Yuval Noah Harari
इंसानियत का इतिहास, संक्षेप में।
दो लफ्जों में
सैपियन्स (Sapiens) में हम देखेंगे कि इंसान किस तरह से जंगलों से निकल कर आज शहरों तक आ गया है। यह किताब हमें होमो सैपियन्स के पैदा होने से लेकर अब तक के सफर के बारे में बताती है कि किस तरह से हमने विज्ञान की मदद से इतने सारे कारनामे किए और आगे हम किस तरह के कारनामे करने वाले हैं।
यह किसके लिए है
-वे जो इंसानों की अब तक की कहानी जानना चाहते हैं।
-वे जो इवोल्यूशन पढ़ना पसंद करते हैं।
-वे जो होमो सैपियन्स के विकास करने के सफर के बारे में जानना चाहते हैं।
लेखक के बारे में
यूवाल नोह हरारी ( Yuval Noah Harari ) एक लेखक की तरह दुनिया भर में जाने जाते हैं। उनकी किताब सैपियन्स और होमो ड्युस बेस्ट सेलर किताबें हैं। वे आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में इतिहास के प्रोफेसर हैं।
यह किताब आपको क्यों पढ़नी चाहिए?
क्या आप ने कभी सोचा है कि किस तरह से इंसान यहाँ पर आए थे? क्या वाकई भगवान ने उन्हें बनाया है? बहुत से लोग इस सवाल से जूझते रहते हैं। वे हर वक्त यह जानने की कोशिश करते हैं कि हम जिस टेक्नोलॉजी की मदद से चाँद पर जा पहुंचे, वो आखिर शुरू कहाँ से हुई थी। वो कौन था जिसने पैसे की या फिर धर्म की खोज की थी? अगर आप भी हैं जो इस तरह के सवालों से जूझ रहे हैं, तो आपकी तलाश अब खत्म होने वाली है।
यह किताब हमें इंसानों के उस अनोखे सफर के बारे में बताती है जो हम पिछले तीन लाख सालों से करते आ रहे हैं। यह किताब शुरू होती है जंगलों में इंसानों के शिकार करने से और हमें इंसानों के भविष्य तक लेकर जाती है।
-बात कर पाना किस तरह से इंसानों के लिए बहुत फायदे की बात साबित हुई।
-लोगों का विश्वास समय के साथ भगवान पर से क्यों उठने लगा।
-इंसानों का भविष्य कैसा होगा।
होमो सैपियन्स धरती पर आने वाले पहले नहीं थे, लेकिन आज ये सबसे आगे हैं।
अगर हम अपने आस पास देखें तो हमें एक बात साफ समझ में आती है कि हम पूरी धरती पर राज कर रहे हैं। इसके अलावा हम स्पेस में भी जा पहुंचे हैं और वहाँ पर भी घर बनाने के बारे में सोच रहे हैं। लेकिन सवाल यह उठता है कि हमने इतना सब किया कैसे?
आज के इंसानों की प्रजाती को होमो सैपियन्स कहा जाता है। लेकिन इंसान पिछले 25 लाख साल से इस धरती पर हैं। इनका जन्म बहुत पुराने बंदरों से हुआ था जिसका नाम आस्ट्रालोपिथेकस था। इससे निकलने वाले पहले इंसान होमो रुडोल्फेंसिस और होमो इरेक्टस थे जो ईस्ट एफ्रिका में रहा करते थे। लेकिन बाद में ये ईस्ट एफ्रिका को छोड़कर दूसरी जगह पर रहने के लिए चले गए क्योंकि वहाँ का वातावरण इनके लिए ठीक नहीं था।
होमो सैपियन्स इस धरती पर 3 लाख साल पहले आए। ये भी बाकी के इंसानों की प्रजाति की तरह दो पैरों पर चल सकते थे और झुंड में रहा करते थे। इनके पास भी दिमाग को इस्तेमाल कर सकने की क्षमता थी। आग की खोज इनके आने से पहले की जा चुकी थी, जो कि निएनडर्थलों ने की थी।
अब सवाल यह उठता है कि जब ये लोग भी बाकी के लोगों की तरह ही थे, तो सिर्फ यही जिन्दा क्यों बचे। इसे समझाने के लिए हमारे पास दो थियोरी है - इंटरब्रीडिंग थियोरी और रीप्लेसपेंम थियोरी।
