Dr. David B. Agus
बीमारियों के बीच खुद को बचाए रखने के तरीके
दो लफ्जों में
साल 2016 में आई ये किताब आपको मेडिकल फील्ड में तेजी से हो रहे डेवलपमेंट की जानकारी देती है जो खास तौर पर उन बीमारियों को टार्गेट कर रही है जिन्होंने इंसानी समाज को लंबे समय से घेर रखा है। जेनेटिक्स में हो रही तरक्की कैंसर, इनफर्टिलिटी और एजिंग जैसी चीजों पर काफी हद तक काबू पाती हुई नजर आती है लेकिन आप भी कुछ आसान तरीके अपनाकर एक हेल्दी सोसाइटी बनाने में मदद कर सकते हैं।
ये किताब किनको पढ़नी चाहिए?
• मेडिकल सेक्टर से जुड़े लोग
• क्रॉनिक बीमारियों के मरीज
• जो लोग अपनी सेहत को लेकर जागरुक हैं
लेखक के बारे में
डॉ. डेविड अमेरिका के जाने माने कैंसर स्पेशलिस्ट हैं। उन्होंने इंडीविजुअल ट्रीटमेंट अप्रोच को बढ़ाने के लिए बहुत काम किया है। उन्होंने The End of Illness और A Short Guide to a Long Life जैसी और किताबें भी लिखी हैं।
जेनेटिक्स में हो रही तरक्की ने कैंसर जैसी बीमारी के इलाज में मदद की है पर इसके नुकसान भी हैं।
अगर कोई बीसवीं सदी के शुरुआती दौर में डॉक्टर के पास जाता तो उसे या उसके जैसे हर मरीज को एक जैसी दवा थमा दी जाती। समय के साथ इलाज के तरीकों में बदलाव आया है। आज की तारीख में एक ही बीमारी के लिए अलग इलाज हो सकते हैं जो आपके लक्षणों और यहां तक कि पर्सनालिटी को भी ध्यान में रखकर तय किए जाएं। पर ऐसा करने की जरूरत क्या है? इस किताब में आप पढ़ते हैं कि मेडिकल फील्ड में कितने बड़े बदलाव हुए हैं और डॉक्टर किन बेहतर तरीकों से बीमारियों से लड़ाई लड़ रहे हैं। इसके साथ इस बात पर भी लगातार अपडेट आ रहे हैं कि हम किस तरह खुद को फिट और हेल्दी रखने के लिए रोजमर्रा की आदतों में बदलाव कर सकते हैं। अब वक्त आ गया है कि पुरानी सोच को बदला जाए और नई जानकारी से कदम से कदम मिलाकर चला जाए।
इस किताब को पढ़कर आप जानेंगे
• कैंसर के इलाज में क्या तरक्की हो रही है
• इनफर्टिलिटी के इलाज में क्या बदलाव आए हैं
• बीमारियों की वजह से किसी देश की तरक्की कैसे रुक जाती है
तो चलिए शुरू करते हैं!
जब स्टीव जॉब्स को कैंसर हुआ तब उन्होंने इलाज का कोई तरीका नहीं छोड़ा। डॉ. डेविड भी 2007 में स्टीव का इलाज कर रही ऐसी ही एक मेडिकल टीम का हिस्सा थे और उन्होंने माॅडर्न जेनेटिक अप्रोच की मदद से स्टीव के इलाज में बहुत बड़ा रोल प्ले किया। सेल्स की सीक्वेंसिंग की मदद से वैज्ञानिक DNA के उस हिस्से का पता लगा सकते हैं जिसे कैंसर सेल डैमेज करती है। इसकी मदद से डॉक्टर किसी मरीज को ऐसी स्पेसिफिक दवा दे सकते हैं जो सिर्फ खराब हिस्से को टार्गेट करे। लेकिन कैंसर हर चीज को चकमा दे सकता है। खराब हो चुकी सेल्स, म्यूटेट होकर दवा को बेअसर कर सकती हैं। अगर कोई नई दवा दी जाए तो कुछ समय बाद फिर यही होने लगता है। स्टीव जॉब्स को तो बचाया नहीं जा सका पर डॉ. डेविड के काम ने जेनेटिक मेडिसिन की किताब में एक नया चैप्टर खोल दिया।
