोग बातचीत, मनोरंजन, आराम और हंसी-मजाक करते हैं। ऑलदेनबर्ग मानते थे कि ये स्थान सामाजिक जीवन, नागरिक जुड़ाव और लोकतान्त्रिक प्रक्रिया के बहुत जरूरी हैं। महखाना और ढाबा थर्ड प्लेस के प्रमुख उदाहरण हैं।
हालांकि ऑलदेनबर्ग ने शायद कभी इस बात पर गौर नहीं किया मगर सोशल मीडिया साइटे भी थर्ड प्लेस का शानदार नमूना है।
जब हम सामाजिक मीडिया के अपने खाते में प्रवेश करते हैं तो हम पुराने और नए दोनों प्रकार के लोगों को आते, बात करते और सामाजिक होते देखते हैं। यहाँ हम लोगों के रोजमर्रा की आदतों से वाकिफ रहते हैं और हमारे करीबी लोगों की ज़िंदगी में होने वाली महत्वपूर्ण घटनाओं से जुड़े रह पाते हैं। अपने पुराने दोस्तों से मिलने के लिए अब हमें मिलने की योजना नहीं बनानी पड़ती है हम ग्रुप के द्वारा आसानी से अपने पुराने मित्रों से जुड़े हुए रह सकते हैं।
पिछले कुछ वर्षों से, सोशल मीडिया खासकर फ़ेसबुक, युवाओं के लिए सामाजिक होने और समय बिताने का एक अच्छा थर्ड प्लेस बन चुका है। आजकल ज्यादातर युवा छुट्टी के दिनों में खेलने के बजाय सोशल मीडिया पर ऑनलाइन जाना, बातचीत करना और फ्लर्ट करना ज्यादा पसंद करते हैं। एक अध्ययन में यह बात सामने आई है कि इंटरनेट के बाद जन्मी पीढ़ी के लोग शराब पीने और सेक्स करने के उतने आदी नहीं हो रहे हैं जीतने कि इंटरनेट से पहले की पीढ़ी के लोग थे। इसका कारण संभवतया इंटरनेट पर समय व्यतीत करना है।
ऑलदेनबर्ग यह भी मानते हैं कि थर्ड प्लेस क्रांतिकारी आंदोलनों में विस्तृत और हल्के-बंधे हुए सामाजिक समूहों को बनाने में भी बहुत सहयोगी रहे हैं। अमरीकी क्रांति में महखानों का और यूरोप के पुनर्जागरण में कॉफीखानों का महत्वपूर्ण योगदान इस बात की जीती-जागती मिसालें हैं।
इससे सोशल मीडिया की थर्ड प्लेस के जैसे होने वाली बात और भी मजबूत होती है। उदाहरण के लिए 2011 में मध्य-पूर्व और उत्तरी अफ्रीका के देशों में अरब स्प्रिंग के दौरान विरोध और असहमति जाहीर करने के लिए जिस प्रमुख ऑनलाइन साधन का उपयोग किया गया था वह था ट्विटर ।
इंटरनेट फोरम और ऑनलाइन समुदाय थर्ड प्लेस के कुछ अन्य उदाहरण हैं। फिलहाल 'रैडिट' इंटरनेट पर मौजूद सबसे लोकप्रिय फोरम है, जिसमें 12 लाख से अधिक ऑनलाइन समुदाय मौजूद हैं, जो मेकअप से लेकर थ्री-डी पेंटिंग जैसे विभिन्न विषयों पर आधारित है। ऑनलाइन कम्यूनिटी एक थर्ड प्लेस के जैसे काम करती है। जैसे- आप रेडिट पर एक "पेंटिंग" कम्यूनिटी में जाते हैं । सबसे पहले तो आपका उद्देश्य पेंटिंग के बारे में जानना होता है। लेकिन इसके बाद आप अपने आप ही लोगों से घुलने-मिलने लगते हैं और उनके नाम और चेहरे आपको अपने आप ही याद होने लग जाते हैं। और इसके बाद आप खुद भी उनके साथ चर्चा में शामिल हो जाते हैं।
मीम इंटरनेट संस्कृति की कड़ी हैं जिन्हे उप-संस्कृतियों के बीच में अंदरूनी-चुटकुलों के रूप में प्रयोग किया जाता है
यह बात उलेखनीय है कि मीम इंटरनेट के भी पहले से मौजूद हैं। विकासशील जैवविज्ञानी रिचर्ड डौकिन्स ने 1976 में मीम शब्द का पहली बार उपयोग किया था जो जीन शब्द से प्रेरित था। डौकिन्स के अनुसार मीम साझा करने लायक सामाजिक संस्कृति का एक ऐसा टुकड़ा है जो समाज द्वारा स्वीकार किये जाने पर प्रचलित होता है।
इस परिभाषा के हिसाब से देखा जाए जो मीम 1976 से पहले भी मौजूद थे। इंटरनेट मीम के जानकार लिमर शिफ़्टमैन, एक पुराने सांस्कृतिक ग्रैफिटी स्केच को इंटरनेटपूर्व मीम की संज्ञा देते हैं।
