Carl Richards
सही इन्वेस्टमेंट के तरीके
दो लफ्जों में
पैसा हमारी बुनियादी जरूरतों में से एक है। लेकिन अक्सर ये होता है कि हम इसे कमाते तो बड़ी मेहनत से हैं पर खर्च या इन्वेस्ट करते वक्त ज्यादा नहीं सोचते। ये किताब आपकी इस आदत को सुधारने में मदद करती है। एक उलझन हमेशा हमें सताती है कि हम क्या कर रहे हैं और हमें क्या करना चाहिए। कार्ल ने इसे ही बिहेवियर गैप का नाम दिया है। ये किताब आपको सिखाती है कि पैसों से जुड़े सही डिसीजन कैसे लेने चाहिए।
ये किताब किनको पढ़नी चाहिए
• जो लोग सही जगह पर इन्वेस्ट करना चाहते हैं
• जो लोग कुछ अच्छा सीखना चाहते हैं
• ऐसे लोग जो पैसे को ही सब कुछ नहीं मानते
लेखक के बारे में
कार्ल रिचर्ड्स, सर्टिफाइड फाइनेंशियल प्लानर हैं। वो BAM ALLIANCE में डायरेक्टर ऑफ इनवेस्टर एजुकेशन के तौर पर काम करते हैं। ये 130 से ज्यादा वेल्थ मैनेजमेंट एडवाइजरों का ग्रुप है। उन्होंने न्यूयॉर्क टाइम्स के लिए लिखा है और मार्केटप्लेस मनी, Oprah.com और Forbes.com के कार्यक्रमों में भी शामिल रहे हैं।
ये किताब आपको क्यों पढ़नी चाहिए?
ताकि आप समझदारी से फाइनेंशियल डिसीजन ले सकें और पैसों की चिंता दूर कर सकें।
हम सब ये समझते हैं कि पैसे बहुत सोच समझकर खर्च करने चाहिए। हमारे पास टीवी, मीडिया और अखबारें हैं जो हमें इसके बारे में तरह-तरह की सलाह देती रहती हैं। फिर भी बहुत से लोग अक्सर हाथ में पैसे न टिकने या उनकी कमी का रोना रोते मिल जाते हैं। अपनी प्रोफेशनल लाइफ में कार्ल ने लोगों को बहुत बार सही डिसीजन न लेकर पछताते हुए देखा है। इन सब बातों ने कार्ल को ये किताब लिखने की प्रेरणा दी। ये किताब आपको सिखाती है कि किस तरह आप इतनी सारी बातों में अपने काम की बात चुनें। किस तरह अपने फाइनेंशियल गोल को ध्यान में रखते हुए इन्वेस्ट करें और एक खुशहाल जिंदगी की तरफ कदम बढ़ाएं। इस समरी को पढ़कर आप जानेंगे कि आपको हर फाइनेंशियल एडवाइस मानने की जरूरत नहीं है। भविष्य के बारे में ज्यादा चिंता करना कैसे आपके पैसों की बर्बादी कर सकता है और अपने बच्चों के साथ भी फाइनेंशियल बातें डिस्कस क्यों करनी चाहिए ?जब हम क्या करें और क्या न करें के बीच फंस जाते हैं तो वहीं से बिहेवियर गैप की शुरुआत होती है।
आपके साथ कई बार ऐसा होता होगा जब आप किसी काम को करें या नहीं इसको लेकर कन्फ्यूजन में रहते होंगे। जैसे वजन घटाने की कोशिश कर रहे लोगों का ये सोचना कि उनको मिठाई का दूसरा पीस खाना चाहिए या नहीं। यही बिहेवियर गैप है। ऐसा होना बिल्कुल नेचुरल है। इस हां या नहीं की वजह से हम मजबूत डिसीजन नहीं ले पाते हैं। इसका दूसरा पहलू ये भी है कि हम झुंड वाली मानसिकता का शिकार बन जाते हैं। यानि अपने लिए क्या सही है इसकी परवाह किए बिना वो करते हैं जो सारी दुनिया कर रही है। दरअसल हमें वही करना सेफ लगता है जो ज्यादा लोग करते हुए नजर आते हैं। 90s के डॉट कॉम बूम में यही हुआ था।