इंटरब्रीडिंग थियोरी कहती है कि होमो सैपियन्स बाकी के इंसानों के साथ , जैसे निएनडर्थलों के साथ, मेटिंग करने लगे और इस तरह से वे दो प्रजातियां एक में मिल गई। इसका हमारे पास सबूत भी है। यूरोप के लोगों के डीएनए का 1% से 4% भाग निएनडर्थलों के डीएनए से मिलता है।
रीप्लेसपेंम थियोरी के हिसाब से होमो सैपियन्स कुछ ज्यादा समझदार थे और उन लोगों ने बाकी की प्रजातियों को गायब होने पर मजबूर कर लिया। वे या तो उनका खाना छी लिया करते थे या फिर उन्हें ही खा जाया करते थे, या मार दिया करते थे। उस तरह से बाकी की प्रजातियां मर गई।
दोनों ही थियोरी सही मानी जाती है। ऐसा कहा जाता है कि होमो सैपियन्स उन्हें मार भी दिया करते थे और उनसे मेटिंग भी किया करते थे।
सोचने समझने की क्षमता को इस्तेमाल कर के होमो सैपियन्स पूरी धरती पर फैलने लगे।
तो हमने देखा कि होमो सैपियन्स ने बाकी की प्रजातियों को किस तरह से गायब होने पर मजबूर किया। लेकिन वे ऐसा कैसे कर पाए? इसका जवाब है काग्निटिव रेवोल्यूशन।
लगभग 70 हजार साल पहले होमो सैपियन्स के दिमाग में कुछ खास बदलाव आने लगे। इस बदलाव से वे अब कुछ ज्यादा समझदार हो गए। अब वे एक दूसरे से बात करने के काबिल हो गए थे जिससे उन्होंने बड़े झुंड बनाए और साथ मिलकर शिकार करने लगे। वे अब ज्यादा बेहतर हथियार बनाने लगे थे और उनके इस्तेमाल से वे जानवरों को आसानी से मार दिया करते थे।
इन सभी खूबियों की वजह से होमो सैपियन्स को खाना हमेशा मिल जाया करता था। वे किसी भी जानवर को खोजकर उनका शिकार कर लिया करते थे जबकि दूसरी प्रजातियां ऐसा नहीं कर पाती थी। जब वातावरण बिगड़ने लगा तो होमो सैपियन्स एक जगह को छोड़कर दूसरी जगह आराम से जा सकते थे और वहाँ पर जाकर रह सकते थे।
एक्साम्पल के लिए जब वे अमेरिका के लिए निकल रहे थे तो उन्हें रास्ते में बहुत ठंड भरी आर्कटिक रीजन से होकर जाना पड़ा। यहाँ पर वे बड़े बड़े जानवरों का शिकार कर के उनकी चमड़ी से कपड़े बनाने लगे और उसे पहनकर वे खुद को ठंड से बचाने लगे। इस तरह से उन्होंने अपना पेट भरा और खुद को गर्म रखा।
इसके बाद वे यूरोप, एशिया और आस्ट्रेलिया में भी जाकर रहने लगे और वहाँ के जानवरों का शिकार करने लगे। लेकिन उनके इस तरह से हर जगह जाने से बहुत से जानवर गायब होने लगे थे।
एक्साम्पल के लिए 50 हजार साल पहले आस्ट्रेलिया के ग्राउंड स्लाथ 20 फुट लम्बे हुआ करते थे, लेकिन इंसानों के आने के कुछ हजार साल बाद वे गायब हो गए।
एक दूसरे से बात करने की क्षमता ने होमो सैपियन्स की जिन्दा रहने में बहुत मदद की।
होमो सैपियन्स के लिए भाषा का इस्तेमाल करना सबसे फायदेमंद साबित हुआ। इससे उन्हें एक झुंड में मिल जुलकर साथ काम करने की ताकत मिली जिनसे कि वे बहुत आगे तक जा सके।
एक्साम्पल के लिए , जब वे एक दूसरे से बात करने लगे तो वे अपने शिकार करने के तरीकों को एक दूसरे को बताने लगे। इस तरह से वे जानकारी का लेन देन करने लगे और बहुत सारे दिमाग एक साथ आकर मिल गए। इसके अलावा, वे अपने बच्चों को यह सिखा पाते थे, जिससे उनके बच्चों को अपने पिता के जिन्दगी भर का अनुभव सिर्फ कुछ सालों में मिल जाता और वे उसके आगे के अनुभव को लेना शुरू करने लगे।
