The XX Brain

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The XX Brain

Lisa Mosconi, PhD
महिलाओं की दिमागी सेहत के लिए गाइड

दो लफ्जों में
साल 2020 में आई ये किताब इस बात के लिए गाइड करती है कि महिलाओं में दिमागी सेहत कैसे बढ़िया रखी जा सकती है और वो खुद को अल्जाइमर से कैसे बचा सकती हैं। अल्जाइमर महिलाओं को भी उतना ही अपना शिकार बनाता है जितना पुरुषों को पर मेडिकल इंडस्ट्री इनके लिए ज्यादा कुछ नहीं कर रही है। ये किताब बताती है कि आप किस तरह अपनी सेहत की चाबी अपने हाथों में ले सकती हैं, जरूरत महसूस होने पर डॉक्टर की सलाह ले सकती हैं और कैसे अल्जाइमर से खुद को बचा सकती हैं। 

ये किताब किनको पढ़नी चाहिए?
• जो महिलाएं किसी भी दिमागी बीमारी से खुद को बचाना चाहती हैं
• भुलक्कड़ महिलाएं
• हेल्थ सेक्टर के लोग जो महिलाओं की हेल्थ केयर को लेकर अपनी स्किल बेहतर बनाना चाहते हैं 

लेखिका के बारे में
डॉ लिसा मोस्कोनी, पीएचडी डिग्री होल्डर हैं। वे वीमेन ब्रेन इनिशिएटिव की डायरेक्टर और वेइल कॉर्नेल मेडिकल कॉलेज में अल्जाइमर प्रिवेंशन क्लिनिक की असोसिएट डायरेक्टर हैं। उनकी पिछली किताब ब्रेन फूड इस बात पर आधारित थी कि हम जो कुछ खाते हैं उसका हमारे दिमाग पर क्या असर पड़ता है।

महिलाओं की सेहत को लेकर मेडिकल फील्ड में भी भेदभाव होता है।
क्या आप ये बात जानते हैं कि ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया में  अल्जाइमर से मरने वाली महिलाओं की गिनती ब्रेस्ट कैंसर से मरने वाली महिलाओं से ज्यादा होती है? या फिर 45 साल की हर पांच में से एक महिला को अपने जीवन में अल्जाइमर होने की संभावना होती है जबकि पुरुषों में हर दस में से एक को। अगर आपने ये सब कभी नहीं सुना तो हैरान मत होइए। ज्यादातर लोगों को ये पता ही नहीं है। महिलाओं के लिए अल्जाइमर किसी  महामारी की तरह है और हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। अफसोस की बात ये है कि अब तक इस परेशानी पर मीडिया ने बहुत कम ध्यान दिया है और मेडिकल सेक्टर की तरफ से भी कोई ज्यादा अटेंशन नहीं मिली है। इस महामारी की क्या वजह है और हम इसे रोकने के लिए क्या कर सकते हैं? ये किताब ऐसे सवालों पर रोशनी डालती है और इस बात के लिए एक आसान टूलकिट की तरह आपकी मदद करती है कि चाहे आपकि उम्र जो भी हो आपका ब्रेन हमेशा हेल्दी रहे। 

इस समरी को पढ़कर आप यह भी जानेंगे कि हल्की एक्सरसाइज करना मुश्किल एक्सरसाइज से फायदेमंद क्यों है? कोई म्यूजिकल इंस्ट्रुमेंट सीखना आपके दिमाग को क्या फायदा पहुंचाता है? और महिलाओं को हार्ट अटैक आने पर अक्सर डॉक्टर इसे पहचान क्यों नहीं पाते। 

तो चलिए शुरू करते हैं!

कल्पना कीजिए कि एक उल्का पिंड धरती की तरफ बढ़ रहा है। इसके असर में जितने इलाके आएंगे उसके हिसाब से लगभग तीस लाख लोगों का सफाया होने का खतरा है। ऐसे में आपको हर न्यूज चैनल और अखबार में यही खबर देखने को मिलेगी। स्पेस एजेंसियां अपनी रिपोर्ट लाने लगेंगी और हर तरह से इस खतरे को टालने या इससे बचने को जी जान लगा देंगी। यानि हर जगह बस इसी की चर्चा होती रहेगी। अब जरा सोचकर देखें अगले 30 सालों में इतनी ही महिलाएं अल्जाइमर से मर जाएंगी फिर भी इस बारे में कहीं भी कोई खास चर्चा नहीं होती है। इसकी वजह क्या है? असल में यहां एक भेदभाव होता है और इसकी वजह से महिलाओं को अपनी सेहत से समझौता करना पड़ जाता है। मेडिकल सेक्टर में हमेशा आदमियों का दबदबा रहा है। ज्यादातर डॉक्टर और वैज्ञानिक तो पुरुष ही रहे और तो और जिन लोगों या मरीजों पर रिसर्च हुई वो भी आम तौर पर पुरुष ही थे। आप ये समझ लीजिए कि इलाज करते समय हर किसी को एक ही जेंडर का समझकर काम होता रहा जबकि एक महिला और पुरुष का शरीर, उनके हार्मोन, बीमारियां, लक्षण और इलाज अलग होते हैं। जैसे कि अगर एक महिला को दिल का दौरा पड़े तो उसमें पुरुषों वाले लक्षण नहीं होते हैं। सीने में दर्द की जगह महिलाओं में आमतौर पर फ्लू जैसे लक्षण नजर आते हैं जैसे पसीना आना और जी मिचलाना। इसका मतलब है कि पुरुषों से सात गुना ज्यादा मामलों में उनके दिल के दौरे को कोई हल्की फुल्की बीमारी समझकर उनको घर भेज दिया जाता है। 

