Gaur Gopal Das
जीवन में बैलेंस और पर्पस की खोज
दो लफ्जों में
प्रैक्टिकल नॉलेज से भरी 2018 में आई यह किताब हमें, हमारे अन्दर और बाहर की दुनिया का बैलेंस बनाना सिखाती है. कैसे हम स्प्रिचुअल और सोशल दोनों ही पहलुओं को एक साथ लेकर चल सकते हैं, और कैसे इस बैलेंस को बनाये रखते हुए ज़िन्दगी में सुख और संतोष की प्राप्ति कर सकते हैं.
ये किताब किसके लिए है
- जो लोग अपनी लाइफ के पर्पस की तलाश में हैं
- जो लोग सफलता की बुलंदियों पर पहुँच कर भी संतुष्ट नहीं महसूस करते.
- जो लोग अपने अन्दर छुपी प्रतिभा की तलाश में हैं.
लेखक के बारे में
पेशे से इंजिनियर, गौर गोपाल दास, हेवलेट पैकार्ड (Hewlett Packard) नामक कंपनी में काम करते थे. 1996 में वो नौकरी छोड़कर इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर कृष्णा कौनशीअसनेस (International Society for Krishna Consciousness) यानी ISCKON से जुड़ गए. आज वो एक मोटिवेशनल स्पीकर हैं और लोगों को जीवन जीने का सही तरीका समझाते हैं. गौर गोपाल दास संत के तौर पर मुंबई स्तिथ आश्रम में रहते हैं. बतौर लेखक ये उनकी पहली किताब है.जीवन में आभार को महसूस करना हमेशा आसान तो नहीं है, पर एक खुशहाल निजी जीवन के लिए ये सबसे जरुरी है.
आपने कभी टायरों में कम हवा के साथ गाड़ी चलयी है?
ऐसे में गाड़ी चल तो सकती है, लेकिन अगर आपने जल्दी इसका कोई उपाय नहीं किया तो आपकी गाड़ी के एक-दो टायर पंक्चर हो जायेंगे जिसके बाद गाडी को चलाना नामुमकिन हो जाएगा. कुछ ऐसा ही हमारे जीवन के साथ भी है. लेखक जीवन को एक मोटर गाडी की तरह देखते हैं हैं, जिसके चार जरुरी स्तम्भ हैं जैसे गाड़ी के चार पहिये. ये स्तम्भ हैं आपका निजी जीवन, आपका कार्यस्थल का जीवन, आपके रिश्ते और आपका सामाजिक योगदान. आध्यात्म इस गाडी की स्टीयरिंग व्हील की तरह है, जिसके बिना हम गाड़ी को सही दिशा में चलाने का सोच हीं नहीं सकते. इस किताब में हम जीवन की गाड़ी के इन्हीं जरुरी पहलुयों पर चर्चा करेंगे और जीवन के इंजन के रहस्यों को उजागर करेंगे.
लेखक अपने एक दोस्त की कहानी के साथ इस अध्याय की शुरुवात करते है. उनके दोस्त की साढ़े चार साल की बेटी गंधर्विका को इतनी छोटी उम्र में बर्रकिट’स लिंफोमा (Burkitt’s Lymphoma) नाम का जानलेवा कैंसर हो गया था. ये घटना किसी भी परिवार को तोड़ कर बिखेर सकती है. लेकिन मायूस होने का इतना बड़ा कारण होने बावजूद उसके माँ-बाप नें कभी जीवन में आशा का साथ नहीं छोड़ा. उनके रिश्तेदारों और दोस्तों नें भी उनका भरपूर साथ दिया. फिर वो चाहे गंधर्विका के ठीक होने के लिए प्रार्थना हो या उसके इलाज़ के लिए पैसा जिससे जो बन पड़ा, उसने वो किया.
उसके माता-पिता भी चाहते तो अपनी किस्मत पर रोते हुए जीवन बिता सकते थे, पर उन्होंने इश्वर से कोई शिकायत नहीं की बल्कि वह इतने मददगार दोस्त और रिश्तेदार देने के लिए शुक्रगुजार थे.
