Brian C. Gunia
नेगोशिएशन का सबसे पुराना और असरदार तरीका जिसे लोग भूलते जा रहे हैं
दो लफ़्ज़ों में
द बार्टरिंग माइंडसेट (The Bartering Mindset) 2019 में आई ये किताब सदियों पुराने बार्टर सिस्टम के नेगोशिएटिंग प्रिंसिपल्स पर आधारित है. बार्टर सिस्टम में लोग अपने सामान के बदले सामान या सर्विसेज एक्सचेंज कर अपनी जरूरतें पूरी कर लेते थे. लेखक कहते कि वो पुराने प्रिंसिपल आज के मोनेटरी इकोनॉमिक्स में भी उतने ही कारगर हैं. इस किताब में लेखक नें इस पुरे सिस्टम को पाँच स्टेप्स में तोडकर समझाया है और हमें नेगोशिएट करने का एक सभ्य और बेहतर तरीका सिखाया है.
ये किताब किसके लिए है?
- उन प्रोफेशनल्स के लिए जो नेगोशिएट करने के नए तरीके सीखना चाहते हैं.
- साइकोलोजिस्ट और इकोनॉमिस्ट के लिए.
- हिस्टोरियन (Historian) और अन्थ्रोपोलॉजिस्ट (Anthropologist) के लिए जो बार्टर सिस्टम के इंटरडिसिप्लिनरी पहलु को समझना चाहते हैं.
लेखक के बारे में
ब्रायन सी.गुनिया (Brian C. Gunia) जॉन होपकिंस कैरे बिज़नस स्कूल (Johns Hopkins Carey Business School) में एसोसिएट प्रोफेसर हैं. उनकी रिसर्च इस बात पर फोकस करती हैं कि लोग अपने एथिकल बिहेवियर, नेगोशिएटिंग स्किल्स और अच्छी नींद लेकर कैसे अपने करियर में आगे बढ़ सकते हैं.उनके रिसर्च कई जाने माने जर्नल में पब्लिश हुए हैं जैसे अकैडमी ऑफ़ मैनेजमेंट जर्नल और जर्नल ऑफ़ एप्लाइड साइकोलॉजी (Academy of Management Journal and Journal of Applied Psychology).
मोनेटरी माइंड सेट नेगोशिएशन के नैरो-माइंडेड एप्रोच को जन्म देता है.
बात चाहे ठेले से सब्जी लेने की हो या किसी एयर कंडिशन्ड शोरूम से कार लेने की अपनी हर जरुरत को पूरी करने के लिए हम पैसों का सहारा लेते हैं. चूँकि पैसों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाना आसान है इसलिए हमारा मॉडर्न मोनेटरी सिस्टम में पैसों का खास रोल है. पैसों नें यूँ तो लेन-देन को काफी आसान कर दिया है, लेकिन अगर साइकोलॉजिकल तौर पर देखें तो इसके काफी नेगेटिव पहलु है.कई साइकोलोजिस्टों नें काफी पहले ही इस बात से आगाह कर दिया था कि पैसों का लोगों के सोचने-समझने के तरीकों पर बहुत गहरा असर पड़ने वाला है. इसे हम मोनेटरी माइंड सेट का नाम दे सकते हैं और इस मोनेटरी माइंड के साथ नेगोशिएटकरना मुश्किल है क्यूंकि ये हमारी सोच को लिमिटेड कर देता है.
लेकिन इसप्रॉब्लम का एकसौल्युशन है जिसे बार्टरिंग सिस्टम कहते हैं. इसके इस्तेमाल से हम नेगोशिएटिंग की समस्याओं केक्रिएटिव सौल्युशन ढूँढ सकते हैं. इस किताब में दिए गए अध्याय ना सिर्फ आपको इस सिस्टम की बारीकियाँ सीखाएँगे बल्कि पाँच स्टेप्स के प्रोसेस के जरिये आपको ये भी बतेयंगे कि आज के मॉडर्न मोनेटरी सिस्टम के साथ आप इसका इस्तेमाल कैसे कर सकते हैं. एक बार आप इसे अपना कर देखें कि कैसे हर डील में जीत आपकी ही होती है.
तो चलिए शुरू करते हैं!
