Thank You for Arguing

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Thank You for Arguing

Jay Heinrichs
एरिस्टोटल की तरह बनिये, बहस में कभी दोबारा हार का सामना न करना पड़ेगा

दो लफ्जों में
यह किताब थैंक यू फ़ॉर अरगुइंग जोकि साल 2013 में पब्लिश हुई थी, हमें भाषण कला यानी कि rhetoric के आर्ट के बारे में बताती है। इस समरी में हम जानेंगे कि आखिर rhetoric है क्या? परसुऐशन किस प्रकार वर्क करता है? और किस प्रकार आप किसी बहस को रिसर्च और इतिहास के महान वक्ता की थ्योरी के जरिये जीत सकते हैं।

यह किताब किसके लिए है?
- यह किताब उस व्यक्ति के लिए है जो की अच्छी आर्गुमेंट यानी कि बहस करने में दिलचस्पी रखता है। 
- पॉलिटिशियन या फिर वो कोई भी व्यक्ति जो पॉलीटक्स पर बहस करता है।
- यह किताब उन पेरेंट्स के लिए भी है जो अपने बच्चों को परसुऐट करना चाहते हैं। 

लेखक के बारे में
जे हेनरिक्स एक एडिटर और पब्लिशिंग एग्जीक्यूटिव रह चुके हैं। Rhetoric को फुल टाइम जॉब के तौर पर अपनाने के लिए उन्होंने अपना करियर बदल दिया। अब वो rhetoric के टेक्निक पर ब्लॉग्स लिखते हैं और बहस पर आधारित वर्कशॉप ऑर्गनाइज करते हैं।

आज के युग में इस बात का कितना महत्व है
जब कभी आप किसी दो इंसान के बीच बहस के बारे में सोचते हैं तो आपके दिमाग मे सबसे पहला यही ख्याल आता है कि जब दो लोग बहस कर रहे होते हैं तो आमतौर पर वो एक दूसरे के ऊपर चिल्ला रहे होते हैं। लेकिन बहस का मतलब सिर्फ वर्बल अटैक नहीं होता। 

बहस एक इफेक्टिव तरीका होता है जिसके जरिये दो या उससे अधिक लोग एक कॉमन कन्क्लूजन तक पहुंच सकें। हालांकि बहस कभी कभी पैशनेट हो सकती है और बहस के दौरान गरमा गर्मी भी हो सकती है लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि बहस को हमेशा नफरत और द्वेष के साथ जोड़ा जाए। 

जब बहस को आप अलग पर्सपेक्टिव के साथ देखेंगे तो आप पाएंगे कि ये एक टेक्निक की तरह होती है जिसको पढा और इम्प्रूव किया जा सकता है। 

उस टेक्निक को सीखकर न सिर्फ बहस और मजेदार हो सकती है बल्कि इससे आप एक ऐसे व्यक्ति बन सकते हैं जोकि बहस करने में सक्षम होंगे। और यही सब हम इन लेसन में पढ़ेंगे।

किसी भी इंसान के जीवन में बहस का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। बहस करने से न सिर्फ हमारा व्यक्तित्व इन्फ्लुएंस होता है बल्कि हमारे द्वारा लिए जाने वाले फैसलों को भी एक प्रापर दिशा मिलती है। 

जब कभी दो लोग एक दूसरे के साथ किसी टॉपिक पर गुस्से में चिल्ला कर एक दूसरे से बात कर रहे होते हैं तो ज्यादातर लोग उसे ही बहस करना समझते हैं। और ऐसा हो भी क्यों न, समाज ने आज तक हमें यही सिखाया है कि बहस करने का दूसरा मतलब एक दूसरे से लड़ाई करना या फिर तेज आवाज में बातें करना ही होता है। लेकिन वाकपटुता यानी कि बहस करने की कला (द आर्ट ऑफ आर्गुमेंटेशन) समाज मे मौजूद उन ज्यादातर लोगों की सोच से भी काफी बढ़ कर है। अगर कम शब्दों में कहें तो वक्रपटुता, स्किल्स और टेक्नीक का वो महत्वपूर्ण कॉम्बिनेशन है जो कि बहस करने वाले व्यक्तियों को वो मदद प्रदान करता है जिससे कि वो अपने विपक्षी को अपनी बात पर राजी कर सके। ग्रीस के इतिहास में भी इस बात को सच साबित करने के कई सबूत देखने को मिलते हैं। 

इतिहास की बात बाद में करेंगे पहले यह जान लेते हैं कि आज के युग में इस बात का कितना महत्व है?