इस समय CRISPR यानि Clustered Regularly Interspaced Short Palindromic Repeats नाम का जीन एडिटिंग टूल काफी इस्तेमाल हो रहा है। हो सकता है कि आने वाले समय में इसकी मदद से इम्यून सिस्टम से जुड़ी CCR5 जैसी किसी खास जीन को सही तरह से डिलीट करने में मदद मिल जाए। अगर ऐसा होता है तो HIV से भी इम्यूनिटी मिल सकती है। यहां खतरा ये होता है कि जीन्स में किए जाने वाले ऐसे बदलाव पक्के होते हैं। CCR5 को कैरी करने वाली जीन, म्यूटेट होकर उस इंसान को दूसरी किसी बीमारी के लिए prone बना सकती है जैसे कि West Nile Virus. अभी इनके खतरे पूरी तरह से पता भी नहीं चल पाए हैं। लेकिन आने वाले कल में स्टडीज इस पर रोशनी डाल सकती हैं। क्योंकि जेनेटिक्स पर काम कर रहे वैज्ञानिक सिर्फ कैंसर पर ही फोकस नहीं कर रहे। एजिंग पर भी काफी काम हो रहा है।
जेनेटिक्स की मदद से एजिंग से जुड़े काफी सवालों के जवाब मिल सकते हैं।
"आपकी उम्र क्या है?" इस सवाल के एक से ज्यादा जवाब हो सकते हैं। हालांकि लगभग हर इंसान इसके जवाब में अपने कुल साल बताएगा लेकिन हमारी एक बायोलॉजिकल एज भी होती है जो हमारी सेहत से जुड़ी जानकारी देती है। अपने आसपास ही आपको ऐसे कितने लोग नजर आते होंगे जो अपनी उम्र से या तो काफी छोटे या काफी बड़े लगते हैं। साल 1972 में न्यूजीलैंड में डुनेडिन स्टडी की शुरुआत हुई। इसमें 1000 infants को शामिल किया गया और उम्र बढ़ने के साथ उनकी सेहत में होने वाले बदलावों पर नजर रखी गई। जब ये बच्चे 38 साल के हो गए तो वैज्ञानिकों ने इनसे खुद मिलकर इनका चेकअप किया। इसमें काफी पैरामीटर जांचे परखे गए जैसे शरीर के हर ऑर्गन का फंक्शन, कोलेस्ट्राल लेवल, दांतों की कंडीशन और इम्यून सिस्टम की मजबूती। इस डेटा की मदद से इनकी बायोलॉजिकल एज पता लगई गई जो अलग-अलग थी भले ही सभी 38 साल के थे।
इसमें ज्यादातर लोगों के रिजल्ट्स तो सामान्य थे पर कुछ लोग 38 के होते हुए भी किसी 28 साल के युवा की तरह फिट और ताकतवर थे। जबकि कुछ लोग किसी 60 साल के बुजुर्ग की तरह पस्त हो चुके थे। कुछ लोग ऐसे भी थे जिनकी उम्र तो एक साल बढ़ती पर बायोलॉजिकल एज तीन साल बढ़ जाती। आज की तारीख में बायोलॉजिकल एज के बारे में और गहरी जानकारी मिल चुकी है। जैसे कि अब शरीर के हर एक हिस्से की बायोलॉजिकल एज पता लगाई जा सकती है। बॉस्टन यूनिवर्सिटी के रिसर्चर्स ने दिल की उम्र का पता लगाने के लिए एक ऑनलाइन कैलकुलेटर तैयार कर दिया है जहां आपको बस कुछ सवालों के जवाब देने होते हैं। साल 2015 में मिले डेटा के हिसाब से अमेरिका में हर चार में से तीन लोग ऐसे हैं जिनके दिल की बायोलॉजिकल एज उनकी अपनी उम्र से कम से कम पांच साल ज्यादा है। इसमें ऐसे लोग भी मिले जिनके दिल उनकी अपनी उम्र से काफी यंग है। वैज्ञानिक ऐसे ही लोगों की स्टडी पर खास फोकस कर रहे हैं। जेनेटिक्स की मदद से रिसर्चर्स को ये पता लगाने में मदद मिल सकती है कि हमारे DNA का कौन सा हिस्सा हमारे शरीर को बायोलॉजिकली यंग बनाए रखता है। इस पर स्टडी जारी है।
जेनेटिक्स से इनफर्टिलिटी के इलाज में भी काफी मदद मिल सकती है पर अभी लंबा रास्ता तय करना है।