कंप्यूटर के आ जाने से दुनिया में एक बड़ा बदलाव आया और हर किसी ने इस सेक्टर की कंपनियों में इन्वेस्ट करना शुरू कर दिया। उस समय हर किसी को भारी मुनाफा हो रहा था। इसलिए आम लोगों ने भी उधार लेकर शेयरों में $ 44 बिलियन से अधिक का निवेश किया। फिर एक दिन मार्केट गिरने लगा और NASDAQ अपने 50% लेवल पर आ गया। लोगों के पैसे डूब गए और वो कर्ज के पहाड़ के नीचे दब गए। ये घटनाएं स्टॉक मार्केट में आम हैं। लोग ये सोचकर उत्साह में आ जाते हैं कि सबका मुनाफा हो रहा है तो हमारा भी होगा। इस तरह भावनाओं में बहकर दिमाग की जगह दिल से फैसले कर लेते हैं। ये बिहेवियर गैप को जन्म देता है। इस गैप को बंद करने के लिए आज पर नहीं बल्कि बीते हुए कल पर नजर डालनी चाहिए। आपके सामने डॉट कॉम क्रैश, हाउसिंग बबल और 2008 की मंदी जैसे ढेरों उदाहरण हैं।
ये सभी घटनाएं दूसरों को अंधाधुंध फॉलो करने की जगह सोच समझकर निवेश करने की जरूरत पर रोशनी डालती हैं। इससे आप बिहेवियर गैप को भर पाते हैं। आपको ओवर कान्फिडेंस से भी बचना चाहिए। 1990 के दशक में लॉन्ग टर्म कैपिटल की घटना ने यही संदेश दिया। ये एक हेज फंड था जिसे नोबेल पुरस्कार विजेताओं का एक ग्रुप चला रहा था। ये लोग खुद पर जरूरत से ज्यादा यकीन करते हुए सच्चाई से मुंह मोड़कर बैठे थे। इनका मानना था कि कंपनी को एक दिन में कभी भी $ 35 मिलियन से ज्यादा नुकसान नहीं हो सकता। लेकिन एक दिन ऐसा आया जब कंपनी के $ 553 मिलियन डूब गए। फेडरल रिजर्व को कंपनी के बचाव में आना पड़ा। भविष्य में क्या होगा हम नहीं जानते। इसलिए हम बस अपने वर्तमान को सही रख सकते हैं।
दुनिया का सबसे अच्छा इन्वेस्टमेंट ढूंढने की जगह वो चुनें जो आपके लिए सबसे अच्छा साबित हो सके।
असल में "दुनिया में सबसे अच्छा"जैसी कोई चीज नहीं होती। जरूरी नहीं जो इन्वेस्टमेंट दूसरों के लिए बढ़िया साबित हो रहा हो वो आपके मतलब का भी हो। अपने लिए इन्वेस्टमेंट करते वक्त आपको आज के खर्च और कल के लिए बचत दोनों के बारे में गहराई से सोचना पड़ता है। खर्च और बचत के बीच ये बैलेंस बनाते हुए इन्वेस्टमेंट करना आपके भविष्य की तरफ एक छोटा सा कदम है बस। बड़े रिटर्न जनरेट करने वाले तरीकों के साथ-साथ आप ज्यादा पैसे बचाकर, अपनी रिटायरमेंट को आगे बढ़ाकर और जॉब के बाद कोई और काम करते हुए भी अपने फाइनेंस को मजबूत बना सकते हैं। इस बात की भविष्यवाणी नहीं की जा सकती कि कोई इन्वेस्टमेंट आगे चलकर कितना ग्रो करेगा। इसलिए हम किसी भी इन्वेस्टमेंट को बेस्ट नहीं कह सकते। बेहतर यही है कि किसी मिराज का पीछा करने की जगह सच को समझिए और ये देखिए कि आपके फाइनेंशियल गोल को पूरा करने वाला रास्ता कौन सा है। ऐसा कोई इन्वेस्टमेंट नहीं है जिसे यूनिवर्सल कहा जा सके। इसलिए पहले खुद से सवाल करिए कि आपके लिए क्या बेहतर है। इसका जवाब आपके गोल, मौजूदा बचत, कमाई और यहां तक कि क्रेडिट कार्ड जैसी चीजों की मदद से मिलेगा।