विज्ञापनों से ले कर राजनीतिक भाषणों में, किताब से लेके ब्लॉग्स में, किचन से लेके अदालत में हमें बहस का अलग अलग प्रकार देखने को मिल जाता है। बहस, इंसान की रोजमर्रा की जिंदगी में एक बहुत महत्वपूर्ण रोल अदा करती है। आज के जमाने मे भी वक्रपटुता हमारी सोच के अनुसार ढल रही है और हम इस बात को नोटिस भी नहीं कर पा रहे हैं। 

एक बहुत ही आम धारणा लोगों के बीच मे यह बनी हुई है कि बहस हमें लड़ाई की ओर ले जाती है। लेकिन बहस करने का मुख्य लक्ष्य यह होता है की एक ऐसे रिजल्ट पर पहुँचा जाए जिसमें सबकी सहमति हो। यानी कि बहस का मुख्य लक्ष्य उसे जीतना नहीं बल्कि अपनी ऑडियंस को जीतना होता है। अपनी ऑडियंस को अपनी बात मनवा कर और उनकी सहमति लेकर ही आप किसी बहस को जीता हुआ मान सकते हैं। 

मनोविज्ञान के प्रोफेसर जॉन गोटमैन की एक स्टडी ने इस बात को पूरी तरह साबित भी कर दिया है। एक थेरेपी के दौरान उन्होंने कपल्स को ऑब्सर्व किया। अपनी स्टडी के दौरान उन्होंने पाया कि शादी शुदा कपल्स के बीच में भी उतनी ही बहस होती है जितनी कि अनमैरिड कपल्स के बीच में होती है। लेकिन उन्होंने एक बहुत ही महत्वपूर्ण डिफरेंस भी नोटिस किया। उन्होंने देखा कि शादी शुदा कपल्स अपने बीच हुई बहस को समय के साथ सुलझा लेते हैं और अनमैरिड कपल ज्यादातर उस बहस की वजह से ब्रेकअप कर लेते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो शादी शुदा कपल्स ने जो किया उसको बहस कहा जा सकता है क्योंकि अंत में वो कपल एक रिजल्ट पर पहुंच गया और बहस सुलझ गयी जबकि अनमैरिड कपल ने जो किया उसको बहस नहीं कह सकते, उसको लड़ाई कहा जायेगा क्योंकि किसी बात पर सहमति होने को बजाय उसकी वजह से उनका रिश्ता खत्म हो गया। 

यानी कि बहस को जीतने के लिए लड़ाई करना या अग्रेसिव होना बहस करने का सही तरीका नहीं है। ऐसा करने से आप किसी सहमति पर नहीं पहुंच सकते। तो फिर आइये जानते हैं कि सबसे बेहतर तरीका क्या है? 

ग्रीक फिलॉस्फर एरिस्टोटल के अनुसार बहस करने का सबसे स्ट्रांग तरीका है सिडक्शन। सिडक्शन यानी कि लालच। अपनी ऑडियंस को लालच देना, उन्हें ये समझाना कि उन्हें भी वही चाहिए जो आपको चाहिए, बहस जीतने का सबसे आसान तरीका है। और इसी की मदद से आसानी से सहमति पर पहुंचा जा सकता है।

बहस तभी करनी चाहिए जब आपको यह पता हो कि आप क्या साबित करने के लिए बहस कर रहे हैं
बहस करने के पीछे लोगों का मुख्य उद्देश्य यही होता है कि वो सामने वाले को मजबूर कर दें अपनी बात मनवाने के लिए। बहुत से लोग सिर्फ और सिर्फ अपने विपक्षी को हराने के उद्देश्य से उससे बहस करना शुरू करते हैं। लेकिन सोचिये अगर बहस का अंत कुछ इस प्रकार हो कि आपका विपक्षी आपकी बात से एग्री ही न करे तो फिर बहस करने का क्या फायदा हुआ। इससे अच्छा तो यही होता कि आप फालतू में बहस करके अपना और सामने वाले का समय बर्बाद न करते। इस चीज से कैसे दूरी बनाए जा सकती है?

