Joe Dominguez and Vicki Robin
कंज़्यूमरिज़्म और कर्जे का शिकार होने से खुद को बचाना सीखो
दो लफ्जों में
यह किताब एक अलग तरह की पर्सनल फाइनेंस बुक है. जिस में पैसों के साथ डील करते टाइम होने वाले नुकसान और डिसिप्लिन के बारे में बात करने की जगह इस मामले में आप की चॉइस, फ्रीडम और पूरी संतुष्टि के बारे में लिखा गया है. जिस को पढ़ कर आप अपने सपनों को हकीकत में पूरा करने के लिए और नए जमाने में पैसों की वजह से होने वाली अफरा - तफरी, कंज़्यूमरिज़्म और कर्जे का शिकार होने से खुद को बचाने के लिए जरूरी बातों को अच्छी तरह से जानेंगे. कंज़्यूमरिज़्म एक ऐसा आइडिया है जो मार्केट मे मौजूद बहुत से प्रोडक्ट्स को ज्यादा इस्तेमाल करने के लिए बढ़ावा देता है. और पैसा खर्च कर के बहुत सी सर्विसेस को लेने के लिए जोर देता है.
यह किनके लिए है
- जो अपने पर्सनल फाइनेंस के मामले में इन्वेस्टिंग सेविंग और बजटिंग के बारे में अच्छी तरह से समझना चाहते हैं.
- जो एक नए नजरिए के साथ अपनी जिंदगी को गुजारना चाहते हैं.
- जो इस बात पर यकीन करना चाहते हैं कि अच्छी जिंदगी जीने के लिए हफ्ते में 50 - 60 घंटे तक काम करना जरूरी नहीं है.
- जो यह रियलाइज करना चाहते हैं कि कम रिसोर्सेस के साथ जल्दी रिटायर होकर भी जिंदगी को अच्छी तरह से गुजारा जा सकता है. और
- जो सिर्फ पैसा कमाने के लिए अपना बहुत सारा टाइम वेस्ट करने की जगह दूसरे सोशल मामलों में भी पार्टिसिपेट करने के लिए काफी सारा टाइम निकालना चाहते हैं.
लेखक के बारे में
इस बेस्ट सेलर किताब को 1992 में पब्लिश किया गया था . जिसके ऑथर जो डोमिंग्वेज़ और को - ऑथर विकी रॉबिन हैं. इस किताब में पैसों के साथ अपनी रिलेशन शिप को पूरी तरह से बदलने और आर्थिक आजादी पाने के लिए 9 स्टेप्स के बारे में बताया गया है. जिसके जरिए से पैसों की कमाई और खर्च करने के मामले में लोगों के रवैये को बदलने की कोशिश की गई है. इस किताब की 5 लाख से ज्यादा कॉपीज इंग्लिश लैंग्वेज में बिक चुकी हैं. इस के बाद भी इस किताब को डच, जर्मन, स्पेनिश और फ्रेंच लैंग्वेजेज में ट्रांसलेट किया गया है.
जो डोमिंग्वेज़ का जन्म 1938 में न्यू यॉर्क सिटी में हुआ था. वह वॉल स्ट्रीट स्टॉक मार्केट में एनालिस्ट का जॉब करते थे. 1969 में 31 साल की उम्र में वह अपने जॉब से रिटायर हो गए. लेकिन उस समय तक उस जॉब से उन्होंने बहुत कम सालों में ही करीब 70 हजार डॉलर की एक बड़ी रकम जमा कर ली थी. इसके बाद उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी में कभी भी पैसों के लिए कोई काम नहीं किया.
उन्होंने अपने खर्चों को सालाना 6 हजार डॉलर तक काम कर लिया था. इस वजह से वह सोशल सर्विस वॉलिंटियर करने और दूसरे लोगों की जिंदगी बेहतर बनाने के लिए अपना सारा टाइम खर्च कर पाते थे.
1984 में उन्होंने विकी रॉबिन और कुछ दूसरे लोगों के साथ मिल कर न्यू रोड मैप के नाम से एक नॉन प्रॉफिट फाउंडेशन की शुरुआत करी. जिसके जरिए से वह लोगों को लंबे टाइम तक अच्छा भविष्य बनाए रखने के लिए मनी, हेल्थ और रिलेशन शिप पर एजुकेशनल प्रोग्राम चलाया करते थे.
11 जनवरी 1997 को कैंसर से उनकी डेथ हो गई .
विकी रॉबिन का जन्म 6 जुलाई 1945 को हुआ था. वह एक अमेरिकन लेखिका और स्पीकर हैं. उनको ' F I R E ' मूवमेंट के जरिए से लोगों को इंस्पायर करने के लिए भी जाना जाता है जिसके जरिए से उन्होंने लोगों में योर लाइफ और योर मनी के मामले में दोबारा से इंटरेस्ट पैदा कर दिया.
' F I R E ' मूवमेंट का फुल फॉर्म ' फाइनेंशियल इंडिपेंडेंस, रिटायर अर्ली ' है.इस किताब को पढ़ना शुरू करने से पहले आप खुद से इन सवालों को कीजिये :
- क्या आपके पास अपनी जरूरतें पूरा करने लायक पैसा है ?
- क्या आप अपनी फैमिली और दोस्तों के साथ टाइम स्पेंड कर पा रहे हैं ?
- क्या आप अपने जॉब से घर लौट कर खुश होते हैं ?
- जो चीजें आपके लिए मायने रखती हैं क्या उनके लिए आपके पास वक्त है ?
- कल को अगर आपको जॉब से निकाल दिया जाए तो क्या आप उसे एक मौके की तरह देख पाएंगे ?
- क्या आप समाज के लिए अपने योगदान से सेटिस्फाइड हैं ?
- क्या आप अपने जमा किए हुए पैसों से चिंता मुक्त रह सकते हैं ?
- क्या आपने इतनी सेविंग कर ली है, जिस की वजह से बिना किसी इनकम के अगले 6 महीनों तक आपका खर्च चल सके ?
- क्या आप अपनी जिंदगी में अपने रिलेशंस, अपने खर्चे, अपनी वैल्यूज के बीच सही ताल मेल बिठा पाए हैं?
इन सभी सवालों में से अगर किसी एक का भी जवाब नहीं में है तो यह किताब आपकी जिंदगी को खुशहाल बनाने में आप की भरपूर मदद कर सकती है .
हमारी मॉडर्न लाइफ स्टाइल बहुत ज्यादा कंज़्यूमरिज़्म का शिकार हो गई है. कंज़्यूम करने का मतलब है किसी चीज को इस्तेमाल करना और उसे खत्म कर देना. इसीलिए हमें आए दिन सुनाई पड़ता है कि धरती के नेचुरल एलीमेंट्स तेजी से खत्म होते जा रहे हैं. इसके अलावा आज के दौर में ज्यादातर लोगों की जिंदगी कर्ज पर डिपेंड होती जा रही है. चाहे वह होम लोन हो, कार लोन हो या फिर क्रेडिट कार्ड का लोन हो. असल में हम दूसरों के पैसों पर जिंदगी गुजार रहे हैं. 2008 के एक रिकॉर्ड के मुताबिक अमेरिकन नागरिकों पर करीब 9 लाख करोड़ डॉलर का कर्ज बकाया था . और यह कर्ज रोजाना 150 करोड़ डॉलर के हिसाब से बढ़ रहा है. यह आंकड़े सिर्फ अमेरिका के हैं. जबकि पूरी दुनिया के हालात इससे भी ज्यादा गंभीर हैं. लेकिन अगर हम फिजूलखर्ची को रोकने पर ध्यान दें तो हालत बहुत बेहतर हो सकते हैं . इसलिए अपनी जरूरतों को जिंदगी जीने के हिसाब से लिमिट में रखें ना कि दिखावे की जिंदगी जीने के लिए बेहिसाब फिजूलखर्ची करते रहें.
यहां इस बात को समझने की जरूरत है कि फाइनेंशियल रोड मैप यानी पैसों और उससे खरीदी जा सकने वाली चीजों के साथ आप के रिलेशन की सोच और रूप रेखा को 100 साल पहले अमेरिकन कम्युनिटी के लिए इंडस्ट्रियल रिवॉल्यूशन के दौरान बनाया गया था. जबकि आज के दौर में हमें दुनिया भर की मेजर एनवायरनमेंटल प्रॉब्लम्स को ध्यान में रखते हुए इस रोड मैप को बदलने की जरूरत है. इस किताब में यह बताया गया है कि मौजूदा दौर में पुराने फाइनेंशियल मैप की जगह नए फाइनेंशियल मैप को कैसा होना चाहिए.
आर्थिक सुरक्षा के लिए एक ही कंपनी में रिटायर होने तक लगातार काम करना और फिर जिंदगी भर पेंशन लेते रहना हमारी उम्मीदों को पूरा करने के लिए अब सबसे अच्छा तरीका नहीं रह गया है. हालांकि आप हमेशा काम आने वाले कुछ सिद्धांतों और तरीकों को इस्तेमाल कर के पैसों के मामलों को आसानी से समझ सकते हैं और फाइनेंशियल इंडिपेंडेंस भी हासिल कर सकते हैं.
इस किताब में जो डोमिंग्वेज़ और विकी रॉबिन ने आपके पर्सनल खर्चों को कम करने के लिए और एक ज्यादा अच्छी तरह से मैनेज की जा सकने वाली और खुशनुमा लाइफ स्टाइल हासिल करने के लिए 9 - स्टेप - अप्रोच के तरीकों को बहुत अच्छी तरह से एक्सप्लेन किया है. जिन को फॉलो करने के बाद आप की लाइफ स्टाइल आपकी ट्रू वैल्यूज को रिफ्लेक्ट करने लगती है. इस का मतलब है कि यह बेहतरीन अप्रोच रुपये पैसों के मामले में आप को फंसाने की जगह उस पर आप की मजबूत पकड़ बनाती है.
9 स्टेप प्रोग्राम के जरिए से यह समझाने की कोशिश की गई है कि दरअसल आप पैसों के बदले में अपनी लाइफ का सौदा करते हैं.
इस किताब के ऑथर्स का कहना है कि सबसे सस्ते बजट वाले प्लान इस लिए फेल हो जाते हैं क्योंकि वह सेल्फ डिसीप्लिन के मुताबिक बनाए जाते हैं. इसका मतलब है कि हम खुद को ऐसी चीज करने के लिए फोर्स करते हैं जिसे हम नहीं करना चाहते हैं. लंबे टाइम के दौरान हम में से बहुत से लोगों के अंदर अपनी इच्छा के खिलाफ सक्सेस हासिल करने की मजबूत विल पावर कम होती जाती है .
इसलिए इस किताब में हमारी बाहरी फाइनेंशियल सिचुएशन को बदलने के बारे में यह कहा गया है कि पहले हमें रुपए पैसों के बारे में अपने आइडियाज और यकीन के मुताबिक खुद को एडजस्ट करने की कोशिश करनी चाहिए. इसके बाद हम इस बात को एक बेहतर तरीके से समझ सकते हैं कि हम कौन हैं और फिर अपनी लाइफ में चलने वाले मनी फ्लो को ज्यादा समझदारी से इस्तेमाल कर सकते हैं.
फाइनेंशियल इंडिपेंडेंस पाने के लिए 9 स्टेप प्रोग्राम यह हैं : -
द मनी ट्रैप : द ओल्ड रोड मैप फॉर मनी
स्टेप नंबर वन : मेकिंग पीस विद द पास्ट
आर्थिक सुरक्षा सिर्फ आपके रुपए पैसों पर ही नहीं टिकी होती है बल्कि यह कुछ ऐसी नॉलेज पर टिकी होती है कि आप अपनी लाइफ को किस तरह से गुजारते हैं.
