Brian Wansink
जानिए ओवरईटिंग के कुछ कारण और उनसे बचने के उपाय
दो लफ्जों में
यह किताब उन बातों को समझाती है जो हमारे खान-पान पान की आदतों को प्रभावित करती हैं और जिन्हें हम जाने-अनजाने फॉलो करने लगते हैं। इसमें कुछ ऐसे आसान तरीके भी बताए गए हैं जो आपको इन आदतों से छुटकारा दिला सकते हैं। इनकी मदद से आप अपनी सेहत और वजन पर कंट्रोल कर सकते हैं।
ये किताब किनको पढ़नी चाहिए?
- जिनको डाइटिंग करना मुश्किल लगता है।
- जो लोग हेल्दी और पॉजिटिव लाइफ जीना चाहते हैं।
- जिनको साइकोलॉजी में रुचि है।
लेखक के बारे में
ब्रायन वानसिंक कंज्यूमर बिहेवियर के प्रोफेसर और कॉर्नेल यूनिवर्सिटी में कॉर्नेल फूड एंड ब्रांड लैब के डायरेक्टर हैं। इसके अलावा USDA के सेंटर फॉर न्यूट्रीशन पॉलिसी एंड प्रमोशन के लिए उन्होंने एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर के तौर पर काम किया है। अपनी स्टूडेंट लाइफ में उन्होंने फूड साइकोलॉजी और ईटिंग हैबिट पर रिसर्च पेपर लिखे हैं जो न सिर्फ इंटरनेशनल लेवल पर पब्लिश हुए बल्कि उनको अवार्ड भी मिला। उनके इस काम की वजह से हमारे लिए खान-पान की आदतों और खरीदारी करने के पीछे की साइकोलॉजी को समझना ज्यादा आसान हुआ।रेस्टोरेंट और बिजनेसमैन ऐसे बहुत से तरीके आजमाते हैं जिनसे आपकी ईटिंग हैबिट बदलें और उनको फायदा हो।
आपने एक शब्द सुना होगा माइंडलेस ईटिंग। इसका मतलब होता है कि हम खाना खाते तो हैं पर ये एहसास किए बिना कि हम क्या खा रहे हैं, कितना खा रहे हैं, और खाना हमें पसंद आ भी रहा है या नहीं। दरअसल हमने "पेट भर के खाना" का मतलब गलत समझ लिया हैं। आप पढ़ेंगे कि पेट भरके खाने का मतलब इस लिमिट तक खा लेना नहीं होता जहां आपका पेट ही आपको और खाने से रोकने लगे। ऐसी कौन सी ट्रिक्स हैं जिनसे आप अपनी सही खुराक ले पाएंगे? किस तरह साधारण सी चीजों को मार्केटिंग स्किल से फैंसी और टेम्पटिंग बनाकर आपके सामने सजा दिया जाता है। और कुछ टिप्स भी हैं जिनसे आप अपनी डाइट में बदलाव लाकर उसके पॉजिटिव इफेक्ट्स देख सकते हैं।
ये सब इस किताब में पढ़िए।
तो चलिए शुरू करते हैं!
बहुत से लोगों को लगता है कि विज्ञापन या मार्केटिंग में की जा रही ट्रिक्स उन पर असर नहीं डालतीं। वे सोचते हैं कि "चाहे दूसरे इससे प्रभावित हों पर मुझ पर इन चालाकियों का कोई असर नहीं होता।"
और मजे की बात ये है कि हर कोई ऐसा ही सोचता है। अगर खान-पान की बात करें तो उनकी मार्केटिंग इस तरीके से होती है कि वह हर किसी को प्रभावित कर देती है।
सबसे पहली बात तो ये है कि अच्छी मार्केटिंग साधारण से लगने वाले खाने को भी आकर्षक बना देती है। यहां तक कि अगर रेस्टोरेंट के मेन्यू में किसी डिश का नाम जरा स्टाइलिश या अलग सा हो तो लोग उसे ही ज्यादा ऑर्डर और पसंद करते हैं बजाए किसी ऐसी डिश के जिसका नाम एकदम सामान्य सा हो। आप खुद सोचिए कि आप इडली खाना पसंद करेंगे या स्टीम्ड राइस एंड लेंटिल केक?
