Tom Standage
पहिए से हवाई जहाज तक का सफर
दो लफ्जों में
साल 2021 में आई ये किताब ऑटोमोबाइल सेक्टर के इतिहास और भविष्य की बात बताती है। पहिए से लेकर स्टीम इंजन और फिर ऑटोमेटेड कारों तक के मनमोहक सफर से गुजरते हुए आपको ये पता चलेगा कि इन गाड़ियों ने हमारे इतिहास पर क्या असर डाला और इस सफर में इनकी वजह से क्या मुश्किलें आईं?
ये किताब किनको पढ़नी चाहिए?
• जो लोग गाड़ियों में रुचि रखते हैं
• हर वो इंसान जो क्लाइमेट की चिंता करता है
• जो लोग ऑटोमोबाइल या ट्रांसपोर्ट सेक्टर में इन्वेस्ट करना चाहते हैं
लेखक के बारे में
टॉम स्टैंडेज साल 1998 से द इकोनॉमिस्ट के लिए लिखते आ रहे हैं। वे अब वहां डिप्टी डायरेक्टर का काम संभालते हैं। वो एक पॉप्युलर कमेंटेटर और जाने माने स्पीकर भी हैं जो अक्सर टेक्नॉलॉजी और सोशल ट्रेंड्स पर बोलते हैं। उन्होंने ए हिस्ट्री ऑफ द वर्ल्ड इन सिक्स ग्लासेस और एन एडिबल हिस्ट्री ऑफ ह्यूमैनिटी जैसी बहुत सी बेस्ट सेलिंग किताबें लिखी हैं।
पहिए का आविष्कार उस जमाने के राजाओं के लिए सुविधा और शान दोनों की बात थी।
जब कारों की बात आती है तो आपको लगता होगा कि इलेक्ट्रिक कार और रिन्यूएबल एनर्जी जैसे मुद्दे बहुत नए हैं। लेकिन सच ये है कि इस तरह की बहस तब से चल रही है जब पहली बार कारें बाजार में आई थीं। अब जाकर ये बहस उस जगह पर पहुंची है जहां बदलाव किए जा रहे हैं। हम में से ज्यादातर लोगों के लिए कारें इतनी पुरानी चीज हैं कि हम उनकी उस महत्वपूर्ण भूमिका को नजरअंदाज कर देते हैं जो उन्होंने हमारे कस्बों और शहरों को डिजाइन करने में निभाई थी। कारों का हमारे जीवन पर हर रोज प्रभाव पड़ता है। क्लाइमेट चेंज कहर बरपा रहा है और कोविड नाम की महामारी हमारी आदतों को बदल रही है। ऐसा लगता है कि हमें आखिरकार कारों की जरूरत पर दुबारा सोचने और इनसे दूरी बनाने का समय मिल गया है।
इस किताब को पढ़कर आप जानेंगे
• रथ किस तरह स्टेटस सिंबल होते थे
• शुरुआती दौर में इलेक्ट्रिक कारों का फोकस महिलाओं पर क्यों था
• स्मार्टफोन, ट्रांसपोर्ट सेक्टर का भविष्य क्यों बदल सकता है
तो चलिए शुरू करते हैं!
विज्ञान हमें बहुत से सवालों का जवाब देता आया है लेकिन इतिहास अभी भी अपने पास कुछ राज रखता है। उदाहरण के लिए हम उस आदमी का नाम नहीं जानते जिसने पहिये का आविष्कार किया। पहले माना जाता था कि पहिया मेसोपोटामिया के दौर से आया है जिसे अक्सर "सभ्यता का पालना" कहा जाता है और इसकी शुरुआत लगभग 3500 ईसा पूर्व में हुई। हालांकि कार्बन डेटिंग से पता चलता है कि पहिए का जन्म कार्पेथियन पहाड़ों जैसे कि पश्चिमी यूक्रेन में हो सकता है। यूक्रेन में मिट्टी की एक आकृति मिली जिसमें चार पहियों पर एक बैल बना हुआ था। ये 3950 से 3650 ईसा पूर्व के बीच बनाया गया था। इसके पास ही दक्षिणी पोलैंड में एक बर्तन मिला जिस पर चार पहिए वाली गाड़ी का चित्र बना हुआ था। ये 3630 - 3380 ईसा पूर्व का है। कार्पेथियन पहाड़ों पर तांबा पाया जाता था जिससे ब्रांज एज की शुरुआत हुई थी।