दरअसल फाइनेंशियल इंडिपेंडेंस का मतलब ऐसी इनकम से है जो आप अपने जॉब के अलावा दूसरे तरीकों से कमाते हैं. लेकिन इसका यह मतलब भी है कि आप रुपए पैसों के मामले में अपने पुराने आइडियाज और यकीन में बदलाव करने के लिए तैयार हैं.
ज्यादातर मिडिल क्लास के लोग अपनी जिंदगी में नौकरी के इस कदर गुलाम हो गए हैं कि ना तो वह इनसे छुटकारा ले पाते हैं और ना ही इनके बिना उनका गुजारा हो पाता है. उनका काम ही उनकी पहचान बन गया है. जैसे हम यह नहीं कहते हैं कि हम एक इंजीनियर का काम करते हैं बल्कि हम खुद को एक इंजीनियर कहते हैं. और नौकरी का पैसा कमाने को अपनी आजीविका कहते हैं. पर आज कल के दौर में नौकरियों की परेशानी ने हमारी जिंदगीयों से जिंदा दिली को अलग कर रखा है. इसकी एक वजह यह भी है की वक्त के साथ - साथ हमारी जरूरतें भी बढ़ती जा रही हैं. हम जितना भी कमाते हैं वह कम पड़ जाता है.
विज्ञापनों के जरिए से हमारे माइंड में यह भरा जाता है कि जितना ज्यादा उतना अच्छा यानी कि मोर इज बेटर. इस आइडिया को स्टैंडर्ड ऑफ लिविंग के नाम से बेचा जा रहा है. और हम इसे बिना सोचे समझे खरीद रहे हैं. इसका नतीजा यह है कि हम बस चीजों को जमा किए जा रहे हैं. भले ही उसका इस्तेमाल हो या ना हो. हम कंपटीशन और दिखावे के चक्कर में उलझ जाते हैं. हम पहले एक छोटा लोन लेते हैं. फिर उसे चुकाने के लिए ज्यादा काम करते हैं. और बहुत ज्यादा काम से परेशान होकर ऐशो आराम की चीजों पर और ज्यादा खर्च करते हैं. इसके बाद बढ़े हुए खर्चों को संभालने के लिए फिर से लोन लेते हैं. और उसको चुकाने के लिए और ज्यादा काम करते हैं. इस तरह यह चक्र चलता रहता है. और हम लोन के चक्रव्यूह में ज्यादा से ज्यादा फंसते चले जाते हैं.
इस किताब में कंजूमर सेंटर्ड इकोनॉमिक्स के बारे में बताया गया है. जिसमें लोग जितनी ज्यादा खरीदारी करते हैं देश की अर्थव्यवस्था उतनी ही मजबूत होती है. अमेरिका में हर साल एडवर्टाइजमेंट पर 15 हजार करोड़ डॉलर से भी ज्यादा खर्च किए जाते हैं. जिन के दो पर्पज होते हैं. पहला यह कि इन के जरिए से आप को मौजूदा जिंदगी में आपकी अधूरी इच्छाओं को महसूस कराना और दूसरा आपको इस बात के लिए कंवेंस करना कि ज्यादा खरीदारी से आप भी अमीर दिख सकते हैं. लेकिन ज्यादा से ज्यादा खरीदारी करने की आदत की वजह से हम कुछ ऐसा छीन रहे हैं जो कभी वापस लौट कर नहीं आएगा. और वह हैं धरती के नेचुरल एलिमेंट्स जो हमें जिंदगी देते हैं. जैसे हवा मिट्टी पानी. इनमें फैलता प्रदूषण धरती को जहरीला बना रहा है. जिसकी वजह से आने वाली पीढ़ियां हमें कभी माफ नहीं करेंगी. पूंजीपतियों ने सिर्फ अपने आर्थिक फायदे के लिए अपने पैसों की ताकत से एक ऐसा माहौल खड़ा कर दिया जहां हम पूरी तरह से कंज़्यूमरिज़्म के शिकार हो चुके हैं.
इसलिए अब हमें पैसों के साथ अपने रिश्ते के बारे में नए तरीके से सोचने की जरूरत है. हमें यह सोचना चाहिए कि हम क्यों विज्ञापन से इतने प्रभावित हो जाते हैं ? और क्यों एक नंबर के कंज्यूमर बनने के लिए उतावली रहते हैं. जीवन की बहुत सी दूसरी खुशियों में से हमने पैसे को ही क्यों चुना ?
दरअसल हमारी जिंदगी पर इस बात का ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ता है कि हमारे पास कितना पैसा है बल्कि इस बात का ज्यादा प्रभाव पड़ता है कि उस पैसे से हम कैसा महसूस करते हैं .
हमें यह भी समझना चाहिए कि इंसान अपनी आदतों का गुलाम होता है. हम अनायास ही अपनी आदतों का पालन करते हैं . अक्सर विज्ञापनों के जरिए हम पर प्रभाव डाल कर जरूरत से ज्यादा प्रोडक्ट को खरीदवाया जाता है . इस वजह से कभी - कभी हमारे अंदर तनाव भी आ जाता है. इस लिए हम पैसों के साथ अपने रिश्ते में सुधार लाकर अपने अंदर बदलाव ला सकते हैं. लेकिन उससे पहले हमें पैसे और अपनी संतुष्टि के बीच में संबंध पर ध्यान देना होगा . जब हम छोटे होते हैं तो हमारी जरूरतें भी छोटी और सीधी-सादी होती हैं. जैसे जैसे हम बड़े होते जाते हैं हमारी जरूरतें महंगी हो जाती हैं. और उनको पाने से मिलने वाली संतुष्टि कम होती जाती है. जैसे जैसे हम अपनी महंगी जरूरतों को पूरा करते जाते हैं, वैसे वैसे उनकी कीमत का भुगतान मुश्किल होता जाता है. बचपन में हमें एक रुपए की टॉफी से भी जो खुशी मिल जाया करती थी वह अब बड़े होने पर करोड़ों रुपए के बंगले में भी नहीं मिलती है. क्योंकि बचपन में वही टॉफी हमारे लिए पर्याप्त थी. जैसे जैसे हम जिंदगी में जरूरतों को पूरा करते गए, उस में कहीं एक पल ऐसा जरूर था जब हमारे पास जो था वह पर्याप्त था. लेकिन हम मोर इज बेटर यानी ज्यादा ही बेहतर है, वाली मानसिकता के शिकार हो गए. और जिस दिन से हमने पर्याप्त की सीमा रेखा को पार कर के जरूरत से ज्यादा सामान इकठ्ठा करना शुरू कर दिया, उसी दिन से हमारी खुशी और संतुष्टि कम होते चले गए . इस के बाद ज्यादा खरीदारी करने के बावजूद हमें कोई खुशी या संतुष्टि नहीं मिलती है .बस पैसे खर्च होते हैं और नए खर्चों को चुकाने का बोझ बढ़ता जाता है.
असल में हम अपनी हर इच्छा और हर ख्वाइश को अपनी जरूरत मान लेते हैं. इस वजह से पैसों से खरीदारी कर के मिलने वाली संतुष्टि की दिशा पलट जाती है. और ज्यादा से ज्यादा पैसा खर्च करके भी हम अपने दुख और चिंता को बढ़ाते हैं.
इस मनी ट्रैप यानी पैसों के जाल से बाहर निकलने के लिए यह बताया गया है कि आपको अपनी जिंदगी की एक बैलेंस शीट बनानी होगी. जिसमें एक तरफ आप को अपने एसेट्स और इनकम लिखने होंगे और दूसरी तरफ आपके खर्च यानी लायबिलिटीज को लिखा जाएगा. जिनमें आप पर अब तक के बकाया कर्ज और उनके भुगतान का डिटेल होगा. इसके बाद आप अपनी संपत्ति के सभी सामानों की कीमत को जोड़ कर उस का वैल्यूएशन कीजिए. फिर उसमें से अपनी लायबिलिटीज को घटा दीजिए. इससे आपको अपनी नेट वर्थ पता चलेगी. ऐसा करने के बाद आप को अपनी फिजूलखर्ची और बहुत से ऐसे सामानों के बारे में पता चलेगा जिनको खरीदने के बाद वह आपके इस्तेमाल में नहीं हैं . और फिर इस सच्चाई को जानने के बाद आप बेहतर तरीके से पैसों के साथ अपने रिश्तों को सुधारने की कोशिश कर पाएंगे.
मनी ऐंट व्हाट इट यूज्ड टू बी — एंड नेवर वाज
स्टेप नंबर टू : बीइंग इन द प्रेजेंट — ट्रैकिंग योर लाइफ एनर्जी
अगर कभी आपको अपनी जिंदगी और पैसे में से किसी एक को चुनना हो तो आप किसे चुनेंगे. क्योंकि मुश्किल की बात यह है कि आप सिर्फ पैसों को चुन कर जिंदगी की जिंदा दिली से दूर हो जाएंगे और दूसरी तरफ आप जिंदगी को चुन तो लें, लेकिन यह बिना पैसों के कैसे कटेगी ? इस लिए आप हर हाल में जिंदगी और पैसे दोनों को एक साथ चुनना चाहते हैं.
आप अपनी जिंदगी से तो अच्छी तरह से वाकिफ़ हैं लेकिन क्या आप पैसे के बारे में सब कुछ अच्छी तरह से जानते हैं ?
इसी बात को समझने के लिए जेसन और नेड्रा वेस्टन नाम के दो लोगों ने इस किताब में बताए गए स्टेप वन के मुताबिक बैलेंस शीट तैयार करके अपनी नेट वर्थ के बारे में पता लगाया. जेसन एक 22 साल के आदर्शवादी नौजवान हैं . जो पिछले कई सालों से पैसे से परहेज करते हैं. उनको लंबे बाल रखना, शहर से दूर किराए के एक ही कमरे में रहना और मनोरंजन के नाम पर फिलासफी की बातों में इंटरेस्ट लेना यह सब चीजें पसंद हैं. हालांकि उन्होंने मनी को काफी हद तक अवॉइड किया है. फिर भी उनके ऊपर 5000 डॉलर का कर्ज हो गया है.
दूसरी तरफ नेड्रा खुले हाथों से खर्च करती हैं. 1983 में जब जेसन नेड्रा से मिले और उन्हें एक दूसरे से प्यार हुआ उस वक्त नेड्रा के ऊपर 15 हजार डॉलर का कर्ज था. नेड्रा जरूरत से ज्यादा सामान खरीदती थीं और फिर ज्यादा पैसा कमाने के लिए ओवर टाइम काम करती थीं. उनका मानना था कि कर्ज लेने में कोई खराबी नहीं थी क्योंकि कर्ज चुकाने के लिए तो पूरी जिंदगी पड़ी थी. इसलिए वह कर्ज चुकाने के लिए बहुत कम रकम खर्च करती थीं. और अपने दूसरे शौक पूरे करने में ज्यादा पैसे खर्च कर देती थीं. उन दोनों के विचारों में मतभेद होने के बावजूद जेसन और नेड्रा ने साथ रहने का फैसला किया. इसके बाद नेड्रा को अपना काफी सामान एक गोदाम में रखवाना पड़ा. जिसका किराया अलग से लगता था. लेकिन फिर भी वह अपनी कलेक्शन की आदत को छोड़ने के लिए तैयार नहीं थीं . उन्हें जेसन का तरीका भी कुछ खास पसंद नहीं था. जिसमें सिर्फ जरूरतों के मुताबिक खर्च किया जाता है.