अगर किसी एक को यह पता लग जाए कि खाना कहाँ पर रखा है, तो वो बाकी सभी को बता सकता था और अगर किसी एक को पता लग जाए कि कोई खतरनाक जानवर कहाँ पर छिपता है, तो वो बाकियों को बता कर उनकी जान बचा लेता था। इस तरह से वे बहुत सुरक्षित रहने लगे।
इसके अलावा वे खुद को बहुत बड़े झुंड में रख सकते थे और उनके साथ अच्छे रिश्ते बनाकर साथ काम कर पाते थे। ऐसा इसलिए क्योंकि वे एक दूसरे से बात कर पाते थे और तेजी से वे एक दूसरे को अच्छे से समझ पाते थे। उन्होंने बहुत से रीति रिवाज और धर्म बनाए। उन्होंने भगवान बनाए। इन सभी बातों को मानने वाले लोग एक झुंड का हिस्सा बन जाते थे। इस तरह से उनमें बहुत सी बातें मिलने लगती थी। इसका मतलब रीता रिवाजों के इसी अंधविश्वास ने हमें आज तक जिन्दा रखा है क्योंकि ये हमें जोड़कर रखते थे।
इसके अलावा बहुत से जानवर हैं जो झुंड में रहा करते हैं जैसे कि मधुमक्खियां। लेकिन वे बदलते माहौल के साथ खुद को ढ़ाल नहीं पाती और ना ही किसी मौके का फायदा उठा पाती हैं। बंदर भी साथ रहा करते हैं, लेकिन क्योंकि वे एक दूसरे से अच्छे से बात नहीं कर पाते, वे बड़े झुंड नहीं बना पाते और इस तरह से होमो सैपियन्स के मुकाबले पीछे हैं।
सिर्फ होमो सैपियन्स ही ऐसे हैं जो खुद को गाँव, शहर, राज्य या देश जितने बड़े ग्रुप में बाँधकर रख सकते हैं और उसका फायदा आज हमें देखने को मिल रहा है।
होमो सैपियन्स ने जब खेती करना सीखा, तो उनकी जनसंख्या बहुत तेजी से बढ़ने लगी।
काफी समय से होमो सैपियन्स सिर्फ शिकार कर के खाना खाया करते थे। लेकिन जब उन्होंने खेती करने का तरीका सीखा तो वे किसान बन गए और उन्होंने शिकार करना कम कर दिया। साथ ही वे जानवर भी पालने लगे। लेकिन उन्होंने ऐसा क्यों किया, यह जानना मुश्किल है।
सबसे पहले तो शिकार करने के बहुत से फायदे थे। खेती करना एक मुश्किल काम था। एक किसान को अपने खेत में पूरा दिन काम करना होता था और फसल उगाने में कुछ महीनों का समय लगता था। दूसरी तरफ शिकार करना सिर्फ कुछ घंटों का काम था।
शिकार कर के वे अलग अलग जानवरों को खा सकते थे। उनके पास बहुत से आप्शन थे। लेकिन खेती करने पर वे सिर्फ कुछ फसल ही उगा पाते थे। इसके अलावा वे जो फसल उगाया करते थे, उन्हें पचाने में उन्हें परेशानी होती थी। गेहूँ जैसी चीज़ें हम अच्छे से पचा नहीं पाते थे और इसमें इतना ज्यादा पोषण भी नहीं था। दूसरी तरफ मछलियाँ, फल और दूसरे जानवरों में बहुत प्रोटीन मिलता था।
सवाल यह उठता है कि जब शिकार करने के इतने फायदे थे , तो होमो सैपियन्स ने शिकार करना छोड़कर खेती करना क्यों शुरू कर दिया? इसके दो जवाब हो सकते हैं।
सबसे पहला यह कि खेती करने की मानसिकता बहुत धीरे धीरे हमारे दिमाग में उतर रही थी और हर पीढ़ी के साथ यह हमारे दिमाग में कुछ ज्यादा अच्छे से बैठ जाती थी। जब तक लोगों को खेती करने के नुकसान और शिकार करने के फायदों के बारे में पता लगा, तब तक वे खेती करने के आदि हो गए थे।
दूसरा यह कि खेती करने का एक बहुत बड़ा फायदा था। इससे एक छोटी सी जमीन में एक किसान अपने खाने भर के लिए बहुत सारा अनाज उगा सकता था। इससे उसे साल भर खाने की खोज नहीं करनी पड़ती थी।
जब खाना पर्याप्त मात्रा में मिलने लगा, तो जनसंख्या बहुत तेजी से बढ़ने लगी। फिर से इससे एक समस्या पैदा हुई। अब बढ़ती जनसंख्या के लिए खाना कहाँ से लाया जाए?