सबसे पहली और महत्वपूर्ण चीज यह है कि सिर्फ बहस करने के लिए बहस न करें। बहस करना तभी फायदेमंद होता है जब उस बहस की वजह से आप वो हांसिल कर लें जो आप हांसिल करना चाहते हैं। उदहारण के तौर पर मान लीजिये की आपको अपने दोस्त को कन्विन्स करना है किसी काम को करने के लिए। तो इस केस में आपका लक्ष्य यह है कि आप अपने दोस्त से वो काम करवाएं। अगर आप बहस करने के बाद भी अपने दोस्त से वो काम करवाने में नाकाम रहे तो बहस करने का क्या फायदा हुआ। यह जरूरी नहीं कि बहस के अंत में जीत उस व्यक्ति की हो जो सामने वाले को चुप करा दे। बहस में किसी की जीत तभी होती है जब वो इंसान उस चीज को हांसिल कर लेता है जिसके लिए उसने बहस शुरू की थी।

एक उदहारण लेकर इस बात को समझते हैं। मान लीजिए कि एक लो स्पीड जोन में जहां पर स्पीड लिमिट 50 किलोमीटर प्रति घण्टा है, उस जगह पर आप 51 किलोमीटर प्रति घण्टा की रफ्तार से ड्राइव कर रहे और अचानक से आपको एक पुलिस अफसर ने रोक लिया। अब ज्यादातर लोगों का सबसे पहला रिएक्शन ये रहेगा कि जब पुलिस अफसर उनके पास आएगा तो वो उसके साथ बहस में उलझ जाएंगे। लेकिन जो समझदार व्यक्ति होगा उसको पता होगा कि उसे इस सिचुएशन से किसी भी प्रकार से बाहर निकलना है, तो इसलिए वो व्यक्ति अपनी गलती मानकर उसके लिए माफी मांग लेगा। इससे होगा ये कि अफसर को लगेगा कि ड्राइवर ने उसकी अथॉरिटी की इज्जत की और शायद इस वजह से वो आपके ऊपर फाइन लगाने की बजाय आपको समझाकर जाने दे। 

इसलिए अपने दिमाग में हमेशा अपना लक्ष्य निर्धारित करके रखें। हर बार खुद को सही साबित करने की कोशिश न करें। अगर आपका विपक्षी आपको नीचा दिखाने की कोशिश कर रहा है तो उसे ऐसा करने दें क्योंकि ऐसा करने से जरूरी नहीं कि वो बहस में आपसे जीत जाए। क्योंकि आपका मकसद है अपना लक्ष्य हांसिल करना न कि किसी को नीचा दिखाना। 

क्या आपको 2004 में अमेरिका के प्रेसिडेंट पद के उम्मीदवार जॉन केरी और जॉर्ज वाशिंगटन बुश के बीच की डिबेट याद है? पोल्स का मानना था कि जॉन केरी ने अपने लॉजिक की मदद से वो डिबेट जीत ली थी लेकिन जब चुनावी नतीजे सामने आए तो जॉर्ज वाशिंगटन बुश प्रेसिडेंट का चुनाव जीत गए। यानी कि बुश का लक्ष्य उनके दिमाग में तय था, उनकी नजरें प्रेसिडेंट के चुनाव पर थी जबकि केरी की नजरें बहस में खुद को सुपीरियर साबित करने पर।

कोई भी बहस का मुख्य कारण कोई एक टॉपिक होता है यानी कि बहस सिर्फ उसी टॉपिक के इर्दगिर्द घूमती है और उस टॉपिक के मुख्य मुद्दों का पता लगाकर ही बहस का सही परिणाम मिल सकता है। 

कई बार ऐसा होता है कि बहस करने से भी कोई रिजल्ट नहीं मिलता क्योंकि बहस करने वाले दोनों व्यक्ति अलग अलग मुद्दों पर अपनी राय रख रहे होते हैं। एरिस्टोटल के मुताबिक हर बहस का नीचे बताए गए तीन कारणों में से कोई न कोई एक कारण होता है। 

सबसे पहला आरोप। किसी चीज को लेकर किसी दूसरे व्यक्ति पर आरोप लगाने से कई बार बहस शुरू हो जाती है। मान लीजिए कि आप बाथरूम इस्तेमाल करने टॉयलेट में गए और वहां आपने देखा कि किसी ने पूरा टॉयलेट पेपर ही इस्तेमाल कर लिया है। अब आप गुस्से में बाहर आके यही बोलेंगे की आखिर किसने पूरा टॉयलेट पेपर यूज़ कर लिया है। इससे बहस शुरू हो सकती है। 