अगर आपने कभी नेगोशिएशन की कोई किताब पढ़ी हो तो आपने डिस्ट्रीब्यूटिव बिहेवियर के बारे में जरुर पढ़ा होगा. इसके मुताबिक अगर आपको किसी के साथ निगोशिएट करके डील हासिल करनी है तो आपको कम्पटीटिव तरीकों को अपनाना होगा जैसे सामने वाले से हर हाल में अपनी बात मनवाना या सबसे पहले अपना ऑफर रखना. इसलिए ज्यादातर निगोशिएटर डिस्ट्रीब्यूटिव बिहेवियर में विश्वास रखते हैं क्यूंकि आमतौर पर यही देखने को मिलता है कि जो पहले ऑफर करने में कामयाब हो जाता है डील ज्यादातर उसके ही हाथ लगती है.
लेकिन अगर हम ध्यान से देखें तो लोगों के डिस्ट्रीब्यूटिव बिहेवियर पर भरोसे का कारण मोनेटरी माइंडसेट है जो कहीं न कहीं हमें इस कम्पटीटिव टैक्टिस की तरफ धकेलता है.
जब आप मोनेटरी माइंडसेट के साथ नेगोशिएटिंग टेबल पर बैठते हैं तो आप अपने साथ बहुत सी धारणायें लेकर आते हैं. सबसे पहले तो आप खुद को एक अलग पार्टी और सामने वाले को दूसरी पार्टी की तरह देखते. साथ ही आपके दिमाग में ये बात चलती है कि एक पार्टी के लिए बेहतर डील जाने-अनजाने दुसरे के लिए घाटे के सौदे जैसा है. इसलिए खरीदने वाली और बेचने वाली दोनों ही पार्टियाँ कोम्प्रोमाईज़ कर लेते हैं और बीच के रास्ते पर सहमत हो जाते हैं. इसका मतलब है कि दोनों को पहले से ही छोटे केक का और भी छोटा स्लाइस मिलता है.
मोनेटरी माइंड सेट के कारण डिस्ट्रीब्यूटिव बिहेवियर और संकुचित मानसिकता का सबसे अच्छा और रीसेंट उदाहरण है अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का जब उन्होंने कहा कि अमेरिका और मेक्सिको के बीच बॉर्डर पर दीवार बनने का खर्चा मेक्सिको उठाएगा. मेक्सिको के प्रेसिडेंट नें इस बात से साफ़ इनकार कर दिया. कुछ ही दिनों में ये लगने लगा कि दोनों में से कोई भी दीवार का सारा खर्चा नहीं उठाना चाहता इसलिए अगर विवाद को रोकना है तो दोनों को मिलकर कोई बीच का रास्ता निकालना होगा.
लेकिन कैसा रहे अगर नेगोशिएशनमें किसी को कोम्प्रोमाईज़ करना ही ना पड़े. यहीं से शुरुवात होती है इंट्रीगेटिव (intregative) बिहेवियर की. इंट्रीगेटिव (intregative) बिहेवियर का मकसद सामने वाली पार्टी को खुश करके म्यूच्यूअल इंटरेस्ट में फैसला करना है और इसके लिए प्रॉपर कम्युनिकेशन और कनेक्शन बिल्डिंग की जरुरत पड़ती है ताकि दोनों पार्टीज सौदे का भरपूर फायेदा उठा सकें वो भी बिना किसी कोम्प्रोमाईज़ के.
रिसर्च के मुताबिक एक सक्सेसफुल नेगोशिएटरवो है वो इंट्रीगेटिव और डिस्ट्रीब्यूटिव बिहेवियर का इस्तेमाल मौके के हिसाब से करे. फोर्ब्स में छपे एक आर्टिकल में लिखा था कि आज-कल टैलेंटेड से टैलेंटेड लोगों को भी सामने वाली पार्टी से हाँ करवाने में मुश्किल आ रही है. इसका मतलब है कि लोग इंट्रीगेटिव (intregative) बिहेवियर का इस्तेमाल नही कर पा रहे. ये जानते हुए कि इंट्रीगेटिव (intregative) बिहेवियर सबके लिए फायेदेमंद है हमारा मोनेटरी माइंडसेट हमें डिस्ट्रीब्यूटिव बिहेवियर की ओर ले जाता है.