व्यापार करने के लिए होमो सैपियन्स ने पैसे की और लिखने की खोज की।
जनसंख्या तेजी से बढ़ रही थी और लोगों को लगने लगा कि अब उन्हें इससे निपटने के लिए कुछ करना होगा। इसलिए होमो सैपियन्स ने व्यापार करने के तरीके बनाए और लेन देन करना शुरू किया। पहले के वक्त में अगर किसी के पास खाने की कमी होती थी तो वो अपने झुंड के किसी व्यक्ति से जाकर माँग लेता था और अगर भविष्य में उसे कभी खाने की जरूरत पड़ती थी तो वो भी किसी से माँग लिया करता था।
जब खेती करने से वे बहुत अनाज उगाने लगे और अब उन्हें शिकार करने की या फिर किसी से कुछ माँगने की जरूरत नहीं पड़ती थी, तो कुछ लोग खेती करने के अलावा कुछ अलग तरह के काम करने लगे, जैसे कि हथियार बनाना या कपड़े बुनना। जो लोग खेती नहीं करते थे, वे इन चीजों के बदले में कुछ अनाज किसानों से माँग लिया करते थे। जब यह काम बड़े पैमाने पर होने लगा तो बार्टर सिस्टम पैदा हुआ।
बार्टर सिस्टम का मतलब सामान के बदले सामान का सौदा। अगर आपको अनाज चाहिए और आपके पास हथियार हैं और एक व्यक्ति को हथियार चाहिए और उसके पास बहुत सारा अनाज है तो आप उसे अपने हथियार देकर उससे अनाज ले लेते। लेकिन समय के साथ इस सिस्टम में बहुत सी कमियां पैदा होने लगी।
इसके लिए सबसे पहले आपको किसी ऐसे व्यक्ति को खोजना होता जो कि वही खरीदना चाहता था जो आप बेचना चाहते थे और आप वही खरीदना चाहते हों जो वो बेचना चाहता हो। इस तरह से लोगों को अपना पर्फेक्ट मैच खोजने में परेशानी होने लगी। अगर कोई व्यक्ति यह वादा करता था कि आप अगर आज उसे अपना अनाज दे दें तो वो बाद में आपको चाकू दे देगा, तो क्या भरोसा है कि वो अपना वादा निभाएगा? यहाँ से पैसे का जन्म हुआ जो कि आज तक चलता आ रहा है।
लगभग 3000 बीसी में होमो सैपियन्स ने लिखना सीखा और उन्होंने पैसे बनाए। ऐसा करने वाले पहले लोग सुमेरिया और मेसोपोटामिया के थे। जब उन्हें अपने व्यापार से संबंधित जानकारी को याद रखने की जरूरत महसूस हुई और उन्हें लगने लगा कि इतनी सारी बातें वे अपने दिमाग में नहीं रख सकते, तो उन्होंने इसे कहीं और रखने की कोशिश की।
वे कुछ आसान से सिम्बल का इस्तेमाल कर के यह सारे काम करने लगे। वे मिट्टी पर लिखा करते थे या फिर दीवारों पर। साथ ही उन्होंने पैसे बनाए जिसकी मदद से वे कुछ भी खरीद सकते थे। अगर उन्हें कपड़े चाहिए होते, तो वे बुनकर को पैसे देकर उससे वे ले लेते और बुनकर किसान को पैसे देकर अनाज ले लेता। अगर कोई व्यक्ति वादा करता कि वो बाद में उसकी कीमत चुका देगा तो उसका नाम लिख लिया जाता और जब तारीख नजदीक आती तो उससे वो सामान ले लिया जाता।
नियमों को लागू करने के लिए राज्य बनाए गए जहाँ पर रहने वाले एक नियम को मानते थे।