तांबे की माइनिंग कोई आसान काम नहीं था। इस वजह से ये बात आसानी से समझी जा सकती है कि दुनिया में पहिए वाले सबसे पहले वाहन वो रहे होंगे जिनको हाथ से चलाकर तांबे को खदानों से निकालने के लिए इस्तेमाल किया जाता था। यानि पहिए का चलन कार्पेथियन से होकर मेसोपोटामिया जैसे इलाकों में फैल गया। कम से कम वो थ्योरी तो यही कहती है जिसे इतिहासकार रिचर्ड बुलियट ने 2016 में लोगों तक पहुंचाने में मदद की। लेकिन पहिए रातों रात लोगों के जीवन का हिसासा बन गए हों ऐसा भी नहीं था। उस समय के टूल्स की मदद से इनको बनाना बिल्कुल आसान नहीं था। इसलिए पहियों का इस्तेमाल भी कम होता था। 3000 ईसा पूर्व तक दो पहिया गाड़ियों का इस्तेमाल किया जा रहा था। लेकिन 2000 ईसा पूर्व में आकर रथों की वजह से पहिए लोकप्रिय हो गए।
स्पोक वाले पहियों का आविष्कार उस दौर के तकनीकी विकास में एक बड़ी छलांग थी। इस तरह के पहिए बड़े, हल्के और तेज चलने वाले थे। इनको रथों में लगाया गया। हित्ती समुदाय ने इनको एक टूल की तरह काम में लिया। रथों से हथियार और बाकी चीजें एक जगह से दूसरी जगह ले जाई जातीं। लड़ाई में जा रहे रथों की भव्य सजावट की जाती और इस पर बैठने वाले राजाओं और वीर योद्धाओं को शक्तिशाली और भगवान की तरह दिखाकर बाकी जनता से ऊंचा दिखाया जाता। दरअसल मिस्र और हित्ती राजाओं की मृत्यु पर उनको रथों के साथ दफन करना आम बात थी। इस तरह पहिए उस दौर में एक स्टेटस सिंबल बन रहे थे।
रोमन सड़कों और नए आविष्कारों ने कोच और फिर ट्रेनों को चलन में लाने की राह बनाई।
चौथी सदी ईसा पूर्व तक रथ एक सैनिक वाहन के रूप में चलन से बाहर हो गया था लेकिन आने वाली सदियों में ये रोम में खेलकूद की प्रतियोगिताओं का जरूरी हिस्सा बना रहा। रथ चलाने में माहिर और बड़े रईस लोग उस दौर के सुपरस्टार एथलीट थे। पहिए के विकास के लिए रोमन वैगन और दो पहिया गाड़ियां पूरे रोम में माल लाने ले जाने का काम कर रही थीं। इस वजह से रोम में सड़कें बनीं। सड़कों के लिए नियम भी बने और सही तरह से शहर बसाने की प्लानिंग भी की गई जहां ट्रैफिक सिस्टम हो। पोम्पेई शहर में वन वे सड़कों का ग्रिड जैसा सिस्टम बनाया गया था जो आज के मैनहट्टन से बहुत अलग नहीं है। रोमन काल में एक और बड़ा बदलाव हुआ स्टीयरेबल अगले पहियों का विकास। इनकी वजह से चार पहिया गाड़ियों का इस्तेमाल और आसान बन गया। इससे ढके हुए वैगन, कोच और लंबी दूरी के स्टेजकोच बने।
सुनने में अजीब लग सकता है लेकिन लंबे समय तक गाड़ियों और पहिए से चलने वाले दूसरे वाहनों को महिलाओं की सवारी के तौर पर देखा जाता था। रोम में सीनेटर की पत्नियां इनकी सवारी करती थीं। ये चलन रोम तक ही सीमित नहीं था। मिडिल एरा में भी बड़े खानदानी रईस घोड़े या ऊंट की ही सवारी करते थे। लेकिन सोलहवीं शताब्दी तक कोच की लोकप्रियता बढ़ रही थी। कोचों में स्टीयरिंग और सस्पेंशन होता था जैसा पिछली सदी की गाड़ियों में होता था लेकिन वे हल्के थे और तेजी से चलते थे। इससे भी बढ़कर यूरोप में तुर्क साम्राज्य के खिलाफ लड़ाई में बड़ी गाड़ियों का इस्तेमाल किया जा रहा था। बहुत से वैगनों को एक साथ रखकर चलता फिरता किला बनाया जा सकता था और उनका इस्तेमाल तोपों को ले जाने और दागने के लिए किया जा सकता था। इस तरह पहिए वाले ट्रांसपोर्ट ने आखिरकार महिलाओं की सवारी होने के ठप्पे से मुक्ति पाई। इसके अलावा शाही सवारी के लिए कोचों को फैंसी तरीकों से सजाया जाने लगा था। लेकिन शायद ज्यादा बड़ी बात थी स्टेजकोच का विकास। ये कोचों की एक ऑर्गनाइज्ड व्यवस्था थी जिससे लोग लंबे सफर पर जा सकते थे। इनको स्टेज में बांटने की वजह से ये नाम पड़ा। सत्रहवीं सदी में स्टेजकोच ने लोकप्रियता हासिल की और कई मायनों में वे अगली बड़ी ट्रेनों के जन्मदाता बने।