लेकिन जब उन्हें यह रियलाइज हुआ कि उन दोनों की टोटल नेट वर्थ माइनस 20 हजार डॉलर है, तो उनके जिंदगी जीने का तरीका बदल गया. इसके बाद जेसन ने फैसला किया कि वह नेड्रा को अपनी सूझबूझ से फैसला लेने के लिए मोटिवेट करेंगे. नेड्रा को भी यह समझ आया कि कर्ज लेकर दुनिया में दिखावा करना भविष्य के लिए कितना नुकसान दे हो सकता है. अगर वह हमेशा कर्ज के बोझ तले दबी रहेंगी तो वह अपनी जिंदगी से कभी आजादी नहीं पा सकेंगी. इस लिए उन्होंने अपनी कलेक्शन की आदत को छोड़ देने का फैसला किया.
इसके बाद जब उन्होंने शादी की तो उन का कुल कर्ज बढ़कर 30 हजार डॉलर हो चुका था. लेकिन इस वक्त फर्क़ इस बात का था कि उन्हें सच्चाई समझ आ गई थी. और पैसे के साथ उनके रिश्ते में एक तब्दीली आ गई थी. हालांकि पैसों को लेकर जेसन और नेड्रा के नजरिए बिल्कुल अलग थे, लेकिन इस मामले में वह दोनों ही गलत थे.
दरअसल नेड्रा साउथ कैलिफोर्निया में अपनी मां के साथ बड़ी हुई थीं. और उन्होंने बहुत गरीबी में अपना वक्त गुजारा था . इसलिए जब उन्होंने पैसे कमाने शुरू किए तो वह खर्चीली हो गईं. वह अपने क्रेडिट कार्ड की मिनिमम वैल्यू का ही भुगतान करती थीं. इस वजह से उन पर कर्ज बढ़ता गया. वहीं दूसरी तरफ जेसन पर उनकी फैमिली के राजनीतिक विचारों का बहुत गहरा प्रभाव पड़ा था. उनके लिए ज्यादा पैसा कमाना उनकी प्रायोरिटी नहीं थी. इसी लिए वह अपनी जरूरतों के लिए यहां वहां छोटे - मोटे काम किया करते थे. लेकिन इसमें उनका बहुत सारा समय चला जाता था.
असल में जेसन और नेड्रा दोनों को पैसे की समझ बिल्कुल नहीं थी. मिसाल के तौर पर शादी या दूसरे रिश्तो में जब आप दूसरे लोगों को ठीक से नहीं समझते हैं , तो जिंदगी में तनाव होता है. और पैसे के साथ आप के रिश्ते का हिसाब किताब भी कुछ ऐसा ही है.
जो डोमिंग्वेज़ के मुताबिक पैसे को समझने के लिए उसे चार अलग - अलग नजरियो से देखना होगा. जिन को आसानी से समझने के लिए मिसाल के तौर पर आप यह मान लीजिए कि आप एक 100 मंजिला बिल्डिंग के सामने जमीन पर खड़े हैं. - आप का पहला नजरिया है वहां खड़े होकर सड़क की हलचल को देखना.
- दूसरा नजरिया है पचासवीं मंजिल पर जाकर वहां से नजारा देखना.
- तीसरा नजरिया है इमारत की छत पर खड़े होकर 101 वीं मंजिल से पूरे शहर का नजारा देखना.
- चौथा नजरिया है हेलीकॉप्टर में बैठकर उस इलाके के नजारे को देखना. और उसका मुआईना करना.
इन में से पहला नजरिया हमारी आम जिंदगी का रोजमर्रा का नजरिया है जिससे हम पैसे का लेन देन करते हैं. हमारी पहली इनकम, पैसे का ऑपरेशन यानी संचालन , इन्वेस्टमेंट, कर्ज लेना और चुकाना यह सब हम इसी नजरिए से देखते हैं.
जब नेड्रा ने पैसा कमाना शुरू किया तब उन्हें यह नहीं पता था कि पैसे का जिंदगी पर क्या प्रभाव पड़ता है. जैसे - जैसे उन को जरूरत होती गई वह पैसे कमाती गईं. वह कर्ज भी लेती गईं. और अपनी इनकम बढ़ाने के लिए ज्यादा काम भी करती गईं. वहीं दूसरी तरफ जेसन को छोटी से छोटी जरूरत के लिए भी कोई ना कोई काम करना पड़ता या किसी की मदद लेनी पड़ती . उनके पास कभी पैसे नहीं रहते. एक तरफ जहां नेड्रा अपनी कमाई से ज्यादा खर्च कर रही थीं, वही जेसन के पास खर्च करने का ज्यादा मौका ही नहीं था.
दूसरे नजरिए के जरिए हम थोड़ा ऊपर उठकर हम अपने निजी विचार और सोच पर ध्यान देते हैं. जैसे पैसे के संचालन को लेकर आपके जो भी निजी विचार हैं उन पर आपकी फैमिली और परवरिश का क्या असर पड़ा है ? पैसा आपके लिए क्या मायने रखता है ? क्या वह सुरक्षा का प्रतीक है या शक्ति का प्रतीक है ? या फिर एक सामाजिक स्वीकृति का प्रतीक है या किसी शैतान, का प्रतीक है ?
पैसों के लिए नेड्रा और जेसन के निजी विचार उनकी परवरिश के मुताबिक थे. नेड्रा सोचती थीं कि उनकी जिंदगी में जितना हो वह कम है इसलिए और भी होना चाहिए. वह मोर इज बेटर की मानसिकता का शिकार थीं. वहीं जेसन के लिए पैसा शैतान के बराबर था.
तीसरे नजरिए के जरिए हम थोड़ा और ऊपर उठ कर देखने लगते हैं. इसमें पैसे को सांस्कृतिक तौर पर देखा जाता है. पैसे को लेन देन में वैल्यूएशन करने का एक जरिया कहा जाता है. आपके कल्चर में पैसे का उपयोग जिस तरह से शुरू हुआ था उसी के असर के मुताबिक पैसा आपके लिए मायने रखता है.
इंसानों के समाज में फाइनेंस का कंसेप्ट करीब 4 हजार साल पहले शुरू हुआ था. आज भी घर के छोटे-मोटे काम का कोई भुगतान नहीं होता है. जैसे घर पर छोटी मोटी मरम्मत करना, बाग बगीचे की देखभाल करना, घर की सफाई वगैरा - वगैरा. और ना ही घर के खाने का होटल की तरह कोई बिल चुकाना पड़ता है. पुराने जमाने के दौरान एक पूरे गांव के लोग मिलकर खाना खाते थे. जो अब एक फैमिली तक सीमित रह गया है.
टाइम टाइम पर इकोनॉमिस्ट सुझाव देते हैं कि महंगाई बढ़ गई है. हम भी उस बात को सच मान लेते हैं. और खुद को गरीब महसूस करने लगते हैं चाहे भले ही हमें अपनी जिंदगी के लिए पर्याप्त से भी ज्यादा चीजें हासिल हो रही हों. हम यह नहीं जानते हैं कि अर्थ शास्त्रियों ने महंगाई का वैल्यूएशन किस बेसिस पर किया है ? आज से 20 से 30 साल पहले तक जो चीजें सिर्फ अमीर लोग अपने ऐशो आराम के लिए खरीदते थे उन्हें अब अर्थशास्त्रीयों ने आम जिंदगी की जरूरतें बता कर महंगाई का वैल्यूएशन किया है. पहले के मुकाबले आज के जमाने में लोगों के घरों में बिजली के इंस्ट्रूमेंट्स बहुत ज्यादा हैं, और उनके घर पर गाड़ियों के अलावा और भी बहुत से सामान जरूरत बहुत ज्यादा हैं. जबकि हम यह नहीं समझ पाते हैं कि इनमें से किन चीजों की हमें जरूरत है और किन चीजों की सिर्फ चाहत है.
अपने चौथे नजरिए के जरिए हम काफी ऊपर उठकर बहुत दूर तक देखने लगते हैं. यह हमारे स्पिरिचुअल नजरिए को दिखाता है. हम अपनी सीमित जिंदगी का एक चौथाई हिस्सा पैसा कमाने में लगा देते हैं. इस लिए इस नजरिए के मुताबिक पैसा आपकी जिंदगी के बदले में किए गए सौदे की कीमत है. पैसा कभी भी मुफ्त में नहीं आता है उसके बदले में आप को अपना टाइम, अपनी बुद्धि, ताकत टैलेंट कैपेबिलिटी और रिश्तो को कभी न कभी कहीं ना कहीं देना ही पड़ता है . जब जेसन और नेड्रा को पैसे के साथ इस इक्वेशन की जानकारी हुई तब उनकी समझ में आया कि अपने कलेक्शन के लिए उनकी फिजूलखर्ची के भुगतान के लिए लिए उनको जो ज्यादा काम करना पड़ेगा. उसके एवज में किए गए जिंदगी के सौदे घाटे के ही होंगे. क्योंकि उस दौरान बीते हुए वक़्त के साथ वो खुशियां वह मंजर कभी वापस लौट कर नहीं आएंगे.
जेसन भी यह समझ गए थे कि पैसा न कमाने की उनकी जिद से वह काफी वक्त अपनी छोटी मोटी आम जरूरतों को पूरा करने में लगा रहे हैं जबकि उस समय का वह बेहतर उपयोग कर सकते हैं. उनके हाथ से मौके छूट रहे हैं. इस तरह उन दोनों के अंदर पैसे की समझ में सुधार आया. जिसकी वजह से आगे उनकी जिंदगी बेहतर होती चली गई.
फाइनेंशियल फ्रीडम का मतलब बहुत अमीर होना नहीं है. क्योंकि जॉन स्टूअर्ट मिल के मुताबिक इंसान अमीर होने की जगह दूसरों से ज्यादा अमीर होना चाहता है.
फाइनेंशियल आजादी आपको पर्याप्त की भावना से मिल सकती है. क्योंकि जब कुछ भी जरूरत से ज्यादा हो जाता है तो दुख की वजह बन जाता है. उसी तरह जब आपके पास जरूरत के हिसाब से पर्याप्त हो तब आप फाइनेंशली आजाद हैं .
फाइनेंशियल फ्रीडम हासिल करने के दो आसान तरीके बताए गए हैं. पहले तरीके में आप यह देखते हैं कि आपको अपने जॉब से जो भी कमाई होती है उसमें से करीब आधा हिस्सा तो उस जॉब को बचाने में ही खर्च हो जाता है. जैसे जॉब पर जाने का खर्च, अपने लेवल के हिसाब से कपड़े गाड़ी और घर मेंटेन करने का खर्च, जॉब की वजह से बोरियत होने पर वेकेशन के लिए जाने का खर्च वगैरा-वगैरा. क्यूंकि अगर आप जॉब ना करते तो आप को यह सब खर्चे भी ना करने पड़ते. इस लिए आप को यह समझना होगा कि क्या आप को अपने जॉब से पर्याप्त पैसा मिल रहा है या नहीं. या इसकी जगह आप कुछ ऐसा काम कर सकते हैं जिसमें इतने सारे छुपे हुए खर्चे ना करने हों. इस बात को रिलाइज करके कुछ लोगों ने जॉब को छोड़ कर घर से ही पार्ट टाइम काम करना शुरू किया तो उन्होंने पाया की जॉब के मुकाबले आधी इंकम में ही वह ज्यादा बचत कर पा रहे हैं. इसके बाद उनको फाइनेंशियल फ्रीडम का मतलब समझ आ गया.
इसी तरह से दूसरे तरीके के लिए आपको अपनी इनकम और खर्चों का पूरा पूरा हिसाब रखना होगा . शुरू में ऐसा करना आपको बहुत मुश्किल लग सकता है. लेकिन ऐसा करने से आपको पता लगेगा कि आप की कितनी जिंदगी के एवज में आप ने कितना कमाया और कितना गंवाया. ऐसा करके आप अनुमान और अंदाजे की दुनिया से बाहर निकलकर फैक्ट्स के बेस पर रियलिटी की दुनिया में आ जाएंगे. और फिर अपने पैसे पर आपका कंट्रोल बेहतर होगा. और इसी वजह से आप अपनी जिंदगी में संतुष्टि और खुशी के लिए अपने पैसों और हालात पर निर्भर नहीं रहेंगे. इसी एहसास को फाइनेंशियल फ्रीडम कहते हैं.