और ये बात एक रेस्टोरेंट में किए एक्सपेरिमेंट से साबित भी की जा चुकी है। वहां एक डिश का नाम था "सीफूड फिलेट।" फिर उसका नाम बदलकर "सक्यूलेंट इटालियन सीफूड फिलेट" रख दिया। इसी तरह बाकी चीजों के नाम भी बदले गए। और ये देखा गया कि लोगों को फैंसी नाम वाली डिश ज्यादा अच्छी लगी। और तो और रेस्टोरेंट को लेकर भी उनके रिव्यू ज्यादा बेहतर आए। जबकि डिश की रेसिपी में कोई बदलाव नहीं किया गया था। इसी तरह फूड आइटम की पैकिंग भी बहुत सोचकर की जाती है। जिससे लोगों का ध्यान उस पर जाए।
दूसरी बात ये है कि ब्रांड मार्केटिंग भी हमारा नजरिया बदल देती है। यह एक आम धारणा है कि ब्रांडेड चीजें ही अच्छी होती हैं और लोकल चीजों में उनकी तरह क्वालिटी नहीं होती। हम पहले से ही मान कर बैठे हैं कि कोका-कोला या बेन एंड जेरी के टेस्ट का मुकाबला कोई दूसरा प्रोडक्ट नहीं कर सकता। इसके लिए भी एक्सपेरिमेंट किया गया। इससे ये पता चला कि जब लोगों को ये नहीं पता होता कि वो कौन से ब्रांड का प्रोडक्ट खा या पी रहे हैं तो उनको सबके टेस्ट एक जैसे लगते हैं। फिर भी वो ब्रांडेड आइटम को मंहगे दामों पर खरीदने को तैयार रहते हैं।
हमारे आसपास का वातावरण, लाइट, सजावट, तापमान जैसे बहुत से फैक्टर्स खाते वक्त हम पर असर डालते हैं।
सादा सा खाना भी धीमी रोशनी और मधुर संगीत में मजा देता है और हम आराम से धीमे-धीमे खाना एंजॉय करते हैं। जबकि अच्छे से अच्छा खाना तेज रोशनी, शोर-शराबे और बिखरी चीजों के बीच बेस्वाद लगता है। और हम जल्दी-जल्दी खाना निपटा देते हैं।
जिस तरह बिजनेसमैन हमारे विचारों को अपने फायदे के लिए टार्गेट करते हैं, हम भी अपने विचारों का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए कर सकते हैं।
जिस तरह बिजनेसमैन हमारे विचारों को अपने फायदे के लिए टार्गेट करते हैं, हम भी अपने विचारों का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए कर सकते हैं।
आपने पढ़ा कि किस तरह खाने की चीजों के नाम या पैकिंग बदलकर हमको कन्फ्यूज कर दिया जाता है कि प्रोडक्ट की क्वालिटी या टेस्ट बेहतर है। लेकिन जिस तरह मार्केटिंग से हमारे दिमाग पर काबू पाया जा सकता है, हम खुद भी अपनी सोच को अपने फेवर में कर सकते हैं। असल में ये सब कुछ आपके परसेप्शन का खेल है। आप वजन कम करने के लिए अपने खाने में कटौती करने के बाद भी खुद को ये यकीन दिला सकते हैं कि आपने जरूरत से ज्यादा कैलोरी ले ली है। क्योंकि भरपेट खाने का एहसास दिलाने में हमारे पेट से ज्यादा आंखें मदद करती हैं।
यानि अगर आपने एक प्लेट पूरी भर ली है तो आपको यही लगेगा कि आप बहुत ज्यादा खा रहे हैं। भले ही उस भोजन में कैलोरी की मात्रा कम हो। इसके उलट अगर आप कोई हाई कैलोरी वाली चीज भी खा लें जिसकी क्वांटिटी देखने में कम लगे तो आपको ऐसा नहीं लगेगा कि आपने ओवरईटिंग की है। ये आइडिया आपकी बहुत मदद कर सकता है। क्योंकि खाने की मात्रा से ज्यादा फर्क तो कैलोरी इनटेक से ही पड़ता है। तो अगली बार अपनी प्लेट तैयार करते वक्त उसे ऐसी चीजों से सजा लें जिसमें कैलोरीज कम हों। इसे देखते ही आपका पेट भरने लगेगा। आपके कुछ फिक्स्ड पैटर्न बन जाते हैं जिनको बदलकर आप एक हेल्दी ईटिंग हैबिट बना सकते हैं। आपको बस ये समझना है कि गल्ती कहां हो रही है। फिर आप इसे सुधार भी सकते हैं।