अगर आप एक बेहतरीन नेगोशियेटर बनना चाहते हैं तो ये जरुरी है कि आप मोनेटरी माइंडसेट को छोड़कर बार्टरिंग माइंड सेट को अपनायें ताकि हर पार्टी को एक बड़े केक का बड़ा टुकड़ा मिले और किसी को कोई कोम्प्रोमाईज़ ना करना पड़े.
बार्टरिंग माइंडसेट को समझने के लिए आपको बार्टरिंग इकॉनमी को ध्यान से समझना होगा.
हम सबने अपनी लाइफ में कभी न कभी बार्टरिंग का इस्तेमाल किया होगा, हो सकता आपने किसी दोस्त से खिलौना एक्सचेंज किये हो या मम्मी का कोई काम करने के बदले उनसे कोई फेवर माँगा हो. लेकिन फिर भी बार्टरिंग हमारी डेली लाइफ का हिस्सा नहीं है. इसलिए बार्टरिंग माइंड सेट को मोनेटरी इकॉनमी में इस्तेमाल करने से पहले उसे समझना बहुत जरुरी है.
मोनेटरी माइंड सेट की ही तरह बार्टरिंग में भी निगोशिएट करने से पहले मन में कई सवाल होते है. इन सवालों के जवाब ढूँढते हुए आपको कैसे सौदा पक्का करना है उसे समझने के लिए हम एक उदाहरण का सहारा ले लेते हैं. मान लीजिये एक किसान है जिसका नाम है रमण. उसकी खेती अच्छी खासी चल रही थी और उसे बेच कर कमाये पैसों से उसका और उसके परिवार का गुजर भी बढ़िया चल रहा था. तभी एक दिन उसकी बेटी के पैर में फ्रैक्चर हो गया और उसे डॉक्टर की मदद की जरुरत पड़ी. इसलिए उसने अपनी गाड़ी में अनाज भरा और डॉक्टर के पास चल पड़ा. वहाँ जाकर उसे एहसास हुआ कि एक डॉक्टर अनाज की उतनी कीमत नही देगा जितना कि लोहे कीक्यूंकि लोहा औजार बनाने के काम आता है.
इसलिए उसने तय किया कि पहले वो अनाज के बदले लोहा लाएगा फिर डॉक्टर से सौदा करेगा. वो लोहा मंडी पहुंचा तो उसे पता चला कि लोहे का व्यापारी अंडे खाने का शौक़ीन है. इसलिए उसने अपने अनाज के साथ अंडे का भी ऑफर दिया और इस तरह उसे एक अच्छा सौदा मिल गया. वो लोहे का टुकड़ा डॉक्टर को देकर उसने अपनी बेटी का इलाज़ करवा लिया.
इसी तरह अगर आप भी सामने वाले की जरूरतों को ध्यान में रखकर निगोशिएट करेंगे तो बड़ी आसानी से आप अपने लिए एक अच्छी डील हासिल कर लेंगे और साथ ही सामने वाले को भी ठगा हुआ महसूस नहीं होगा. आगे आने वाले अध्यायों में हम सीखेंगे कि रमण की बार्टरिंग सोच को हम अपनी मॉडर्न इकॉनमी के साथ जोडकर कैसे इस्तेमाल कर सकते हैं.
बार्टरिंग माइंड सेट के इस्तेमाल के लिए एक निगोशिएटर को सबसे पहले अपनी नीड्स और ऑफर को समझना होगा.
अगर आपको अपने बॉस से सैलरी बढ़ाने को कहना हो तो आप कैसे कहेंगे? शायद आप उनके साथ मीटिंग करके अपनी परफॉरमेंस डिस्कस करेंगे और फिर उनसे अपनी सैलरी बढ़ाने की बात करेंगे.शायद आपको जितने हाईक की जरुरत हैशुरुवात में आप उससे ज्यादा माँगे ताकि आपका बॉस कम करते-करते फाइनली आपकी चाही हुई अमाउंट के आस-पास सेटल हो जाए. लेकिन अगर इसी प्रॉब्लम को आप बार्टरिंग माइंड सेट के साथ एप्रोच करेंगे तो ना आपको न आपके बॉस को, किसी को भी कोम्प्रोमाईज़ करने की जरुरत नहीं है.इसके बारे में और जानने से पहले ये समझते हैं कि इस माइंड सेट को अपनाने का पहला स्टेप क्या है. वो पहला स्टेप है ये समझना कि आपकी जरुरत क्या है और आपके पास ऑफर करने के लिए क्या है यानी आपकी नीड्स और आपकी ऑफरिंग.