जब व्यापार बढ़ने लगा तो लोगों को जरूरत महसूस हुई कि वे सब अपने अलग अलग नियमों पर काम नहीं कर सकते। साथ ही उन्हें कुछ खास नियम चाहिए थे जिनसे वे अपने आप को रोज के झगड़े से बचा सकें और अगर झगड़ा हो तो उसे सुलझा सकें। यहाँ से सरकारें बनना शुरू हुई।
नियम बनाए गए और उन सभी नियमों को लागू काया गया। लोग नियमों के हिसाब से काम करते रहें, यह देखने के लिए एक व्यक्ति को राजा बनाया गया जो कि लोगों के बीच की समस्या को सुलझा सके।
1776 बीसी में हम्मुराबी नाम के व्यक्ति ने बेबीलॅान शहर में नियम बनाए जिसे हम्मुराबी कोड के नाम से जाना जाने लगा। इन नियमों को पूरे बेबीलॅान शहर में लागू किया गया। क्या किया जाना चाहिए, क्या नहीं किया जाना चाहिए, बार्डर के क्या नियम है, व्यापार के क्या नियम है, यह सब कुछ हम्मुराबी कोड में लिखा गया। लेकिन सवाल यह उठता है - लोग इन नियमों को मानेंगे क्यों?
इसके लिए धर्म को लाया गया। जब लोगों को लगता था कि भगवान ने किसी व्यक्ति को उनपर राज कर के उन्हें सही रास्ता दिखाने के लिए भेजा है, तो वे उसकी बात आसानी से मान लिया करते थे। इसके लिए हम्मुराबी ने कहा वो भगवानों द्वारा उनपर राज करने के लिए चुना गया है और इस तरह से मेसोपोटामिया के लोग उसकी बात मानने लगे।
जब साम्राज्य बढ़ने लगे तो उसके साथ ही धर्म की ताकत भी बढ़ने लगी। लोग भगवान के नाम पर डर जाया करते थे और राजाओं की बात मान लिया करते थे। यह सुनने में कुछ अजीब लगता है लेकिन इसी अजीब चीज़ ने उन दिनों समाज में सुख शांति बनाकर रखा था। लोग इससे मिलजुलकर रहने लगे और अच्छे से काम करने लगे।
समय के साथ लोग भगवान को छोड़कर खुद पर निर्भर रहने लगे।
पहले के वक्त के होमो सैपियन्स खुद पर भरोसा नहीं करते थे। उन्हें लगता था कि उनके हाथ में कुछ भी नहीं है और जो कुछ भी हो रहा है वो भगवान के भरोसे हो रहा है। उन्हें नहीं लगता था कि वे कुछ कर सकते थे, इसलिए वे कुछ करते भी नहीं थे। वे सिर्फ बैठकर इंतजार करते थे।
लेकिन 16वीं और 17वीं शताब्दी में हालात बदल गए। कुछ लोगों ने साइंस की मदद से अलग अलग तरह की खोज की और यह कर दिखाया कि सब कुछ भगवान के हाथ में नहीं हैं। यहाँ से लोगों को यह एहसास होने लगा कि वे खुद के लिए कुछ कर सकते हैं और यहां से टेक्नोलॉजी का विकास होने लगा।
एक्साम्पल के लिए चाइल्ड मार्टैलिटी रेट को ले लीजिए।बहुत से बच्चे अपना पहला जन्मदिन मनाने से पहले मर जाया करते थे। लेकिन जब अलग अलग तरह की दवाइयों की खोज की जाने लगी, तो इससे चाइल्ड मार्टैलिटी रेट में काफी सुधार हुआ। इसके बाद 1000 में से सिर्फ एक का ही बच्चा एक साल के अंदर मरता था।
धीरे धीरे वे लोग खुद को बेहतर बनाने के लिए अलग अलग तरह के तरीके अपनाने लगे। बहुत सी सरकारें अपने लोगों को बाहर जाकर दुनिया के बारे में जानने के लिए कहती थी और वे इसके लिए उन्हें बहुत पैसा दिया करती थी। इसके अच्छे एक्साम्पल हैं - क्रिस्टोफर कोलंबस।