आप टीवी देखते हुए पॉपकार्न का पैकेट उठा लाते हैं और एक-एक करके खाने लगते हैं।
इस दौरान आप टीवी में इतना खो जाते हैं कि रोबोटिक तरीके से आपका हाथ पॉपकॉर्न के पैकेट से मुंह की तरफ जाने लगता है। आपका पेट भर जाने के बाद भी ये सिलसिला जारी रहता है क्योंकि आपका सारा अटेंशन तो टीवी में है। ये आपके खाने का एक पैटर्न है।
इसे बदलने के लिए अगली बार टीवी देखते हुए पॉपकार्न के बड़े से पैकेट के बदले एक छोटा सा बाउल ले आइए। ताकि जब वो खाली हो जाए तो आपको उसे भरने के लिए दुबारा उठना पड़े। इस तरह आप टीवी के असर से बाहर आएंगे। आपको यह रियलाइज होगा कि आपने काफी खा लिया है। और बाउल को दुबारा भरने की जरूरत नहीं है।
आपकी प्लेट और सर्विंग के साइज की वजह से आप अनजाने में जरूरत से ज्यादा खा लेते हैं। हम कितना खाना खाते हैं इस पर हमारा सबकांशस एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। खाने की प्रेजेंटेशन भी इस पर असर डालती है। इसका सीधा सा मतलब ये है कि खाने की प्लेट या पैकेट जितने बड़े होंगे हम भोजन भी उतना ज्यादा कर लेंगे। इस बात को एक थिएटर में किए गए एक्सपेरिमेंट से साबित भी किया जा चुका है। फिल्म देखने आए लोगों को पॉपकॉर्न के मीडियम या लार्ज साइज पैकेट दिए गए। पैकेट इतने बड़े बनाए गए थे कि इनको पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सकता था।
और इसका नतीजा ये निकला कि जिन लोगों को लार्ज पैकेट दिए गए थे, उन्होंने ज्यादा पॉपकॉर्न खा लिए। इस एक्सपेरिमेंट से ये साबित हुआ कि हमारी आंखें हमको चकमा देकर ओवरईटिंग करा देती हैं। पॉपकॉर्न तो बराबर थे। लेकिन पैकेट के साइज में फर्क होने की वजह से लार्ज पैकेट में कुछ जगह खाली थी। इसे देखकर लोगों को ये लगा कि पैकेट में तो थोड़े से पॉपकॉर्न हैं। यह एक तरह का ऑप्टिकल इल्यूजन है।
रेस्टोरेंट इस बात का फायदा उठाकर आपको बड़ी प्लेट में सर्व करते हैं। जिसे देखकर आपको लगता है कि प्लेट तो खाली है और आपने ज्यादा कहां खाया है। इस चक्कर में आप ज्यादा खा लेते हैं।
ये एक्सपेरिमेंट आप घर पर कीजिए। दो अलग साइज की प्लेट लीजिए और उसमें बराबर खाना भरिए। अब देखिए कि कौन सी प्लेट में खाने वाला दूसरी सर्विंग मांगता है।
हमें कितना खाना चाहिए इस बात के लिए हम अपने शरीर से मिल रहे सिग्नल को अनदेखा करके सुनी सुनाई बातों पर ज्यादा भरोसा करते हैं।
हमारा शरीर हमें हर अच्छी-बुरी कंडीशन का सिग्नल दे देता है। जैसे अगर हम कुछ गड़बड़ खा लेते हैं तो जी मिचलाता है या वॉमिट हो जाती है। जब हमें चोट लगती है तो दर्द महसूस होता है। ताकि हम अपना और नुकसान होने से रोक लें और सावधानी बरतें। लेकिन अगर ईटिंग लिमिट की बात की जाए तो पेट भर जाने वाले सिग्नल इतने स्ट्रांग नहीं होते कि हम उनको समझकर और खाते जाना बंद कर दें। ऐसा क्यों होता है?