अपनी जरुरत को समझने का मतलब है ना सिर्फ ये जानना कि आपकी जरुरत है क्या बल्कि ये भी पता लगाना होगा कि आपको उसकी जरुरत है क्यूँ. जैसे अगर आपको सैलरी में हाईक चाहिए तो उसका कारण बढ़ते पेट्रोल के दाम या मेहेंगाई हो सकती है जिसके कारण आपको मौजूदा सैलरी में ट्रेवल करने और घर चलाने में दिक्कत महसूस हो रही है. जब आपको अपने सवाल का जवाब मिल जाए तो आप ये जानने की कोशिश करें की आपको कितने हाईक की जरुरत है जैसे हो सकता है आने-जाने के खर्चे को कम करने के लिए आपको ज्यादा माइलेज वाली कार लेनी पड़े. ये सब कैलकुलेट करने के बाद ही आप किसी फाइनल फिगर पर पहुँच सकते हैं.
अपनी जरूरतों को डिफाइन करने के बाद अब बारी आती है ये जानने की कि आपके पास उसके बदले ऑफर करने के लिए क्या है. इसके लिए सबसे पहले ये समझ लें कि आपफ़िलहाल अपने निगोशिएटिंग पार्टनर को क्या वैल्यू प्रोवाइड कर रहे हैं. इस केस में आपका निगोशिएटिंग पार्टनर आपका बॉस है तो आपको ये जानना पड़ेगा कि कंपनी को आपसे क्या फायेदा है. जैसे हो सकता है कि अपनी बेहतर एनालिटिकल स्किल्स के कारण आप हमेशा हर रिपोर्ट को बड़ी ही बारीकी से बनाते हों.
अंत में आप ये सोचें कि आप क्या ऑफर करेंगे. जैसे अगर आपका बॉस हर समय ट्रेवल करते हुए मीटिंग्स अटेंड करने से परेशान है तो आप चाहें तो उसके कुछ प्रोजेक्ट्स की जिम्मेदारी ले सकते हैं ताकि आप उसकी ट्रेवलिंग को कम कर सकें. या फिर आपके पास कोई ऐसी स्किल हो जिससे आप किसी और डिपार्टमेंट का रुका हुआ काम कर सकते हैं या कंपनी की कोई बड़ी प्रॉब्लम सौल्व कर सकते हैं.
हो सकता है ये सब सोचना और करना आपको थोडा बचकाना लगे लेकिन यकीन मानिये आपके लिए इससे बेहतर तरीका कोई नहीं है. और याद रहे जब तक आप निगोशिएट करने के क्रिएटिव तरीके ढूँढतेरहेंगे तब तक आप बिलकुल सही ट्रैक पर हैं.
अपने निगोशिएटिंग पार्टनर की जरूरतों और ऑफर के बारे में जानना और उसे समझना भी बहुत जरुरी है.
इसके पहले के अध्याय में आपने अपनी जरूरतों और ऑफरिंग के बारे में समझा उसके बाद आपको अपने निगोशिएटिंग पार्टनर की जरूरतों और ऑफरिंग को समझना भी बहुत जरुरी है तभी आप बेहतर तरीके से निगोशिएट कर पाएंगे.डील की अलग-अलग संभावनायों को एक्स्प्लोर करने के लिए आपको थोडा क्रिएटिव होकर सोचना होगा.