मान लीजिए आपको आने वाले कल में अपने बच्चों के कॉलेज की फीस का बंदोबस्त करना है तो आप बच्चों के दाखिले के कम से कम 18 साल पहले एक एजुकेशनल अकाउंट खोल सकते हैं या म्यूचुअल फंड में निवेश कर सकते हैं। आपका गोल होना चाहिए कम से कम 240,000 डॉलर बचाना। पर बच्चा कॉलेज तक पहुंचता ही नहीं है तो ये फंड बेकार चला जाएगा। इसलिए उनकी स्कूली पढ़ाई पर भी ध्यान दें। इस उदाहरण से आपने ये आसानी से समझ लिया होगा कि निवेश का फैसला इतना भी आसान नहीं होता। फिर भी ऐसे बहुत से लोग हैं जो बिना किसी ठोस स्टडी के दूसरों की देखा देखी या फिर टीवी और मैग्जीन में बताई गई एक्सपर्ट एडवाइस की बुनियाद पर शेयर खरीद लेते हैं। आप ये गल्ती मत कीजिए। ये आपकी मेहनत का पैसा है। कोई भी इन्वेस्टमेंट करते समय ये जरूर देखें कि इससे आपके आने वाले कल में कितनी मदद मिल सकती है। अगर वो आपको फायदेमंद लगे तभी आगे बढ़ें नहीं तो टाटा कह दें। इस तरह आप दिल से नहीं दिमाग से फैसला कर पाएंगे।
सुनी सुनाई बातों की परवाह न करते हुए वो करें जो आपके लिए सही हो।
दुनिया में सलाह देने वालों की कमी नहीं है। किसी को सलाह-मशवरा देकर हम खुद को बुद्धिमान समझने लगते हैं। लेकिन शायद यही वजह है कि ज्यादातर सलाह किसी खास काम की नहीं होती हैं। ऐसा भी नहीं कि हर कोई गलत सलाह देता हो पर वो आपके काम आए इसकी संभावना कम ही रहती है। फाइनेंशियल एडवाइस पर तो ये बात पूरी तरह खरी उतरती है। जो बात आपके काम की हो वो दूसरे के लिए बिल्कुल बेकार बल्कि नुकसानदायक भी हो सकती है। ज्यादातर लोग ये बात नहीं जानते या फिर इसकी परवाह नहीं करते हैं। लाखों लोग द इकोनॉमिस्ट को ये सोचकर पढ़ते हैं कि इसमें दी गई सलाह पर चलकर वो स्टॉक मार्केट से मुनाफा कमा सकते हैं। लेकिन उसमें लिखी गई बात हर किसी पर तो लागू नहीं हो सकती। जैसे वजन कम कर रहे लोगों को एक्सरसाइज करने या खानपान सुधारने की सलाह दी जाती है। पर ये एक कॉमन एडवाइस है। किसी दिल या शुगर के मरीज पर ये उल्टा असर भी कर सकती है।
ये भी जरूरी नहीं कि सलाह दे रहे लोग पूरी तरह निष्पक्ष हों। वो भी फेवरेटिज्म का शिकार हो सकते हैं। टोयोटा का सेल्सपर्सन कभी भी होंडा की तारीफ नहीं करेगा। इसलिए आपको भी बहुत सोच समझकर आगे बढ़ने की जरूरत है। एक बार जब आप काम की और बेकार सलाह के बीच फर्क करना सीख लेते हैं तो सही रास्ते की तरफ बढ़ जाते हैं। एक समय ऐसा आता है जब आप कॉपी कैट बनने की जगह अपना खुद का एक अच्छा इन्वेस्टमेंट पोर्टफोलियो तैयार कर लेते हैं। इसे वक्त के साथ बदलकर अपडेट भी कर पाते हैं। अपनी जिंदगी से जुड़ा लगभग हर फैसला आप खुद करते हैं। क्या खाना है, क्या पहनना है, क्या पढ़ाई करनी है। तो फिर फाइनेंस के लिए किसी पर डिपेंड क्यों करना? आपको वॉरेन बफेट नहीं बनना है। आप जो हैं वो हैं बस। आगे आप पढ़ेंगे कि फाइनेंशियल प्लानिंग करते समय अपने गोल, ताकत और कमजोरियों को समझना क्यों जरूरी है।
पैसे से कुछ खुशियां जरूर खरीदी जा सकती हैं। वरना ये बस अपनी जरूरतें पूरी करने का एक जरिया भर है।