महिलाओं पर दवाइयों का असर पुरुषों से अलग ढंग से होता है। स्टडीज से पता चला है कि एंबियन नाम की नींद की गोली की जो खुराक आम तौर पर चलती है उतनी महिलाओं को नुकसान पहुंचाती है। आप शायद इसका जवाब समझ चुके होंगे कि इसे पुरुषों पर टेस्ट किया गया था। मेडिकल इंडस्ट्री ने एक लंबे समय तक महिलाओं के रिप्रोडक्टिव ऑर्गन की बीमारियों पर ही अलग तरह से इलाज किया है वरना बाकी हर बीमारी में उनको आंख बंद करके पुरुषों जैसे इलाज ही मिलते रहे। लेकिन इस तरह की लापरवाही में शरीर के एक बहुत खास हिस्से की अनदेखी हो जाती है यानि ब्रेन। पुरुषों की तुलना में महिलाओं में डिप्रेशन या एंजायटी होने की संभावना दोगुनी होती है। वे पुरुषों से चार गुना ज्यादा माइग्रेन का शिकार बनती हैं और उनमें मल्टीपल स्केलेरोसिस जैसी ऑटोइम्यून बीमारियों का खतरा तीन गुना ज्यादा होता है। सबसे ज्यादा चिंता की बात ये है कि अल्जाइमर के तीन में से दो मरीज महिलाएं हैं। 45 साल की हर पांच में से एक महिला में इस बीमारी के होने की संभावना होती है। जबकि इसी उम्र के दस में से एक आदमी को ये खतरा होता है। यानि महिलाओं की सेहत से जुड़ी परेशानियां उनकी "बिकनी" से कहीं आगे जाती हैं। ये सेहत के मुद्दे से ज्यादा बराबरी का सवाल है। महिलाओं की सेहत को भी उतना ही जरूरी माना जाना चाहिए। बिल्कुल वैसे ही जैसे कोई उल्का पिंड धरती की तरफ बढ़ रहा हो।

मेनोपॉज जैसे बड़े हार्मोनल चेंज ब्रेन में बहुत से बदलाव ले आते हैं।
अगर आपने प्रीमेंस्ट्रुअल सिंड्रोम यानि PMS से होने वाले उतार-चढ़ाव महसूस किए हैं तो आपके लिए ये कोई हैरानी की बात नहीं होगी कि हार्मोन आपके दिमाग पर असर डालते हैं। लेकिन ये असर कितना गहरा होता है ये बात आपको जरूर हैरान कर सकती है। इनमें सबसे ज्यादा असर एस्ट्रोजन का होता है जिसे "मास्टर रेग्युलेटर" कहा जाता है। एस्ट्रोजन दिमाग के लगभग हर बड़े फंक्शन पर असर डालता है। ये एनर्जी प्रोडक्शन में मदद करता है, सेल्स को हेल्दी रखता है और दिमाग के उन हिस्सों को एक्टिवेट करता है जो मेमोरी और अटेंशन के लिए जिम्मेदार होते हैं। ये आपके इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाकर दिमाग की सुरक्षा करने में भी मदद करता है। इतना ही नहीं ये ब्रेन को इस बात के लिए भी मदद करता है कि वो एंडोर्फिन रिलीज करे ताकि आपका मूड सही बना रहे। यही वजह है कि मेनोपॉज का वक्त काफी मुश्किल होता है क्योंकि उस समय एस्ट्रोजन का लेवल काफी गिर जाता है। मेनोपॉज तब होता है जब किसी महिला का आखिरी मेन्स्ट्रुअल साइकल हो और वो इसके बाद कंसीव नहीं कर सकती है। ये आमतौर पर उसके चालीसवें या पचासवें सालों के आसपास होता है। हालांकि जिस महिला की बच्चेदानी निकाली जा चुकी है वो इस दौर से जल्द ही गुजरती है। 

हॉट फ्लश जैसे कॉमन लक्षणों के अलावा एस्ट्रोजन में गिरावट का दिमाग पर भी काफी असर पड़ता है। कई महिलाओं को लगता है कि वे डिप्रेशन और एंजायटी से जूझ रही हैं। कुछ में बाइपोलर या स्किजोफ्रेनिया के लक्षण भी नजर आने लगते हैं। इसके अलावा मेनोपॉज की वजह से महिलाओं में दिल की बीमारी, मोटापा और डाइबिटीज का खतरा बढ़ जाता है। ब्रेन पर की गई स्टडी से ये पता चलता है कि एस्ट्रोजन में गिरावट के साथ दिमाग की एक्टिविटी कम हो जाती है। इसके साथ साथ दिमाग में एमाइलॉइड बढ़ने लगता है जो अल्जाइमर का एक मेन इंडिकेशन है। मेमोरी सेंटर भी सिकुड़ने लगते हैं। स्टडीज कहती हैं कि मेनोपॉज से 80 प्रतिशत महिलाओं में डिमेंशिया का खतरा बढ़ जाता है। 