लोग एक साफ-सुथरी और शांत सवारी को लेकर बड़े खुश थे।
आप कभी किसी बड़े शहर में रहे हैं तो आपको अच्छी तरह पता होगा कि वहां रहना कितना महंगा पड़ता है। अगर साल 1890 में न्यूयॉर्क या लंदन की बात करें तो उस वक्त सबसे बड़ा खर्चा घोड़ों की वजह से फैली गंदगी को साफ करने में आता था। अकेले लंदन में ही लगभग 300,000 घोड़े थे जो हर दिन लगभग 22 पाउंड वेस्ट निकालते थे। लोगों को शोर, तेज बदबू और सड़क पार करने जैसी बड़ी मुश्किलें होती थीं। बरसात के दिनों में सड़कें बिल्कुल नर्क बन जाती थीं जिनसे गंदगी न सिर्फ पूरे शहर बल्कि घरों और लोगों के ऊपर भी आ जाया करती थी। यानि हर कोई इस तकलीफ से छुटकारा चाहता था। आप सोचेंगे कि ट्रेनों के चलने से घोड़ों की जरूरत कम हो जानी चाहिए थी लेकिन इसने तो हालात को बदतर ही बनाया। ट्रेनों का मतलब बस इतना था कि अब पहले से कहीं ज्यादा सामान और लोगों को लाया ले जाया जा रहा था। यानि उन चीजों और लोगों को ट्रेन डिपो से उनके ठिकाने तक ले जाने के लिए और ज्यादा घोड़ों और गाड़ियों की जरूरत थी। न्यूयॉर्क शहर के सेवेंथ एवेन्यू स्ट्रीट रेलवे में 2,500 घोड़े थे जिनके लिए चार मंजिलों वाले अस्तबल की जरूरत थी। यानि ये सब बहुत मुश्किल होता जा रहा था।
लेकिन सवाल तो वही बना रहा। बिना घोड़े की गाड़ी कैसी दिखेगी और कैसे चलेगी? 1894 में फ्रांस में एक प्रतियोगिता हुई जिससे लोगों का ध्यान उस समय के कुछ अच्छे विकल्पों पर गया। ये पेरिस से रूएन तक 85 मील की सड़क दौड़ थी जिसमें आखिर स्टेज में 21 गाड़ियां पहुंचती थीं। सभी गाड़ियों में या तो स्टीम इंजन या पेट्रोल इंजन थे और उनमें से लगभग सभी को टिलर से चलाया गया था। सिर्फ एक ही गाड़ी थी जिसमें उसके मालिक ने स्टीयरिंग व्हील लगाने के लिए बदलाव किए थे। ये इवेंट बहुत कामयाब रहा। इसमें लोग कारों की वाहवाही कर रहे थे क्योंकि वे लगभग 10 मील प्रति घंटे की रफ्तार से धूल उड़ाती हुई गुजर रही थीं। हैरानी की बात ये है कि स्टीम इंजन वाली कार सबसे पहले रूएन पहुंची लेकिन जीत नहीं पाई। दौड़ का मकसद सिर्फ ये तय करना नहीं था कि कौन सी कार सबसे तेज थी। ये भी देखा जाना था कि कौन सी कार भरोसे और प्रेक्टिकल यूटिलिटी पर खरी उतरती है। भाप इंजन वाली कार पावरफुल थी और पहाड़ियों पर चढ़ने में तेज थी पर इसमें इंजन को लगातार चालू रखने के लिए ऑपरेटरों की एक टीम की जरूरत होती थी। इसलिए जर्मन इंजीनियर गोटलिब डेमलर के डिजाइन किए गए इंजन वाली कार को पहला पुरस्कार दिया गया। ये साफ था कि आने वाले साल में कौन सी गाड़ी जीतेगी।
जैसे जैसे कीमतें घटने लगीं लोग कारों की तरफ और आकर्षित होने लगे।
पेरिस-रूएन दौड़ के एक साल बाद हुई अगली प्रतियोगिता हर तरह से पहले से ज्यादा उम्मीदें जगा रही थी। ये दौड़ पेरिस से बोर्डो तक 730 मील की थी। इस बार एक कार ने 15 मील प्रति घंटे की औसत रफ्तार पकड़ ली थी जिसमें बहुत एडवांस डेमलर फीनिक्स इंजन लगा था। ये दूसरे नंबर पर आई कार प्यूजो से ग्यारह घंटे पहले ही बोर्डो पहुंच गई। हालांकि नियम के हिसाब से चार सीटों वाली गाड़ी ही भाग ले सकती थी जबकि डेमलर दो सीटों वाली गाड़ी थी। इसलिए उसे डिसक्वालीफाई कर दिया गया। लेकिन ये तय था कि अब पेट्रोल कारों का समय