नई तकनीकों की बदौलत आज इनफर्टाइल लोगों के लिए बच्चा पैदा करना आसान हो गया है। लेकिन जेनेटिक वजह से होने वाली इनफर्टिलिटी पर अभी काफी काम बाकी है और इसमें कुछ रिस्क भी हो सकते हैं। डॉक्टरों ने ये देखा है कि कुछ महिलाओं में माइटोकॉन्ड्रिया की खराबी की वजह से इनफर्टिलिटी हो सकती है। ये हमारी सेल्स का एक छोटा सा हिस्सा हैं जो शरीर को काम करने के लिए एनर्जी जनरेट करते हैं। इनका अपना DNA होता है। जब इनमें कोई खराबी होती है तो मसल्स या नर्व्स पर बुरा असर पड़ सकता है। जिन महिलाओं के माइटोकॉन्ड्रिया में डिफेक्ट होता है वो भी in-vitro fertilization यानि IVF की मदद से बच्चा पैदा कर सकती हैं लेकिन ऐसे बच्चों में किसी तरह की डीजनरेटिव बीमारी की संभावना बहुत रहती है।
इससे निपटने के लिए वैज्ञानिकों ने एक नया IVF तरीका ढूंढ निकाला है जहां पेरेंट्स का एग और स्पर्म तो मिलाए ही जाते हैं इसके साथ किसी दूसरी फर्टाइल महिला का हेल्दी माइटोकॉन्ड्रिया भी मिला दिया जाता है। इस तीन के कांबिनेशन की मदद से जेनेटिक परेशानी का हल निकल आता है। हालांकि सुनकर तो सब अच्छा लगता है पर इस तरह से होने वाले बच्चे में क्या बदलाव आ सकते हैं ये बात अभी तक साफ नहीं है।
साल 1997 में न्यू जर्सी के डॉक्टर जैक्स कोहेन ने चूहों पर इसका सफल एक्सपेरिमेंट किया। आगे चलकर उन्होंने इसकी मदद से 17 बच्चों को जन्म दिलाया। इनमें से तीन, ऑटिस्टिक या टर्नर सिंड्रोम का शिकार थे। टर्नर सिंड्रोम, फीमेल्स में पाया जाने वाला एक जेनेटिक डिफेक्ट है जिसकी वजह से बच्चों की ग्रोथ रुक सकती है या उनको इनफर्टिलिटी हो सकती है। बाकी बच्चों की सेहत का रिकॉर्ड नहीं रखा जा सका पर चूहों पर हुई स्टडी ये बताती है कि इस तरह तीन पेरेंट्स को मिलाकर पैदा हुए चूहों में आगे चलकर कॉग्निटिव प्रॉब्लम्स हो सकती हैं। भले ही अभी डीटेल पता नहीं चली है पर इतना जरूर समझ आ गया है कि इस प्रोसेस के साथ नुकसान जुड़े हैं और इसे बड़े पैमाने पर लागू करना खतरे से खाली नहीं है।
प्रिवेंटिव मेडिसिन बहुत अच्छी रहती हैं पर अभी तक वेस्ट में ये अपनी सही जगह नहीं बना पाई हैं।
इससे अच्छा क्या होगा कि आप खुद को समय रहते ही किसी बीमारी से बचा लें या बीमार पड़ें भी तो कम से कम नुकसान हो और जल्द से जल्द रिकवरी हो जाए। यहां चैलेंज ये है कि दुनिया के हर इंसान की सेहत की गारंटी नहीं दी जा सकती क्योंकि हम सब अलग-अलग हैं। इस वजह से डॉक्टर और वैज्ञानिक, हेल्थ पर कोई भी पक्का दावा नहीं कर पाते हैं। जैसे डॉक्टर डेविड भी मरीजों को रोज एस्पिरिन की छोटी खुराक और कोलेस्ट्रॉल घटाने वाली दवा लेने की सलाह देते थे ताकि वो लंबे समय तक हेल्दी रहें। लेकिन स्टडीज ये भी बताती हैं कि भले ही ये दवाएं दिल की बीमारी और इन्फ्लामेशन से बचाती हों पर कुछ लोगों पर इनके बुरे असर भी हो सकते हैं। अब इसका ये मतलब भी नहीं है कि जिनको इससे फायदा हो रहा हो वो लोग भी इन्हें लेना बंद कर दें पर कोलेस्ट्रॉल ठीक रखने के दूसरे तरीकों पर भी काम होना चाहिए।