हम सब फाइनेंशियल सिक्योरिटी क्यों चाहते हैं? ताकि हम खुश रह सकें और अपने परिवार को एक अच्छी लाइफस्टाइल दे सकें। खुश रहने का अधिकार सबको है पर हमको ये भी नहीं भूलना चाहिए कि खुशी का मतलब हमारी आमदनी नहीं है। खुशी का असली मतलब है हमारे मन की शांति। नोबेल पुरस्कार विजेता डैनियल कन्मैन और प्रिंसटन के प्रोफेसर एंगस डीटन ने हाल ही में एक स्टडी से इसे साबित भी किया है। इस स्टडी में ये पाया गया कि खुशियों और कमाई का सीधा कनेक्शन तब तक ही रहता है जब तक आमदनी $ 75,000 तक होती है। जैसे-जैसे आमदनी इसके ऊपर पहुंचती है लोगों के मन की शांति और भावनात्मक स्थिरता कम होने लगती है। इसे देखते हुए ये कहा जा सकता है कि लोग पैसे पर उतना ध्यान दे रहे हैं जितनी जरूरत नहीं है। अगर सिर्फ पैसे से सारी खुशियां खरीदी जा सकतीं तो दुनिया के अमीर देशों में कोई दुखी नहीं होता। हां पैसा आपकी बहुत सी जरूरतों को पूरा कर देता है। आप सारी दुनिया की सैर कर सकते हैं, आलीशान महल बनवा सकते हैं या इसे दान करके बहुत से जरूरतमंदों का भला कर सकते हैं। यानि लगभग वो सब कुछ जो आपको अच्छा लगता है।
इसलिए एक सही फाइनेंशियल डिसीजन लेने के लिए आपको अपने आप को समझना होगा। इस तरह आप अपने पैसे सही जगह लगा पाएंगे। डेविड ब्रूक्स, न्यूयॉर्क टाइम्स के लिए कॉलम लिखते हैं। वे और भी बड़े पैमाने पर इस बात को सपोर्ट करते हैं। उन्होंने कहा है कि सरकार को फाइनेंशियल पैरामीटर की जगह इस बात पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए कि लोग कितना खुश हैं। हम कम से कम अपने लिए तो इस बात का पालन कर ही सकते हैं। पैसों की चिंता या पीछा मत कीजिए। अपने गोल पर ध्यान दीजिए। इस तरह आप वो कदम उठाते हैं जो आपके लिए सबसे सही है। आगे आप पढ़ेंगे कि तरह-तरह की बातों में उलझने से कैसे बचें।
मेनस्ट्रीम मीडिया आपको इंडीविजुअल से भीड़ में बदलने में मुख्य भूमिका निभाता है।
हम स्टॉक मार्केट या फाइनेंशियल बातों की जितनी भी जानकारी रखते हों पर मीडिया की वजह से हमारी सोच पर ताला पड़ सकता है। असल में मीडिया हमारे साथ एक झुंड की तरह पेश आता है। हम अपने पोर्टफोलियो को ग्रीन देखकर खुश होते हैं और रेड देखकर परेशान। यानि हमारे दिमाग में ये बात घर कर चुकी है कि नंबर ही सब कुछ हैं। हम दूसरों को फॉलो करके खुद को सेफ महसूस करते हैं। यानि ज्यादा लोग जो भी कर रहे हैं वो ठीक ही होगा। जबकि हमें ये बात अच्छी तरह समझ में आती है कि भेड़चाल के नुकसान हो सकते हैं। साल 2006 के subprime mortgage crisis का उदाहरण ले लीजिए। जब मकानों की कीमतें लगभग 30 प्रतिशत गिर गईं। स्टॉक मार्केट की कीमतें 57 प्रतिशत गिर गईं। इन दोनों घटनाओं की वजह थी overvaluation. इस दौरान हर कोई भीड़ में शामिल होकर स्टॉक या मकानों में पैसे लगा रहा था। इस वजह से कीमतें बढ़ रही थीं। फिर एक दिन बबल फूटना ही था। इसलिए आपको दिमाग खोलकर रखने की जरूरत है। हर उस बात को मानना जरूरी नहीं है जो मीडिया ने बताया है। मीडिया आपको अच्छी और सही जानकारी भी देता है। लेकिन इतने बड़े जाल में से सही राह ढूंढ निकालना लगभग नामुमकिन हो जाता है। इसलिए भटकने के चांस ही ज्यादा होते हैं। साल 2010 में द इकोनॉमिस्ट ने बड़े जोर शोर से इस बात का डंका पीटा कि अमेरिकन इकोनॉमी पटरी पर आ गई है। इसके पक्ष में उन्होंने ढेरों तर्क रख दिए। ये बात गलत साबित हुई और इकोनॉमी एक बार फिर लड़खड़ा गई। ये तो बस एक उदाहरण था। मीडिया के ऐसे ढेरों कारनामे हैं। इससे बचने का एक तरीका है। मीडिया में आने वाली खबरों और अफवाहों को लेकर जागरूक रहें। पैसों की चिंता कम करें। क्योंकि जब आपका दिमाग शांत होता है तो आप कुछ अच्छा और सही सोच पाते हैं।