व्हेयर इज इट ऑल गोइंग ?
स्टेप नंबर थ्री : मंथली टेबुलेशन
पैसे को लेकर या तो हम पास्ट में की गई गलतियों के लिए पछतावा करते हैं या फिर फ्यूचर के लिए चिंतित रहते हैं. इस लिए हमें अपनी जिंदगी में नो शेम नो गेम का मंत्र अपनाना चाहिए. जिसका मतलब है अपनी जरूरतों के मुताबिक खर्च करने में ना तो हमें शर्म आनी चाहिए और ना ही हमें खुद पर कोई इल्जाम लगाना चाहिए.
मिसाल के तौर पर अनीता क्लियर नाम की एक लेडी को ज्यादा खरीदारी की आदत पड़ चुकी थी. वह बहुत सालों तक अपनी जमा पूंजी को जरूरत से ज्यादा खरीदारी में खर्च करती रहीं. और उनका खरीदा हुआ बहुत सा सामान इस्तेमाल हुए बिना अलमारी में यूं ही बेकार पड़ा था. जिसे देखकर उन्हें बहुत दुख होता था कि इन को इस्तेमाल करने वाला कोई नहीं था. उसके बाद आहिस्ता आहिस्ता उनको खरीदारी करने में खुशी मिलना बंद हो गई. और फिर उन्होंने कलेक्शन के लिए खरीदारी की आदत छोड़ दी.
बहुत से मिडिल क्लास परिवारों में अक्सर रुपए पैसे की खींच तान चलती रहती है. लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि यह खींच तान किसी भी अहम जरूरत की चीज जैसे कि रोटी कपड़ा और मकान को लेकर नहीं बल्कि एक सभ्य समाज की सब मिनिमम रिक्वायरमेंट पूरी होने के बाद की हैं. इस खींचतान की वजह हमारी लालसा और ज्यादा से ज्यादा कलेक्शन करने की आदत है . इस स्थिति से निपटने के लिए स्पेशलिस्ट एडवाइजर्स आप को बजटिंग करने का सुझाव देते हैं . जिस के लिए वह कहते हैं कि अपनी जरूरतों की लिस्ट बनाइए और सिर्फ उसी के मुताबिक खर्च कीजिए. इससे आपकी फिजूलखर्ची बंद हो जाएगी. लेकिन असल में ऐसा नहीं होता है. बल्कि कुछ खरीदने का मन होने पर हम अपना मन मार कर बैठे रहेंगे. और फिर इस तरीके में मुश्किल यह है कि यह तरीका लंबे समय तक असरदार नहीं है . प्रॉब्लम खरीदारी की नहीं है, असली प्रॉब्लम है हमारी लालसा और हमारे अंदर का डर कि बाद में शायद यह ना मिले या वह ना मिले इसलिए हम इस सामान का कलेक्शन कर लें. और इस तरह की फिजूलखर्ची से बचने के लिए हमें इन भावनाओं को कंट्रोल करने की जरूरत है.
इस के लिए आप अपने इनकम और खर्च के हिसाब को जरूरत और ऐशो आराम की कैटेगरी में डिवाइड कीजिए. और अपने खर्च को सही जगह पर लिखते जाइए . और हर महीने उनका इंस्पेक्शन कीजिए .धीरे धीरे आपको खुद ही नज़र आने लगेगा कि कहां ज्यादा खर्च हो रहा है. जिसके बाद आप उस पर लगाम लगा सकते हैं. इससे आपका सेल्फ कॉन्फिडेंस भी बढ़ेगा और आपको यह भी समझ आ जाएगा कि कब आपके पास पर्याप्त हो गया है.
यहां यह भी समझने वाली बात है कि फिजूल खर्च से सिर्फ आपका पैसा ही बेकार नहीं जाता है बल्कि इसकी वजह से आपकी लिमिटेड जिंदगी का समय भी बर्बाद हो रहा है.
इस किताब में रोज मेरी नाम की एक लेडी का उदाहरण दिया गया है. उन्होंने अपने महीने भर के खर्च को सोच समझ कर अलग - अलग कैटेगरीज में मंथली लेजर यानी बही खाते के तौर पर लिखना शुरू किया. जिसका नाम इस किताब के मुताबिक मंथली टेबुलेशन है. रोजमेरी को अपने मंथली टेबुलेशन से बहुत फायदा हुआ. उन्हें महीने दर महीने अपने बनाए हुए टेबुलेशन में अपनी आदतें साफ नजर आ रही थीं. उन्होंने जब अपने टेबुलेशन की बारीकी से जांच की तो उन के लिए फ्यूचर में पैसों का संचालन करना बहुत आसान हो गया.
एक दूसरे एग्जामपल में अमेरिका के मेन नाम के एक गांव में रहने वाले स्टीव ब्रैंडन नाम के शख्स और लू बाउर नाम की लेडी बहुत ही अलग - अलग तरह की कम्यूनिटी से आते हैं. दोनों बहुत अच्छे दोस्त हैं और एक साथ रहते हैं. और मिल जुल कर खर्च करते हैं. स्टीव ट्रक चलाते हैं और लू एक अकाउंटेंट हैं. उन दोनों ने अपनी टोटल इनकम और टोटल खर्च का हिसाब लिखना शुरू किया. ऐसा करके उनको पता चला कि दोनों मिल कर औसतन अपने काम से हर घंटे करीब 10 डॉलर कमा रहे हैं. और इस तरह एक डॉलर के एवज में वह अपनी जिंदगी के 6 मिनट दे रहे हैं. इस सीधे से हिसाब से उनकी जिंदगी की कई उलझने सुलझ गईं. लू की इनकम स्टीव से करीब ढाई गुना ज्यादा है. लेकिन इस बात का उनके रिश्ते पर कोई उल्टा असर नहीं पड़ा. क्योंकि दोनों ने मिलजुल कर अपने रुपए पैसों के संचालन पर काम किया. एक बार अपने महीने दर महीने बनाए गए टेबुलेशन को देख कर स्टीव ने नोटिस किया कि वह तरह तरह की कुकीज़ यानी बिस्किट बगैरा पर बहुत ज्यादा खर्च कर रहे हैं. इसके बाद फौरन उन्होंने अपने उस खर्च को कंट्रोल किया. ऐसा करने से ना सिर्फ उनका मौजूदा खर्च कम हो गया बल्कि साथ ही साथ उन्होंने डाइटिंग और फ्यूचर में होने वाले थेरेपिस्ट के खर्च को भी बचा लिया.
एक दूसरे एग्जांपल में बताया गया है कि लिन और कार्ल मरनेर नाम के पति - पत्नी दोनों को म्यूजिक का बहुत शौक है और यह दोनों ही कंप्यूटर प्रोग्रामर हैं. लेकिन इनकी सिमिलरिटीज की वजह से इन के खर्च के हिसाब भी एक जैसे नहीं हैं. दोनों के नेचर एक दूसरे से बहुत अलग हैं. कार्ल एक बेहद सुलझे हुए और बहुत सोच समझकर खर्च करने वाले शख्स हैं. जबकि लिन एक इमोशनल और शौकीन मिजाज लेडी हैं. उन दोनों की खरीदारी की आदत एकदम अलग थी. और म्यूजिक को छोड़ कर उनके शौक भी अलग थे. इस वजह से मंथली टेबुलेशन में दोनों को काफी मुश्किलें आ रही थीं. इतना ही नहीं शादी के कुछ टाइम बाद लिन ने अपना कंप्यूटर प्रोग्रामिंग का जॉब छोड़ दिया और पियानो सिखाने लगीं. इससे उनकी मंथली इनकम अनसर्टेन हो गई. और फिर लिन का घर खर्चे में कंट्रीब्यूशन कम हो गया. जिसकी एवज में वह घर के कामों में ज्यादा हाथ बंटाने लगीं. लेकिन इसके बाद भी उनका मंथली टेबुलेशन उलझा का उलझा ही रहा. इसका असर उनकी शादी पर भी पड़ने लगा और इस वजह से उन्हें झगड़े होने लगे. इस प्रॉब्लम को हल करने के लिए दोनों ने अपना अलग-अलग मंथली टेबुलेशन बनाना शुरू किया . क्यूंकि कार्ल की एक फिक्स इनकम थी. इसलिए उनको ज्यादा फर्क नहीं पड़ा. लेकिन जब लिन ने घबराते हुए अपना मंथली टेबुलेशन बनाया तो वह हैरान रह गईं. और उनकी बहुत सी धारणाएं टूट गई थीं. दरअसल वह खुद को कार्ल पर जितना डिपेंडेंट समझती थीं असल में वह उससे कहीं ज्यादा सेल्फ डिपेंडेंट थीं. इसके बाद उनको यह रियलाइज हो गया कि उन्होंने फाइनेंशियल फ्रीडम हासिल कर ली थी.
फाइनेंशियल ऑपरेशन से फाइनेंशियल फ्रीडम हासिल करने के प्रोसेस को इस तरह समझा जा सकता है :
1. पहली बात, अपनी मंथली इनकम को अलग - अलग खास कैटेगरीज में डिवाइड कीजिए. अगर आपकी कोई फिक्स इनकम नहीं है तो 6 महीने या एक साल का एवरेज भी ले सकते हैं. इसी तरह अपने मंथली खर्चों को भी खास कैटेगरीज में डिवाइड कीजिए. और इसमें यह भी लिखिए कि आप जिंदगी की किन-किन जरूरतों के लिए कितना पैसा खर्च कर रहे हैं ?
2. दूसरी बात, अपना मंथली टेबुलेशन बनाएं.
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3. तीसरी बात, आप की टोटल इनकम और टोटल खर्चे के डिफरेंस से पता चलेगा कि आप ने क्या कुछ बचाया है या सब कुछ उड़ा दिया या फिर अपनी इनकम से ज्यादा खर्च कर दिया है.
4. चौथी बात, हर किए गए खर्च के एवज में उस पैसे को कमाने के लिए आप ने अपनी जिंदगी का कितना टाइम लगाया इसका भी हिसाब लिखें. ऐसा करने से आपको समझ में आएगा कि आप कहां पर जरूरत से ज्यादा खर्च कर रहे हैं जो अमूमन आपको पता नहीं लग रहा है. इतना ही नहीं इससे आपका ध्यान उस आदत पर भी जाएगा जो अनायास आप से फिजूल खर्च करवा रही है. जिस वजह से आप तनाव में आ जाते हैं और अपने कलेक्शन से दुखी होते हैं.
हाऊ मच इज एनफ ? नेचर ऑफ फुलफिलमेंट
स्टेप नंबर फोर : थ्री क्वेश्चन्स दैट विल ट्रांसफॉर्म योर लाइफ
इस किताब में इस बारे में समझाया गया है कि हमारी जिंदगी में इतनी सारी प्रॉब्लम्स और चैलेंजेज होने के बाद भी अपने सपनों को कैसे पूरा किया जा सकता है.
इसके लिए आप को एक स्पिरिचुअल सफर करने की एक्सरसाइज कराई जाती है. जिसमें आपको अपने आप से 3 सवाल पूछने होते हैं. जिनके जवाब भी आपको पूरी ईमानदारी से देने होते हैं.
- पहला सवाल - आप को किसी भी काम को करने में जितना समय लगा उसके मुकाबले में आपको कितने फुलफिलमेंट यानी पूर्ति का एहसास हुआ ?