दूसरा कारण वैल्यू। वैल्यू यानी कि आदर्श। यदि आप किसी के द्वारा बनाये गए और पालन किए जाने वाले आदर्शों पर सवाल उठाएंगे तो तय है कि बहस शुरू हो जाएगी। जैसे के आप किसी से पूछ लेते हैं कि क्या डेथ पेनल्टी को लीगल होना चाहिए या नहीं। इस बात पर दो लोगों की राय अलग हो सकती है और इससे बहस की शुरुआत हो सकती है। 

तीसरा कारण एरिस्टोटल के मुताबित जो है, वो है च्वाइस, च्वाइस यानी कि विकल्प। जब आप किसी इंसान को विकल्प देते हैं तो हो सकता है कि इससे भी बहस की शुरुआत हो जाये। ऐसी परिस्थिति तब पैदा होती है जब आपसे कोई ऐसा सवाल कर ले जैसे की क्या चीन में रेलोकेट करना सही रहेगा?

लेकिन सोचिये की ऐसा क्यों जरूरी है कि बहस के कारण को पहचाना जाये?

इसका जवाब बहुत ही सिंपल है। अगर आपको बहस का मुख्य कारण ही पता नहीं होगा तो आप कभी पॉजिटिव रिजल्ट तक नहीं पहुंच पाएंगे। एक उदहारण लेके इस बात को समझते हैं। मान लीजिए एक पति पत्नी साथ में घर के ड्राइंग रूम में बैठे हुए हैं। पत्नी का मन बुक पढ़ने का हो रहा है और पति की इच्छा है कि वो अपने पसंदीदा बैंड रोलिंग स्टोन्स का स्टीरियो म्यूजिक सुने। अब दोनों काम एक साथ तो हो नहीं सकते क्योंकि अगर पति तेज आवाज में गाने सुनने लगेगा तो इससे पत्नी को बुक पढ़ने में प्रॉब्लम आएगी। अब अगर पत्नी अपने पति की हरकतों की वजह से उसपे गुस्सा करने लगे तो अवश्य ही बहस शुरू हो जाएगी। अगर पत्नी कहेगी की तुम इतनी तेज म्यूजिक क्यों सुन रहे तो ये पति के ऊपर आरोप लगाये जाने के कारण बहस हो सकती है। और अगर पत्नी अपने पती से कह दे कि म्यूजिक में तुम्हारा टेस्ट बिल्कुल खराब है तो बात आ जायेगी वैल्यूज यानी कि आदर्शों पर। 

और हो सकता है कि धीरे धीरे बहस म्यूजिक और शांति की जगह किसी और बात पर पहुंच जाए। 

एरिस्टोटल के मुताबिक बहस के तीन कारण हो सकते हैं - आरोप, वैल्यू और च्वाइस। तो अगर हम ऊपर वाले उदहारण को देखकर समझना चाहें तो आरोप तब होगा जब पत्नी अपने पती से कहेगी की जब तुमको पता था मैं पढ़ रही हूं तभी तुमने जान बूझकर स्टीरियो म्यूजिक चालू किया। वहीं अगर पति अपनी पत्नी से ये बोल की तुम रोलिंग स्टोन के म्यूजिक के विपक्ष में इसलिए हो क्योंकि तुमको बीटल्स पसन्द है तो ऐसे में बात आ जायेगी वैल्यूज पर। और अगर पत्नी  पति से कहने लगे कि क्या मैं रोलिंग स्टोन का म्यूजिक बन्द करके कोई और म्यूजिक चालू कर लूं तो बहस का कारण होगा च्वाइस। 

तो बहस के टॉपिक के मुख्य मुद्दे को जानने के साथ ही अगर आप इस बात पर भी फोकस करेंगे कि बहस के दौरान कौन से चीजें उपयोगी साबित हो सकती हैं तो आप बहस को आसानी से एक पॉजिटिव रिजल्ट दे सकते हैं। कॉमन टेन्स में बात करके भी बहुत सी बहस का सॉल्यूशन मिल सकता है।