किसी नई परिस्थिति से निपटने को तैयार रहकर और समय-समय पर जरूरी बदलाव करके आप अपने फाइनेंशियल गोल पर टिके रह सकते हैं।
क्या आप प्लान करने और फॉर्म्यूलेट करने का फर्क समझते हैं? प्लानिंग एक तरह की भविष्यवाणी ही है। लेकिन आप भाविष्य का अंदाजा लगाने की लाख कोशिश कर लें पूरी तरह सही साबित नहीं हो सकते। जबकि फॉर्म्यूलेट करने का मतलब भविष्य को देखना नहीं है बल्कि इससे निपटने के लिए खुद को तैयार करना है। प्लानिंग आज की परिस्थितियों को ध्यान में रखकर की जाती है न कि ये सोचकर कि कल ऐसा होगा ही। इसलिए प्लानिंग में आपके सामने ढेरों सरप्राइज आ जाते हैं। कार्ल ने साल 2004 में $ 575,000 का एक घर खरीदा। इससे पहले किसी ने इसे $ 400,000 में खरीदा था। साल 2007 में जब घर की कीमत बढ़कर $ 1 मिलियन हो गई तो कार्ल ने ये सोचकर उसे नहीं बेचा कि अभी तो कीमतें और बढ़ेंगी। लेकिन मार्केट क्रैश हो गया और मकान का दाम अपनी खरीदी हुई कीमत से भी कम रह गया। मार्केट कभी भी सीधी दिशा में नहीं चलता। इस वजह से हम सबको कभी न कभी नुकसान देखना पड़ता है। इससे निपटने का क्या रास्ता है? अगर आप अपने गोल पर टिके रहना चाहते हैं तो मौजूदा वक्त के हिसाब से अपनी प्लानिंग बदलते रहिए।
मान लीजिए कि आप लॉस एंजिल्स से मियामी के लिए एक क्रॉस कंट्री फ्लाइट उड़ा रहे हैं। अगर आप बस सीधी लाइन में उड़ान भरते रहे तो लक्ष्य पर नहीं पहुंचेंगे। आपको घुमावदार रास्ते लेने ही पड़ेंगे। जाहिर है कोई भी पायलट लगातार सीधी उड़ान नहीं भरता। वो अपना रूट बदलता है। अपने फाइनेंस को सही तरह से हैंडल करने के लिए भी आपको यही स्ट्रैटेजी रखनी चाहिए। अपने रास्ते में थोड़े-थोड़े बदलाव करते रहें। इसके लिए आपको कम वक्त का टारगेट बनाकर चलना चाहिए जैसे 15 सालों की जगह अगले तीन साल। इस तरह आप बिना भटके एक बड़े गोल की तरफ बढ़ते रहेंगे।
इन्वेस्टमेंट के हर पहलू पर ध्यान देकर आप सही डिसीजन ले सकते हैं।
इंसानों के लिए भावनाओं में बह जाना बहुत सामान्य बात है। लेकिन फाइनेंशियल डिसीजन लेते समय भावनाओं को महत्व देना भारी पड़ सकता है। सबसे पहले खुद के सामने ईमानदार रहें। इन्वेस्टमेंट में लक और स्किल का बराबर वजन होता है। कार्ल एक सुझाव देते हैं जिसे उन्होंने ओवरनाइट टेस्ट कहा है। खुद से सवाल कीजिए कि अगर किसी ने रातों रात आपके सारे स्टॉक बेच दिए तो आप कल फिर से कौन से स्टॉक खरीदेंगे? इसके जवाब में आप कुछ स्टॉक्स को दुबारा खरीदने से मना कर सकते हैं। हम अक्सर जो चल रहा है उसे चलने दो की थ्योरी पर काम करते हैं। चाहे निवेश हो या रिश्ते। इस जगह पर ओवरनाइट टेस्ट हमें अपने फिक्स्ड आइडिया से बाहर निकालने और बिना किसी पक्षपात के सही डिसीजन लेने का रास्ता दिखाता है। जब आप किसी खास इन्वेस्टमेंट को लेकर ये कन्फर्म नहीं कर पा रहे हैं कि इसे