Reading Like a Writer

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Reading Like a Writer

Francine Prose
किताबों से प्यार करने वालों के लिए, जो कुछ लिखना सीखना चाहते हैं

दो लफ़्ज़ों में
साल 2006 में रिलीज हुई किताब ‘Reading Like a Writer’ आपको किसी भी किताब को पढ़ना सिखाती है. इस समरी के चैप्टर्स को पढ़कर आपको पता चलेगा कि किसी भी मास्टर पीस को लिखा कैसे जाता है? ऐसी कौन सी चीज़ें हैं जो कि किसी भी किताब को मास्टर पीस बनाती हैं. अगर आप भी चाहते हैं कि आपको पढ़ना आ जाए. अगर आप भी चाहते हैं कि आप किसी नॉवेल से उसका सार निकाल सकें तो ये समरी आपके लिए ही है. 

ये किताब किसके लिए है?
- पढ़ने के शौक़ीन लोग 
- लेखक या फिर जिसे लेखक बनना हो 
- ऐसे लोग जिन्हें क्लासिक नॉवेल पढ़ने का शौक है
 
लेखक के बारे में
इस किताब के लेखक ‘Francine Prose’ हैं. नॉवेल लेखक होने के साथ ही साथ ‘Francine Prose’ को निबंध लेखन में भी रूचि है. 

क्या आपको आर्ट ऑफ़ क्लोज रीडिंग के बारे में पता है?
क्या आप भी जानना चाहते हैं कि एक मास्टर पीस नॉवेल को कैसे लिखा जाता है? अगर आप सोचते हों कि इसे सीखने के लिए आपको कोई राइटिंग वर्क शॉप ज्वाइन करना पड़ेगा तो फिर आप गलत हैं. ऐसा कुछ भी नहीं करना पड़ेगा.  इस समरी के चैप्टर्स आपको पढ़ना भी सिखायेंगे और लिखना भी, इस समरी के ज़रिये आपको बहुत कुछ सीखने को मिलेगा. अगर आपको साहित्य से प्यार है. तो फिर ये किताब आपके लिए किसी परीक्षा की गाइड से कम नहीं है. 

इस किताब की हेल्प से आपको पता चलेगा कि कठिन परीक्षा में अच्छे नम्बरों से पास कैसे हुआ जाता है? यहाँ कठिन परीक्षा का मतलब अच्छी किताब और बुक राइटिंग से है. 

क्या आपने कभी किसी बच्चे को कुछ भी पढ़ते हुए देखा है? अगर नहीं देखा है तो अब देखिएगा. जब आप किसी बच्चे को कुछ भी पढ़ते हुए देखेंगे तो आपको पता चलेगा कि वो किसी भी चीज़ को बड़े ध्यान से पढ़ते हैं. बच्चे बड़ों से बेहतर क्लोज रीडर होते हैं.

जैसे-जैसे हम बड़े होते जाते हैं. वैसे-वैसे ही हम इमपेशंट भी होते जाते हैं. हम कम समय में काफी कुछ पढ़ना चाहते हैं. हम जल्दी-जल्दी पढ़ना भी सीख जाते हैं. इसे स्किम रीडिंग कहा जाता है. हमें इसी तरह की रीडिंग की आदत पड़ जाती है. हम कम से कम समय में ज्यादा से ज्यादा जानकारी इकठ्ठा करना चाहते हैं.

ये कहना भी गलत नहीं होगा कि हम जंक फ़ूड की तरह फूड्स को कन्ज्यूम करने लगते हैं.

ऐसा नहीं है कि स्किम रीडिंग से कुछ फायदा नहीं होता है. कई सिचुएशन में इस तरह की रीडिंग फायदेमंद होती है. लेकिन जब कभी लिटरेचर की बात आती है. तब हमें स्किम रीडिंग से परहेज करना चाहिए. अगर आप लिटरेचर को जल्दी-जल्दी खत्म करने की कोशिश करेंगे तो फिर आप शब्दों की आत्मा को ही खत्म कर देंगे. इसलिए लिटरेचर को पढ़ने का एक अलग ही तरीका होता है.

ग्रेट लिटरेचर से आप क्या समझते हैं?