बहस करने की सबसे खास कला यह है कि आप अपनी ऑडियंस के इमोशन को अपनी तरफ अट्रैक्ट करें और लॉजिक का यूज़ करें
किसी से अपनी बात मनवाने के लिए एरिस्टोटल के तीन टूल्स के बारे में क्या आपको पता है? पहला महत्वपूर्ण टूल है लोगो यानी कि बहस के दौरान लॉजिक इस्तेमाल करना। दूसरा टूल है पैथोज यानी कि बहस के दौरान इमोशन का इस्तेमाल करना। और तीसरा महत्वपूर्ण टूल है इथोस यानी कि कैरेक्टर का इस्तेमाल करके किसी बहस को अंजाम देना। 

आइये समझते हैं की यह टूल किस प्रकार काम करते हैं। 

सबसे पहले एरिस्टोटल के पहले टूल के बारे में जान लेते हैं जोकि है लोगो। इस टूल का इस्तेमाल करके सबसे पहले आप अपने विपक्षी की किसी बात पर एग्री करते हैं और फिर मौका देखकर उसको एक ऐसा रिप्लाई देते हैं जिसका जवाब उसके पास मौजूद नहीं होता। 

एक उदहारण लेके इस बात को समझने का प्रयास करते हैं। मान लीजिये आप और आपका एक दोस्त क्रिकेट के बड़े फैन है। आपको विराट कोहली पसन्द है और आपके दोस्त को सचिन तेंदुलकर। दोनों में कौन बेहतर है इस बात को लेके आप दोनों में बहस शुरू हो जाती है। आपके दोस्त का मानना है कि सचिन ने इंडियन क्रिकेट टीम को बहुत सारे मैच जिताये हैं और वो टीम के सबसे महत्वपूर्ण खिलाड़ी थे। अब आप अपने दोस्त की इस बात से एग्री कर सकते हैं कि हां सचिन ने भारत को बहुत मैच जितवाये हैं और वो भारत के बहुत महत्वपूर्ण खिलाड़ी भी हैं। आपके दोस्त को लगेगा कि आप उसकी बात दे एग्री कर गए हैं लेकिन तभी आप उसके सामने एक प्रश्न रखिये की सचिन तेंदुलकर के रिटायरमेंट के बाद भारत को उनके जैसे प्लेयर की जरूरत होगी और कोहली उस कमी को बखूबी पूरा कर सकते हैं। अब आपका दोस्त आपके इस तर्क का शायद ही कोई उत्तर दे पाए। इससे आप अपने दोस्त से बिना डिसएग्री किए अपनी बात पर उसको राजी कर सकते हैं। 

अब बात करते हैं एरिस्टोटल के दूसरे टूल की जोकि है पैथोज। 

पैथोज का ग्रीक में मतलब होगा है सिम्प्थी। इस टूल के जरिये आप अपनी ऑडियंस की फीलिंग के साथ मेल बैठाकर उनसे बहस में जीत हांसिल कर सकते हैं। और वैसे भी एक क्लासिक बहस तभी होती है जब आप अपने अपोनेंट की फीलिंग बदलने में कामयाब हो जाएं। 

फिरसे एक क्रिकेट का उदाहरण लेते हैं। मान लीजिये आपकी और आपके दोस्त की टीम के बीच मैच हुआ और आपके दोस्त की टीम मैच हार गई। अब आपका काम है उसको चीयर अप करना और उसकी फीलिंग को बदलना। क्योंकि हार के बाद तय है कि आपका दोस्त काफी लो फील कर रहा होगा। आप अगर पैथोज टूल का इस्तेमाल करते हैं तो आप अपने दोस्त को सांत्वना देने की बजाय उसको चीयर अप करेंगे और उसको समझाएंगे की हार जीत तो मैच का पार्ट है। इससे उसको अच्छा महसूस होगा।

अब जब आप समझ गए हैं कि एरिस्टोटल के पहले दो टूल किस प्रकार काम करते हैं तो आइए उनके तीसरे टूल के बारे में पढ़ लेते हैं।

किसी भी बहस में सबसे ज्यादा इम्पोर्टेन्ट है कि आप कौन हैं न कि ये की आप क्या कह रहे हैं। 

आपको याद है वो समय जब अब्राहम लिंकन अमेरिका में स्लेवरी यानी कि गुलामी खत्म करने के लिए लड़ाई कर रहे थे। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि लिंकन के आईडियाज से ज्यादा इफेक्टिव उनकी खुद की पर्सनालिटी थी जिसकी वजह से वो लड़ाई जीतने में सफल रहे। एरिस्टोटल का तीसरा टूल एथोस भी यही कहता है कि अपनी ऑडियंस को अपने कैरेक्टर से जीतने का प्रयास करें। और एरिस्टोटल खुद भी अपने तीसरे टूल को सबसे जरूरी टूल मानते थे। 