मान लीजिये आप एक छोटा सा कैफ़े चलाते हैं जिसकी आपके शहर में अच्छी खासी रेप्युटेशन है. आपकी कॉफ़ी और पेस्ट्री लोगों को काफी पसंद आती है. लेकिन बढती मेहेंगाई और स्टाफ का खर्चा बढ़ने के कारण आपका प्रॉफिट कम हो गया है, ऊपर से दूकान का मालिक भी अगले महीने से रेंट बढाने की बात कर रहा है. अब आप बहुत परेशान हैं कि इतना कुछ आप कैसे हैंडल करेंगे कहीं आपको कैफ़े बंद ना करना पड़ जाए.
पहले अध्याय की सीख से हम अपनी नीड्स तो समझगए कि हमें अपना कैफ़े बचाना है. आपको ये भी पता है कि इसके लिए आपको खर्चे कम करने होंगे, अपना प्रॉफिट बढ़ाना होगा और किसी न किसी से टाईअप करके अपना बिज़नस बढ़ाना होगा. अगर आप मोनेटरी माइंड सेट से सोचें तो आप सबसे पहले क्या करते सीधा जाकर अपने दूकान के मालिक से किराया कम करने की बात करते या फिर अपने प्रोडक्ट्स और सर्विसेज का प्राइस बढ़ा देते. लेकिन बार्टरिंग माइंड सेट में आपके पास बहुत से ऑप्शन हैं जिनसे आप कई नए ट्रांजेक्शन पार्टनर ढूँढ सकते हैं.
जैसे आप अपना प्रॉफिट बढाने के लिए अपने कैफ़े के आस-पास के थिएटर या स्कूल कॉलेज में जाने वालों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर सकते हैं. अपना खर्चा कम करने के लिए आप फैंसी सुपर मार्केट की जगह किसी होलसेल लोकल मार्केट से सामान खरीद सकते हैं. फाइनली आप लोकल लोगों की मदद से अपने कैफ़े में कुछ नया कर सकते हैं जैसे किसी लोकल सिंगिंग, म्यूजिक या डांसिंग आर्टिस्ट को अपने कैफ़े में अपना टैलेंट दिखने का मौका दे सकते हैं.
एक बार आपने अपनी प्रॉब्लम का क्रिएटिव सौल्युशन ढूँढ लिया और अपने ट्रांजेक्शन पार्टनरडिसाइड कर लिए तो आपको उनकी जरूरतों और ऑफर के बारे में सोचना शुरू करना होगा. जैसे स्कूल कॉलेज या मूवी जाने वालों का ध्यान अपनी ओर खींचने के लिए आपको वहाँ अपने कैफ़े का प्रचार करना होगा. लोकल मार्केट में पेस्ट्री बेचने के लिए किराना स्टोर वाले को कुछ अच्छा ऑफर देना होगा या लोकल आर्टिस्ट को अपने कैफ़े में परफॉर्म करने के बदले आप कुछ डिस्काउंट दे सकते हैं. इसी तरह आप अपनी क्रिएटिविटी के साथ अपने कस्टमर्स को एक अच्छा अम्बिएंस और अच्छी सर्विसेज देकर कैफ़े का नाम और बढ़ा सकते हैं. तो आपने देखा कि कैसे लोगों की जरूरतें एक दुसरे से जुडी हुई है आप इस तरह सोच कर और अपनी और दूसरों की मिलती जुलती जरूरतों पर फोकस करके अपनी प्रॉब्लम के नए सौल्युशन निकाल सकते हैं.
रिलेशनशिप एस्टेब्लिश करके और ट्रेड के कास्ट और बेनिफिट समझ कर आप अपने लिए पॉवर पार्टनरशिप ढूँढ सकते हैं.जब आपने अपने पार्टनर कीजरूरतों और ऑफर को समझ लिया तो अब बारी है स्टेप 4 की जिसमें आप अपनी नीड्स और ऑफरिंगके साथ उसेकम्पेयर कर के देखेंगे और इस तरह से आप एक मजबूत पार्टनरशिप की शुरुवात कर सकते हैं.
अपने पार्टनर के साथ आपकी कितनी बनेगी कितनी नहीं इसका पता आप तीन स्टेप्स में लगा सकते हैं पहले स्टेप में एक कॉलम में ये लिखें की आप अपनी किस ऑफरिंग से उनकी किस जरुरत को पूरा करेंगे और दुसरे कॉलम में लिखें कि उनके किस ऑफर से आपकी कौनसी जरूरतें पूरी होंगी. जैसे थिएटर वाले मूवी से पहले आपकी शॉप का ऐड चला सकते हैं जिससे लोगों को आपकी शॉप के बारे में पता चले बदले में आप अपने कैफ़े मेंथिएटर में लगने वाली मूवीज के पोस्टर लगा सकते हैं.