- दूसरा सवाल - क्या आपके टाइम का यह इन्वेस्टमेंट आपकी लाइफ वैल्यूज और परपज से तालमेल रखता है ?
- तीसरा सवाल - अगर आपके लिए रोजी रोटी का सवाल ना होता तो आप उस समय का इस्तेमाल कैसे करते ?
अगर आप इन सवालों के जवाब पूरी ईमानदारी से देते हैं तो इस से आपकी जिंदगी में ना सिर्फ एक ऐसा पॉजिटिव चेंज आएगा, जो आपको संतुष्टि और फुलफिलमेंट प्रोवाइड करेगा, बल्कि अपने सपनों को जीने की हिम्मत भी देगा.
टेड और मारथा ने अपने आपसी मन मुटाव को ऐसे ही दूर किया. उन दोनों के शौक और खरीदारी की आदतें अलग अलग थे. दोनों को ही एक दूसरे के किए गए खर्च फालतू के लगते थे. वह एक दूसरे पर उंगली उठाते, सवाल करते और एक दूसरे की पसंद का मजाक उड़ाते थे. धीरे-धीरे उनके बीच तनाव बढ़ गया पर प्यार अभी भी बाकी था. जब उन्हें इस प्रोसेस की जानकारी हुई तब उन्होंने भी अपना रवैया बदल दिया. अब वह दोनों एक दूसरे से बस इतना पूछते कि क्या उन्हें यह खरीद कर पूर्ति मिली. और क्या वह इसे खरीद कर अंदर से संतुष्ट थे. इससे दूसरा शख्स भी यह सोचने पर मजबूर हो जाता था कि क्या वाकई उसका खर्च जरूरी था या वह सिर्फ कलेक्शन की भावना की वजह से था. इस तरह उनके झगड़े भी कम हो गए और दोनों का आपसी प्यार भी बढ़ गया.
आगे इस किताब में आपकी जिंदगी के पर्पज के बारे में समझाया गया है. जोएना मेसी एक टीचर, पर्यावरण संरक्षक और लेखिका हैं. उन्होंने 3 अलग अलग दिशाओं में सोचने के लिए कहा है. ऐसा करने से आपको अपनी जिंदगी का पर्पज पता चलेगा.
- पहली दिशा है - आप वह काम कीजिए जो आप सिर्फ पैसे कमाने के लिए ना करते हों और जिसे आप हमेशा पूरे जज्बे के साथ अपने तन मन से करना चाहते हों.
- दूसरी दिशा है - अपने दर्द से दूर मत भागिये. बल्कि उसे अपने काम में शामिल कीजिए . बनावटी ऐशो आराम की चीजों से इसको मत छुपाईये. उस दर्द को दूर भगाने की कोशिश कीजिए. अगर कोई दूसरा शख्स भी आप की तरह दर्द से गुजर रहा है तो उसकी मदद कीजिए इससे आपको अपने काम में मदद मिलेगी.
- तीसरी दिशा है - मौजूदा समय में आपको जो कुछ भी हासिल है, उसका इस्तेमाल कीजिए.
दरअसल अपने उद्देश्य का पता कर पाना सबके लिए आसान नहीं होता. जैसे मदर टेरेसा ने अपनी जिंदगी का पर्पज तलाश कर लिया था. हो सकता है आप वैसे अपना पर्पज ना ढूंढ पाएं. इस लिए आपको सिर्फ अपने मन में झांक कर बस यह ध्यान रखना है कि आपके सपने नजर अंदाज ना हो सकें.
आगे किताब में एक एग्जांपल के तौर पर यह बताया गया है कि जॉर्ज बर्नार्ड शॉ ने एक बार एक लेडी जो थोड़े गरीब घर से थीं, उनसे यूं ही कहा कि वह शर्त लगाते हैं कि 5 पाउंड के लिए आप उनके साथ बिस्तर तक आएंगी. यह सुन कर उन लेडी का नाराज होना बनता था. उन्होंने जॉर्ज को ताना कसते हुए कहा कि वह ऐसा सोच भी कैसे सकते थे. जॉर्ज ने भी एक पल को सोचा और फिर कहा अगर बात एक लाख पाउंड की हो तो ! इस पर वह लेडी खामोश हो गईं. और उनकी खामोशी ने सब कुछ बयां कर दिया. इस अनुभव से जॉर्ज को यह लगा कि उन की बहस काम पर नहीं बल्कि उसकी कीमत पर थी. इसी तरह पैसा भी हमारे काम और हमारी सीमित जिंदगी का सिर्फ एक मोल है. इस लिए उसे सिर्फ इसी तरह देखना चाहिए ना कि उसके लिए जिंदगी जीनी चाहिये. जिंदगी जीने के लिए जितना पैसा जरूरी है उतने से ही संतोष करना चाहिए. हम जितना ज्यादा पैसा चाहेंगे उसके साथ जिंदगी में उतना ही दुख भी आएगा. हमें अपनी इच्छा और जरूरत के फर्क को समझना बेहद जरूरी है . क्या है जो हमारे लिए इतना जरूरी है जिसके बिना हमारा काम ही नहीं चल सकता ? और वह क्या है जो हमें अपनी इच्छा की वजह से चाहिए . इस बारे में थोड़ा सोचने पर हमें रियलाइज होता है कि इनके बिना भी काम चल सकता है. जब तक हम इस फर्क को नहीं समझेंगे, हमें पूर्ति का एहसास नहीं होगा और हमें कभी ऐसा नहीं लगेगा कि जो है वह पर्याप्त है. और हम हर वक्त मोर इस बेटर के पीछे लगे रहेंगे. जिसकी वजह से हमारे पास जो होगा हम उसका भी अच्छे से इस्तेमाल नहीं कर पाएंगे. बल्कि और ज्यादा कलेक्शन करने में लग जाएंगे कि इतना पर्याप्त नहीं है. फाइनेंशियल फ्रीडम से हमें अपने बचपन के सपनों को साकार करने का और इस दुनिया को बेहतर बनाने का मौका और वक्त मिल सकता है . इसके अलावा हम अपने अंदर फुलफिलमेंट और जिंदगी की खुश हाली के अहसास को महसूस कर सकते हैं. फाइनेंशियल फ्रीडम हासिल करने के लिए सही काम चुनने के साथ - साथ अपने कमाए हुए पैसों को सही तरीके से खर्च करना भी जरूरी है. क्योंकि आप वही खर्च करेंगे जो आपने कमाया है और इसे कमाने में आपने अपनी जिंदगी के सीमित समय को लगाया है. इसलिए आप को तय करना है कि आप अपने समय को किस तरह और किस पर खर्च करना चाहते हैं. आप जो भी खरीदें उससे आप को एक परमानेंट पूर्ति का एहसास होना चाहिए. आप बस वही खरीदें जिस चीज की आपको वाकई में जरूरत है. अगर आपका काम और आप के खर्च का तरीका आपकी लाइफ के परपज और वैल्यूज से तालमेल में है तो आपको हर हाल में अपने फुलफिलमेंट का एहसास जरूर होगा.
सीइंग प्रोग्रेस
स्टेप नंबर फाइव : मेकिंग लाइफ एनर्जी विजिबिल
किताब के इस पार्ट मेें आप को पैसों के संचालन में सुधार का अंदाजा लगाने के लिए एक ग्राफ बनाने के लिए कहा जाता है. जिसमें एक्स - ऐक्सिस यानी होरिजेंटल लाइन में साल होंगे और वाई - ऐक्सिस यानी वर्टिकल लाइन में आपकी इनकम और खर्च होंगे. इस ग्राफ के जरिए आप साल दर साल अपने पैसों के संचालन में सुधार का इंस्पेक्शन कर के अपने फाईनेंशियल बिहेवियर को देख सकते हैं. जिससे आपको अपने टोटल खर्चे के बारे में यह पता चलेगा कि क्या आप के खर्चे आप की इनकम से कम हैं या उसके बराबर हैं या फिर वह आप की इनकम से ज्यादा हैं . इस ग्राफ के साथ मंथली टेबुलेशन को तैयार करके आप अपने फिजूल खर्चो के बारे में समझ सकते हैं. कभी-कभी ऐसा भी होता है कि किसी महीने में कुछ अन यूजुअल खर्चे आ जाते हैं जैसे कि गाड़ी की मरम्मत, इंश्योरेंस प्रीमियम या फिर घर का प्रॉपर्टी टैक्स वगैरह - वगैरह. अगर आप गौर करें तो तकरीबन हर महीने में कोई ना कोई अन यूजुअल खर्च होता ही है यानी कि हर एक महीना अनयूजुअल सा होता है इन में से कई अन यूजुअल खर्च सालाना होते हैं तो आप इनका मंथली एवरेज निकाल कर इनको मंथली टेबुलेशन में लगा सकते हैं. और इस तरह से आप हर महीने के आंकड़ों को ग्राफ में डाल कर खुद अपनी सहूलियत से पैसों का संचालन कर के अपने खर्च पर और खर्च की आदतों में सुधार ला सकते हैं. और इस तरह से अपने कर्ज को भी कंट्रोल कर सकते हैं . या उसे खत्म कर सकते हैं. ऐसा करके आप बैंक में अपनी रकम को बढ़ा सकते हैं और अपनी फाइनेंशियल फ्रीडम हासिल कर सकते हैं.
द अमेरिकन ड्रीम — ऑन ए शू स्ट्रिंग
स्टेप नंबर सिक्स : वैल्यूइंग योर लाइफ एनर्जी — मिनीमाइजिंग स्पेंडींग
1970 के आखिर में अमेरिका में ' लिव लाइफ दी अमेरिकन वे ' ' और द अमेरिकन ड्रीम ' जैसे बहुत ही पॉपुलर स्टेटमेंट न्यूज़ पेपर्स और हॉलीवुड सिनेमा में अक्सर सुनाई दिया करते थे. जिनके बारे में अलग-अलग स्टोरीज सुनाई जाती हैं. इस किताब में इस को इस तरह समझाया गया है कि अमेरिकन इकॉनमी को द इकॉनमी ऑफ स्पेंडींग कहा जाता है. जैसे कि भारत की इकोनामी द इकॉनमी आफ सेविंग है. यह दोनों देशों के अलग-अलग कल्चर का प्रभाव है. अमेरिका में लोग अपनी तनख्वाह या उससे भी ऊपर खर्च करके हर तरह की ऐशो आराम की चीज खरीद सकते हैं. या फिर महंगे वेकेशंस पर जा कर मदमस्त जिंदगी जीने में यकीन रखते हैं.
वहीं भारत के लोगों की सोच सेविंग की होती है. हमारे यहां कमाई का ज्यादातर हिस्सा या तो इन्वेस्ट किया जाता है या उसका गोल्ड खरीदा जाता है या फिर उसकी जमीन खरीद कर रखी जाती है. और बच्चों की पढ़ाई और उनकी शादी के लिए भी पैसे बचा कर रखे जाते हैं.