एथोस को पूरी तरह समझने के लिए उसके ओरिजिन को जानना भी जरूरी है। एथोस का पैरेंट शब्द है एथिक्स यानि की हैबिटैट। साधारण शब्दों में समझें तो हैबिटैट का मतलब हुआ वो वातावरण जिसमें कि व्यक्ति रहता है। एक एथिकल इंसान होने का मतलब है अपनी ऑडियंस की वैल्यूज को शेयर करना, उनके मैनर और टोन को समझना और जिस  प्रकार किसी पजल में एक हिस्सा जुड़ जाने से पजल सॉल्व हो जाता है उसकी प्रकार आप अपनी ऑडियंस के साथ जुड़ जाएं। 

रोमन्स ने भी एथोस को एक वर्ड 'डेकोरम' में डेसक्राइब करने की कोशिश की है। डेकोरम यानी कि किसी भी क्राउड की आवाज को ताकत देना। उदाहरण के तौर पर बात करते हैं फ़िल्म 8 माइल्स की। ये फ़िल्म मशहूर रैपर एमिनेम की बायोपिक है जिसमे एमिनेम के स्टारडम पाने के सफर को दिखाया गया है। यह फ़िल्म हिपहॉप क्लब में ऐसी जगह पर खत्म होती है जहां ओरेटर्स यानी कि वक्ता लोग एक दूसरे पर वर्बल अटैक करते हैं। 

और बिल्कुल इसी समय क्राउड को आश्चर्यचकित करते हुए एमिनेम व्हाइट थ्रैश बम की तरह ब्लैक क्राउड पर जीत हांसिल करते हैं। उनकी जीत की स्ट्रेटजी यह होती है कि वो अपने अपोनेंट की साख पर सवाल उठाते हैं और पॉइंट आउट करते हैं कि वो भी एक वेल्थी परिवार से आते हैं और उन्होंने भी प्राइवेट स्कूल अटेंड किया है। 

फ़िल्म में एमिनेम के कैरेक्टर के लिए तो यह रणनीति एक दम सही साबित हुई परन्तु आप जब भी एरिस्टोटल के तीसरे टूल यानी कि एथोस का प्रयोग करें तो जरा सावधान रहें। अपनी ऑडियंस को डेकोरम की मदद से कन्विन्स करने का मतलब उनकी नकल करना नहीं है। बल्कि इसका मतलब यह है कि आप अपनी ऑडियंस के आइडियल को रिप्रेजेंट करें क्योंकि अगर आप किसी ऐसे व्यक्ति को रिप्रेजेंट करेंगे जिसको आपकी ऑडियंस अपना आइडियल मानती है तो आपके लिए अपनी ऑडियंस को कन्विन्स करना काफी आसान हो जाएगा। बिल्कुल उसी प्रकार जैसे एक नैतिक राजनेता यानी कि एथिकल पॉलिटिशियन किसी जनसभा को एड्रेस करते समय ज्यादा से ज्यादा ईमानदार दिखने की कोशिश करता है चाहे उसके साथ वाले कितनी भी चीटिंग कर रहे हों परन्तु वो पूरा ईमानदार रहता है। क्योंकि उसे पता होता है की जनता का आइडियल एक ईमानदार नेता है और ईमानदार बनकर वो जनता को अपने प्रति कन्विन्स कर सकता है।

एथोस का मतलब यह होता है कि आप अपने कैरेक्टर को अपनी बात मनवाने वाले हथियार की तरह इस्तेमाल करें
अपनी ऑडियंस को जीतने के लिए जरूरी है कि आप उनके सामने एक दमदार कैरेक्टर को पेश करें। आइये हम आपको समझाते हैं कि ये कैसे संभव है। 

एरिस्टोटल के मुताबिक एथोस के बेस पर जो बहस होती है उसमें तीन बहुत जरूरी क्वालिटी होती है। पहली होती है वरचु जिसकी मदद से आप अपनी ऑडियंस की वैल्यू शेयर करके उनसे अपनी बात मानव सकते हैं। लेकिन ऐसा करने से पहले आपके लिए यह जरूरी है कि आप जान लें कि आपकी ऑडियंस किस प्रकार की वैल्यू होल्ड करती है और आप कैसे उसको अपने कैरेक्टर में शामिल कर सकते हैं। 