ग्रेट लिटरेचर के कई सारे मतलब होते हैं. उसके शब्दों में जितना आप डूबते जायेंगे उसके नए-नए मतलब आपको समझ में आते जायेंगे. इसलिए लिटरेचर को बड़ी सावधानी और पेशन्स के साथ पढ़ना चाहिए. लिटरेचर पढ़ना कोई पानी पूरी खाने जैसा नहीं होता है कि फट से मुंह में डाले और निगल लिए. अगर आप लिटरेचर को समझना चाहते हैं. तो फिर आपको उसके हर एक शब्द अपर गौर करना पड़ेगा.

लिटरेचर पढ़ने के लिए आपको अपनी रीडिंग को स्लो डाउन करना पड़ेगा. आप अपनी रीडिंग को जितना स्लो करेंगे उतना ही फायदा आपको होगा. इसका रिवार्ड नॉलेज के रूप में आपको मिलेगा. इस रिवार्ड को आप कभी भी पैसों से नहीं खरीद सकते हैं. इसके लिए आपको सही ढ़ंग से किताब को पढ़ना होगा. 

 प्लाट और करैक्टर डेवलपमेंट के लिए शब्दों का चुनाव सही होना चाहिए
ऑक्सफ़ोर्ड इंग्लिश डिक्शनरी के अनुसार इंग्लिश लैंग्वेज में 1 लाख 70 हज़ार शब्दों का यूज किया जाता है. इसका मतलब साफ़ है कि किसी भी राइटर के पास आप्शन काफी ज्यादा हैं. लेकिन यहाँ पर लेखक सामने ये चैलेन्ज रहता है कि वो इतने शब्दों में वो एक सही शब्द का चुनाव कैसे करे. जो कि उसकी बात को सही ढ़ंग से रीडर्स के सामने रख दे. 

किसी भी फिक्शन को ग्रेट बनाने के पीछे उसमें यूज हुए शब्दों का बहुत बड़ा योगदान होता है. इसलिए जब कभी भी आप किसी भी नॉवेल को पढ़िएगा तो ये कल्पना करने की कोशिश करियेगा कि राइटर इस शब्द की जगह कौन सा शब्द यूज कर सकता था? या फिर जिन शब्दों का उपयोग राइटर ने किया है. तो क्यों किया है? अगर आप ऐसा करते हैं तो फिर आपकी इमेजिनेशन पॉवर बेहतर होती जायेगी.

इसी के साथ इस बात को भी याद रखियेगा कि किसी भी नॉवेल को ग्रेट उसकी पहली लाइन ही बना देती है. ज़्यादातर ग्रेट नॉवेल की पहली लाइन बहुत इफेक्टिव होती है. 

अमेरिकन राइटर की एक नॉवेल है. जिसका नाम है ‘द ग्रैंडमदर’. इस नॉवेल के पहले दो शब्द ही इतने प्रभावशाली हैं कि वो आपको बता देते हैं कि नॉवेल की थीम क्या होने वाली है.

फिक्शनल नॉवेल को अगर आप पढ़ रहे हैं या फिर आप फिक्शनल नॉवेल लिखना चाहते हैं तो फिर एक बात सबसे ज़रूरी होती है. वो ये है कि आप अपने नॉवेल के करैक्टर को कैसे इंट्रोड्यूस करते हैं. किसी भी नॉवेल का ये फेज बता देता है कि उसके राइटर के पास एक्सपीरियंस कितना है. 

किसी भी किताब में जब भी करैक्टर के बारे में बताने की बात आती है तो वहां पर शब्दों का चयन काफी इम्पोर्टेन्ट हो जाता है. 

उस फेज में राइटर के तौर पर आपकी ज़िम्मेदारी ये बनती है कि आप सही वर्ड्स का सिलेक्शन करें. अगर आपके शब्दों में वो गरिमा होगी तो फिर रीडर्स भी आपकी किताब से खुद को कनेक्ट कर सकेंगे. किसी भी किताब की राइटिंग के समय फैंसी शब्दों का भी महत्त्व होता है. लेकिन आपको ये ध्यान रखना होगा कि फैंसी शब्द ‘दाल’ में नमक की तरह होते हैं. इनका सही इस्तेमाल आपको आना चाहिए. फैंसी शब्द रीडर्स को आकर्षित कर सकते हैं लेकिन इनका यूज कहाँ, कैसे और कितना करना है? ये आपको मालूम होना चाहिए. अगर आप हर जगह फैंसी शब्दों का ही यूज करने लगेंगे तो फिर रीडर्स भी बेवक़ूफ़ नहीं है. वो आपकी तकनीक को समझ जायेंगे और उन्हें इरीटेशन भी होने लगेगी. 