अगले स्टेप में आप इस सौदे का कास्ट और बेनिफिट निकालें ना सिर्फ अपने लिए बल्कि अपने पार्टनर के लिए भी. जब आप किसी काम की कास्ट निकाल रहे हों तो केवल पैसा ही नहीं टाइम के फैक्टर के बारे में भी जरुर सोचिये. इसके लिए आपको हर छोटे-छोटे खर्चे को कैलकुलेट करने की जरुरत नहीं है बल्कि आपको बस इतना ही पता लगाना है कि कौनसे पार्टनर से आपको कितना फायेदा होने वाला है.
तीसरा और आखरी स्टेप है ये पता लगाने का कि कौनसा पार्टनर आपके लिए कितना फायेदेमंद रहेगा. इस स्टेप पर काम करने की शुरुवात तो आपने दुसरे स्टेप के साथ ही कर ली थी. यहाँ आपको किसी मैथमेटिकल फार्मूले की जरुरत नहीं बल्कि बस पार्टनरशिप को कास्ट और बेनिफिट के अनुसारचार केटेगरीयों में बाँटना हैं :- हाई बेनिफिट/लो कास्ट, हाई बेनिफिट/हाई कास्ट, लो बेनिफिट/ लो कास्ट, लो बेनिफिट/हाई कास्ट.
अब अपनी नयी लिस्ट के साथ आप अपने पोटेंशियल पार्टनर को ढूँढ सकते हैं. चूँकि बहुत से पार्टनरों की जरूरतें एक दुसरे के साथ ओवरलैप करती है इसलिए आप एक के साथ किये गए ट्रेड को दुसरे के साथ ट्रेड करते समय कॉम्प्लीमेंट के तौर पर इस्तेमाल कर सकते हैं. जैसे अगर थिएटर में ऐड दिखाने से आपके कैफ़े में कस्टमर्स बढ़ गए तो हो सकताहै आर्टिस्ट आपके कैफ़े में परफॉर्म करने में ज्यादा इंटरेस्ट दिखाएं क्यूंकि अब उन्हें यहाँ बहुत एक्सपोज़र मिलेगा.
अपने और अपने पार्टनर्स के साथ रिलेशनशिप और ट्रेड को समझ कर आप पता लगा सकते हैं कि कौनसा पार्टनर आपके लिए कितना फायेदेमंद है. अगर आप ये सोच रहे हैं कि आप इतने सारे झंझटों में पड़े ही क्यूँ तो अगले अध्याय को पढ़ें आप समझ जायेंगे कि इससे आपको कितना फायेदा होने वाला है.
बार्टरिंग माइंडसेट को अपनाने का पाँचवा स्टेप है एक मजबूत पोटेंशियल पार्टनरशिप को एस्टेब्लिश करना.
एक बार आपने ये समझ लिया कि कौनसा पार्टनर आपको कम कास्ट में ज्यादा फायेदा दे सकता है, तो आप निगोशिएट करने के लिए तैयार हैं. लेकिन ये याद रखना जरुरी है कि एकदम से डील में कूदने से पहले जरुरी है कि आप अपने पार्टनर से बात करके उससे उसके और मार्केट के बारे में जानकारी इक्कठी करें.
इसे आप कुछ इस तरह समझ सकते हैं कि अभी तक आपने जो भी सोचा है केवल कागज पर लिखी बातें है और अब बारी है उसे टेस्ट करने की ताकि किसी भी डील में कूदने से पहले आपको रियल वर्ल्ड की जानकारी मिल जाए. रियल वर्ल्ड में पार्टनरशिप बनाना एक फाइव स्टेप प्रोसेस है सबसे पहले जान-पहचान बनाएं, फिर अपनी जरूरतें उसके सामने रखें, आप उसकी जरूरतें कैसे पूरी करेंगे ये बताएं, आपकी जरूरतें वो कैसे पूरी करेगा ये देखें और अपना फाइनल डिसिशन तैयार करें.