भले ही ऐसा लगे कि किसी को एकदम से अल्जाइमर हो गया है पर इसकी शुरुआत दशकों पहले हो जाती है। इसके साफ साफ लक्षण चाहे बुढ़ापे में दिखाई दें पर बुनियाद तो युवा अवस्था में ही रख दी जाती है। बहुत सी महिलाओं में इसकी शुरुआत मेनोपॉज से होती है। तो क्या इन सब बातों का ये मतलब है कि हर महिला के ऊपर हार्मोनल बोझ है जिसे हर हाल में ढोते जाना है? बिल्कुल नहीं। आपको इन हार्मोन्स से होने वाले बदलावों और उनसे निपटने के तरीके जानने की जरूरत है बस। सही तरह से प्लान करके मेनोपॉज में होने वाली परेशानियों को कम या दूर किया जा सकता है ताकि आपका ब्रेन मेनोपॉज और उसके बाद भी हेल्दी रहे।

अल्जाइमर बुढ़ापे में होने वाली आम घटना या जेनेटिक बीमारी नहीं है। इसे काफी हद तक रोका जा सकता है।
जरा याद कीजिए कि बचपन में हम परियों की कहानियों और न जाने कितने मिथ को सच समझते थे। बड़े हो जाने पर भी उनमें से कई कहानियों से आप आज भी जुड़े होंगे। महिलाओं की सेहत के बारे में भी ऐसे न जाने कितने मिथ चले आ रहे हैं। कहानी के मिथ तो कोई नुकसान नहीं करते जबकि सेहत से जुड़े मिथ बहुत खतरनाक हैं क्योंकि वे महिलाओं की हेल्थकेयर और इलाज के बारे में हमारे नजरिए पर बुरा असर डालते हैं। जैसे अल्जाइमर से जुड़ी सबसे आम गलतफहमियों में से एक ये है कि महिलाओं में एक खास तरह का अल्जाइमर जीन होता है इस वजह से उनको ये बीमारी होती है। इस बात से तो ये लगता है कि अल्जाइमर होना स्वाभाविक या तय है और इसे रोकने के लिए आप कुछ भी नहीं कर सकते हैं। जबकि ये बात गलत है। लेकिन सच्चाई भी इतनी आसान नहीं है। कुछ जीन इस बीमारी के खतरे को बढ़ाते हैं। 

अल्जाइमर के 1 से 2 प्रतिशत मामले जीन्स में आए बदलाव की वजह से होते हैं। कुछ ऐसे जीन्स भी हैं जो आपको अल्जाइमर के लिए ज्यादा प्रोन बना देते हैं। रेस की भूमिका भी बहुत खास है। अगर आप एक अफ्रीकी अमेरिकी महिला हैं तो आपको अल्जाइमर या स्ट्रोक होने की संभावना एक गोरी महिला की तुलना में दोगुनी है। अगर आप हिस्पैनिक हैं तो आपको अल्जाइमर होने की संभावना डेढ़ गुना ज्यादा है। लेकिन जेनेटिक मेकअप से ही किसी नतीजे पर पहुंचना गलत है। स्टडीज ये बताती हैं कि अल्जाइमर के कम से कम एक तिहाई मामलों को अच्छी सेहत और लाइफस्टाइल बदलकर रोका जा सकता है। एक दूसरा मिथ कहता है कि महिलाओं को अल्जाइमर कई बार होता है क्योंकि वे लंबे समय तक जीवित रहती हैं। यानि इस मिथ के हिसाब से अल्जाइमर बुजुर्गों को होने वाली बीमारी है। अब क्योंकि महिलाएं ज्यादा उम्र तक जीवित रहती हैं तो उनको अल्जाइमर भी बार-बार हो सकता है। 

ऊपरी तौर पर देखें तो ये बात सही लगती है लेकिन गहराई से देखने पर ये बातें कहीं नहीं टिकतीं। सबसे पहली बात तो ये है कि महिलाएं पुरुषों की तुलना में बहुत लंबे समय तक जीवित नहीं रहती हैं। एवरेज देखें तो बस तीन से पांच साल ज्यादा और उन्हें आमतौर पर पुरुषों की तुलना में कम उम्र में अल्जाइमर हो जाता है। यहां हैरानी की बात ये है कि महिलाओं को उम्र से जुड़ी दूसरी बीमारियों जैसे पार्किंसंस या स्ट्रोक का इतना खतरा नहीं है। यानि अल्जाइमर नाम की इस महामारी का कारण उम्र के अलावा कुछ और होना चाहिए। अब उन कहानियों की भूल जाने का समय है जो हमें ये कहती हैं कि अल्जाइमर कोई नेचुरल या पहले से तय की गई बीमारी है और ऐसी बातों को मानने की जगह आप इसे एक ऐसा क्राइसिस मान लें जिससे बचा जा सकता है।