किसी भी किताब को लिखते समय आपको ये भी ध्यान रखना है कि इमोशन का सही इस्तेमाल हो सके. रियल लाइफ में हमारे इमोशन हमारे शब्दों से ही दिखते हैं. इसलिए नॉवेल को लिखते समय भी हमें हमारे शब्दों का ख्याल रखना है. हमें ये कोशिश करनी चाहिए कि जहाँ भी इमोशन से जुडी हुई बात हो वहां पर इमोशन से कनेक्ट करने वाले शब्दों का ही यूज किया जाए. 

कई जगह ये बताया भी गया है कि कठिन शब्दों में बड़ी चीज़ें लिखना बहुत आसान है. बल्कि सरल शब्दों में अच्छी चीज़ें लिखना काफी ज्यादा कठिन है. इस बात से इस किताब के ऑथर भी सहमत है और आपको सलाह देना चाहते हैं कि राइटिंग के समय ऐसे शब्दों का चयन करें जिससे आम लोग आसानी से कनेक्ट कर सकें. कभी-कभी ऐसा भी होता है कि हम फैंसी शब्दों के चक्कर में पड़कर आसानी से समझा देने वाली बात को काफी ज्यादा कठिन बना देते हैं. किसी भी किताब को लिखते समय हमें इस गलती से बचने की कोशिश करनी है. आप कोशिश करिए कि अपनी बात को आसानी से रीडर्स के दिमाग में बैठा सकें. अगर आप आसानी से किसी भी सिचुएशन को समझा सकते हैं तो फिर आप भी राइटर बन सकते हैं.

मुश्किल-मुश्किल शब्दों का उपयोग करके आप ज्ञानी कहला सकते हैं लेकिन अगर आप इसी तरह से  लिखने लगेंगे तो फिर रीडर्स कभी भी खुद को आपसे कनेक्ट नहीं समझ पायेगा. इसलिए खुद के लिए नहीं बल्कि दूसरों के लिए लिखने की कोशिश करिए. 

मान लीजिये कि आपने अपनी किताब में बहुत बड़ी और अच्छी जानकारी दे दी है. लेकिन आपकी भाषा इतनी कठिन है कि लोगों को समझने में ही दिक्कत हो रही है. तब क्या होगा? कुछ लोग किताब पढ़ भी लेंगे तो आगे वालों क्या बतायेंगे? बोलेंगे कि किताब की लैंग्वेज बहुत हार्ड है. कई लोग तो आधी किताब पढ़ेंगे फिर पढ़ना ही बंद कर देंगे. इससे क्या होगा? आप जो भी सन्देश या कहानी लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं. वो आगे बढ़ ही नहीं पायेगी. इसलिए लिखते समय इस बात का ख्याल रखियेगा कि आसान से आसान लैंग्वेज में लोगों तक बढ़िया से बढ़िया कंटेंट दे सकें. 

इसके साथ ही साथ आपको ये भी ख्याल रखना है कि प्लाट के डेवलपमेंट के लिए सही शब्दों का चुनाव होना चाहिए. वो खूबी आपके अंदर कैसे आएगी? अगर आप नये राइटर हैं तो ये खूबी आपके अंदर तभी आएगी. जब आप ज्यादा से ज्यादा किताबें पढ़ेंगे. 

इसलिए कहा भी गया है कि लिखने से पहले पढ़ने की आदत डालनी चाहिए. 

 

ब्यूटीफुल सेंटेंस क्या होता है?
किसी भी वाक्य या फिर सेंटेंस को सुंदर क्या बनाता है? ये सवाल जितना सुंदर है उसका जवाब देना उतना ही कठिन है. ये वैसी ही चीज़ है जिसे खुद पढ़कर ही एक्सपीरियंस किया जा सकता है. ये ठीक ‘इश्क’ की तरह है. इश्क की खूबसूरती का एहसास आपको तब तक नहीं हो सकता है. जब तक आप खुद उन गलियों से ना गुज़रे हों. भले ही किताबी ज्ञान आपके पास कितना भी क्यों ना हो? लेकिन ये ज्ञान आपको फायदा तभी देगा. जब आप खुद उस फील्ड के खिलाड़ी बनने की कोशिश करेंगे.

सेंटेंस की सुन्दरता को पता करने का कोई हार्ड और फ़ास्ट रूल नहीं है. लेकिन फिर भी सिम्पल, क्लियर, म्यूजिकल सेंटेंस सुंदर होते हैं. 