दुबारा लेना है या नहीं तो इससे छुटकारा पाना बेहतर होगा। आप भावनाओं में बहते हैं या नहीं इसे पता लगाने का एक तरीका और है। हमेशा ये पक्का करते हुए चलें कि कोई कदम आपको मंजिल तक ले जा रहा है या नहीं। कुछ लोग ऐसा न सोचते हुए कोई स्टॉक इसलिए खरीद लेते हैं कि वो ट्रेंड में है और कल बहुत पैसा बना देगा। लेकिन इसे हम बस नकल कह सकते हैं न कि फाइनेंशियल डिसीजन लेना। आप इन्वेस्टमेंट आने वाले कल के लिए कर रहे हैं। पहले सोचिए कि आप भविष्य में अपने परिवार को क्या देना चाहते हैं, उनके लिए क्या जमा करना चाहते हैं। अब अपना पोर्टफोलियो इस नजरिए से देखिए कि क्या वो आपकी इस जरूरत को पूरा कर पाएगा? ये भी सच है कि पूरी तरह सोच समझकर किया गया फैसला भी उतना सही साबित न हो जितनी हम उम्मीद लगाते हैं। क्योंकि इन्वेस्टमेंट हमारे सामने नई परिस्थितियां लाता रहता है। आप आज को देखते हुए सबसे सही डिसीजन ले सकते हैं। आपके हाथ में बस इतना ही है।
अपने फैसलों की जिम्मेदारी लीजिए पर याद रखिए कि नतीजे पूरी तरह आपके हाथ में नहीं है।
हम बच्चों को अपनी गल्ती स्वीकारना सिखाते हैं। लेकिन जब बड़े कुछ गलत कर दें तो वो ये बात क्यों भूल जाते हैं? आप अपने हर कदम के लिए जिम्मेदार हैं। कार्ल के एक जानकार का मानना था कि महंगे कपड़े और चमचमाती कार जैसी लक्जरी उनकी शान बढ़ा देगी। लोग उनको सफल आदमी मानने लगेंगे। हकीकत में ये सब ऊपरी चमक दमक से ज्यादा कुछ नहीं था जिसकी बुनियाद खोखली थी। इस दिखावे की आदत ने उनको कर्ज के ढेर तले दबा दिया। सफलता का दिखावा करने की जगह उनको लगन से काम करते हुए करियर की बुलंदी पर पहुंचना चाहिए था। लेकिन ये एक मुश्किल रास्ता है। इसके लिए धैर्य और अनुशासन की जरूरत होती है। पर जीवन में अच्छे बदलाव लाने के लिए कड़ी मेहनत जरूरी तो है। अपने फाइनेंस सुधारने के लिए आपको एक साफ नजरिया रखने की जरूरत है। हम अक्सर काम की बातों से ध्यान हटाकर इधर-उधर की चीजों में भटक जाते हैं। एक दिन कार्ल इस वजह से किसी दूर दराज की जगह की तरफ निकल गए कि वहां उनको पेट्रोल सस्ता मिल जाएगा। रास्ते में उन्होंने हिसाब लगाया कि जितने पैसे वो बचा रहे हैं आने जाने में उतने का पेट्रोल लग जाएगा। यानि कुल बचत न के बराबर होगी। इसमें समय की बर्बादी होगी सो अलग। अगर वो पहले ही ये सोच लेते तो इतनी लंबी ड्राइव पर क्यों आते? इस बात से हमें ये समझ आता है कि ऊपरी तौर पर अच्छे और सस्ते नजर आने वाले प्लान भी फ्लॉप हो सकते हैं। पर इसके साथ आपको ये समझने की जरूरत भी है कि परिस्थितियां कभी भी पूरी तरह से आपके हाथ में नहीं हो सकतीं। आपने अपने बच्चे को हार्वर्ड में पढ़ने भेजा। पढ़ाई पर बहुत खर्च किया। लेकिन वो आगे चलकर किसी स्कूल में एक मामूली सैलरी पर टीचिंग करने का फैसला भी ले सकता है। आपके लिए ये लॉस है पर आपके बच्चे को इसमें ही अपना फायदा दिखता है। जब आप उसकी पढ़ाई पर इन्वेस्ट कर रहे थे तब आपने ऐसी उम्मीद नहीं की थी। यानि आने वाला कल हमारे लिए बहुत से सरप्राइज ला सकता है। बेहतर यही है कि उनके लिए आप पहले से तैयार रहें।