क्योंकि फुलनेस की इन्फॉर्मेशन आने में देर लगती है। हमारा डाइजेस्टिव सिस्टम ब्रेन तक यह सिग्नल अपने फुल हो जाने के बीस मिनट बाद ही भेज पाता है। और इस दौरान हम खाना जारी रखते हैं। सोचकर देखिए कि इन बीस मिनटों में हम कितनी ओवर ईटिंग कर सकते हैं। अगर खाने की स्पीड कम हो तो फिर भी ठीक है। लेकिन लोगों को खाना फिनिश करने की जल्दी रहती है। हमें बचपन से यही सुनते हैं कि "जल्दी-जल्दी खाना खत्म करो, तुम कितना धीरे खाते हो!" अमेरिकन अपने लंच को लगभग 11 मिनट में ही खत्म कर लेते हैं। अगर आप भी इस तरह खाते हैं तो अंदाजा लगा लीजिए कि आपको फुलनेस का सिग्नल मिलने का कोई चांस है भी या नहीं?
तो आखिर हम यह कैसे समझते हैं कि अब हमें बस कर देना चाहिए?
इसके लिए हम उन बातों का सहारा लेते हैं जो अपने आस-पास सुनते और देखते आ रहे हैं। जब हम एक टेबल पर सबके साथ खाने के लिए बैठते हैं तो तब तक बैठे रहते हैं जब तक सब लोग खाना न खा लें। ये एक सोशल नॉर्म है। लेकिन हम भी ऐसे ही बैठे नहीं रहते बल्कि अपनी प्लेट में कुछ न कुछ लेते रहते हैं। यानि अगर आप दूसरों की तुलना में तेजी से खाते हैं तो इस बात के चांसेस बहुत ज्यादा हैं कि आप अपनी जरूरत से ज्यादा खा लेंगे। हालांकि ये सोशल नॉर्म्स हर जगह अलग-अलग मिलेंगे। लेकिन ये तय है कि हम इनसे बहुत प्रभावित होते हैं।
इससे बचने का एक बहुत आसान उपाय है। अगली बार जब आप टेबल पर बैठें तो सबसे आखिर में भोजन करना शुरु कीजिए। बहुत आराम से खाइए। इस तरह शायद ही आपको दूसरी सर्विंग की जरूरत पड़े।
ओवरईटिंग की एक वजह यह भी होती है कि हमको अपनी खुराक का सही अंदाजा नहीं होता है। लगभग हर पैक्ड फूड में सर्विंग का साइज लिखा होता है पर हममें से कितने लोग इसको पढ़ते हैं?