अल्जाइमर के खतरे का पता लगाने के लिए अपनी जांच कराते रहें।
अगर आप पोकर खेल रहे हैं और आपके पास राजा और इक्का जैसे पत्ते आ गए हैं तो आप खुद को विनर समझ सकते हैं। लेकिन अच्छे पत्ते होने के बाद भी आप हार सकते हैं और कमजोर पत्ते होने पर भी आप जीत सकते हैं। यानि कुछ भी तय नहीं है। अल्जाइमर और इसके रिस्क फैक्टर के लिए भी यही बात सच है। आपके साथ भी कई रिस्क फैक्टर हो सकते हैं पर उनमें से किसी का भी ये मतलब नहीं है कि आपको आगे चलकर ये बीमारी होगी ही। ये बस कुछ खतरे के निशान हैं जिनको दूर करते जाना है। आज की तारीख में आपकी खास जरूरत के मुताबिक इलाज भी बदला जा सकता है। यानि आपको जो भी खतरे हों उनसे छुटकारा पाया जा सकता है। आपके कमजोर पत्तों को मजबूत बनाया जा सकता है। अपने जेनेटिक मेकअप, वातावरण और लाइफस्टाइल के आधार पर आप इस बात का अंदाजा लगा सकते हैं कि आपमें अल्जाइमर की कितनी संभावना हो सकती है। आपका दिमाग और शरीर आपस में मजबूती से जुड़े होते हैं। अगर आपका वजन ज्यादा है या आपको दिल की बीमारी या डायबिटीज है तो आपके पास रिस्क फैक्टर हैं। 

ब्रेन ट्रॉमा भी एक वजह बन सकता है। किसी तरह की ब्लंट इंजरी दिमाग को मिलने वाली ब्लड सप्लाई कम करके इन्फ्लामेशन की वजह बन सकती है। हालांकि इन्फ्लामेशन एक तरह का नॉर्मल बॉडी फंक्शन ही है पर कभी-कभार हमारा शरीर इस तरह के रिस्पांस को बंद नहीं कर पाता है। इसकी वजह से इन्फ्लामेशन क्रॉनिक होने लगता है और ब्रेन हार्मोन कम होने लगते हैं। आपके वातावरण में भी कई तरह के रिस्क फैक्टर पाए जाते हैं। भोजन, जिन बर्तनों या डिब्बों में भोजन आता है वो और स्किन केयर प्रोडक्ट में कई तरह के जहरीले रसायन होते हैं। अपने वातावरण में छिपे इन जहरीली चीजों का पता लगाना भी रिस्क फैक्टर समझने के लिए जरूरी है। आपके शरीर में जहरीली चीजें पहुंचाने में सबसे आगे रहने वालों में स्मोकिंग का नाम आता है। जो महिलाएं स्मोक करती हैं उनमें दिल और दिमाग की बीमारियां बढ़ने का खतरा ज्यादा होता है। इन रिस्क फैक्टर्स को ध्यान में रखना बचाव का एक अच्छा तरीका हो सकता है। लेकिन रिस्क को अपनी किस्मत समझकर चुप न बैठ जाएं। अपने डॉक्टर से कोलेस्ट्रॉल, बीपी, थायरॉइड फंक्शन और किसी भी तरह के इन्फेक्शन की जांच के लिए कहने में न हिचकिचाएं। ऐसे किसी भी कदम को बढ़ाने का मतलब है कि आप अल्जाइमर के खिलाफ लड़ाई में एक कदम आगे चल रहे हैं और इससे निपटने के लिए पूरी तरह से तैयार हैं। 

मेनोपॉज हार्मोन थेरेपी पर सवाल उठाने वाले लोग हैं पर हमें इसके महत्व को नकारना नहीं करना चाहिए।
हम फार्मा इंडस्ट्री पर इस बात के लिए बहुत विश्वास रखते हैं कि वो हमारी हर बीमारी का इलाज दे देगी।  अगर अल्जाइमर महिलाओं की सेहत से जुड़ा इतना बड़ा मुद्दा है तो इसके इलाज के लिए भी कोई न कोई गोली तो होनी चाहिए, है ना? अफसोस की बात है कि ये इतना आसान नहीं है। क्लीनिकल ट्रायल्स के दौरान अल्जाइमर की दवाओं का फेल्योर रेट सबसे ज्यादा है लगभग 99.6 प्रतिशत। ये डेटा हैरान कर देता है। अभी हमने पढ़ा कि महिलाओं में दिखने वाले अल्जाइमर के लक्षणों पर मेडिकल रिसर्च में कोई खास ध्यान नहीं दिया गया है। लेकिन एक इलाज कुछ उम्मीद जगाता है जो है हार्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपी। इसे मेनोपॉज हार्मोन ट्रीटमेंट या MHT भी कहा जाता है। अगर मेनोपॉज के समय हार्मोन घटने से अल्जाइमर बढ़ जाता है तो ये बात लॉजिकल लगती है कि आर्टिफिशल तरीके से हार्मोन देने पर इस समस्या का हल निकल सकता है। लेकिन इस तरह के इलाज के साथ विवाद भी जुड़े होते हैं। साल 1993 में MHT के असर को समझने के लिए एक क्लीनिकल ट्रायल शुरू किया गया था। इस स्टडी में 160,000 महिलाओं को रखकर इसे 15 साल तक चलाने की योजना बनाई गई थी। लेकिन दस साल बाद यानि 2003 में इसे अचानक बंद कर दिया गया। स्टडी में ये पाया गया था कि जिन महिलाओं ने MHT ली उनमें स्ट्रोक, ब्लड क्लॉट, कैंसर और डिमेंशिया का खतरा बढ़ गया था। 