ऐसे वाक्य जो बड़े प्यार से और सिम्पल तरीके से अपने रीडर्स से कम्यूनिकेट करने में कामयाब हो जाते हैं. वही सेंटेंस सभी के दिलों में भी छा जाते हैं.

जर्मन राइटर ‘Heinrich von Kleist’ काफी सुंदर सेंटेंस बनाया करते थे. उन्हें इस फील्ड का मास्टर भी कहा जाता था. आज भी जर्मन राइटर की दुहाई दी जाती है. इनके सेंटेंस की खूबी ही ये हुआ करती थी कि वो काफी सिम्पल और क्लियर हुआ करते थे. 

उनकी लिखी हुई कहानी द अर्थकुएक को अगर आप पढ़ेंगे तो आपको पता चलेगा कि उन्होंने बहुत सारी जानकारी एक छोटे से सेंटेंस में दे दी है. लेकिन उस सेंटेंस को पढ़ते समय आपको बिल्कुल भी ऐसा नहीं लगेगा कि उसमे बहुत ज्यादा शब्दों का यूज किया गया है.

 

क्या आप पैराग्राफ के महत्त्व को समझते हैं?
किसी भी राइटिंग स्टाइल के लिए या फिर किसी भी नॉवेल के लिए ये काफी ज़रूरी होता है कि उसके पैराग्राफ कैसे लिखे हुए हैं? मान लीजिये कि आप कोई नॉवेल पढ़ रहे हैं. अब आपको कैसे पता चलेगा कि वो नॉवेल इंट्रेस्टिंग है? इस बात का अंदाजा तभी लगेगा जब आप उसके पैराग्राफ देखेंगे. 

एक नॉवेल में पैराग्राफ का महत्त्व उतना ही होता है. जितना कि किसी डिटेक्टिव की लाइफ में सुराग या फिर क्लू का महत्त्व होता है. अगर आप डिटेक्टिव हैं और कोई नया केस सॉल्व कर रहे हैं तो फिर आपकी कोशिश रहेगी कि जल्द से जल्द आपको पहला सुराग मिल जाए. जब आपको सुराग मिल जाएगा उसके बाद केस को सॉल्व करने के लिए आपका इंटरेस्ट भी ज्यादा बढ़ जाएगा. ठीक उसी तरह अगर आप कोई किताब पढ़ रहे हैं और उस किताब के चैप्टर्स के पैराग्राफ बहुत अच्छे से लिखे हुए हैं. तो फिर किताब को पढ़ने में आपका इंटरेस्ट बना रहेगा. 

इस किताब के लेखक बताते हैं कि पैराग्राफ का महत्त्व इतना ज्यादा होता है कि आप एक पैरा पढ़ने के बाद पूरी किताब पढ़ने के लिए मजबूर हो सकते हैं. इसलिए जब भी आप किताब लिख रहे हों तो हर एक पैरा को बड़े ध्यान से लिखने की कोशिश करियेगा. 

अगर हम रीडर के माइंड सेट की बात करें तो, कोई भी रीडर लम्बे पैरा नहीं पढ़ना चाहता है. इसलिए आपकी कोशिश रहनी चाहिए कि आप अपने रीडर्स के सामने स्माल पैरा पेश करें. आपकी कोशिश होनी चाहिए कि उन्हें ऐसा मटेरियल मिले. जो उनके दिमाग में आसानी डाइजेस्ट हो जाए. 

एक काफी ज्यादा मशहूर ब्रिटिश रोमांटिक कवि हुआ करते थे. जिनका नाम विलियम वर्ड्सवर्थ था. वो अपने आपको शहरी जीवन के क्रिटिक के रूप में पेश किया करते थे. उनके अनुसार शहर की बिल्डिंग्स, प्रदूषण, हवा, दुआं और कुछ भी नहीं हैं. ये बस जिंदगी के लिए एक जहर की तरह है.

उनके अनुसार शहर की हवा से इंसान के अंदर का चैन और सुख मर जाता है. 

आज के दौर में ज़्यादातर लोग ब्रिटिश कवि विलियम वर्ड्सवर्थ की इस बात से एग्री करते हैं. इसी का रीजन ये है कि लोग नेचर के बीचों बीच अपने वेकेशन को प्लान करते हैं. शहर के लोग अपने वेकेशन में नेचर के पास जाना चाहते हैं. 