कोक की एक छोटी बॉटल पर लिखा होता है कि इसमें 2.5 हिस्से हैं। यानि इसे दो बार से ज्यादा सर्व करना है। जबकि हम उसे एक बार में अकेले ही पी लेते हैं। ये तो एक छोटा सा उदाहरण है। हम रोजाना ऐसी गलती न जाने कितनी बार करते होंगे। हम इस बात को समझते ही नहीं कि एक पैकेट या एक बॉटल, सिंगल या वन टाइम कंज्यूम करने के लिए नहीं होता है। यानि अगर आप कोक की बॉटल आधी भी खाली कर दें तो आप तय लिमिट से ज्यादा पी रहे हैं और फिर भी आपका दिमाग इस बात को नहीं मानेगा। आपको यही लगेगा कि आपने तो आधी बोतल ही पी है। अमेरिका जैसे देशों में प्रचलित सुपर साइज कल्चर इसको और बढ़ाता है। जहां फैमिली पैक ये सोचकर खरीद लिए जाते हैं कि ये सस्ते होते हैं।
इसकी वजह हमारे अतीत में मिलती है।
हमारा इवॉल्यूशन इस तरह हुआ है कि हम हमेशा खाने के आसान रास्ते ढूंढते हैं। हम चाहते हैं कि कम मेहनत या खर्च में ज्यादा खाना मिल जाए। इसलिए अगर हमें एक बड़ा पैकेट कम कीमत में मिलेगा तो हम उसे जरूर खरीद लेंगे। हमारा ध्यान कैलोरी पर नहीं कीमत पर रहता है।
लेकिन इनसे अनहेल्दी ईटिंग हैबिट बढ़ती है।
हम जितना बड़ा पैक लेंगे उतना ही ज्यादा खाएंगे। खाना पकाते हुए भी अगर आप एक बड़े पैकेट में से सामान लेते हैं तो आपका ध्यान पोर्शन या सर्विंग साइज पर नहीं जाता। और अगर ज्यादा खाना पका लिया जाए तो ओवर ईटिंग भला कैसे कम हो पाएगी?
अपने परिवार की सेहत का ध्यान रखते हुए डाइट प्लान करें।
आम तौर पर पेरेंट्स इस बात का ध्यान रखते हैं कि उनके बच्चे टीवी पर क्या देखते हैं। इससे बच्चे सोशलाइज भी होते हैं और कोई ऐसा प्रोग्राम भी नहीं देख पाते जिससे उन पर बुरा असर पड़े। इसी तरह सेहत को ध्यान में रखते हुए इस बात पर भी नजर रखनी जरूरी है कि आप और आपकी फैमिली किस तरह का भोजन खा रही है। इसके लिए आगे बताई गई बातों पर अमल करें। अब आप ये समझ चुके हैं कि बड़े पैकेट साइज ओवरईटिंग की वजह बनते हैं। इसलिए छोटे पैक लें। अगर फैमिली पैक आ भी जाते हैं तो उनके छोटे पोर्शन बना कर रख लें। इस तरह आप न तो ज्यादा खाना पकाएंगे और न ही ज्यादा खा सकेंगे।
इस बात पर भी ध्यान रखिए कि आपके घर की फूड हैबिट क्या हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि आप सब आलू, पास्ता, चीज या रेडी टू ईट मील पर ही निर्भर होते जा रहे हैं? खाने में बहुत सी वेराइटी होती है। हर चीज की अपनी जरूरत और महत्व है। इसलिए आज आप जो चीजें खरीद लाए हैं, अगले हफ्ते उन्हें न लाकर दूसरी चीजों पर फोकस करें।
आप खाना बनाते हुए भी नए-नए तरीके आजमाइए।
बहुत सी सब्जियां ऐसी हैं जिनको आप कभी उबालकर, कभी बेक करके और कभी सलाद की तरह भी इस्तेमाल कर सकते हैं। ये तो तय है कि हर रोज आप अपनी प्लेट को हेल्दी नहीं बना सकते। बच्चों वाले घर में ये और भी मुश्किल होता है। पर जब आप खाने में एक्सपेरिमेंट करने लगते हैं तो हर सदस्य की फूड हैबिट भी डेवलप होने लगती है। और हम अपने उस बेसिक ह्यूमन नेचर को पीछे छोड़ने लगते हैं जो हमें नमकीन, तली हुई या मीठी चीजों की तरफ ललचाता है। अब तो वैसे भी आपको हर तरह की एक्जोटिक चीजें हर जगह मिल जाती हैं। तो देर किस बात की? आज ही कोई नई डिश बनाइए। आपकी मदद करने के लिए कुकिंग क्लास, किताबें और इंटरनेट तो है ही।