हम अपने आसपास की दुनिया से ही बहुत कुछ सीख सकते हैं। डेविड अपनी एक मेमोरी शेयर करते हुए कहते हैं कि जब साल 2014 में वो अफ्रीका गए तो ये देखकर हैरान रह गए कि उनके गाइड ने मलेरिया की दवा लेने से इन्कार कर दिया। उसका कहना था कि अगर एक बार ये दवा ली तो सारी जिंदगी इसका सहारा लेना पड़ेगा। दवा की जगह गाइड ने इस बात का ध्यान रखा कि वो मच्छरों से दूर रहे। जैसे उसने पूरे शरीर को ढंक रखा था। वो ऐसी जगहों पर सोया जहां मच्छर नहीं थे और मच्छर भगाने के लिए रिपेलेंट का इस्तेमाल किया। इस तरह उसने अपना बचाव किया। उसे देखकर डॉक्टर डेविड को ये एहसास हुआ कि बचाव वाली ये सोच वेस्टर्न मेडिसिन में तो दिखती ही नहीं है। कोलेस्ट्रॉल के लिए स्टेटिन जैसी दवाओं पर जिंदगी भर निर्भर रहना कोई सही उपाय नहीं था। जबकि प्रिवेंटिव अप्रोच शरीर को दवाओं पर निर्भर किए बिना ही हेल्दी रखती है। बस हर इंसान को ये समझना होगा कि उसे किस तरह खुद को बचाना है।
मेडिकल स्टडीज और रिसर्च पर भरोसा करें न कि विकीपीडिया पर।
क्या आप मीडिया पर आने वाली हर बात पर यकीन कर लेते हैं? नहीं ना। सेहत पर भी ये बात लागू होती है। इसलिए गूगल और विकीपीडिया पर आंख बंद करके यकीन कर लेना भी ठीक नहीं है। हालांकि बहुत से ऑनलाइन प्लेटफार्म हैं जिनसे आप सही जानकारी जुटा सकते हैं पर जहां तक पर्सनल हेल्थ की बात आती है वहां सोच समझकर फैसला करना चाहिए। साल 2014 में अमेरिकन ऑस्टिओपैथिक असोसिएशन के जर्नल में छपी एक स्टडी कहती है कि विकीपीडिया पर लगभग हर बड़ी बीमारी जैसे दिल की बीमारी, डिप्रेशन, डायबिटीज और यहां तक कि पीठ दर्द से जुड़े आर्टिकल्स में भी काफी गल्तियां थीं। इसलिए किसी भरोसेमंद जगह से पूरी और सही जानकारी इकट्ठा करना जरूरी है। आपने सॉ पामेटो के पौधे के बारे में सुना होगा जिसके बारे में दावा किया जाता है कि वो prostate की बीमारियों में चमत्कार कर देता है। इसके विज्ञापनों और ऑनलाइन जानकारी देखकर आपको ये लगेगा कि आप तो खजूर जैसा कोई फल ही खा रहे हैं जिसका कोई नुकसान नहीं है। जबकि थोड़ी स्टडी करेंगे तो आपको पता चलेगा कि इसके भी साइड इफेक्ट्स होते हैं जैसे ब्लड क्लॉटिंग को धीमा करने वाली दवाओं का असर कम करना, हार्मोन का बैलेंस बिगाड़ना, चक्कर और दिल मचलना।
जितना हो सके ऑनलाइन दावों को मानने या फॉलो करने से बचें। इसकी जगह नई और बड़े पैमाने पर हुई स्टडीज पर ध्यान दें। इनको पूरी रिसर्च और ध्यान से तैयार किया जाता है और इनके नतीजों को क्रॉस चेक भी किया जाता है। हालांकि मेडिकल स्टडीज भी गलत जानकारी दे सकती हैं। अगर बहुत छोटे ग्रुप पर स्टडी की गई हो या रिजल्ट्स को समझने में भूल हो जाए तो ऐसा हो सकता है। डॉक्टर एन्ड्र्यू वेकफील्ड ने measles, mumps और rubella (MMR) वैक्सीन पर स्टडी करके ये बताया कि इस वैक्सीन को लेने वाले बच्चों को ऑटिज्म हो सकता है। हालांकि ये वैक्सीन लगभग हर बच्चे को लगाई जाती है। लेकिन इस स्टडी में सिर्फ 12 बच्चों ने भाग लिया था और ये पूरी तरह गलत थी। इसके बावजूद आज भी बहुत से लोग ये मानते हैं कि वैक्सीन से ऑटिज्म हो सकता है।
बढ़ते वजन को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है।