लोगों का मानना था कि दुनिया चपटी है, लेकिन कुछ लोगों को समुद्र पार करने की बहुत जिज्ञासा थी। ऐसे में कोलंबस को कैस्टील के राजा ने बहुत पैसे दिए ताकि वो जाकर यह पता लगा सकें कि समुद्र के उस पार क्या है। जब कोलंबस ने अमेरिका की खोज की, तो वहाँ से उन्हें बहुत फायदा कमाने की मिला। इस तरह से उनकी एकोनामी सुधरने लगी।
इसी तरह से ब्रिटिश सरकार ने जेम्स कुक को दक्षिणी पैसिफिक समुद्र में जाकर पता लगाने के लिए कहा कि उसके उस पार क्या है। यहाँ पर आस्ट्रेलिया और न्यू ज़िलैंड की खोज हुई। उन्हें भी इससे बहुत फायदा कमाने को मिला।
समय के साथ लोग पैसों की ताकत को समझने लगे और भगवान की ताकत पर से उनका भरोसा उठने लगा।
जब इंसानों को लगने लगा कि वे अपनी जिन्दगी में होने वाली बहुत सी चीज़ों को काबू कर सकते हैं और विज्ञान की मदद से इस दुनिया को समझ सकते हैं, तो उन्होंने भगवान पर भरोसा करना कम कर दिया। यह यूरोप के लोगों की देन थी क्योंकि वे ही थे जो सबसे पहले पूरी दुनिया पर राज करने निकले थे और उन्होंने अपनी सभ्यता को हर जगह फैला दिया। हम आज भी उनकी सभ्यता के हिसाब से जीते हैं।
यूरोप के लोगों ने अपने कायदे कानून और अपने जैसी सरकार को हर जगह पर लागू करना शुरू किया। इसमें उनका सबसे बड़ा योगदान था पूंजीवाद, यानी की पैसे की ताकत को समझना और उसका इस्तेमाल करना। वे पहले थे जिन्होंने पैसे से अपनी जिन्दगी को आसान बनाने की कोशिश की और आज पूरी दुनिया लगभग पैसे के पीछे ही भाग रही है।
इसके पहले लोगों का मानना था कि मरने के बाद उन्हें स्वर्ग मिलेगा, अगर वे अच्छे काम करेंगे तो। उनका मानना था कि उन्हें यह पर किसी तरह के एक्साम के लिए भेजा गया है और जो ज्यादा से ज्यादा अच्छे काम कर के जितने ज्यादा नंबर लाएगा, वो पास हो जाएगा। लेकिन बाद में लोग पैसों की मदद से धरती पर ही स्वर्ग को लाने लगे। तरह तरह की चीजें उनके लिए आराम का काम करने लगी और उन्होंने खुद काम करना कम कर दिया।
विज्ञान ने धर्म से संबंधित बहुत सी बातों को गलत साबित कर दिया है। अब लोगों का मानना है कि धरती का जन्म बिग बैंग थियोरी के हिसाब से हुआ और यहां पर जिन्दगी डार्विन्स थियोरी आफ इवोल्यूशन के हिसाब से पैदा हुई। जैसे जैसे लोगों का विश्वास स्वर्ग पर से उठ रहा है, वैसे वैसे वे अपनी जिन्दगी को आरामदायक बनाने के लिए पैसे के पीछे भाग रहे हैं। इस तरह से पूंजीवाद फैला जा रहा है, जिसकी शुरुआत यूरोप के लोगों ने की थी।
ग्लोबलाइज़ेशन की वजह से आज की दुनिया में बहुत शांति है।
जब से इंसानों ने खेती करना सीखा , उस वक्त से वे एक दूसरे से लड़ते आ रहे हैं। दूसरे वर्ल्ड वार तक लगभग कहीं न कहीं हर वक्त युद्ध होता रहता था और एक ना एक देश खत्म होते रहते थे। शक्तिशाली देश कमजोर देशों को दुनिया के नक्शे से मिटा दिया करते थे। लेकिन 1945 के बाद से ऐसी एक भी घटना देखने को नहीं मिली है। आखिर यह कैसे हुआ ?