डाइटिंग का सही फायदा तभी मिल सकता है जब आप छोटे और प्रेक्टिकल टार्गेट से शुरुआत करें। लोग डाइटिंग की शुरुआत तो बहुत जोश में कर लेते हैं पर थोड़े समय बाद अपनी पुरानी आदतों पर लौट आते हैं। अगर डाइटिंग करके आखिर में आपने भी यही किया है तो निराश मत हों। यह बहुत सामान्य सी बात है। डाइटिंग के लिए एक स्ट्रिक्ट रूटीन फॉलो करना जरूरी है। और यह सबके लिए मुश्किल होता है।
अब इसका सॉल्यूशन जानते हैं।
डाइटिंग की शुरुआत छोटे बदलावों के साथ करनी चाहिए। ये बिल्कुल वैसा ही है जैसे आप एक्सरसाइज करना शुरु करते हैं। कुछ दिन तक आप हल्के अभ्यास करते हैं। धीरे-धीरे आप एक्सरसाइज का टाइम और डिफिकल्टी बढ़ाते हैं। अगर एक ही दिन में हेवी एक्सरसाइज कर लेंगे तो इतना थक जाएंगे कि अगले काफी दिन का गैप आ जाएगा। यही नियम डाइटिंग पर भी लागू होता है।
इसके लिए एक आसान सा तरीका है। एक चेकलिस्ट बनाइए और लिखिए कि ऐसी कौन सी तीन चीजें हैं जिनकी मदद से आप अपने खाने में रोज 100 कैलोरी घटा सकते हैं। जैसे कि मटन की जगह फल और सब्जियों का ज्यादा इस्तेमाल, तेल और चीनी की मात्रा कम करना और पैक्ड फूड से दूरी बनाना।
अब इस चेकलिस्ट को फॉलो कीजिए। हो सकता है किसी दिन आपसे कुछ छूट जाए। फिर भी इतना तो तय है कि पहले की तुलना में आप ज्यादा हेल्दी रूटीन अपनाते जाएंगे। ये बात आपको मोटिवेट करेगी। याद रखिए बड़े बदलाव छोटी शुरुआत से ही होते हैं।
डाइटिंग न कर पाने की एक वजह यह भी है कि हम एक दम से खाना-पीना बंद कर देते हैं। अगर आपको मीठा खाने की आदत है तो आप उसे एक ही दिन में कभी नहीं छोड़ पाएंगे। हो सकता है दो-चार दिन निकल जाएं पर उसके बाद आपको मीठे कि इतनी कमी लगने लगेगी कि किसी दिन आप पिछले सारे दिनों की भरपाई एक साथ कर देंगे।
इसका उपाय यह है कि आप मीठी चीजों के नए सोर्स देखें। अगर आप आइस्क्रीम या चॉकलेट के दीवाने हैं तो कोशिश करके मीठे रसीले फलों से दोस्ती कीजिए। फल खाना बोरिंग लगता है तो स्मूदी या शेक बना लीजिए। अगर मिठाइयां पसंद हैं तो बाजार से लाने के बजाए घर पर बना लीजिए। और उसमें चीनी भी घटा लीजिए। धीरे-धीरे आप इतने मजबूत हो जाएंगे कि आपको कोई चीज नहीं ललचाएगी। फिर देखिएगा आपको डाइटिंग का कितना अच्छा नतीजा मिलेगा।
एक तरीका यह भी है कि आप अपने फेवरेट फूड को एक रिवार्ड की तरह लें। यानि अगर आपने आज दिन भर खाने में कोई चीटिंग नहीं की है तो रात को एक आइस्क्रीम खा लें। इससे यह फायदा होगा कि आप ईनाम के इंतजार में एक हेल्दी डाइट पर टिके रहेंगे।
अगली बार डाइटिंग शुरु करते हुए कछुए और खरगोश की कहानी याद रखें। जहां कछुआ धीमी शुरुआत करके भी जीत जाता है। यही बात डाइटिंग पर भी लागू होती है।