आभार का भाव रखना एक स्वस्थ और खुशहाल जीवन के लिए बहुत जरुरी है. पर समस्या ये है कि इंसानी दिमाग दुःख और गुस्सा भरी घटनाओं को भूल हीं नहीं पता. इसलिए शुक्रगुजारी को जीवन में लाना मुश्किल हो जाता है. लेकिन कभी भी अगर आपको अपने जीवन में शुक्रगुजारी की कमी महसूस हो तो गंधर्विका के माता-पिता को याद कर जरुर ली जिएगा जिनकी बदकिस्मती भी उनके जीवन से शुक्रगुजारी को नहीं मिटा सकी.
लेखक मानते हैं कि जीवन में शुक्रगुजारी लाना इतना आसान नहीं है, लेकिन अगर हम थोडा प्रयास करें तो ये मुमकिन है. आप अपने जीवन से रोज बस 10 मिनट निकालिए और किसी डायरी में आज के दिन की उन बातों को नोट कीजिये जिनके लिए आप शुक्रगुजार हैं. वो कोई भी छोटी सी बात हो सकती है जैसे किसी अजनबी द्वारा दी गयी मुस्कान या किसी पुराने दोस्त का अचानक मिल जाना.
ऐसा करने से आप अपने जीवन के उन पलों को पहचान पाएंगे जिनके लिए आपको शुक्रगुजार रहना चाहिए. साथ हीं साथ आपको उन बातों को याद रखने में भी आसानी होगी. एक बार आपने शुक्रगुजारी से भरे उन पलों को पहचान लिया उसके बाद आप दूसरों से शुक्रगुजारी व्यक्त करना सीखें. इसे करने का सबसे आसान तरीका है कि आप पिछले 24 घंटों में जिस-जिस व्यक्ति या पलों के शुक्रगुजार रहे हैं उनके बारे में सोचें. उसके बाद उन लोगों को अपनी भावना जाहिर करने के उपाय सोचें, जैसे कि अपनी बीवी को स्वादिष्ट खाना बनाने के लिए शुक्रिया कहना. ये हर हफ्ते करें और आप देखेंगे कि आभार के भाव को अपने जीवन में लाने से आपका जीवन स्वस्थ, संतुष्ट और खुशहाल बन गया है.
अपने निजी जीवन को संतुलित बनाने के लिए चिंताओं का त्याग करें और आध्यात्म को जीवन का हिस्सा बनाएं.
क्या आप व्हाट्स ऐप के फाउंडर ब्रायन ऐक्टन (Brian Acton) की कहानी जानते हैं? 12 साल तक पहले एप्पल फिर याहू के लिए जी तोड़ मेहनत करने के बाद ब्रायन नें अपने दोस्त जैन कौम (Jan Koum) के साथ कहीं घुमने का फैसला किया, उन्होंने एक साल साउथ अफ्रीका में बिताया. जब वो वापस आये तो उन्हें कहीं नौकरी नहीं मिली फेसबुक और ट्विटर दोनों नें उनका एप्लीकेशन रिजेक्ट कर दिया. पर इस रिजेक्शन को उन्होंने निराशा में कभी नही बदलने दिया. उस दौरान ट्विटर पर किये गए उनके जोशीले पोस्ट उनकी जिंदादिली का सबूत हैं.
उनके इसी जोश और लगन का नतीजा व्हाट्स ऐप के रूप में उन्हें मिला. जिस फेसबुक नें कभी उन्हें नौकरी पर नहीं रखा था उसी को 19 बिलियन डॉलर में उन्होंने व्हाट्स ऐप बेचा. इस कहानी से हमें ये सीख मिलती है कि जो चीज़ें हमारे बस में नहीं हैं उसकी चिंता हमें छोड़ देनी चाहिए, और जो हम कर सकते हैं उसपर ध्यान देना चाहिए. जैसे फेसबुक और ट्विटर में नौकरी मिलना ऐक्टन के हाथ में नहीं था लेकिन उस रिजेक्शन के प्रति अपना रिएक्शन उनके हाथ में था.