नेचर में जाकर, पेड़ों के पास जाकर या तो हिमालय की गोद में जाकर लोग रिलैक्स करते हैं. उन्हें वो सुकून मिलता है. जो उन्हें शहरी जन जीवन में नहीं मिलता है. 

विलियम वर्ड्सवर्थ के अनुसार नेचर से इंसानी शरीर के साथ ही साथ दिमाग भी सुकून में रहता है. इससे आदमी के अंदर जिंदगी को लेकर एक अलग नज़रिए का जन्म भी होता है. 

इस बात को सच मानते हुए लेखक अपने इंग्लैंड के दौरे को याद करते हैं. जब लेक डिस्ट्रिक्ट गये हुए थे. वहां बढ़िया बारिश हो रही थी. तब लेखक ने रिलैक्स महसूस किया था. इसी के साथ उन्होंने वहां के जंगल की सैर भी की थी. 

अब आप सोचिये कि लेखक ने विलियम वर्ड्सवर्थ की बात को इतनी तवज्जों क्यों दी थी? इसके पीछे का रीजन यही था कि विलियम वर्ड्सवर्थ ने अपने बात को आसान और इफेक्टिव ढ़ंग से अपने पाठकों के सामने पेश की थी. 

इसलिए इस किताब के माध्यम से लेखक बार-बार यही बताना चाहते हैं कि आपको अपनी बात सरल ढ़ंग से रखने की कोशिश करनी है. 

 

नरेटर क्या होता है?
कहानी के कई रूप हो सकते हैं. एक ही कहानी को अलग-अलग किरदारों के पर्सपेक्टिव से भी बताया जा सकता है. ज़्यादातर नॉवेल में आप देखते होंगे कि फर्स्ट या थर्ड पर्सन की तरफ से नरेशन किया जाता है. यही तरीका सही भी है. 

किसी भी किताब का नरेशन उसी हिसाब से होना चाहिए जिस हिसाब रीडर्स को पढ़ने में आसानी हो. लेखक को याद रखना चाहिए कि किताब को रीडर्स के लिए लिखा जा रहा है. फर्स्ट पर्सन और थर्ड पर्सन के नरेटिव स्टाइल को अधिकत्तर यूज किया जाता है. आपको बता दें कि दोनों ही नरेटिव स्टाइल की अपनी-अपनी खूबी है और अपने-अपने ही चैलेन्ज हैं. 

इसलिए अपनी किताब लिखने से पहले आपको ये डिसाइड करना पड़ेगा कि आप किस नरेटर के हिसाब से अपनी स्टोरी को रीडर्स के सामने पेश करने वाले हैं. 

ये आपका काम है कि सबसे पहले अपने नरेटर का फैसला करें. उसके बाद आप ये तय करें कि उसकी टोन कैसी होगी.

अगर आप फर्स्ट पर्सन की तरफ से अपनी स्टोरी को नरेट कर रहे हैं तो आपकी कोशिश ये होनी चाहिए कि उसकी पर्सनालिटी इंट्रेस्टिंग हो, जब उसकी पर्सनालिटी इंट्रेस्टिंग होगी. तभी रीडर्स भी उससे जुड़ना पसंद करेंगे. 

यहाँ पर लेखक थर्ड पर्सन नरेटर की भी बात करना चाहते हैं. वो बताते हैं कि थर्ड पर्सन का पर्सपेक्टिव ज्ञानी वाला होना चाहिए. उसकी पर्सनालिटी ऐसी होनी चाहिए जिसे सब कुछ पता है. 

चायनीज फिलॉसफी में एक टर्म चलता है. उसे ‘डी’ टर्म कहा जाता है. इसका मतलब होता है कि जिनके पास पॉवर, वर्च्यु और करिश्मा होता है. चायनीज फिलॉसफी बताती है कि जिन लोगों के पास ‘डी’ कांसेप्ट होता है. उनका माइंड सेट ही अलग रहता है. 

फिलॉसफर बताते हैं कि ‘डी’, पॉवर और इन्फ्लुएंस का सोर्स होता है. जब कोई भी लीडर इस स्टेट ऑफ़ माइंड में पहुँच जाता है. तो फिर उसे किसी से भी डर नहीं रहता है. उसे डर क्यों नहीं रहता है? 

इसके पीछे का रीजन साफ़ है. इसके पीछे का रीजन है कि जब लीडर उस स्टेट ऑफ़ माइंड में पहुँच जाता है. तब लोग उसे फॉलो करने लगते हैं. 