ये डेटा काफी हैरान कर देता है कि अमेरिका के लगभग 67% लोगों का वजन सामान्य से ज्यादा है। इससे ज्यादा हैरानी की बात ये है कि इनमें से सिर्फ 36% लोग इस बात को मानते हैं कि उनका वजन ज्यादा है। बाकी को लगता है कि उनका वजन ठीक है या कम है। साल 2010 में Obstetrics & Gynecology जर्नल में छपी एक स्टडी में ये बात सामने आई। जैसे-जैसे मोटापे की समस्या बढ़ रही है समाज में इसे एक आम बात समझा जाने लगा है। Pediatrics के एक जर्नल में साल 2014 में एक स्टडी छपी। लगभग 50% ओवरवेट बच्चों के माता पिता को इस बात का अंदाजा ही नहीं था कि उनके बच्चों को कोई हेल्थ प्रॉब्लम है। ये बहुत परेशान करने वाली बात है क्योंकि ज्यादा वजन आगे चलकर कई तरह की बीमारियों की वजह बन सकता है। इनमें से एक है ब्रेस्ट कैंसर। मीनोपॉज के बाद वो महिलाएं जिनका वजन ज्यादा है उनमें ब्रेस्ट कैंसर की संभावना बाकी से 60% ज्यादा होती है। अगर लोगों को वजन और सेहत से जुड़े कनेक्शन पता होंगे तो वो अपनी सेहत को लेकर ज्यादा जागरुक रहेंगे। बच्चों के माता पिता भी शुरुआत से सावधान रहेंगे।
समाज में वजन के अलावा और भी बातों को अनदेखा कर दिया जाता है। कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी की एक स्टडी बताती है कि लोगों को इस बात का अंदाजा नहीं होता कि उनको रोज कितनी चीनी खानी चाहिए। इस स्टडी में भाग लेने वाले ज्यादातर लोगों का कहना था कि वे कम चीनी खाते हैं पर उनके यूरिन टेस्ट कुछ और ही बताते थे। मजे की बात ये है कि जिनको ऐसा लगता था कि वो ज्यादा चीनी खा रहे हैं उनके भोजन में चीनी काफी कम थी।
रोजाना एक्सरसाइज करके आप अपनी उम्र के काफी साल बढ़ा सकते हैं पर लोग हिलना डुलना ही नहीं चाहते।
आदिम काल में लोग शिकार, खेती और भोजन ढूंढने में लगे रहते थे। इस वजह से उनका शरीर चुस्त रहता था। आज के दौर में इतनी भागमभाग है कि लोगों को कसरत करने का समय नहीं मिल पाता। साल 2012 में लेंसेट जर्नल में हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की एक स्टडी छपी थी जिसमें ये बताया गया था कि अमेरिकन्स में एक्सरसाइज से बढ़ती दूरी किसी महामारी की तरह चुनौती बनती जा रही है क्योंकि 80% अमेरिकन्स सही तरह एक्सरसाइज नहीं कर पाते जो उनको फिट रहने के लिए जरूरी है। डॉक्टर जैनीक वैन उफलेन की एक स्टडी से पता चला है कि जो महिलाएं काम या किसी भी वजह से दिन में कम से कम नौ घंटे बैठी रहती हैं उनमें रोजाना छह घंटे से कम समय तक बैठने वाली महिलाओं की तुलना में डिप्रेशन का खतरा बढ़ जाता है।
बैठे रहना अपने आप में अनहेल्दी नहीं है खास तौर पर तब जब आप सही तरह से बैठें। उदाहरण के लिए जमीन पर बैठने के लिए पैरों और लोवर बॉडी की मसल्स पर जोर आता है जबकि कुर्सी या सोफे पर पसरने में ऐसा कोई खास जोर नहीं पड़ता। ऐसी पोजीशन में लंबे समय तक बैठने से शरीर का मेटाबॉलिज्म बंद हो जाता है। इसकी वजह से ब्लड शुगर और फैट इकट्ठी होने लगती है। बैठे रहने से शरीर को बीमारियों का खतरा होता है पर उठना और हिलना डुलना फायदेमंद है। रोजाना एक्सरसाइज करना सबसे बेहतरीन एंटी-एजिंग उपाय है। साल 2012 में अमेरिका में नेशनल कैंसर कंसोर्टियम ने एक्सरसाइज के हेल्थ पर पड़ने वाले असर को मापा। उन्होंने देखा कि अगर कोई इंसान हफ्ते में कम से कम 75 मिनट टहलता है तो वो अपनी उम्र डेढ़ साल बढ़ा सकता है। वहीं अगर आप हर हफ्ते 7.5 घंटे चल पाते हैं तो आपकी उम्र 4.5 साल बढ़ सकती है। स्टडी में ये भी देखा गया कि हर हफ्ते कम से कम दो घंटे एक्सरसाइज करने और वजन सही रखने से लोग अपनी उम्र सात साल तक बढ़ा सकते हैं।