जाहिर है कि लोग इस तरह के नतीजों से परेशान थे  और महिलाओं ने स्टडी से खुद को पीछे हटा लिया था। लेकिन ट्रायल में कुछ खामियां थीं जो इन नतीजों पर सवाल उठाती हैं। एक तो इसमें सिर्फ साठ और सत्तर की उम्र वाली महिलाओं को शामिल किया गया था जो काफी पहले ही मेनोपॉज से गुजर चुकी थीं। इनमें से कई महिलाओं को शायद पहले से ही थिक आर्टरीज की परेशानी थी जो दिल की बीमारी की वजह बनती है। इसके अलावा स्टडी में सिर्फ लंबे समय तक हाई डोज देने पर होने वाले बदलावों पर फोकस किया गया था लेकिन इस बात पर कोई ध्यान नहीं दिया गया कि कम समय और कम खुराक का असर क्या हो सकता है और वो कितना सेफ होगा। इन सवालों के जवाब ढूंढने के लिए कभी भी बड़े पैमाने पर कोई स्टडी नहीं हुई है इसलिए MHT को लेकर अभी भी उलझन बनी हुई है। लेकिन कुछ ऐसी महिलाओं पर भी स्टडी की गई है जिनकी उम्र 60 साल से कम और मेनोपॉज को पांच साल तक हुए हों। जब इनको कम समय के लिए MHT दी गई तो कुछ अच्छे नतीजे देखने को मिले। जिन महिलाओं की बच्चेदानी निकाली जा चुकी है उनमें MHT के बाद दिल की बीमारी का खतरा कम होने और ब्रेन की हेल्थ सुधरने जैसे अच्छे बदलाव देखने को मिले हैं। अब सवाल ये उठता है कि क्या आपको ये थेरेपी लेनी चाहिए? इसका जवाब हां या ना में नहीं हो सकता। हां आपका डॉक्टर आपके साथ अच्छी तरह बातचीत करके और आपके रिस्क फैक्टर्स की जांच करके आपको इसके फायदे नुकसान बता सकता है।

एक बैलेंस्ड और पौष्टिक आहार आपके दिमाग को फिट रखने में मदद करता है।
अगर आपने कभी ऊंघते हुए एक कप कॉफी के लिए हाथ बढ़ाया होगा तो आपको समझ आ जाएगा कि आप जो खाते-पीते हैं उसका सीधा असर आपके दिमाग पर पड़ता है। हमारा दिमाग खुद में फिर से एनर्जी भरने और अपने जरूरी फंक्शन के लिए भोजन पर निर्भर करता है। अगर आप अपने ब्रेन को हेल्दी रखना चाहते हैं तो सबसे पहले अपने खानपान पर ध्यान देना होगा। हमें क्या खाना चाहिए इसके बारे में हमेशा नई बातें सुनने को मिलती हैं। 1990 के दशक की शुरुआत में लो फैट डाइट का ट्रेंड था जबकि आज हाई फैट वाली कीटो डाइट चल रही है। सच तो ये है कि कोई भी एक्सट्रीम डाइट ब्रेन के लिए सही नहीं होती। इसकी जगह आप जो भी खाते हैं उसकी क्वालिटी पर ध्यान दें। कुछ फैट आपके लिए बुरी हैं लेकिन कुछ जरूरी हैं। जैसे कि ट्रांस फैट चाहे जितनी कम से कम ली जाए वो आपका नुकसान करती है। जबकि दूसरी तरफ एवोकाडो, नट्स और मछली में मिलने वाली अनसैचुरेटेड फैट आपके दिल और दिमाग को अच्छी तरह काम करने और हेल्दी रखने में मदद करती है खासकर तब जब आप उन्हें रोज खाते हैं। 