आ गया है। इन दौड़ों को लेकर लोगों में बहुत क्रेज था इस वजह से इनको खबरों में भी काफी जगह मिलती थी। इस तरह देश विदेश में लोग इन कारों से परिचित हो रहे थे और ऑटोमोबाइल सेक्टर में तेजी आ रही थी। लेकिन सड़कों पर कारों को मिला जुला रिएक्शन दिया गया। आज के हिसाब से देखा जाए तो शुरुआती दौर में कारें बिल्कुल तेज नहीं थीं। वे सड़कों पर चलते हुए बहुत धूल उड़ाती थीं। इसके अलावा ग्रामीण इलाके में लोगों की बहुत सी मुर्गियां और छोटे पालतू जानवर इनकी चपेट में आ जाते थे। इतना ही नहीं बच्चों की जान भी चली जाती थी। इस तरह शुरुआत में तो लोग इन कारों को अपना दुश्मन ही समझने लगे थे।
उस समय एक पॉप्युलर किताब आई थी द विंड इन द विलो। इसमें मिस्टर टॉड नाम का एक कैरेक्टर दिखाया गया जो ऑटोमोबाइल फ्रीक था। वो हमेशा अपनी कारों का एक्सीडेंट करता रहता था और उसके पड़ोसी उसकी लापरवाह ड्राइविंग से डरे रहते थे। आप में से काफी लोगों ने अपने आस पास ऐसे लोगों को देखा भी होगा। ऑटोमोबाइल से दूरी रखने की एक वजह ये भी थी कि शुरुआत में ये काफी महंगे थे। लोग उनको महंगे और जानलेवा खिलौनों की तरह समझते थे जिसे केवल अमीर लोग ही खरीद सकते थे। जब फोर्ड कारों का फेमस मॉडल टी आया तब कीमतों में कमी आने लगी और लोगों का नजरिया बदलना शुरू हुआ। इसकी वजह थी प्रोडक्शन का नया असेंबली लाइन तरीका। अब कार बनाने की लागत कम हो गई थी और अलग-अलग सेक्शन में काम के लिए अलग लोग लगाए गए थे। फोर्ड कारों ने बिक्री का रिकॉर्ड बना दिया था और अब उनको $ 850 जितनी कम कीमत पर बेचा जा सकता था जबकि इससे पहले एक अमेरिकी कार लगभग 2,834 डॉलर में बिकी थी। आज के हिसाब से ये कीमत लगभग 80,000 डॉलर होगी। टी नाम का ये मॉडल साल 1908 में बाजार में उतरा और तुरंत हिट हो गया। पहली बार एक आम आदमी कार खरीद पा रहा था। इस कार के विज्ञापनों में किसी फैंसी रेस्तरां के सामने खड़ी या ड्राइवर वाली कार नहीं दिखाई जाती थी। ये आम जनता की कार थी जिसे बड़े पैमाने पर बनाया जा रहा था। ये कोई हल्की या साधारण कार नहीं थी। इसमें एक पावरफुल इंजन था जो महंगी से महंगी कारों को भी मात दे सकता था। इस कार ने सब कुछ बदल दिया।
1920 के दशक से कारें एक बड़ा स्टेटस सिंबल बन गईं।
1900 से 1920 के बीच अमेरिका में कारों की संख्या 8,000 से लगभग एक हजार गुना बढ़कर 8 मिलियन हो गई थी। यूरोप में भी इसी तरह की बढ़त देखने को मिली। लेकिन इस समय तक कारों के बारे में लोगों की सोच एक बार फिर बदल रही थी और मॉडल टी को बेकार समझा जाने लगा था। खास तौर पर जनरल मोटर्स (GM), ऑटोमोबाइल में एक रिवॉल्यूशन ला रही थी। GM के पास कारों के बहुत से ब्रांड थे और हर ब्रांड एक अलग स्टेटस बताता था। इसके साथ ही साल 1919 में GM ने एक प्लान दिया जिसमें लोग पूरे पैसे दिए बिना भी गाड़ी अपने घर ले जा सकते थे। लोग अपनी पुरानी कार एक्सचेंज भी कर सकते थे। ये ब्रांड जैसे शेवरले, पोंटियाक, ओल्डस्मोबाइल, ब्यूक और कैडिलैक अलग-अलग कीमत के थे और आपके पास इनमें से जो भी गाड़ी होती वो आपका स्टेटस बन जाता। इस तरह लोगों का मन होने लगता था कि वो नई कार खरीदें भले ही उनकी कार एकदम सही चल रही हो। ऊपर से GM हर साल लगातार नए मॉडल पेश करके ये ट्रेंड बनाए रखती थी।