इस किताब में आगे बताया गया है कि कम खर्च करना यानी सिर्फ जरूरत के सामान को ही खरीदना और फिजूल खर्च से बचने की आदत को इंग्लिश लैंग्वेज में फ्रुगैलिटी कहते हैं. और जैसे कि पहले ही बताया जा चुका है कि अमेरिका में लोग हमेशा ज्यादा खर्च करने की कोशिश में लगे रहते हैं. इसी वजह से वहां पर आम बोल चाल की भाषा में फ्रुगैलिटी या फ्रुगैल शब्द को बहुत नीची नजरों से देखा जाता है. और सच्चाई तो यह है कि इंग्लिश लैंग्वेज में फुलफिलमेंट यानी पूर्ति के एहसास के मायने बताने वाला कोई सटीक शब्द या स्टेटमेंट ही नहीं है. क्योंकि भाषा का विकास रीति रिवाज और कल्चर के मुताबिक होता है. फ्रुगैलिटी का यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि आपको मन मार कर जीना है. बल्कि इसकी जगह इसका यह मतलब है कि जो कुछ भी आपके पास है आप उसी में आनंद उठाइए और उसको पूरी तरह इस्तेमाल करने के बाद ही नया खरीदें. जिससे कि फालतू की खरीदारी को रोका जा सके. इस लिए जो कुछ भी अगर आप को लगता है कि भविष्य में कभी तो काम आएगा और उसे अभी से जोड़ कर रख रहे हैं तो यही गलत आदत आपकी पैसों की प्रॉब्लम के लिए सबसे बड़ी जिम्मेदार है.
इस किताब में फ्रुगैलिटी को समझने और फिजूलखर्ची से बचने के लिए 10 आसान तरीके बताए गए हैं :
- पहला तरीका - खरीदारी पर ना जाएं :
जिसका मतलब है कि अगर आप अपने काम से बोर हो गए हैं तो सिर्फ मन बहलाने के लिए बेवजह खरीदारी पर ना जाएं.
- दूसरा तरीका - पांव को चादर से बाहर ना फैलाएं :
जिसका मतलब है सिर्फ उतना ही खरीदें जिसकी आपको वाकई में बहुत जरूरत है और जिसको आप अपने पैसों से बिना कर्ज लिए खरीद सकते हैं.
- तीसरा तरीका - आपके पास जो भी पहले से है उसे संभाल कर रखें :
जिसका मतलब है अपनी चीजों और इंस्ट्रूमेंट्स को संभाल कर रखने से भी उनकी मरम्मत और रख रखाव के बहुत से पैसे बच जाते हैं.
- चौथा तरीका - अपनी चीजों का भरपूर इस्तेमाल करें:
कितनी बार ऐसा होता है कि हमारे पास ढेर सारे कपड़े होते हुए भी हम अपने मन में बिठा लेते हैं कि पहनने के लिए कुछ भी नहीं है. और नए कपड़े खरीद लाते हैं. फेंक कर नया खरीदने से पहले अपने कपड़ों और सामानों का इस्तेमाल औसतन 20% ज्यादा करें. इसमें एक बात का ध्यान रखें कि जिस चीज ने बिल्कुल जवाब दे दिया हो, उसे घसीटते भी ना रहें. इसलिए एक संतुलित व्यवहार लेकर चलें.
- पांचवां तरीका - सेल्फ डिपेंडेंट बनें :
कितनी ही बार घर में छोटी मोटी मरम्मत होती रहती है. या गमलों में पौधे लगाने हैं या फिर गाड़ी का टायर बदलना है वगैरह वगैरह. ऐसे काम करना पहले हम अपने माता पिता या घर के बड़ों से ही सीखते थे. लेकिन आजकल की मॉडर्न जिंदगी की जरूरतों ने सब बदल दिया है. आजकल हम ऐसे छोटे-मोटे कामों के लिए भी कारीगरों या खास लोगों को बुलाते हैं. जिसकी वजह से काफी फिजूलखर्ची होती है.
- छठवां तरीका - पूर्व अनुमान लगाएं :
अगर आपने पहले से ही घर में लगने वाली चीजों का अंदाजा लगा रखा है यानी पहले से ही यह सोच रखा है कि अगले कुछ महीनों में क्या क्या जरूरतें आ सकती हैं तो आप काफी खर्च बचा सकते हैं. अक्सर हड़बड़ी में ही गड़बड़ी होती है इस लिए अपनी जरूरत की चीजों को पहले से ही ध्यान में रखिए जिस से शायद हो सकता है कि आपको कोई डिस्काउंट या ऑफर भी मिल जाए.
- सातवां तरीका - सामानों की कीमत क्वालिटी और टिकाऊ पन वगैरह की जांच करें :
किसी चीज को खरीदने से पहले उसके बारे में अच्छे से जांच पड़ताल कर लें. और कीमत क्वालिटी और टिकाऊ पन में सभी विकल्पों को अच्छे से चेक करें. इस तरह आप एक बेहतर खरीदारी कर सकेंगे.
- आठवाँ तरीका - किफायती दाम में खरीदें :
अपनी जरूरत का सामान खरीदने से पहले हर जगह अच्छी तरह से पूछ ताछ करने के बाद ही सबसे किफायती दाम पर खरीदें.
- नौवां तरीका - एक प्रॉब्लम के कई सलूशन :
अगर आप जिंदगी से परेशान हैं तो एक फिल्म देख सकते हैं या दोस्तों से मिल सकते हैं. या कोई किताब पढ़ सकते हैं या फिर किसी अच्छे होटल में खाना खा सकते हैं. यानी एक ही प्रॉब्लम को आप कई तरीकों से हल कर सकते हैं. लेकिन याद रखिए कि हर तरह के हल की अपनी एक कीमत है. इस लिए आप अपनी फाइनेंशियल सिचुएशन के मुताबिक ही यह डिसाइड कर सकते हैं कि आपको कौन सी कीमत चुकानी है.
- दसवां तरीका - इस किताब को अमल में लाएं :
इस किताब के लेखकों के मुताबिक बहुत से लोग इस किताब को बस यूं ही पढ़ लेते हैं पर अमल में नहीं लाते. इस लिए आप को अपनी जिंदगी में भी इस किताब में बताए गए सुझावों को हकीकत में फॉलो करना चाहिए.
आगे इस किताब में पैसे बचाने की जरूरत के बारे में समझाया गया है. क्योंकि महंगाई दिन पर दिन बढ़ती जा रही है. और पैसा कमाने के जरिए कम हो रहे हैं. और सबसे जरूरी बात यह है कि आज कल की मॉडर्न लाइफ मैटेरियलिज्म से भरी हुई है जिसके लिए पैसों का होना बहुत जरूरी है. और जिसे हम अपनी जिंदगी के लिमिटेड टाइम को लगा कर कमाते हैं. इसलिए अगर हम ने आज से पैसों की बचत नहीं की तो याद रखिए ना सिर्फ हमारा कल बल्कि हमारे बच्चों का और हमारी आने वाली पीढ़ीयों का कल भी खतरे में आ सकता है. इसीलिए पैसे बचाना एक निजी और सामाजिक जिम्मेदारी भी है. आप अपनी सूझ बूझ से जिंदगी के अलग - अलग क्षेत्रों में काफी पैसे बचा सकते हैं. और फाइनेंशियल फ्रीडम भी पा सकते हैं.
दरअसल आज कल की मॉडर्न मेटीरियलिस्टिक सोसाइटी पर पर्यावरण को नुकसान से बचाने की जिम्मेदारी भी आती है. क्योंकि जितना कंजम्पशन बढ़ेगा उतनी डिमांड बढ़ेगी. इसके बाद उतनी ही सप्लाई भी बढ़ेगी. और फिर प्रोडक्शन भी बढ़ेगा. और इन सब का हर्जाना धरती को भरना पड़ता है. लेकिन अगर हम अपने कंजम्पशन को कम करके अपने खर्च पर कंट्रोल कर लें तो अपने साथ ही साथ पर्यावरण को भी बचा सकते हैं.
फॉर लव ऑर मनी : वैल्यूइंग लाइफ एनर्जी — वर्क एंड इंकम
स्टेप नंबर सेवन : वैल्यूइंग योर लाइफ एनर्जी — मैक्सीमाइजिंग स्पेंडींग
हम लोग अक्सर टीवी और रेडियो पर इस तरह के विज्ञापन देखते और सुनते हैं जो आपको काम के तनाव से दूर भागने के तरीकों के बारे में बता कर कुछ ना कुछ बेचने की फ़िराक़ में रहते हैं. यह विज्ञापन असर दार भी हैं और इनके दम पर मार्केटिंग भी होती है. क्योंकि बुनियादी तौर पर तकरीबन सभी लोग काम से परेशान हो जाते हैं.
जाने माने इकोनॉमिस्ट रॉबर्ट थियोबाल्ड के मुताबिक काम के बारे में कहा गया है कि असल में लोग काम नहीं करना चाहते हैं. इसी लिए उन्हें मुआवजे के तौर पर काम करने के लिए पैसे दिए जाते हैं. इतिहास के तौर पर अगर हम शुरुआत में काम करने के टाइम पीरियड और उसके विकास को देखें, तो यह पाएंगे कि आज की मॉडर्न लाइफ में हफ्ते में 40 घंटे काम करने का जो सिद्धांत लागू किया गया है वह असल में सदियों पुराना तरीका है . सदियों पहले स्टोन एज में इंसान हफ्ते में औसतन दो दिन ही काम करता था. जिससे कि पूरे हफ्ते के खाने का इंतजाम हो जाता था. और बाकी का टाइम एक्सरसाइज करने, खेल कूद और रीति रिवाज निभाने में बीत जाता था . इंसानी इतिहास में इंसान ज्यादा तर दिन में 2 से 3 घंटे ही काम करता था. और फिर जैसे जैसे हमारी सोसाइटी ने खेती करने के मेन काम की जगह इंडस्ट्रीज लगाने की तरफ कदम बढ़ाने शुरू किए , वैसे वैसे इंसानों के काम करने का टाइम पीरियड भी बढ़ता गया.
1934 में भारत के जाने - माने संत श्री परमहंस योगानंद ने भी सेल्फ डिपेंडेंट और स्पिरिचुअल कमेटियों के बारे में बताते हुए कहा था कि सभी लोगों को चाहे वह अमीर हों या गरीब दिन में 3 घंटे ही काम करना चाहिए. क्योंकि उतने में ही जिंदगी के लिए सफिशिएंट प्रोडक्शन हो जाता है. और इसके बाद उन को दिन का बाकी बचा हुआ टाइम साहित्य और मन के शुद्धिकरण में लगाना चाहिए . जबकि इस की जगह आज कल तो सभी लोगों के लिए दिन में 8 घंटे काम करना जरूरी कर दिया गया है. हालांकि वैसे तो इंडस्ट्रियल रिवॉल्यूशन को मजदूर तबके का भला करने वाला माना गया था, लेकिन यह गौर करने की बात की है कि दुनिया में औद्योगिकरण के बाद ही काम करने का टाइम पीरियड इतना बढ़ा दिया गया कि हमने काम और छुट्टी को अलग-अलग करके देखना शुरू किया. 1930 के द ग्रेट डिप्रेशन के दौरान इकोनामी में उतार-चढ़ाव के बाद पिछले करीब 80 सालों से काम करने का टाइम पीरियड कम से कम दिन के 8 और हफ्ते के 40 घंटे के हिसाब से चला आ रहा है. लेकिन 90 के दशक के बाद काम करने का यही टाइम पीरियड 50 से 60 घंटे तक हो गया है. और हफ्ते में 6 से 7 दिन तक काम चलता रहता है. जिसमें छुट्टी के पीरियड को घटाकर एक से आधे दिन तक कर दिया गया है.
जॉन डी ग्रैफ़ नाम के सिविल राइट्स एडवोकेट ने एक मुहिम शुरू की. जिसमें वह कहते हैं कि साप्ताहिक तौर पर काम करने की अवधि को घटाया जाए. और अवकाश की अवधि को बढ़ाया जाए जिससे लोग अपनी मानसिक सेहत भी सुधार सकें और अपने काम को ज्यादा अच्छे से भी कर सकें. लेकिन उनका काफी विरोध हो रहा है.
यहां पर यह समझना बेहद जरूरी है कि काम करना जरूरी तो है लेकिन अपनी फैमिली और दोस्तों से रिश्तो पर ध्यान देना भी उतना ही जरूरी है.