कार्बोहाइड्रेट के ऊपर भी यही नियम लागू होता है। जिन चीजों में चीनी ज्यादा होती है जैसे कि ब्रेड, पास्ता और केक वो आपके ब्लड शुगर को पहले तो बढ़ाते हैं और फिर घटा देते हैं इससे आपके शरीर के लिए एनर्जी को मेंटेन रखना मुश्किल हो जाता है। लेकिन सब्जियों, ब्राउन राइस और क्विनोआ में पाए जाने वाले कॉम्प्लेक्स कार्ब्स में फाइबर ज्यादा होता है जो आपके ब्लड में एस्ट्रोजन और शुगर को बैलेंस करता है। चना, अलसी और खुबानी जैसी चीजें एस्ट्रोजन लेवल को कंट्रोल करने में मदद करती हैं। और अगर आप चाहते हैं कि आपका ब्रेन एक्टिव बना रहे तो आपको नियमित रूप से एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर सुपरफूड लेने चाहिए। आपकी आधी प्लेट सब्जियों से भरी होनी चाहिए। खाने में जितने ज्यादा रंगों की चीजें शामिल कर पाएं उतना अच्छा रहेगा। आपका शरीर इन सब पौष्टिक चीजों को अच्छी तरह पचा सके इसके लिए आपको अपने पेट में अच्छे बैक्टीरिया को बढ़ावा देने की भी जरूरत है। इसका मतलब है कि प्याज, केला और लहसुन जैसे बहुत सारे प्रीबायोटिक्स खाए जाएं जो एक तरह से फर्टिलाइजर के तौर पर काम करते हैं। इसके साथ दही में पाए जाने वाले प्रोबायोटिक्स भी अच्छे रहते हैं। लेकिन अच्छे से अच्छे भोजन के बावजूद आपको कभी-कभी थोड़े और सपोर्ट यानि सप्लीमेंट की जरूरत हो सकती है। अगर आप थकान या डल महसूस करें तो अपने डॉक्टर से विटामिन बी और ओमेगा 3 फैटी एसिड लेवल की जांच करने के लिए कहें। ये दोनों आपकी मेंटल और इमोशनल वेल बीइंग और ब्रेन हेल्थ के लिए जरूरी हैं। अच्छा और बैलेंस्ड भोजन करके और जरूरत महसूस होने पर सप्लीमेंट लेकर आप अपने शरीर और दिमाग को बेहतर बनाए रखेंगे।

रोजाना हल्की फुल्की कसरत आपके दिमाग को फिट रखने के लिए जरूरी है। लेकिन उम्र बढ़ने के साथ इसकी स्पीड कम करते रहें।
आपने कछुआ और खरगोश की कहानी सुनी ही होगी।  खरगोश तेजी से दौड़ लगाना शुरू करता है और ऐसा लगता है कि वो जीत रहा है। लेकिन जल्दी ही वो थक जाता है। जबकि धीमे-धीमे चल रहा कछुआ वैसे ही चलता रहता है और जीत जाता है। इसी तरह जब कसरत करने की बारी आती है तो महिलाओं को खरगोश की जगह कछुए की तरह ज्यादा बर्ताव करना चाहिए। यानि रोजाना हल्की या मीडियम मेहनत कराने वाली एक्सरसाइज आपकी सेहत को ज्यादा फायदा पहुंचाती है और सबसे ज्यादा आपके दिमाग को। एक्सरसाइज आपकी सेहत के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं होती। ये आपकी आर्टरीज में प्लाक के जमाव को कम करके आपके दिल को मजबूत बनाती है और  एंडोर्फिन रिलीज में मदद करके आपका मूड अच्छा बनाती है। इससे भी जरूरी बात ये है कि इससे आपका दिमाग यंग बने रहने में भी मदद मिलती है। जब आप एक्सरसाइज करते हैं तो ग्रोथ हार्मोन रिलीज होता है जो आपके न्यूरॉन्स की मरम्मत और नए कनेक्शन बनाने में मदद करता है। शायद यही वजह है कि रोजाना एक्सरसाइज करने वाली महिलाओं में आगे जाकर डिमेंशिया होने की संभावना बहुत कम होती है। 

लेकिन अगर एक्सरसाइज के नाम पर आपको जिम जाकर पसीना बहाने का ख्याल सताने लगता है तो घबराने की बिल्कुल जरूरत नहीं है। महिलाओं के लिए लो टू मीडियम इंटेंसिटी वाली कसरत सही रहती है। यहां भी फिट टू ऑल जैसा कोई तरीका नहीं है पर अपनी उम्र को देखते हुए एक्सरसाइज का चुनाव करना अच्छा रहता है। बीस और तीस के दशक की महिलाएं एरोबिक करें तो उनमें एजिंग को धीमा करने और एस्ट्रोजन के जरूरी लेवल को बनाए रखने में मदद मिल सकती है। इस उम्र की महिलाओं को हफ्ते में तीन बार लगभग 45 मिनट तक कसरत करनी चाहिए। मेनोपॉज के बाद आपको फ्रीक्वेंसी बढ़ाने लेकिन एक्सरसाइज को हल्का करने की जरूरत होती है। अब आप हफ्ते में पांच बार लगभग 30 मिनट एक्सरसाइज करें। इस पैटर्न के फायदे की अपनी वजह हैं। एक तो हेवी एक्सरसाइज कोर्टिसोल के लेवल को बढ़ाती हैं। ये स्ट्रेस हार्मोन है जो इन्फ्लामेशन और मसल्स या जोड़ों की परेशानियों को बढ़ा सकता है। दूसरी बात ये कि किसी मुश्किल या हेवी वर्कआउट की रिकवरी के लिए ज्यादा समय लगता है। इसके लिए भरपूर नींद लेना सबसे जरूरी है जबकि मेनोपॉज के बाद आम तौर पर महिलाओं को नींद की गड़बड़ होने लगती है। तीसरी बात ये कि हेवी एक्सरसाइज से मसल्स डैमेज हो सकती हैं और बुजुर्ग महिलाओं में हड्डियां टूटने का खतरा बन सकता है। इसलिए ज्यादा मेहनत करने की जगह योग, पाइलेट्स, बगीचे में काम करने या आधे घंटे साइकिल चलाने जैसे काम करें। सबसे अच्छी कसरत है वो है जो हल्की फुल्की हो पर रोजाना की जाए। इससे आपके दिमाग को फिट रखने में बहुत मदद मिलती है।