एक उदाहरण लेके इस बात को समझने की कोशिश करते हैं। मान लीजिये आप और आपकी बेटी एक रूम में है। आप काफी ध्यान से एक बुक पढ़ रहे हैं और आपकी बेटी टेलर स्विफ्ट का एक नया गाना सुन रही है। लाजमी है कि आपको पढ़ाई में डिस्टर्ब हो रहा है। लेकिन अगर आप अपनी बेटी से सीधा ये कह देंगे कि म्यूजिक बन्द कर दो तो ऐसे में उसे बुरा लग सकता है क्योंकि टीनएज के समय लड़कियों को लगता है कि आजादी ही सबसे जरूरी है और इसलिए वो काफी जल्दी बात को दिल पर ले लेती हैं जिससे बहस हो सकती है। तो आप परिस्थितियों को समझकर अपनी बेटी को च्वाईस दे सकते हैं। आप उससे ये कहें कि या तो तुम म्यूजिक बन्द कर दो या फिर हेडफोन का प्रयोग कर लो। इससे होगा क्या आप उसकी स्वंतन्त्रता को फीलिंग में हेर फेर ला देंगे। 

एथोस के बेस पर होने वालों बहस की दूसरी क्वालिटी होती है प्रैक्टिकल विजडम। इसका मतलब यह होता है कि आपको उस इंसान की तरह नजर आना है जिसको पता है कि किस समय पर क्या करना है। उदाहरण के तौर पर बात करते हैं जिम्मी कार्टर की। जिम्मी कार्टर अमेरिका के प्रेसिडेंट के तौर पर हालांकि दूसरा कार्यकाल पाने में सफल नहीं हुए क्योंकि उनके पास प्रैक्टिकल नॉलेज की कमी थी। 

प्रैक्टिकल नॉलेज रखने वाले लोग किताबी नॉलेज रखने वाले लोगों से ज्यादा प्रभावशाली होते हैं। इसलिए रियल वर्ल्ड एक्सपीरियंस शो करना इफेक्टिव साबित हो सकता है। जैसे कोई व्यक्ति कभी किसी युद्ध के बारे में बताते वक़्त अपनी ऑडियंस का ट्रस्ट हांसिल करने के लिए खुद को एक वेटरन के रूप में शो करता है यानी कि वो अपना एक्सपीरियंस शेयर करता है लेकिन वास्तव में इस एक्सपीरियंस का मतलब युद्ध को अकैडमिक रूप से जानने से कहीं ज्यादा होता है। 

एथोस की तीसरी क्वालिटी होती है सेल्फलेसनेस यानी कि निस्वार्थता। इसका मतलब यह होता है कि अपनी ऑडियंस को यह दिखाना कि आपको किसी भी चीज से ज्यादा दिमाग पर यकीन है। इस क्वालिटी को शो करने के लिए आप एक एग्रीमेंट पर पहुंच सकते हैं जो कि आपको पसंद न हो लेकिन वास्तव में वो ही सच हो। उदाहरण के लिए मान लीजिये की जहां आप काम करते हैं, वहां आपको एक प्रोजेक्ट मिला है। अब आप निस्वार्थता यानी कि सेल्फलेसनेस शो करने के लिए अपने बॉस से कह सकते हैं कि अगर आपको इस प्रोजेक्ट के लिए क्रेडिट न भी मिले तो भी कोई बात नहीं क्योंकि यह प्रोजेक्ट काफी अच्छा और आप इसको पूरा करने के लिए दिल से काम करेंगे।

अपने विपक्षी की कमियों को पहचान कर उनका इस्तेमाल करना सीखें
क्या कभी आपको किसी घटिया सेल्समैन ने कन्विन्स किया है? वैसे वो कुछ सबसे खराब ट्रैप पर भरोसा करते हैं। ऐसे दो सबसे कॉमन ट्रैप हैं घटिया लॉजिक और गलत कंपेरिजन। छोटे बच्चों को ये ट्रैप इस्तेमाल करना काफी पसन्द आता है। छोटे बच्चे कभी कभी किसी चीज को हांसिल करने के लिए ऐसे ट्रैप का इस्तेमाल करते हैं। सबसे कॉमन लाइन है कि " लेकिन दूसरे सारे बच्चे ऐसा करते हैं"। लेकिन इसके जवाब में आप वो न करें जो लगभग सारे पेरेंट्स करते हैं। मतलब आप घटिया लॉजिक का इस्तेमाल न करें। आप अपने बच्चे को गलत साबित करने के लिए यह कभी न पूछें कि "अगर सब कुवें में कूदेंगे तो तुम भी कूद जाओगे क्या।"