ऑथर बताते हैं कि भले ही आप एवरेज हों. लेकिन अगर आपके पास ऐसा माइंड सेट है. तो फिर आप एक अच्छी और सार्थक किताब लिख सकते हैं. 

अगर आप पूरी शिद्दत से अच्छी किताब लिखने की कोशिश करेंगे. तो फिर लोग भी आपकी किताब और उसके कंटेंट को पसंद करेंगे. 

आपको अगर कुछ  फॉलो करने की ज़रूरत है तो वो सिर्फ है लिखने के प्रति आपका पैशन. अगर आपके पास पैशन है तो बाकी चीज़ें आप इस किताब में दी गयी टिप्स से सीख ही जायेंगे.

 

एक्शन, थॉट्स और डायलाग के महत्त्व
लिटरेचर की दुनिया में तीन चीज़ें आपको डिफाइन करती हैं. आप क्या सोचते हैं? आप क्या करते हैं? और आप क्या कहते हैं?

किताब पढ़ने वालों को इस बात से कत्तई फर्क नहीं पड़ता है कि आप कैसे दिखते हैं? साहित्य की दुनिया में हर उस शख्स की कद्र होती है. जिसके पास अच्छा या कुछ सार्थक सोचने या लिखने की कला होती है. 

क्या आपने कभी सोचा है कि लेखक एक्शन, थॉट और डायलाग को क्रिएट कैसे करते हैं? या फिर लेखक करैक्टर डेवलप कैसे करते हैं? 

इसके लिए अलग-अलग राइटर अलग-अलग तकनीक का इस्तेमाल करते हैं. कई राइटर करैक्टर के एक्शन से उसकी पर्सनालिटी को डिफाइन करते हैं. 

वहीं कई लेखक थॉट और डायलाग से करैक्टर को डिफाइन करने की कोशिश करते हैं.

जब भी आप किताब पढ़ते होंगे तो इस बात को नोटिस करते होंगे कि करैक्टर का डेवलपमेंट आपस की बातचीत में भी हो जाता है. 

इसलिए आगे से जब भी आप कुछ लिखने का ट्राय करें तो करैक्टर को उनके डायलाग से डेवलप करने की कोशिश करियेगा. 

कहानी को कहानी क्या बनाता है?
आप अच्छे से झूठ बोलते हैं या फिर झूठ बोलते समय पकड़ा जाते हैं? इस सवाल का जवाब आपको नहीं मालुम है? तो फिर जान लीजिये अच्छे से झूठ बोलने वाला इंसान फैक्ट्स को भी बड़ी चतुराई से घुमाता है. वहीं जिससे झूठ बोलते नहीं आता है. वो कहीं न कहीं फंस जाता है. 

ग्रेट राइटर भी अच्छे से झूठ बोलने वालों की तरह ही होते हैं. उनकी भी कोशिश यही रहती हैं कि झूठी कहानी भी लोगों को सच्ची लगे. इसलिए वो अपने झूठे फैक्ट्स के साथ काफी सही रहते हैं. 

अब सवाल ये भी उठ रहा होगा कि कहानी को कहानी आखिर बनाता क्या है? 

इसके लिए आपको बता दें कि सिर्फ सच्ची कहानियां ही कहानी नहीं होती है. बल्कि झूठ से भरी हुई दास्ताँ ही असली कहानी होती है.  बात तो बस इस बात की होती है कि उस कहानी में लचीलापन कितना है?

क्या उस कहानी में रीडर्स को आकर्षित करने के गुण हैं? 

रीडर्स हमेशा ही करैक्टर और उसके नेचर से आकर्षित होते हैं. इसलिए कहानी में रोमांच के साथ ही साथ अच्छे डायलाग भी होने ही चाहिए. 

 

कुल मिलाकर
अगली बार आप जब भी किसी नॉवेल को हाँथ लगाइयेगा तो खुद को स्लो डाउन कर लीजियेगा. अगली बार आपको हर शब्द को शब्द की ही तरह आराम से पढ़ना है. आपको समझना है कि  उस शब्द के पीछे की क्या कहानी है?

 

आज़ाद रहिये और आज़ादी के साथ लिखिए. कोशिश करिए कुछ नया लिखने की और अंदाज़ आपका खुद का होना चाहिए. लिखने से पहले बहुत सारा पढ़ने की कोशिश करिए. स्लो रीडिंग, डीप रीडिंग. 

 

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