अब समय आ गया है कि महिलाओं की सेहत को नुकसान पहुंचाने वाली तनाव नाम की महामारी से निपटा जाए।
कभी ऐसा हुआ है कि आपको एक साथ बहुत से लोगों ने घेरा हो और सब अपने लिए अटेंशन चाहते हों? अगर इसका जवाब हां है तो आप भी आज की बाकी महिलाओं की तरह हैं जो अपनी नौकरी, घर-परिवार और बच्चों की जरूरतों को पूरा करते हुए चकरी बनी घूमती है। इसके साथ अगर बुजुर्ग माता-पिता या सास-ससुर की देखभाल की जिम्मेदारी भी आपकी है तो फिर आपका पगला जाना कोई हैरानी की बात नहीं है। दिमाग के लिए ये कंडीशन बुरी है। नौकरी में बराबरी की बात फिर भी कर ली जाती है पर घर में बराबरी की बात सोचना भी मुमकिन नहीं है। महिलाओं के पास काम ज्यादा है जबकि किसी तरह का सपोर्ट बहुत कम। आज की तारीख में तनाव एक आम बात बन गई है जबकि ऐसा होना नहीं चाहिए। तनाव से नींद में गड़बड़, मूड खराब होने और डिप्रेशन खतरा बढ़ जाता है। इसकी वजह से आपका दिमाग सिकुड़ भी सकता है। इसलिए हमें तनाव को कंट्रोल में रखने की जरूरत है। लेकिन ये करें तो करें कैसे? 

इसका एक तरीका ये है कि हमारे दिमाग को लगातार काम करते रहने से छुट्टी दी जाए। आज के दौर में हम दिन भर ब्रेकिंग न्यूज, अपने काम, कंप्यूटर और ईमेल से जुड़े रहते हैं। खुद को डिजिटल कैद से आजाद करने की कोशिश करें। फोन का इस्तेमाल कम कर दें और सिर्फ जरूरी ईमेल ही देखें। अगर आपका दिमाग हर समय दौड़ रहा है तो मेडिटेशन या माइंडफुल रहना बहुत अच्छा उपाय है। करने के लिए बहुत सी अलग-अलग चीजें हैं पर सबका नतीजा एक ही निकलता है कि आप अपने दिमाग को आराम करने का मौका देते हैं। इसके फायदे ढेर सारे हैं। एक स्टडी से ये पता चला कि जो लोग लगातार कुछ सालों से मेडिटेशन कर रहे हैं उनमें दिल की बीमारियों का खतरा 48 प्रतिशत तक कम हो गया। अपने दिमाग को थोड़ा आराम देने का सबसे अच्छा तरीका नींद है। आपके शरीर और दिमाग को तरोताजा करने के लिए गहरी नींद बहुत जरूरी है। 

लेकिन अब ज्यादातर लोग नींद में कटौती करते हैं। इसकी वजह से दिमाग थका रहता है, डिप्रेशन और  चिड़चिड़ापन होने लगता है। अगर आपको अच्छी तरह नींद नहीं आती है तो बिस्तर पर जाने से पहले आधे घंटे का विंड डाउन सेशन लें। इसमें आपको बस किसी भी  इलेक्ट्रॉनिक्स या ध्यान भटकाने वाली चीज से दूर रहना है। अपने कमरे की लाइट बंद कर दें और ये भी ध्यान रखें कि कमरा बहुत गर्म न हो। अगर इनमें से कोई भी तरीका काम नहीं करता है तो लिसा का सुझाव है कि आप डॉक्टर से मेलाटोनिन सप्लीमेंट के बारे में सलाह लें। सोने से पहले पिस्ता जैसी चीजें खाएं जिसमें अच्छा खासा मेलाटोनिन पाया जाता है। तनाव हमारे जीवन का एक हिस्सा लगने लगा है जबकि ऐसा होना नहीं चाहिए। ये सिर्फ और सिर्फ हमारा नुकसान करता है। इसलिए हमें इससे निपटने के बारे में चौकन्ना रहना चाहिए।