आईये इस फाइव स्टेप प्रोसेस को कॉफ़ी शॉप के उदाहरण से समझते हैं. जैसा की आपने तय किया था कि आपको अपनी पेस्ट्री किसी लोकल किराना शॉप पर भी बेचनी है यानी किराना शॉप का वो दुकानदार आपके 6 पोटेंशियल पार्टनरों में से एक है. ऐसे में उसके सामने अपनी डील रखने से पहले आपको उसके साथ एक विश्वास का रिश्ता कायम करना होगा जान पहचान बनानी होगी. उससे मिलें उसे अपने बारे में बताएं देखें आप दोनों में अगर कुछ कॉमन है तो उस आधार पर दोस्ती की शुरुवात करें. जब आपको लगे कि वो आपके साथ कम्फ़र्टेबल महसूस करने लगा है तो उसके साथ अपनी प्रॉब्लम शेयर करना शुरू करें. जब आप अपनी जरूरतें और प्रॉब्लम शेयर करेंगे तो वो भी करेगा. जैसे मान लें आपने उसे बताया कि आप अपने कैफ़े की पेस्ट्री अपने शॉप से बाहर भी बेचना चाहते हैं लेकिन अभी आपके पास नयी ब्रांच खोलने के पैसे नहीं हैं तो आप किसी लोकल किराना शॉप से डील करना चाहते हैं. उसनें भी आपको बताया कि जबसे सुपरमार्केट का चलन आया है उसकी दूकान की बिक्री पर भी काफी असर पड़ा है.
उसकी बातों को सुनने के बाद आप उसे अपना आईडिया बता सकते हैं कि अगर वो आपकी पेस्ट्री अपनी दूकान पर बेचेगा तो आप अपने कैफ़े पर आने वाले कस्टमर्स को उसकी दूकान के नाम का पैम्फलेट देकर उसकी दूकान को मशहूर कर सकते हैं. बदले में वो पेस्ट्री बेचते हुए अपनी दूकान के किसी कोने पर आपकी कैफ़े का नाम लिख सकता है.
अपनी बात ख़त्म करने से पहले ये जरुरी है कि आप एक बार फिर से उसे दोनों पार्टीयों के फायेदे के बारे में बताएं और उसे इस डील के बारे में सोचने का समय दें. एक बार आपने अपने लिस्ट किये हुए सभी पोटेंशियल पार्टनर्स को इस तरह से एप्रोच कर लिया तो आपको काफी सारी एडिशनल इनफार्मेशन मिलेगी जिसे आप अपनी लिस्ट को दुबारा तैयार कर सकते हैं वो भी रियल वर्ल्ड के फैक्ट्स के आधार पर.
मल्टी इशू ऑफर (Multi-issue-offer MIO) के इस्तेमाल से बार्टरिंग माइंड सेट और मोनेटरी माइंडसेट के बीच एक ब्रिज बनाया जा सकता है.
जैसे ही आपने ये तय कर लिया कि कौन-कौन असल में आपका पार्टनर बन सकता है तो बारी है आती है अपने निगोशिएशन के वैल्यू क्लेमिंग फेज की यानी जहाँ से असल काम शुरू होना है. अब यहाँ आपको अपने माइंड सेट को धीरे से बार्टरिंग से मोनेटरी की तरफ लाना है क्यूंकि इस मॉडर्न टाइम में हमें आखिरकार तो पैसे का एक्सचेंज ही करना पड़ता है.लेकिन अगर आप अपने माइंड सेट को एकदम से बदल लेंगे तो इतनी देर से अपने जो मेहनत की थी उसपर पानी फिर जायेगा. आईये समझते हैं कि ये काम आपको कैसे करना है.
बार्टरिंग और मोनेटरी सिस्टम को एक साथ चलाने का सबसे आसान तरीका हैमल्टी इशू ऑफर (MIO). जहाँ एक तरफ हम सिंगल इशू ऑफर में हर निगोशिएबल पॉइंट्स पर एक-एक कर के डिस्कशन करते हैं वहीं इशू ऑफर में हम सभी पोंट्स को एक ही बार में डिस्कस करते हैं. जैसे किराने की दूकान वाले को जब आप पेस्ट्री बेचने का ऑफर देंगे तो पेस्ट्री के चार्जेज, उसके दूकान का विज्ञापन और अपने कैफ़े का रेफरल सबके बारे में एक साथ बात करनी होगी.