इसका एक सीधा सा जवाब है - ग्लोबलाइज़ेशन। आज के वक्त में हर देश किसी दूसरे देश पर किसी ना किसी चीज़ के लिए निर्भर रहता है। हर देश की कंपनी किसी दूसरे देश में जाकर व्यापार करती है जिससे दोनों देशों का फायदा हो रहा है। इसलिए दुनिया भर के लीडर आज ज्यादा से ज्यादा शांति बना कर रखने की कोशिश कर रहे हैं ताकि उनके देश का सारा काम अच्छे से होता रहे।
आज के वक्त में अगर किसी एक देश के हालात खराब होते हैं, तो उसका असर बहुत से दूसरे देशों पर पड़ता है। इसलिए हर देश दूसरे देशों की मदद करने के लिए तैयार है और इस तरह से युद्ध बहुत कम होने लगे हैं। 20वीं और 21वीं शताब्दी अब तक की सबसे शांति भरी शताब्दी रही है।
हालांकि बहुत से लोगों का मानना है कि ग्लोबलाइज़ेशन की वजह से बहुत सी सभ्यताएं खत्म हो रही हैं क्योंकि अब बहुत सी अलग अलग सभ्यताएं आपस में मिलने लगी हैं। लोग एक जगह पर रहते तो हैं, पर उनके विश्वास बहुत अलग अलग हैं। लेकिन इन सभी इल्जामों के बाद भी दुनिया में आज बहुत शांति है।
जब इंसान ने खेती करना सीखा था, उस वक्त लगभग 30% आदमी किसी तरह के हिंसा के शिकार हुआ करते थे। लेकिन आज के वक्त में यह घटकर 1% तक आ गई है। ऐसा इसलिए हो पाया क्योंकि आज हमने तरह तरह के कानून बनाए हैं और लोग उस कानून को मान रहे हैं। इसके अलावा हमें आज के वक्त में शांति बना कर रखने की बहुत ज्यादा जरूरत है, क्योंकि अगर आज युद्ध शुरू हुआ, तो यह दुनिया का अंत होगा।
होमो सैपियन्स ने बहुत तरक्की की, लेकिन उनकी खुशी पहले के मुकाबले कम हो गई है।
अब हम सबसे जरूरी सवाल पर ध्यान देते हैं। हमने इतनी सारी तरक्की की। जंगलों में जानवरों का शिकार करने और खतरनाक जानवरों से बचने से लेकर आज हम अपने फोन से खाना आर्डर करने और अपने बेड पर शांति से सोने तक आ गए हैं। लेकिन क्या इतनी सारी सुविधाओं से हमारी खुशी पर कुछ असर हुआ है? क्या हम पहले से ज्यादा खुश हैं?