लेकिन ये हेनरी फोर्ड के लिए अभिशाप था। उनका पूरा बिजनेस मॉडल इस बात पर चलता था कि एक कार बनाई जाए और उसमें अच्छे से अच्छे फीचर्स हों। वो कारों के रंग भी नहीं बदलना चाहते थे। जबकि GM तो फैशन एक्सपर्ट्स हायर कर रही थी ताकि आगे आने वाले मॉडलों के लिए रंग तय किए जा सकें। अब लोगों के पास ढेर सारे ऑप्शन थे जिससे कार न सिर्फ उनके स्टेटस बल्कि पर्सनालिटी को भी दिखा सके। आखिर फोर्ड को ये मानना ही पड़ा कि मॉडल टी को लेकर उनकी पॉलिसी अब बेकार हो चुकी थी। साल 1928 तक 15 मिलियन मॉडल टी बनाने के बाद फोर्ड ने मॉडल ए उतारा। इस बार अलग-अलग रंग और किश्तों की पॉलिसी लाई जानी थी। फिर भी इस समय तक GM ने अमेरिका की सबसे बड़ी कार बनाने वाली कंपनी के रूप में अपनी जगह बना ली थी।
1930 के दशक तक कारों का बिजनेस फलफूल रहा था।
सड़क पर लाखों और कारें आने का मतलब था और ज्यादा एक्सीडेंट। ट्रैफिक साइन, ट्रैफिक लाइट और स्पीड लिमिट जैसी चीजें तय करने में थोड़ा समय लगा। सड़क के ये नियम यूएस से शुरू होकर यूरोप तक पहुंचे। कई नियम लॉस एंजिल्स से चलना शुरू हुए। सुनने में अजीब लग सकता है लेकिन कैलिफोर्निया का मौसम ड्राइवरों के लिहाज से बहुत अच्छा था और वहां हमेशा सड़कों पर कारें ज्यादा रही हैं। फिर भी 1930 के दशक तक इस बारे में बहस होती रही कि सड़कें लोगों के लिए हैं या कारों के लिए। कार लॉबी दुर्घटनाओं के लिए सड़क पर चल रहे लोगों की लापरवाही को दोषी ठहरा रही थी जबकि पैदल चलने वाले कारों को दोष दे रहे थे। 1934 में ये नियम बनाया गया कि पैदल चलने वाले सड़क पार करते समय क्रॉसवॉक का इस्तेमाल करें और बाकी सड़क पर कारें अपनी स्पीड से चलती रहें।
साल 1933 में जर्मनी के नए चांसलर एडॉल्फ हिटलर अमेरिका की ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने जर्मनी में भी इसे तेजी से बढ़ावा देने की सोची। उन्होंने रजिस्ट्रेशन टैक्स से छुटकारा पाने, क्रॉस-कंट्री मोटरवे बनाने और लोगों के लिए कार का एक नया सस्ता ब्रांड शुरू करने का सुझाव दिया जिसका नाम था वोक्सवैगन। जल्द ही ये इंडस्ट्री जर्मनी में उभरने लगी जिसने 1.5 मिलियन नौकरियां निकालीं और इस तरह महामंदी से बाहर निकलने के लिए एक रास्ता मिला। इस बीच 1939 में न्यूयॉर्क शहर में वर्ल्ड फेयर हुआ। वहां इंडस्ट्रियल डिजायनर नॉर्मन बेल गेडेस ने अपने डिजाइनों से ये दिखाने की कोशिश की कि अगले 20 सालों में दुनिया में कैसे बदलाव होंगे। इस एक्जीबीशन को फुतुरामा कहा जाता था और इसमें भी लोगों की जगह कारों में हो रहे बदलाव की कल्पना की जाती थी। इसमें अल्ट्रामॉडर्न सिटीस्केप के बीच में बड़े पैमाने पर सुपरहाइवे ग्लाइडिंग की कल्पना की गई।
शायद ये कोई हैरानी की बात नहीं है कि इसका सबसे बड़ा स्पॉन्सर GM था और फुतुरामा में दिखाए गए मॉडल आने वाले समय में मार्केट में उतरने वाले थे। हाइवे बड़े शहरों से गुजरते थे और अक्सर इनको बनाने में सबसे बुरा असर वहां के गरीबों पर पड़ता था। खास तौर पर ब्लैक कम्यूनिटी के लोगों को अपने घर छोड़ने पर मजबूर किया गया था ताकि वहां से सड़कें निकाली जा सकें। लोगों से ज्यादा कारों को महत्व दिया जाता रहा। इसी तरह फ्यूल को लेकर भी ऐसे फैसले किए गए जिनका गहरा असर पड़ने वाला था।
मार्केटिंग, राजनीति और विज्ञान सभी ने गैसोलीन का इस्तेमाल तय करने में बड़ी भूमिका निभाई।