अपने परिवार और दोस्तों से पैसों की बातें करना थोड़ा अजीब लगता है पर ये बहुत जरूरी मुद्दा है।
बहुत से लोग खुलकर अपने घर और दोस्तों के बीच पैसों की बातचीत नहीं करते। हर किसी की परिस्थिति अलग होती है। किसी की आमदनी कम है तो किसी की ज्यादा। इन सबकी वजह से कभी-कभार ये बातें कड़वाहट ला सकती हैं। लेकिन अगर आप सही फाइनेंशियल डिसीजन लेना चाहते हैं तो इस टॉपिक को बातचीत का हिस्सा बनाना ही होगा। कोई गलतफहमी न हो इसके लिए अपने शब्दों का चुनाव ध्यान से करें। कार्ल अपने जीवन में घटी ऐसी एक घटना बताते हैं। कार्ल और उनकी पत्नी अपने एक दोस्त से बातचीत कर रहे थे जिसने हाल ही में अपने किचन को रीनोवेट कराया था। जैसे-जैसे वो इसमें हुए काम के बारे में बताता गया कार्ल के दिमाग में खर्च की रकम घूमने लगी। दोस्त के जाने के बाद उन्होंने अपनी पत्नी से कहा कि उनके लिए अपने किचन को रीनोवेट करना नामुमकिन है। पत्नी ये सुनकर हैरान थी क्योंकि वो तो अपने किचन की बात ही नहीं कर रही थी। अगर पति-पत्नी ही इस तरह की बातचीत करके कन्फ्यूज होने लग जाते हैं तो भला बच्चों को ये सब इतनी आसानी से कैसे समझ आएगा? पर आपको परेशान होने की जरूरत बिल्कुल नहीं है। कार्ल अपने जीवन से ही एक और उदाहरण आपके सामने रखते हैं। उनकी कोई दोस्त अपने बच्चों के साथ पैसों को लेकर हर बात शेयर करती थी। जब कभी बच्चे कुछ ऐसी चीज खरीदने को बोलते जो उसकी जेब से बाहर होती तो वो साफ कह देती कि हम इसे अफोर्ड नहीं कर सकते। ये तरकीब सचमुच काम कर गई। एक दिन उनके 14 साल के बेटे ने पूछा कि वो अपने परिवार को गरीबी के मामले में एक से दस के पैमाने पर कितने नंबर देंगी? वो बच्चा अपने परिवार की हालत से उदास नहीं था बल्कि उसे सुधारने की सोचता था। इसका सार ये निकलता है कि भले ही आपको हिचकिचाहट होती हो पर अपने परिवार और दोस्तों के साथ पैसों के बारे में बात करना फायदेमंद साबित हो सकता है। इन बातों को घुमा फिराकर करने की जगह जितना साफ-साफ कह दें उतना अच्छा है।
फाइनेंशियल चॉइस जितनी हो सके उतनी सिम्पल रखें। आपने सुना होगा सिम्प्लिसिटी सबसे बड़ा स्टाइल है। आपके फाइनेंशियल मैटर्स पर भी ये बात लागू होती है। आपका पोर्टफोलियो जितना सरल होगा आपकी राह उतनी आसान होगी। ज्यादा टेढ़े-मेढ़े रास्ते अक्सर भटका देते हैं। लाखों लोग वजन घटाने के लिए कुल मिलाकर हर साल 40 बिलियन डॉलर तक खर्च कर देते हैं। बहुत से प्रोग्रामों में भाग लेते हैं। तरह-तरह के डाइट प्लान और प्रोडक्ट्स खरीदते हैं। भले ही कैलोरी इनटेक कम रखने और कसरत जैसे सेल्फ हेल्प तरीके इन सबसे ज्यादा कारगर होते हों। इसके बावजूद उनको कोई खास नतीजे नहीं मिलते। अगर उनको फायदा होने लगता तो ये इंडस्ट्री $ 40 बिलियन तक कैसे पहुंचती। यहां सादगी का महत्व समझ आता है। ढेर सारे चोंचलों में पड़ने और पैसे बर्बाद करने की जगह अपनी लाइफस्टाइल सुधार लीजिए। हो सके तो रोज सुबह थोड़ी देर सैर या दौड़ लगा लीजिए। इतने से ही आपको बदलाव दिखने लगेगा। ये नियम आपकी फाइनेंशियल प्लानिंग में भी मददगार साबित हो सकता है। हर जगह