दिमागी कसरत करते रहें तो दिमाग एक्टिव और शार्प बना रहता है।
आखिरी बार आपने कोई नई चीज कब सीखी थी? या खुद को कंफर्ट जोन से बाहर कब निकाला था? जब हम छोटे होते हैं तो हमेशा कुछ न कुछ नया सीखते या करते रहते हैं। लेकिन जैसे-जैसे हम बड़े होते जाते हैं हम एक फिक्स रूटीन में फंसकर अपनी ग्रोथ पर ध्यान देना बंद कर देते हैं। जबकि ये हमारी मेंटल हेल्थ के लिए सही नहीं है। सीधे शब्दों में कहें तो अपने ब्रेन को हेल्दी रखने के लिए हमें इसे इस्तेमाल करते रहना होता है। 15 सालों तक 900 लोगों पर की गई एक स्टडी में पाया गया कि जिन लोगों के पास क्रिएटिव नौकरी या डिग्री थी उनका कॉग्निटिव फंक्शन बहुत अच्छा था। 400 सीनियर सिटीजन पर हुई स्टडी में भी ये देखा गया कि जो लोग किसी तरह की इंटेलेक्चुअल एक्टिविटी में लगे रहते थे उनमें दिमाग के कमजोर होते जाने का खतरा 54 प्रतिशत कम था। यहां तक ​​​​कि अल्जाइमर की वजह बनने वाली एक जेनेटिक बीमारी के शिकार लोग भी अगर दिमागी कसरत करते रहें तो उनमें बाकी लोगों की तुलना में काफी देर से अल्जाइमर डेवलप होता है। एक्टिव ब्रेन, अपनी सेल्स के साथ बेहतर ढंग से तालमेल बिठा सकता है। यानि वो बहुत तेजी से तरह-तरह के काम कर सकता है। दुख की बात ये है कि दुनियाभर में महिलाओं को बड़ी डिग्री या चैलेंजिंग नौकरी करने के बहुत कम मौके मिले हैं। इसका मतलब ये है कि कई लोग अपने दिमाग को बेहतर बनाने वाले इन मौकों से दूर रह गए हैं। हालांकि आज ये कंडीशन बदल रही है फिर भी असमानता तो बनी हुई है। 

अब यहां अच्छी बात ये है कि आपके ब्रेन को स्टिम्युलेट करने के और तरीके भी हैं। भले ही ऑनलाइन गेम का बढ़ता क्रेज आपके दिमाग का कोई भला न कर पाए पर कुछ ऑफलाइन तरीके जरूर मददगार साबित हुए हैं। अखबार या किताबें पढ़ने से आपके न्यूरॉन्स एक्टिव हो जाएंगे। इसी तरह थिएटर जाना, डॉक्यूमेंट्री देखना या दोस्तों के साथ बोर्ड गेम खेलना भी अच्छा असर डालता है। लेकिन ये बात याद रखें कि आपको खुद को और अपने दिमाग को एक चुनौती देनी है। अगर आप पहले से ही शतरंज के अच्छे खिलाड़ी हैं तो किसी और खेल में महारत हासिल करने की कोशिश करें। अगर आपको हल्की-फुल्की रोमांटिक किताबें अच्छी लगती हैं तो बदलाव के लिए कोई क्लासिक उपन्यास चुनें। कुछ नया सीखना, दिमागी कसरत करने के सबसे बढ़िया तरीकों में से एक है। अगर आपने कभी बेकिंग, डांस या गिटार सीखने का सोचा हो तो ये सही समय है। जितनी जल्दी आप अच्छा भोजन शुरू करें, तनाव कम करें और अपने दिमाग को स्टिम्युलेट करें उतना ही अच्छा है। अब इस बात का समय आ गया है कि दुनिया में महिलाओं की मेंटल हेल्थ पर ध्यान दिया जाए। ये तो जब होगा तब होगा पर तब तक आप अभी से शुरुआत करके अपनी सेहत की चाबी अपने हाथों में ले सकती हैं। 

कुल मिलाकर
महिलाओं की ब्रेन हेल्थ को हमेशा से नजरअंदाज किया जाता रहा है। लेकिन अल्जाइमर नाम की महामारी को रोका जा सकता है। अपनी सेहत की पूरी तरह जांच करके इसे कुछ समय के लिए टाला या पूरी तरह से दूर भी रखा जा सकता है। अगर आप अपनी ब्रेन हेल्थ को बेहतर बनाना चाहते हैं तो पौष्टिक भोजन लेने, कसरत करने, तनाव से दूर रहने और दिमाग को स्टिम्युलेट करने जैसे कुछ कदम आपके बहुत काम आ सकते हैं। 

 

क्या करें

अगर आपको सुबह आलस और सुस्ती लगे तो एक गिलास गर्म पानी पिएं। हमारा दिमाग 80 प्रतिशत पानी ही है। इसलिए पानी की जरा सी भी कमी हो जाए तो दिमाग पर बहुत असर पड़ता है। स्टडीज से ये पता चला है कि ज्यादा पानी पीने से दिमाग का फंक्शन 30 प्रतिशत तक बेहतर बन जाता है। हमारा शरीर गर्म पानी को और अच्छी तरह से एब्जार्ब कर सकता है। इसलिए अगर आप दिन की शुरुआत अच्छी तरह से करना चाहते हैं तो सुबह उठते ही एक गिलास गर्म पानी पिएं। 

 

येबुक एप पर आप सुन रहे थे The XX Brain By Lisa Mosconi, PhD. 

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