मानें या न मानें पर इलेक्ट्रिक कारों को लगभग 100 साल से ज्यादा समय हो गया है फिर भी इन कारों को हमेशा एक शहर के अंदर छोटी दूरी तय करने के लिए सही माना जाता है। 1910 के दशक में इलेक्ट्रिक गाड़ियां बनाने वाली कंपनी ने इलेक्ट्रोबैट के नाम से एक प्लान बनाया जिसमें ये गाड़ियां न्यूयॉर्क के आसपास टैक्सियों की तरह काम करतीं। उन्होंने एक अच्छा बैटरी-स्वैपिंग का प्लान भी किया था जिससे कारें लगातार चलती रहें। लेकिन एक घोटाले ने कंपनी को उसी तेजी से डुबो दिया जितनी तेजी से वो उभर रही थी। उसी समय बैबॉक इलेक्ट्रिक, डेट्रॉइट इलेक्ट्रिक, और वेवर्ली इलेक्ट्रिक जैसी कंपनियां इन कारों की मार्केटिंग महिलाओं को ध्यान में रखते हुए कर रही थीं क्योंकि उनको ज्यादा लंबी ड्राइविंग नहीं करनी होती थी और शहर में घूमने और शॉपिंग के लिए ये गाड़ियां बिल्कुल फिट बैठती थीं। हालांकि ये एक मार्केटिंग ट्रिक थी जो लंबे समय में नाकामयाब साबित होनी थी।
इलेक्ट्रिक कारों को शुरुआती दौर में रुकावटों का सामना भी करना पड़ा पर इसका मतलब ये नहीं था कि अब non renewable fuel का ही सहारा रह गया था। इथेनॉल का इस्तेमाल करने के बारे में शुरू से ही सोचा जा रहा था। इथेनॉल एक तरह का अल्कोहल है जिसे सब्जियों और फसलों के कचरे से तैयार किया जा सकता है। कार का शुरुआती मॉडल टी एक फ्लेक्स-फ्यूल कार ही थी जो गैसोलीन या अल्कोहल पर चल सकती थी। और उस समय बहुत से लोग थे जिन्होंने इस खतरे को भांप लिया था कि सिर्फ एक ऐसे फ्यूल पर भरोसा करना जो आगे चलकर खत्म हो सकता है ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री के भविष्य के लिए ठीक नहीं होगा। अमेरिका में ज्यादातर गैसोलीन, स्टैंडर्ड ऑयल नाम की कंपनी तैयार करती थी जो पॉलिटिक्स में भी एक ताकतवर हैसियत रखती थी। भले ही बाद में इसे गैरकानूनी बताकर 1911 में अलग-अलग कंपनियों में तोड़ दिया गया था। लेकिन इथेनॉल को अपनाने के रास्ते में एक साइंटिफिक रुकावट भी थी। इथेनॉल, गैसोलीन जितना हाई क्वालिटी फ्यूल नहीं होता है इसलिए इसकी वजह से इंजन तेजी से जलते हैं।
जब ये अंदाजे लगाए गए कि अमेरिका की कारों को इथेनॉल से चलाने के लिए कितनी खेती वाली जमीन की जरूरत होगी तो नतीजे परेशान करने वाले निकले। अब इस बात की चिंता होने लगी कि अगर इतनी जमीन का इस्तेमाल इथेनॉल वाली फसलों के लिए हो गया तो अनाज और दूसरी फसलों को उगाने की जगह कम पड़ जाएगी और भोजन की कमी होने लगेगी। ये भी महसूस किया गया कि किसानों और तेल कंपनियों के बीच टकराव की नौबत आ सकती है। फिर भी ये एक ऐसी बहस है जो कभी खत्म ही नहीं हुई। कुछ समय के लिए इसे शांत जरूर कर दिया गया था क्योंकि मिडिल ईस्ट में तेल के भंडार थे भले ही ये recyclable नहीं थे फिर भी एक नई उम्मीद तो जगी थी। फिर भी शायद इससे भी बड़ी बात ये है कि फॉसिल फ्यूल को जलाने से पर्यावरण और दुनिया पर बहुत बुरा असर पड़ा है और एक ईको फ्रेंडली फ्यूल की मांग पहले से कहीं ज्यादा तेज हो गई है।
कुछ बातों से ये खुशनुमा उम्मीद जगती है कि सड़कें शांत और खाली बन सकती हैं।