पैसे इन्वेस्ट न करें। एसेट एलोकेशन जरूरी है पर ऐसा भी न हो कि आप इतनी वेरायटी जमा कर लें कि उस पर सही तरह से ध्यान ही न दे पाएं। अपने खर्चों पर नजर रखें। हर महीने इसको रिव्यू करें। देखें कि किस जगह बचत की गुंजाइश थी। हर नई चीज खरीद लेना न तो जरूरी नहीं है और न ही समझदारी। इस तरह आप धीरे-धीरे बचत की ओर बढ़ने लगते हैं। थोड़े समय का लालच बाद के पछतावे की वजह बनता है। इसलिए कल के बारे में सोचकर चलें। 1950 में स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी ने एक दशक तक चलने वाली स्टडी शुरू की। इसमें देखा गया कि लोग अपनी खुशियों और संतुष्टि के लिए कितना इंतजार कर सकते हैं। इस स्टडी में ये पाया गया कि जिन लोगों ने धैर्य से काम लेते हुए लंबे समय तक इंतजार किया वो ज्यादा सफल हुए। जबकि ऐसे लोग जो जल्द से जल्द सब कुछ पाने का लालच रखते थे उनकी सफलता और खुशियों की उम्र बहुत छोटी रही।
इसलिए आप कभी भी शॉर्ट टर्म गेन के चक्कर में न पड़ें। Slow and steady के नियम का पालन करें। इससे आप बड़े नुकसान से बचेंगे और आपकी फाइनेंशियल सिक्योरिटी मजबूत बनेगी। ये तरीका सुनने में बोरिंग लगता है। पर यहां बोरिंग बने रहना ही अच्छा है। जितना कमाते हैं उससे कम खर्च करें। थोड़े पैसों की बचत करें। सबसे पहले अपने कर्ज चुका दें। पैसों को लेकर यही बोरिंग रवैया आने वाले कल को फैंसी बना सकता है। वरना earn and burn के नुकसान हम सबने देखे हैं। कार्ल की मुलाकात एक बार ऐसे इंसान से हुई जिसने विरासत में मिली छोटी सी रकम को कई गुना बढ़ा दिया था। कार्ल ने जब इसका राज़ पूछा तो उसका जवाब था "इसके पीछे कोई राज़ नहीं है। मैंने बस कोई भी फालतू की चीज नहीं खरीदी और बोरिंग तरीके अपनाए।"
कुल मिलाकर
कभी-कभी हम इस उलझन में पड़ जाते हैं कि हमारे लिए सही क्या है और गलत क्या है। यही बिहेवियर गैप है। इस वजह से हमारे डिसीजन गड़बड़ाने लगते हैं। फाइनेंशियल लेवल पर भी ये गैप हमारा बहुत नुकसान कर सकता है। इसके लिए जरूरी है कि हम सोच समझकर फैसले करें। एक अच्छा इन्वेस्टमेंट वही होता है जो अपने फाइनेंशियल गोल और जरूरतों को ध्यान में रखकर लिया जाए। अपने पोर्टफोलियो को जितना हो सके उतना सिम्पल रखें और जो भी नतीजा मिले उसकी जिम्मेदारी लें।
क्या करें
हर महीने अपने फाइनेंशियल गोल का रिव्यू करें और देखें कि आपके इन्वेस्टमेंट इस पर खरे उतरते हों। इस तरह गल्ती होने की संभावना कम हो जाती है। मान लीजिए कि आप ये तय करने की कोशिश कर रहे हैं कि अपने पैसे बचत खाते में रखें स्टॉक में निवेश कर दें। अगर कुछ समय बाद आपको एक मोटरसाइकिल खरीदनी है तो बैंक में पैसे रखना ज्यादा अच्छा रहेगा। क्योंकि ये स्टॉक मार्केट की तरह अनस्टेबल भी नहीं है और यहां से पैसे निकालना भी आसान है। लेकिन आपका गोल है कि अपने बच्चों के कॉलेज की पढ़ाई के लिए बचत करें और आपको अगले 15-20 साल तक उस पैसे की जरूरत नहीं है तो स्टॉक मार्केट ज्यादा अच्छा रहेगा। क्योंकि इसमें आपको बैंक से ज्यादा रिटर्न मिलेगा।
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