"किलरॉय वस हियर" मीम, जो द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान अमेरिका में काफी प्रचलित हुआ था, में एक लंबी नाक और बिना बालों वाले आदमी को दीवार पर से हाथ रखकर झाँकते हुए दिखाया गया है।
मीम को आज हम जिस रूप में जानते हैं उसमें एक डिजिटल तस्वीर के ऊपर कुछ शब्द लिखे होते हैं। मीम के इस रूप का चलन मुख्यत: सन 2000 के बाद हुआ। इसके बाद कुछ साइटों ने एक तस्वीर के ऊपर कुछ शब्द लिखने का विकल्प देना शुरू कर दिया। इंटरनेट के शुरुआती प्रचलित मीम "4 चेन" नाम की एक अज्ञात वेबसाइट पर 2005 में प्रचलित हुए थे। इनमें बिल्ली की तस्वीर के ऊपर कुछ मजाकिया/विवेकपूर्ण वाक्य लिखे होते थे। इन्हें 'लोलकैट मीम' कहा जाता है।
इन लोलकैट मीम में जानबूझकर व्याकरण और वर्तनी का गलत प्रयोग किया जाता था। गलत चीजों का उपयोग यह दर्शाने के लिए किया गया कि अगर एक बिल्ली बोल सकती तो वह कितनी गलत अंग्रेजी बोलती। एक लोलकैट मीम में एक बो टाई पहनी हुई बिल्ली को टूटी-फूटी अंग्रेजी में कहते हुए दिखाया गया है- "आई कैन हैज प्रोम डेट?"
मीम में जानबूझकर व्याकरण और वर्तनी की गलती करने का यह अंदाज बाद में एक दूसरे लोकप्रिय मीम में देखा गया- "डोगे" जो कि "डॉग" शब्द की गलत वर्तनी थी। डोगे मीम एक जापानी अध्यापक अटसूकों साटो द्वारा अपने कुत्ते 'शिबा इनू' की खींची गई तस्वीर पर आधारित था । इस मीम में शब्दों को तस्वीर के चारों ओर बेढंगे अंदाज में लगाया गया था। ये शब्द कुत्ते के अंतर्मन के विचारों को जाहिर करते थे। इस मीम का विभिन्न उप-संस्कृतियों ने अपने-अपने मजाकिया अंदाज में उपयोग किया, मगर कुत्ते की अजीब भाषा को बरकरार रखकर।
इंटरनेट पर खेल खेलने वालो के समुदाय के बीच प्रचलित एक मीम में एक कुत्ते को फौज के कपड़ों में फॉटोशॉप के द्वारा दिखाया गया है। इस मीम में एक प्रसिद्ध गेम (कॉल ऑफ ड्यूटी) के शब्दों के अंदाज में लिखा गया है- "कॉल ऑफ डाउग" । इसके अलावा मीम में अलग-अलग स्थानों पर इस गेम से संबंधित शब्दों जैसे- "वॉव", "सो टफ" और "सो प्रो"आदि का प्रयोग भी किया गया है।
मीम की लोकप्रियता सिर्फ इसलिए नहीं बढ़ रही है क्योंकि उन्हें बनाना और फैलाना आसान है। किसी विषय पर बनाए हुए मीम को समझने के लिए आपको उस विषय से जुड़ा हुआ होना चाहिए। मीम से आप किसी विषय की किसी अंदरूनी घंटा से खुद को जुड़ा हुआ पाते हैं मगर विषय से बाहरी लोग नहीं।
अनौपचारिक भाषा के प्रयोग से लेकर कॉल ऑफ डाउग तक इंटरनेट का अंदाज तो बदला, पर हमारे वार्तालाप करने का तरीका नहीं बदला। कुल मिलाकर इंटरनेट से अंग्रेजी भाषा बहुत तेजी से विकसित हुई है।
कुल मिला कर
अंग्रेजी भाषा निरंतर बदलती रही है, मगर इंटरनेट ने इसके बदलाव की रफ्तार को बेहद तेजी से बढ़ाया है। ऑनलाइन दुनिया भाषाई बदलाव के लिए एक शानदार जगह है क्योंकि यहाँ आम लोग भी बिना किसी संपादक और अंग्रेजी शिक्षक के डर से अनौपचारिक ढंग से अपनी बात लिख सकते हैं। और क्योंकि लिखते वक्त बोलने के हमारे कुछ टूल्स जैसे- जेस्चर, शारीरिक भाषा आदि छुप जाते हैं, इसलिए ऑनलाइन वार्तालाप में लोगों ने इनकी कमी दूर करने के लिए कुछ नए तरीके ईजाद किये हैं। हालांकि इलेक्ट्रॉनिक बातचीत हमें कुछ मामलों में प्रतिबंधित भी करती है मगर साथ ही साथ यह हमें बातचीत को असरदार बनाने के लिए कुछ नए टूल्स भी प्रदान करती है, जैसे- मीम का प्रयोग करके एक विशिष्ट समुदाय में हंसी-मजाक किया जा सकता है।