ऑटोमोबाइल के बारे में एक बात बड़ी अजीब लगती है। घोड़ों की वजह से होने वाले शोर और पॉल्यूशन को कम करने के लिए ऑटोमोबाइल को बढ़ावा मिला था। लेकिन समय बीतने पर ये देखा गया कि इनकी वजह से हमारी सड़कें पहले से कहीं ज्यादा शोर मचाती हैं और फ्यूल जलने पर निकलने वाले नुकसानदायक केमिकल, कैंसर और सांस की बीमारियों की वजह बन सकते हैं। ये एक फैक्ट है कि कार, ट्रक और बसों की वजह से दुनिया के पूरे CO2 का पांचवा हिस्सा बनता है जो क्लाइमेट चेंज की एक बड़ी वजह है। इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि गैसोलीन की जरूरत ने हमारे जिओ पॉलिटिकल ढांचे को आकार देने में बड़ा रोल प्ले किया है जो इस समय भी स्टेबल नहीं लगता है। हम सबने COVID-19 के रूप में एक और मोड़ देखा जिसने हमें ये सोचने का वक्त दिया कि हम अपने तौर तरीके बदलें। खास तौर पर गाड़ियों के इस्तेमाल और जरूरत पर काफी सवाल उठे। कारों ने बहुत सी चीजें बदल दीं, खासकर WWII के बाद के सालों में। इसने रिश्ते बनने के तरीके तक को बदल दिया।
कारों की बदौलत युवा लोगों के पास अचानक एक बहुत बड़ा फ्रेंड सर्कल आ गया। सैर सपाटा, ड्राइव-इन मूवी थिएटर और ड्राइव-थ्रू रेस्तरां जाना कारों ने आसान कर दिया। अब कार वाले लोगों की अपनी कम्यूनिटी बन जाती थी। शहर अब मिडिल और हाई क्लास के परिवारों का ठिकाना बन गए थे। शहर के बाहर के लोगों को जोड़ने के लिए पार्किंग की सुविधा वाले बड़े शॉपिंग मॉल बनाए जाने लगे। बहुत से शहरों में तो फुटपाथ ही नहीं थे क्योंकि यहां शायद ही कोई कार के बिना रह पाता था। 50 के दशक में भी कुछ लोगों ने इस बात पर जोर दिया कि अगर हम लोगों के बजाए कारों को ध्यान में रखकर समाज बसाएंगे तो उसके नुकसान होंगे।
बहुत पहले ही ये समझा जाने लगा था कि शहरों की वही रूटीन वाली जिंदगी कितनी परेशानियां लेकर आ सकती है। अब कोविड को धन्यवाद दिया जाना चाहिए जिसने लोगों को घर से काम करने और ई-कॉमर्स पर भरोसा करने के लिए मजबूर किया और पिछली सदी के रहन सहन पर गंभीरता से सवाल उठाया। अब लोग ऑफिस, रेस्तरां या शॉपिंग मॉल जाए बिना भी आराम से अपना काम और जरूरत पूरी कर पा रहे हैं। इस बात की संभावना कम है कि लोग इस महामारी के पहले वाली संख्या में ऑफिस जाना शुरू करेंगे। लोग पहले से ही कम्यूट करने को अपने दिन के सबसे बुरे वक्त के तौर पर देखते थे और अब तो ये साबित हो गया है कि हम घर से भी उतनी अच्छी तरह काम कर सकते हैं जैसे ऑफिस से। इसके अलावा कई कस्बों और शहरों ने बाइक लेन बनाकर और फुटपाथों को चौड़ा करके अपनी सड़कों को बदलने पर ध्यान दिया है। कुछ शहर नो-कार जोन भी बना रहे हैं या बहुत कम स्पीड लिमिट लागू कर रहे हैं ताकि इस विचार पर जोर दिया जा सके कि शहरी इलाके कारों की जगह लोगों को महत्व पर दे सकते हैं।
ऑटोमेटेड गाड़ियां तो पहुंच से बाहर हैं लेकिन ट्रांसपोर्ट एप लोगों को लुभा रहे हैं।
साल 1939 में फुतुरामा प्रदर्शनी में एक ऑटोमेटेड गाड़ी की भी कल्पना की गई थी। यानि आने वाले कल में कारों को ड्राइव नहीं करना पड़ेगा वो खुद ब खुद ड्राइव होंगी। नॉर्मन बेल गेडेस ने सेंसर वाली सड़कों की कल्पना की जो कारों को आसानी से चलने में मदद करेंगी। इन दिनों कारों में जो सेंसर लगे हैं वो उनकी कल्पना का ही एक रूप है। AV यानि Automoted Vehicle तकनीक को आगे बढ़ाने की कोशिश में बहुत समय, मेहनत और पैसा खर्च किया जा रहा है लेकिन इसका भविष्य फिलहाल समझ से बाहर है। इसकी जगह स्मार्टफोन से चलने वाली एक तकनीक आने वाले वक्त के लिए ज्यादा अच्छा विकल्प लगती है। 2004 में पहली बार मोजावे में प्रतियोगिता होने के बाद से AV तकनीक में बहुत तरक्की हुई है। उन्नीसवीं सदी के आखिर में पेरिस की दौड़ की तरह रेगिस्तान में हुई इस दौड़ ने ये साबित कर दिया कि ये सपना पूरी तरह से सच किया जा सकता है।