1997 में पब्लिश हुई अपनी किताब ' द टाइम बाइंड ' मे लेखिका अर्ली रसेल होशचिल्ड ने लिखा है कि नए जमाने की मॉडर्न फैमिली के मेंबर्स ज्यादातर अपना टाइम इन तीन चीजों में बिताते हैं - अपने काम में, घर पर और काम में बिताए ज्यादा टाइम की वजह से रिश्तो में पड़ी दरार को मिटाने में.
बचपन में अक्सर हम सब से एक सवाल जरूर पूछा जाता है कि आप बड़े होकर क्या बनना चाहते हैं ? और कई बार ऐसा हुआ जब हमने इस सवाल का जवाब अपने मन से ना देकर वह जवाब दिया जो दूसरे सुनना चाहते थे. और टाइम के साथ साथ हमारे जवाब भी बदलते रहे. दरअसल हमें जिंदगी के मायने समझ में आने से पहले ही यह सवाल पूछ लिया जाता है. और हम इस सवाल का जवाब क्या बनना चाहते हैं की जगह यह देते हैं कि हम क्या करना चाहते हैं . इसी वजह से आगे चलकर बहुत से लोग अपने काम और कैरियर से खुश नहीं होते, और मिडलाइफ क्राइसिस से गुजरते हैं.
हमें यह याद रखना चाहिए कि आजीविका के लिए हम जो भी काम करते हैं, उसके मुकाबले में हमारा होना ही उससे कहीं बड़ा है. पैसे और मैटेरियलिज्म के इस समाज में हम शायद अपना असली नजरिया भूल चुके हैं. लेकिन अभी भी ज्यादा देर नहीं हुई है हमें खुद पर और हमारे अंदर दूसरों की मदद करने की जो क्षमता और टैलेंट हैं, उस पर यकीन रखना चाहिए. और हमें अपने काम और रिश्तो के बीच सही तालमेल बनाने की कोशिश करते रहना चाहिए. और हमें यह भी रियलाइज करना चाहिए कि हम सिर्फ काम करने और बिल चुकाने के लिए ही पैदा नहीं हुए हैं.
आगे इस किताब में यह बताया गया है कि इंसान आमतौर पर कई वजहों से काम करता है. जैसे आजीविका के लिए, सुरक्षा के लिए या किसी परंपरा के लिए या फिर यूं ही मस्ती के लिए या कोई फर्ज निभाने के लिए और अपने क्रिएशन से फुलफिलमेंट यानी पूर्ति को महसूस करने के लिए वगैरा-वगैरा.
दरअसल काम करने के मेन पर्पज मैटेरियलिस्टिक और स्पिरिचुअल हैं. मैटेरियलिस्टिक पर्पज यह है कि हम काम के जरिए अपनी जरूरतों को पूरा कर सकें और समाज में जी सकें. स्पिरिचुअल पर्पज है कि हम अपने काम के जरिए अपनी नॉलेज को बढ़ा सकें, कुछ नया सीख सकें, औरों को कुछ सिखा सकें, और अपने मानसिक स्तर को ऊंचा कर सकें.
क्योंकि जॉब करने से हमारा मैटेरियलिस्टिक पर्पज तो पूरा हो गया, लेकिन स्पिरिचुअल पर्पज अधूरा रह गया. इसीलिए आज मिडिल क्लास और अपर मिडल क्लास के लोगों का एक बहुत बड़ा तबका अपने काम से मानसिक रूप से परेशान है. इसकी वजह अपने जॉब से होने वाली उम्मीदों का पूरा ना होना है. असल में हम यह सोचते हैं कि पैसा कमाने के लिए हम जो काम करते हैं बस वही हमारा काम है.
लेकिन जब हम अपने जॉब और अपने काम में अंतर को समझने लगेंगे तब ना हमें अपने जॉब से शिकायत होगी और ना बाकी कामों से परहेज होगा. और यह काम कुछ भी हो सकते हैं. जैसे अपने शौक पूरे करना, अपने आदर्शों से समझौता ना करना, समाज की बेहतरी के लिए काम करना और दूसरों की मदद करना वगैरा-वगैरा. हम अपने जॉब में खुशी को ढूंढना बंद करके अपने जॉब को ही खुशी से कर सकते हैं. और ऐसा करके अपनी जिंदगी को खुशहाल बना सकते हैं. जबकि हमने जिंदगी के रिश्ते को भी पैसे से तोलना शुरू कर दिया है. हमको यह लगने लगा है कि जिस भी काम के हमको पैसे नहीं मिलते हैं वो काम बेमानी है. हम यह भूल गए हैं कि काम के साथ जिंदगी में अपने रिश्तों को निभाना भी एक अच्छी खुशहाल और संतुष्ट जिंदगी जीने के लिए पैसे कमाने जितना ही जरूरी है. बिना पूरे रिश्तों के यह जिंदगी अधूरी है. चाहे हमारे पास कितने भी पैसे क्यों ना हो जाएँ. इस लिए अपनी लाइफ एनर्जी और जिंदगी के लिमिटेड टाइम का सदुपयोग कीजिए.
द क्रॉस ओवर पॉइंट : द पॉट ऑफ गोल्ड एट द एंड ऑफ द वाल चार्ट
स्टेप नंबर एट : कैपिटल एंड द क्रॉस ओवर पॉइंट
किताब के इस पार्ट में यह बताया गया है कि कैसे आप बिना कोई ऐक्टिव वर्क किए भी अपने पैसे से और पैसा बना सकते हैं .
किताब के लेखक फाइनेंशियल इंडिपेंडेंस पर ' एफ आई प्रोग्राम ' के नाम से एक कार्यक्रम का आयोजन करते थे. जिसमें लोगों को इस किताब में बताए गए सिद्धांतों और तरीकों पर प्रैक्टिकल ट्रेनिंग दी जाती थी.
आम तौर पर खर्च के बाद जो पैसा बच जाता है उस हिस्से को हम इनकम की बचत कहते हैं. जो कभी भविष्य में हमारे काम आ सके और हमें मुसीबत से निकाल सके. पर जब आप एफ आई प्रोग्राम के हिसाब से सोचते हैं तो यह आपकी बचत नहीं बल्कि एक कैपिटल यानी पूंजी है. पूंजी और बचत में एक बहुत बड़ा अंतर होता है. बचत सिर्फ खर्चों के बाद इनकम से बची हुई रकम है जबकि पूंजी सिर्फ अपने होने से ही आपके लिए पैसे कमाती है. पूंजी से पैसे कमाने के 2 तरीके होते हैं - स्पैक्यूलेशन इंस्ट्रूमेंट और डेट इंस्ट्रूमेंट. जब आप अपनी पूंजी का इन्वेस्टमेंट किसी शेयर में , स्टॉक ऑप्शन में या म्यूचुअल फंड में करते हैं, या फिर उससे जमीन जायदाद खरीदते हैं तो आपको उससे स्पैक्यूलेशन यानी उम्मीद होती है कि वह कैपिटल उस इन्वेस्टमेंट से बढ़ेगी. वहीं अगर आप अपनी कैपिटल किसी को ब्याज पर उधार देते हैं तो ब्याज से आपकी इनकम होती है और उधार का पीरियड खत्म होने पर आप की रकम भी वापस मिल जाती है. इस तरह आप की पूंजी सुरक्षित भी रहती है और आप बिना कोई काम किए उस से पैसे भी कमाते हैं . इसे पैसिव इनकम कहते हैं. यह इनकम आपको कई खर्चों से चिंता मुक्त रखती है. इस से आप को जिंदगी जीने के लिए पैसे कमाने की जरूरत नहीं रह जाती है. महीने दर महीने और साल दर साल जब आप इसी तरह अपनी पूंजी को लगातार बढ़ाते जाएंगे और उसका प्रॉपरली इन्वेस्टमेंट करते जाएंगे तो आपकी पैसिव इनकम यूं ही कंपाउंड इंटरेस्ट के जरिए धीरे-धीरे बढ़ती जाएगी. फिर एक वक्त ऐसा आएगा जब आपकी पैसिव इनकम आपके मंथली खर्च से कहीं ज्यादा हो जाएगी इसे क्रॉस ओवर पॉइंट कहते हैं. और उस वक्त आप फाइनेंशियल इंडिपेंडेंस हासिल कर चुके होंगे. और इस की वजह यह है कि उस वक्त आपकी पूंजी आपके रोजमर्रा के खर्च उठाने के लिए जरूरी पैसों को कमाने लगेगी. उस वक्त आप जो भी काम करना चाहेंगे वह कर सकते हैं. क्योंकि उस वक्त आप अपनी आजीविका पर निर्भर नहीं रहेंगे. और पैसिव इनकम के मंथली ट्रेंड को स्टडी कर के आप फ्यूचर के लिए एक ग्राफ बना कर यह भी पता कर सकते हैं कि आप को और कितने साल काम करना पड़ेगा ? मिसाल के तौर पर अगर आप को पता चला कि अगले 5 साल में आप फाइनेंशियली आजाद हो जाएंगे, तो आप इन 5 सालों में अपने काम को अपना बेस्ट कंट्रीब्यूशन देंगे. जिस से बाकी लोगों को भी फायदा होगा.
नाउ दैट यू हैव गॉट इट , व्हाट आर यू गोइंग टू डू विद इट ?
स्टेप नंबर नाइन : मैनेजिंग योर फाइनेंसेज
किताब के इस पार्ट में लोंग टर्म इनकम प्रोड्यूस करने वाले तरीकों के बारे में बताया गया है. जिनकी मदद से आप अपनी जरूरतों के मुताबिक फाइनेंशियल मैनेजमेंट कर सकते हैं.
किताब के मुताबिक फाइनेंशियल सिचुएशन हमेशा टेंपरेरी ही होती है. किसी भी देश की अर्थव्यवस्था में उथल-पुथल होना और उसमें उतार-चढ़ाव आना एक नॉर्मल बात है. आप जब भी किसी भी अर्थशास्त्री या इन्वेस्टमेंट कंसलटेंट से इस बारे में बात करेंगे तो वह आप को इस बात की चेतावनी जरूर देंगे. कई फाइनेंशियल इन्वेस्टमेंट विकल्प में एक डिस्क्लेमर की तरह इस बात की चेतावनी दी होती है कि बाजार के उतार चढ़ाव की जिम्मेदारी उनकी नहीं है . इसलिए सभी लोगों के लिए फाइनेंशियल इन्वेस्टमेंट्स में सावधानी बरतनी बहुत जरूरी है. इस किताब के लेखक भी इस बात पर जोर देते हैं कि आंख बंद करके इन तरीकों को फॉलो न करें बल्कि इनके पीछे के सिद्धांतों को अच्छे से समझ कर और अपने हालातों के मुताबिक उनका पालन करें. और वह अक्सर टाइम टाइम पर अपनी इन बातों को फाइनेंशियल इंडिपेंडेंस के एफ आई प्रोग्राम के जरिए अपने ऑडियंस को गाइड करते रहते हैं.
अक्सर लोगों को फाइनेंशियल मैटर्स में डर लगता है. इस चिंता में हम अपने मौजूदा समय में बहुत से समझौते करते हैं. हमारे सामने महंगाई का डर हमेशा बना रहता है. दिन पर दिन चीजें महंगी होती जा रही हैं. और इन्वेस्टमेंट रेट गिरता जा रहा है यानी कि खर्चे बढ़ रहे हैं और इनकम कम हो रही है. इसलिए हमें जिंदगी की जरूरतों को समझ कर उस के मुताबिक चलना होगा .