सुबह ताकत देने के लिए रात की गहरी और भरपूर नींद जरूरी होती है।
कोई अच्छा एथलीट कैसे बन सकता है? जाहिर है सही डाइट, तगड़ी कसरत और ट्रेनिंग लेकर। लेकिन इनके अलावा भी एक बहुत जरूरी चीज है जिसे हम अक्सर भूल जाते हैं। वो है अच्छी नींद। शरीर को हेल्दी बनाए रखने के लिए नींद जरूरी है। नींद की कमी की वजह से बेहतरीन एथलीटों का परफार्मेंस भी धीमी पड़ जाती है। शरीर की चुस्ती फुर्ती कम हो जाती है और सही तरह फोकस कर पाना मुश्किल हो जाता है। नींद के असर को लेकर वर्जीनिया के एक डॉक्टर, क्रिस्टोफर विंटर ने साल 2009 में एक स्टडी छापी। इसमें दस साल तक बेसबॉल खिलाड़ियों की परफार्मेंस को देखा गया। विंटर ने पाया कि जो टीमें सफर करते हुए एक टाइम जोन बदलती हैं उनकी परफार्मेंस में बहुत फर्क नहीं आता है। जबकि अगर कोई टीम तीन टाइम जोन बदलती है तो उसके जीतने की संभावना 50 प्रतिशत कम हो जाती है। यानि स्टडी की मानें तो जेट लैग के कारण होने वाली नींद की गड़बड़ से टीम को बहुत नुकसान होता था।
स्टडीज से ये भी पता चला है कि गहरी और पूरी नींद सिर्फ परफार्मेंस पर ही असर नहीं डालती है। नींद की कमी मोटापा, कैंसर, डायबिटीज और दिल की बीमारियों को और भी बदतर बनाने का काम करती है। जो लोग नींद पूरी नहीं कर पाते हैं उनको साल भर ठंड का अहसास होता है। जो लोग हर रात छह घंटे से कम सोते हैं उनमें आठ घंटे सोने वाले लोगों की तुलना में ठंड लगने की संभावना चार गुना ज्यादा होती है। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ के अनुसार नींद की बीमारी से गुजर रहे कम से कम 70 मिलियन अमेरिकियों की फिजिकल और मेंटल हेल्थ और प्रोफेशनल परफार्मेंस बिगड़ी रहती है। रात को ली गई अच्छी नींद सारी दुनिया को सेहतमंद रखने में काफी मददगार साबित हो सकती है।
कुल मिलाकर
जेनेटिक्स में हो रही तरक्की से कैंसर, इनफर्टिलिटी और एजिंग जैसी काफी चुनौतियों का हल मिल सकता है। लेकिन जहां इनमें से कई तकनीकें अभी भी खतरे से भरी हैं तो ऐसे भी कुछ रास्ते हैं जो आसान और असरदार दोनों हैं। रोज वॉक करने से लेकर भरपूर नींद लेने तक ऐसे कई उपाय हैं जो हमारी पूरी सेहत पर अच्छा असर डाल सकते हैं।
क्या करें
टच थैरेपी की मदद लें।
एक्सरसाइज और नींद के अलावा शरीर को फिर से नया और हेल्दी बनाए रखने के लिए टच एक जरूरी चीज है। इसलिए अपने खोल से बाहर निकलें और दूरियां कम करें। इसका मतलब ये नहीं है कि आपको बहुत इंटीमेट होना चाहिए या सेक्स करना चाहिए। बस एक करीबी दोस्त को गले लगाना आपके शरीर और मूड को तरोताजा करने के लिए काफी है।
येबुक एप पर आप सुन रहे थे The Lucky Years Dr. David B. Agus.
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