फिर भी आज लगभग 20 साल बाद AV को रोजमर्रा के इस्तेमाल में लाने का ख्याल पहुंच से बाहर है। मशीन लर्निंग की मदद से तरक्की की गई है जो AV सिस्टम को कई तरीकों से ट्रैफिक सिग्नल, ट्रैफिक साइन और रास्ते में आने वाली रुकावटों का मतलब समझा रहा है और उनके हिसाब से रिस्पांस देना भी। परेशानी ये है कि मशीनें उनमें फीड की चीजों पर तो ठीक हैं पर अचानक आए किसी बदलाव का सामना करने में इंसानों से बहुत पीछे हैं। एक इंसान कभी भी हवा में उड़ती झिल्ली को बच्चा नहीं समझेगा जबकि एक AV सिस्टम ऐसा कर चुका है। ऐसी बातें AV को हमारी जिंदगी का हिस्सा बनाने में देरी करवाती हैं और ये भी यकीन से नहीं कहा जा सकता कि कभी सच में इनको परफेक्ट बनाया जा सकेगा। इस बीच दुनिया में कारों की कीमत पर सवाल उठते रहे हैं चाहे उन्हें कैसे भी चलाया जा रहा हो।
इस समय Mobility-as-a-Service (MaaS) प्रोग्राम पॉप्युलर हो रहे हैं। इनको पहली बार 2014 के आसपास हेलसिंकी में इस्तेमाल किया गया। MaaS प्रोग्राम किसी स्मार्टफोन एप में ट्रांसपोर्टेशन के अलग-अलग तरीकों को एक साथ जोड़ते हैं। ये यूजर को उसके डेस्टिनेशन तक जाने के अलग-अलग विकल्प देगा जिसमें साइकिल, इलेक्ट्रिक स्कूटर, पब्लिक ट्रांसपोर्ट या फिर एक कार-शेयर जैसे तरीके शामिल हो सकते हैं। इन सभी सेवाओं को एक साथ जोड़ा जा सकता है, पेमेंट किया जा सकता है और एक एप में एक्सेस किया जा सकता है। इसके बाद से सिंगापुर, एंटवर्प, बर्लिन और बर्मिंघम जैसे शहरों में MaaS प्रोग्राम शुरू किए गए हैं। ऑटोमोबाइल अब पहले की तरह स्टेटस या आजादी का सिंबॉल नहीं रहा है। जबकि पिछले एक दशक में स्मार्टफोन कई मायनों में ये जगह बनाता जा रहा है। भले ही ये सब तरीके प्राइवेसी और सुरक्षा के बारे में सवाल खड़े करते हैं पर ट्रेवल करने की तकनीक और आसानी को देखते हुए इनसे दूरी बनाना मुश्किल है।
कुल मिलाकर
पुराने जमाने से पहिया बहुत से रोल निभाता रहा है। शुरुआती दौर में गाड़ियों का इस्तेमाल यात्रा के लिए किया जाता था जबकि रथों का इस्तेमाल राजाओं को भगवान की तरह ताकतवर और ऊंचा दिखाने के लिए। ऑटोमोबाइल को घोड़ों का शोर और प्रदूषण दूर करने के एक तरीके के रूप में जोर शोर से जगह दी गई थी लेकिन जैसे-जैसे कारें सस्ती होती गईं और स्टेटस सिंबल के रूप में जगह बनाती गईं इस फलती-फूलती इंडस्ट्री ने और भी ज्यादा शोर और प्रदूषण को जन्म दे दिया। अब इस बात पर ध्यान दिया जा रहा है कि हमारा समाज लोगों की जगह कारों पर फोकस कैसे हो गया है। क्योंकि दुनिया भर के शहरों और कस्बों को लोगों के बजाए कारों के हिसाब से डिजाइन किया गया है। महामारी और क्लाइमेट चेंज के खतरे को देखते हुए इन सबके बारे में गहराई के साथ दुबारा सोचा जा रहा है और नई नीतियों में फिर से लोगों को कारों से ऊपर रखा जा रहा है। इन सबमें फ्यूल के विकल्प और AV का विकास जारी है। स्मार्टफोन पर आधारित तकनीक भी है जो लोगों को ऐसे विकल्प दे रही है जो कार खरीदने से ज्यादा काम के हो सकते हैं।
येबुक एप पर आप सुन रहे थे A Brief History of Motion By Tom Standage.
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