सरकार टाइम टाइम पर महंगाई की दर यानी कि रेट ऑफ इन्फ्लेशन को डिक्लेअर करती है. इन्फ्लेशन की दर बढ़ने से चीजें औसतन महंगी होती हैं और कम होने से सस्ती. इन्फ्लेशन की दर को इस्टैबलिश करने के लिए पास्ट के किसी समय को बेस मानकर यह कंपेयर किया जाता है कि मौजूदा वक्त और उस पास्ट के वक्त में चीजों की कीमतों में कितना डिफरेंस आया है. लेकिन यहां पर कुछ पहलुओं पर ध्यान रखा जाना भी जरूरी है. अक्सर कंपैरिजन के टाइम बहुत सी बातों को नजरअंदाज कर दिया जाता है. जैसे किस तरह समय के साथ साथ लोगों के बर्ताव और आदतों में चेंज आता है, और किस तरह तकनीकी विकास की वजह से कई इंस्ट्रूमेंट्स ऐसे भी आ जाते हैं जिनकी वर्किंग पहले के मुकाबले ज्यादा अच्छी हो जाती है. किसी साल अगर कोई फसल खराब हो गई तो उसकी कीमत बढ़ सकती है. वहीँ किसी दूसरी फसल की कीमत कम भी हो सकती है. इसलिए आपको सिर्फ सरकारी इन्फ्लेशन की दर के डिक्लेरेशन से घबराना नहीं चाहिए. बल्कि अपनी सूझ बूझ से आप अपने पैसे बचा सकते हैं. जैसे बिन मौसम के फल और सब्जियों से परहेज रखें क्योंकि यह महंगे तो होते ही हैं लेकिन साथ में आपकी हेल्थ को नुकसान भी पहुंचाते हैं.
आमतौर पर इन्वेस्टर्स दो तरह के होते हैं - कंजर्वेटिव यानी रूढ़िवादी और दिलेर. जहां रूढ़िवादी जरा सा भी जोखिम नहीं उठाते , वहीँ दिलेर इन्वेस्टर्स हर तरह का जोखिम उठाते हैं. आम तौर पर लोग इन दोनों के बीच का एक बैलेंस्ड रास्ता लेकर चलते हैं. जहां वह लोग अपनी जमा पूंजी का एक हिस्सा सेफ इन्वेस्टमेंट के विकल्प में और दूसरा हिस्सा थोड़े जोखिम भरे लेकिन अच्छी कमाई वाले इन्वेस्टमेंट के विकल्प में लगाते हैं. सेफ इन्वेस्टमेंट के तौर पर कुछ विकल्प हैं - जैसे बैंक में फिक्स डिपाजिट या गवर्नमेंट बांड्स या फिर पोस्ट ऑफिस की नेशनल सेविंग इनकम स्कीम, नेशनल पेंशन स्कीम वगैरा-वगैरा. इन सारे विकल्पों में आपकी पूंजी सुरक्षित रहेगी. पर ब्याज की दर लिमिटेड और कम भी रहेगी जिस से इन से होने वाली इनकम भी लिमिटेड होगी लेकिन हमेशा बनी रहने वाली होगी. जबकि जोखिम भरे इन्वेस्टमेंट के विकल्प हैं - शेयर बाजार, ट्रेडिंग और स्टॉक ऑप्शंस, इनमें इन्वेस्ट करने से आपको 25 परसेंट से लेकर 50 परसेंट तक मुनाफा हो सकता है. लेकिन इन में मंदी आने पर आपको भारी नुकसान भी उठाना पड़ सकता है. इसलिए जोखिम भरे इन्वेस्टमेंट करने के लिए आपको मार्केट की अच्छे से स्टडी करना और फाइनेंस की जानकारी का होना बहुत जरूरी है. और क्योंकि यह सब करना सब के बस की बात नहीं है इसलिए इन्वेस्टमेंट के लिए एक और संतुलित विकल्प है - म्यूचुअल फंड. जहां आपकी पूंजी सुरक्षित भी रहे और आपको थोड़े पैसे भी मिल जाएं. इसमें कई तरह के फंड्स होते हैं. आप को उनके बारे में पूरी तरह जानकारी करने के बाद ही उन फंड्स में इन्वेस्टमेंट करना चाहिए . यहां यह बताना बहुत जरूरी है कि कोई भी इन्वेस्टमेंट पूरी तरह से सुरक्षित नहीं है. इस लिए आप को अच्छी तरह से सोच समझ कर ही कोई भी इन्वेस्टमेंट करना चाहिए.
फाइनेंशियल इंडिपेंडेंस के एफ आई प्रोग्राम के तहत इन्वेस्टमेंट में तीन अहम एलिमेंट्स होते हैं - पहला कैपिटल यानी आपके इन्वेस्टमेंट की जमा पूंजी, दूसरा कुशन यानी कि अलग से निकाल कर रखी हुई वह रकम जिस से 6 महीने तक आपके सारे खर्चे निकल जाएं, और तीसरा कैश यानी आपके कैपिटल और कुशन के बाद आपके पास जमा रकम जो आपकी किसी मुसीबत में काम आ सके. अगर आपने अपने पैसों को इस तरह डिवाइड कर रखा है तो आप फाइनेंशियल इंडिपेंडेंस के लिए तैयार हैं.
अमेरिका में ट्रेजरी बॉन्ड्स के नाम से और भारत में गवर्नमेंट डेट बॉन्ड्स के नाम से एक ऐसा इन्वेस्टमेंट विकल्प है, जिसमें रेगुलरली ब्याज की कमाई भी हो और पूंजी भी सुरक्षित रहे . इन बॉन्ड्स के जरिए सरकार विकास के कामों के लिए पब्लिक से पैसे उधार लेती है. उधार का टाइम पीरियड और ब्याज की दर दोनों सरकार ही तय करती है. और उनके मुताबिक पेमेंट किया जाता है. इस टाइम पीरियड के पूरा होने पर आप अपनी पूंजी वापस ले सकते हैं या उसे दोबारा से इन्वेस्ट भी कर सकते हैं.
फाइनली पैसों के सही संचालन, प्रॉपर इन्वेस्टमेंट और अपनी सूझ बूझ से आप एफ आई प्रोग्राम को फॉलो करके एफ आई थ्री को हासिल कर सकते हैं . जिसका मतलब है फाइनेंशियल इंटेलीजेंस यानी पैसे की सही समझ, फाइनेंशियल इंटीग्रिटी यानी अपने खर्च और अपने रहन-सहन को अपने जीवन के उद्देश्यों के साथ सही तालमेल में रखना, और फाइनेंशियल इंडिपेंडेंस यानी कि जिंदगी बिताने का खर्च आपके इन्वेस्टमेंट से आए ना कि आपकी तनख्वाह से. एक बार एफ आई थ्री हासिल कर लेने के बाद आपको कभी भी पैसों के लिए काम करने की जरूरत नहीं रहेगी. और आप जिंदगी में अपने शौक और रिश्तो की जिम्मेदारी को खुशी-खुशी निभा सकेंगे. और एक खुशहाल जिंदगी गुजारने लगेंगे.
कुल मिलाकर
इस किताब को पढ़कर हमें धन दौलत से ज्यादा अपनी वैल्यूज के बारे में और अपनी लाइफ स्टाइल के साथ उन का ताल मेल बैठाने के तरीकों के बारे में पता चलता है. इसके अलावा हमें पैसों से ज्यादा पैसों के साथ हमारी रिलेशन शिप के बारे में ज्यादा आइडिया मिलता है. जिस से हम फाइनेंशियल इंडिपेंडेंस हासिल कर सकते हैं .
इस किताब के अंदर वाकई में आपकी लाइफ चेंज करने की पावर मौजूद है.
इस लिए यह पता लगाया जाना बहुत इंपोर्टेंट है कि मनी हमारी लाइफ में कैसे काम करती है . जब तक मनी फ्लो की बिल्कुल सही पिक्चर सामने नहीं आती है तब तक आप पहले से ही इस बात का अंदाजा नहीं लगा सकते हैं कि कब आप के फ्यूचर के सपने आसानी से पूरा हो सकते हैं.
इस किताब को पढ़कर हमें इन बातों का पता चलता है :
- कंज़्यूमरिज़्म जीने का सही तरीका नहीं है, बल्कि यह अपनी परेशानियों को बढ़ाने का तरीका है.
- मनी के बारे में लोगों के अपने अलग यकीन और झूठी धारणाएं होती हैं.
- फाइनेंशियल इंटेलीजेंस आपकी लाइफ के दूसरे मामलों में भी आप को तनाव से छुटकारा दिलाती है.
- जब फाइनेंशियल सिक्योरिटी की वजह से आपको घबराहट और बेचैनी नहीं होती है तब आप अपने समय को ज्यादा जरूरी मुद्दों को हल करने में लगा सकते हैं.
- कम कर्जे और ज्यादा बचत के साथ आप रुपए पैसों के बारे में सवाल किए बिना बे रोक टोक और ज्यादा अच्छी तरह से अपनी खुशियां तलाश सकते हैं.
- जब आपकी रुपयों पैसों की चिंता कम हो जाती है तब आप के टाइम की एवेलिबिलिटी भी बढ़ जाती है.
- अगर आप किफायत के साथ खर्च करते हैं तो आप के पास जरूरतों को पूरा करने के लिए जरूरी धन कम नहीं पड़ता है.
क्या करें?
इस किताब से हमें जॉब से जल्दी रिटायरमेंट लेने के एक अहम कांसेप्ट के बारे पता चलता है. यह एक क्रॉसओवर पॉइंट है.
क्रॉस ओवर पॉइंट उस पॉइंट को कहते हैं जब इन्वेस्टमेंट से आने वाली इनकम बढ़ कर आप के खर्चों के मुकाबले में ज्यादा होने लगती है.
क्रॉस ओवर पॉइंट का इस्तेमाल इन चीजों में कीजिए :
- अपने रहन - सहन के खर्च को एक ग्राफ पेपर पर ट्रैक कीजिए. अपने खर्चों को लगातार कम करने की कोशिश करते हुए ग्राफ की लाइन को नीचे लाइए.
- अपनी इनकम को ग्राफ पेपर पर ट्रैक कीजिए. और इसको तब तक बात करते रहिए जब तक यह लाइन रहन - सहन के खर्चों की लाइन से ऊपर ना निकल जाए. यही क्रॉस ओवर पॉइंट है.
जब एक बार आप क्रॉस ओवर पॉइंट पर पहुंच जाते हैं, तो आप की इनकम रिटायरमेंट के लायक हो जाती है.
इसके बाद आप यह काम कर सकते हैं :
- अपनी इनकम और खर्चों के डिफरेंस को अलग कर के इन्वेस्ट कीजिए.
- कर्जे की स्थिति से बाहर आइए और पैसों की बचत करना शुरू कीजिए.
- जरूरत से ज्यादा पैसा या चीजों को हासिल करने की चिंता करने की प्रायोरिटीज को बदल कर कम चीजों के साथ अच्छी तरह जीना सीखिए.
- अपने अंदर चलने वाले वैल्यूज और लाइफ स्टाइल के बीच के संघर्ष को सुलझाइए.
- अपनी प्रॉब्लम्स को अपॉर्चुनिटीज में बदल कर नए हुनर सीखने की कोशिश कीजिए.
- अपनी रोजी - रोटी और लाइफ स्टाइल को पूरी तरह से हासिल कीजिए.
येबुक एप पर आप सुन रहे थे Your Money or Your Life By Joe Dominguez and Vicki Robin
ये समरी आप को कैसी लगी हमें yebook.in@gmail.com पर ईमेल करके ज़रूर बताइये.
आप और कौनसी समरी सुनना चाहते हैं ये भी बताएं. हम आप की बताई गई समरी एड करने की पूरी कोशिश करेंगे.
अगर आप का कोई सवाल, सुझाव या समस्या हो तो वो भी हमें ईमेल करके ज़रूर बताएं.
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