आपका ऑफर कुछ ऐसा हो सकता है- एक कॉलम में आप उसे बतायें कि आप उसे हर दिन 500 पेस्ट्री देंगे और साथ में अपने कैफ़े पर आने वाले कस्टमर्स को उसकी दूकान के बारे में छपा हुआ एक कूपन देंगे जिससे उसका बिज़नस बढेगा. दुसरे कॉलम में आप उसे बतायेंगे कि इन सबके बदले वो उसे हर पेस्ट्री के 30 रूपये देगा और साथ ही 1000 रुपए हर महीने कूपन प्रिंट करने के प्रिंटिंग चार्जेज के तौर पर देगा और अपनी शॉप में आपके कैफ़े का पोस्टर भी लगाएगा.
चूँकि ये आपका इनिशियल ऑफर है इसलिए जाहिर सी बात है कि इसमें आपने अपना फायेदा देखा होगा. यानी बड़ी आसानी से आपने बार्टरिंग सिस्टम से मोनेटरी सिस्टम में स्विच किया. दुकानदार को भी इसमें कुछ गलत नही लगेगा क्यूंकि उसे फील होगा कि इसमें उसका भी फायेदा है. इसी तरह हर पहलु को एक ही बार में डिस्कस करके आप दोनों पार्टीज को डील के बारे में सीरियसली सोचने पर मजबूर कर सकते हैं. ज्यादा से ज्यादा वो आपके ऑफर में कुछ बदलाव करने को कह सकता है जैसे हर दिन 500 की जगह 300 पेस्ट्रीज 30 की जगह हर पेस्ट्री के 25 रुपए प्रिंटिंग के 700 हर महीने ऐसा कुछ.
अपने निगोशिएशन के तरीके से आप म्यूच्यूअल बेनिफिट के हर तरीके पर रौशनी डाल सकते हैं और इससे आपको ये भी पता चल गया कि वो पेस्ट्री के नंबर को लेकर थोडा हिचकिचा रहा है शायद वो एक दिन में उतनी पेस्ट्री ना बेच पाए, हो सकता है इससे आपको एक नया और इससे भी शानदार ऑफर बनाने में मदद मिल जाए.
इन सबके बावजूद अगर दुकानदार आपके ऑफर से अग्रीनहीं करता तो आप आसानी से इस बात को वहीं छोड़ सकते हैं वो भी बिना अपना रिश्ता खराब किये. उसके बाद आप बाकी के पोटेंशिअल पार्टनरों के बारे में सोच सकते हैं और ढूँढ सकते हैं कि कौन आपके लिए सबसे ज्यादा फायेदेमंद साबित होता है.
कुल मिलाकर
बार्टरिंग माइंड सेट को अपना कर आप बेहतर तरीके से निगोशिएट कर सकते हैं. अपनी जरूरतों, अपने ऑफर और अपने पोटेंशिअल पार्टनर को समझने के लिए थोडा वक़्त निकालकर आप अपनी सभी प्रॉब्लमों के लिए बेहतर सौल्युशन ढूँढ सकते हैं और म्यूच्यूअल अंडरस्टैंडिंग से दोनों पार्टीज के फायेदे का सौदा कर सकते हैं.
येबुक एप पर आप सुन रहे थे The Bartering Mindsetby Brian C. Gunia
ये समरी आप को कैसी लगी हमें yebook.in@gmail.comपर ईमेल करके ज़रूर बताइये.
आप और कौनसी समरी सुनना चाहते हैं ये भी बताएं. हम आप की बताई गई समरी एड करने की पूरी कोशिश करेंगे.
अगर आप का कोई सवाल, सुझाव या समस्या हो तो वो भी हमें ईमेल करके ज़रूर बताएं.
और गूगल प्ले स्टोर पर ५ स्टार रेटिंग दे कर अपना प्यार बनाएं रखें.
Keep reading, keep learning, keep growing.