एक और स्ट्रेटेजी जिसका लोग यूज़ करते हैं वो है अपने अपोनेंट का अपमान करना। जब आपके ऊपर कोई ऐसे अटैक करता है तो कोशिश करें कि अपने अपोनेंट के शब्दों को ही पॉजिटिव तरीके से बनाकर उसके सामने पेश करें। ऐसा आमतौर पर पॉलिटिशियन करते हैं।

उदाहरण के तौर पर अगर आपका कोई दोस्त आपको एक लिबरल हिप्पी बोल कर आप पर हमला कर रहा है तो आप इसके जवाब में पॉजिटिविटी लाने के लिए यह बोल दें कि अगर लोगों की केअर करने से आप लिबरल हिप्पी बन जाते हैं तो हां आप लिबरल हिप्पी हैं। इससे होगा क्या की आपका अपोनेंट डिफेंसिव मोड में आ जायेगा और आपको भी आसानी से बहस से निकलने का मौका मिल जाएगा। 

अंत में यह भी जरूरी है कि आप खराब उदाहरण और टूटोलॉजी पर ध्यान दें। खराब उदाहरण को आसानी से पकड़ा जा सकता क्योंकि अक्सर ऐसे उदाहरण बहस के मेन मुद्दे से हटके होते हैं। मान लीजिए एक मां ने अखबार में किसी बच्चे के मोलेस्टेशन की खबर पढ़ी तो उसको लगने लगा कि उसके बच्चों का भी बाहर निकलना सेफ नहीं है। यहाँ पर वो मां मोलेस्टेशन के मेन मुद्दे पर ध्यान देने कि बजाय उस एक उदाहरण का इस्तेमाल गलत तरीके से कर रही है। 

अब बात करते हैं टूटोलॉजी की।

उदाहरण के लिए मान लीजिये की कोई कहता है कि इस साल इंडियन क्रिकेट टीम वर्ल्ड कप जीत जाएगी क्योंकि उनके पास बेस्ट टीम मौजूद है। ऐसे स्टेटमेंट की वैल्यू न के बराबर है। इससे बेहतर स्टेटमेंट यह हो सकता कि कोई बोले इस साल इंडियन टीम वर्ल्ड कप जीत जाएगी क्योंकि रवि शास्त्री अब एक अच्छे कोच बन चुके हैं। 

तो अगर आप भी ऐसे ही इन ट्रिक्स पर नजर बनाए रखेंगे और उनको एरिस्टोटल के द्वारा दी गयी टेक्निक के साथ कंबाइन करेंगे तो आप भी बहस को अछे से एन्जॉय कर पाएंगे।

कुल मिलाकर
बहस करना एक पुरानी कला है और इसका उद्देश्य लड़ाई करने से ज्यादा अपने अपोनेंट को परसुऐट करना होता है। भाषण कला यानी कि rhetoric की कला में निपुण होने से आपका कम्युनिकेशन बेटर हो जाएगा, और आप दूसरों को समझ कर अपने ओपिनियन शेयर कर सकेंगे बिना अपने अपोनेंट को अपसेट किये हुए। 

 

एरिस्टोटल को मुताबिक हर पॉइंट का एक दूसरा साइड भी होता है और जब कभी वो खुद को किसी कठिन परिस्थिति में पाते थे तब वो ऐसे रास्ते ढूंढते थे जिसकी मदद से वो चीजों को अपने पक्ष में ला सकें। आमतौर पर ऐसा वो कन्सेशन की मदद से करते थे। उदाहरण के तौर पर मान लीजिये आपकी पत्नी आप से कहती है की अब आप दोनों साथ में कहीं बाहर नहीं जाते तो आप इसका जवाब दे सकते हैं कि हां क्योंकि मैं चाहता हूं कि तुम अपना पूरा समय बस मेरे साथ बिताओ और मैं तुम्हारे साथ। हमारे बीच में और कोई न हो। इससे होगा क्या की आपको समय मिल जाएगा यह तय करने के लिए की किस रेस्टोरेंट में आप दोनों को डेट पर जाना चाहिए।

 

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