इसका जवाब शायद नहीं है। अगर हम साइकोलाजिस्ट की मानें, तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि हमारी जिन्दगी में कितने बड़े बदलाव आते हैं, कुछ वक्त के बाद हमारी खुशी उसी लेवेल पर लौट आती है। एक एवरेज व्यक्ति की जिन्दगी में खुशी के मामले में कुछ खास सुधार नहीं हुआ है।
अगर आपके घर में किसी की मौत हो जाए, तो कुछ महीनों तक आपको लगेगा उनके ना होने की कमी आपको जिन्दगी भर तकलीफ देगी, लेकिन उसके बाद आप फिर से अपनी खुशी के लेवेल नर वापस आ जाएंगे। ठीक इसी तरह से अगर आपकी नई नई शादी हो जाए, तो कुछ वक्त तक आपको सब कुछ अच्छा लगेगा, लेकिन उसके बाद फिर से आप अपने लेवेल पर वापस आ जाएंगे। इसका मतलब हमने भले ही बहुत तरक्की कर ली हो, लेकिन हम पहले से ज्यादा खुश नहीं हैं।
लेकिन अगर हम पूरे समाज की बात करें, तो कुछ लोग हैं जो पहले से कुछ ज्यादा खुश हो चुके हैं। एक्साम्पल के लिए गोरे लोग, जो पहले के वक्त में बहुत सारे पैसे इकट्ठा कर के आज आगे बढ़ गए हैं, वे आज सबसे ज्यादा सुविधा में जी रहे हैं। लेकिन काले लोग या महिलाएं जिनके ऊपर पहले के वक्त से लोग राज करते आए हैं, वे अभी इनके मुकाबले बहुत पीछे हैं। लेकिन खुशी की बात यह है कि आज के वक्त में बहुत से लोगों को यह मौका मिल रहा है कि वे भी सबकी तरह हर मौके का फायदा उठा सकें। आज के हालात पहले से बेहतर हैं।
भविष्य में इंसान शायद खुद को मशीनों के साथ जोड़कर हमेशा के लिए अमर हो जाएंगे।
अब तक हमने देखा कि किस तरह से हमने अब तक का सफर तय किया। लेकिन अब हम क्या करेंगे? हमारी यह सभ्यता किस तरह से आगे बढ़ेगी? इसका जवाब शायद हमारे पास पहले से है।
आज के वक्त में हम कुछ ऐसी मशीनें बना रहे हैं जो कि हमारे शरीर के साथ जुड़कर काम कर सकें। एक्साम्पल के लिए आपने आर्टिफीशियल हर्ट के बारे में तो सुना ही होगा। इंसान का दिल अगर खराब हो जाए, तो उसके बदले में एक मशीन लगाई जा सकती है जो कि बिल्कुल उसी तरह से काम करेगी।
इसके अलावा हम हाथ पाँव भी बना रहे हैं जिसे कि हम अपने खयालों से काबू कर सकते हैं। जेस्सी सुलिवन नाम के एक एलेक्ट्रीशियन ने अपने दोनों हाथ एक एक्सिडेंट में खो दिए थे। इसके बाद उसे ऐसे हाथ लगाए गए जिसे वो अपने खयालों से काबू कर सकता है। इस तरह की टेक्नोलॉजी को बायोनिक टेक्नोलॉजी कहा जाता है। इंसान अब खुद को पूरी तरह से मशीनों से जोड़ रहा है।
इसके अलावा हम मौत का इलाज भी खोज रहे हैं। हम अपने जीन्स में कुछ बदलाव कर के उसमें से वो चीज़ निकाल रहे हैं जो कि हमें बूढ़ा बनाती है। इसे एंटि एजिंग टेक्नोलॉजी कहा जाता है। हम इस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल सी इलेगन वार्म्स ( C. elegans worms ) पर कर चुके हैं और हमने उनकी जिन्दगी को दोगुना लम्बा बना दिया है। चूहों पर भी इस एक्सपेरिंमेंट को कामयाब बनाने के हम काफी करीब हैं। लेकिन हम इसका टेस्ट इंसानों पर नहीं कर पा रहे हैं।
इसकी वजह है कि सरकार हमें इंसानों पर एक्सपेरिमेंट करने की इजाजत नहीं देती। ऐसा करना नैतिक नहीं माना जाता और यह अब तक की सबसे बड़ी, लेकिन सही रुकावट है। लेकिन यह रुकावट हमेशा के लिए नहीं रह सकती।
इन दो टेक्नोलॉजी की मदद से हम खुद को अमर बना सकते हैं। जब भी हमें यह करने का मौका मिलेगा, हम यह जरूर कर लेंगे। शायद आने वाले वक्त में हम आधे इंसान और आधे मशीन हो जाएंगे। इस समाज की एक झलक हमें एक हालिवुड मूवी - द घोस्ट इन अ शेल में देखने को मिल गई है।
कुल मिलाकर
होमो सैपियन्स पिछले तीन लाख सालों से इस धरती के सबसे समझदार जानवर रहे हैं। झुंड में रहना और बातचीत कर के एक दूसरे को जानकारी दे पाना उनके लिए सबसे फायदे की बात साबित हुई। इसी की मदद से वे बड़े ग्रुप्स में रहने लगे और समय के साथ उन्होंने व्यापार करना और टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करना शुरू किया। आने वाले वक्त में शायद इंसान खुद को रोबोट्स के साथ जोड़कर अमर हो जाए।