अगर आप खाते हुए खुद को मॉनीटर करते हैं तो ओवरईटिंग से बच सकते हैं।
शायद ही कोई ऐसा होगा जो खाते समय यह सोचता है कि मैं ओवरईटिंग न करूं। और जब बात अपने मनपसंद खाने की हो तब तो सवाल ही नहीं उठता। हम बस खाते चले जाते हैं। हमें बस यही लगता है कि हमने तो उतना ही खाया जितनी भूख थी। हम खाते हुए कितने लापरवाह होते हैं, इसके लिए एक एक्सपेरिमेंट किया गया। एक रेस्टोरेंट में कुछ लोगों को टमाटर सूप परोसा गया। उनका बाउल लगातार भर दिया जाता। लेकिन इस बात का ध्यान रखा गया कि वो बातों में उलझे रहें और उनको इस बात का पता न चले। इसका नतीजा यह रहा कि न तो किसी ने इस ट्रिक को नोटिस किया और न ही उनको ये ध्यान रहा कि उन्होंने अनजाने में दूसरों की तुलना में लगभग दुगना सूप पी लिया। और इसकी वजह वही थी कि हम ईटिंग के लिए सोशल नार्म्स ही फाॅलो करते हैं। और जब हमें इनकी समझ नहीं आती तब हम गले तक भर कर खा लेते हैं। अब खाते हुए खुद को मॉनीटर कैसे करें? जवाब है अपने सामने सबूत रखिए।
किसी रेस्टोरेंट में दो ग्रुप्स को अनलिमिटेड चिकन परोसा गया। एक टेबल को तुरंत साफ कर दिया जाता। वहीं दूसरी टेबल पर बचे हुए खाने का ढेर लगा रहता। इससे खाने वाले देख पाते थे कि वो कितना खाते जा रहे हैं। पहली टेबल के लोगों को इसका एहसास ही नहीं था क्योंकि उनके सामने इस बात का कोई सबूत ही नहीं था कि उन्होंने कितना खा लिया है। और वो खाते रहे। जबकि दूसरी टेबल के लोगों ने उनसे 28% कम खाया।
अगली बार आप भी किसी "अनलिमिटेड सप्लाई" वाले रेस्टोरेंट में जाते हैं तो इसका सबूत रखिए कि आप कितना खा रहे हैं। वरना ऐसा न हो कि आप खाते हुए वहीं लुढ़क जाएं।
कुल मिलाकर
ये सुनने में अजीब लगता है पर हमारे खान-पान की आदतें मार्केटिंग और सोशल रूल्स के माध्यम से कंट्रोल हो रही हैं। इनको बदलना हमारे हाथ में है। अगर हम माइंडफुल होकर खाने लगें और थोड़ा सा अलर्ट हो जाएं तो हेल्दी ईटिंग हैबिट डेवलप कर सकते हैं और एक बेहतर लाइफ जी सकते हैं।
क्या करें?
बड़ी प्लेट और फैमिली पैक जैसी चीजों से दूरी बना लें।
ये रिसर्च से साबित हो चुका है कि इनकी वजह से हम अनजाने में ओवरईटिंग कर लेते हैं। बड़ी प्लेट में रखा हुआ ज्यादा खाना भी प्लेट के साइज की तुलना में कम नजर आता है और हम ये मान लेते हैं कि हमने तो कम ही खाया है। जबकि असलियत इससे ठीक उलट होती है। छोटी प्लेट में थोड़ा खाना भी ज्यादा नजर आता है और हम ओवरईटिंग नहीं कर पाते। क्योंकि हमारी आंखें पहले ही ब्रेन तक ये मैसेज भेज देती हैं कि प्लेट बहुत ज्यादा भरी हुई है।
हेल्दी ईटिंग के लिए उन चीजों से दूर भागने की जरूरत नहीं है जो आपको बहुत पसंद हैं। बस इस बात का ध्यान रखिए कि आप ज्यादा कैलोरी न लें। दिन भर हेल्दी खाना खाइए और रात में अपना फेवरेट बर्गर या आइस्क्रीम एन्जॉय कीजिए।
येबुक एप पर आप सुन रहे थे Mindless Eating by Brian Wansink
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