जीवन की समस्याओं से निपटने के लिए लेखक नें एक फ्लो चार्ट तैयार किया है. जिसमें कुछ सवाल है जिनके जवाब आपकी समस्याओं का समाधान कर सकते हैं.
सबसे पहला सवाल है कि क्या मेरे जीवन में कोई समस्या है? अगर इसका उत्तर ना है तो क्यूँ चिंता करना. अगर इसका उत्तर हाँ है तो अगला सवाल है कि क्या मैं इसके लिए कुछ कर सकता हूँ? अगर हाँ तो चिंता क्यूँ करना अगर ना तो भी चिंता क्यूँ करना.
आपने देखा कि कैसे जीवन के हर सवाल का जवाब एक ही है कि ‘चिंता क्यूँ करें. यही बात अलगाव यानि detachment के सिद्धांत का मूल है, जो आपके जीवन को प्रबोधन यानि enlightenment की ओर ले जा सकती है.
अगर आप अपनी समस्याओं के बारे में कुछ कर सकते हैं तो इसका मतलब है असल में आपको कोई समस्या है ही नहीं. और अगर आप उन समस्याओं का कुछ कर ही नहीं सकते तब भी चिंता करने में समय बर्बाद करने का कोई तुक नहीं बनता. इसका ये मतलब बिलकुल नहीं है कि आपको अपनी समस्या को सुलझाने के लिए कोई प्रयास नहीं करना.इसका बस ये मतलब है कि चिंता किये बिना जो आपसे हो सके वो करना है.
अपने निजी जीवन को सुधारने का एक और उपाय है आध्यात्म को जीवन का हिस्सा बनाना. इंसान की आत्मा का हमेशा आध्यात्म की ओर झुकाव रहता है, अध्यात्म आत्मा की जरुरत है. यहाँ लेखक ये साफ़ करते हैं कि आध्यात्म का मतलब कोई खास देवी-देवता नहीं बल्कि उस महाशक्ति से है जिसका प्रतिक हम अपने ईश्वर को मानते हैं. अपने और अपने इश्वर के बीच इस सम्बन्ध को महसूस करके हम अपने जीवन को प्यार से भर सकते हैं और दूसरों के जीवन में भी प्यार ला सकते हैं.
अपने जीवन में आध्यात्म को शामिल करने का सबसे सरल उपाय है मैडिटेशन. गोपाल दास जी मंत्र मैडिटेशन की सलाह देते हैं जिसमें मैडिटेशन के दौरान जीवनदायनी मंत्रों को दोहराया जाता है और ऐसा करते हैं हुए हम ज़िन्दगी के मायनों को भी समझ सकते हैं.
ज़िन्दगी की गाड़ी का अगला पहिया है हमारे रिश्ते, जो जीवन में प्यार और साथ का एहसास करवाते हैं. लेखक का मानना है कि रिश्तों को मधुर बनाने से पहले अपने व्यव्हार को समझना जरुरी है.
इस बात को समझाने के लिए लेखक नें एक कहानी का सहारा लिया है. एक बार एक पति-पत्नी एक कॉलोनी में रहते थे. पत्नी अक्सर अपनी खिड़की से लोगों के घरों में टंगे कपड़ों को देख उनपर ताने कसा करती थी, कि वे कपड़ों को सही ढंग से नहीं धोते. एक दिन अचानक उसने देखा कि उसके पड़ोसियों के घर टंगे कपडे साफ़ सुथरे लग रहे हैं, उसने फ़ौरन अपने पति से कहा कि लगता है आज इन लोगों नें किसी और से कपडे धुलवाये हैं. तब हँसते हुए उसके पति नें बताया कि आज उसने खिड़की साफ़ की है. उनके कपड़े नहीं हमारी खिड़की गन्दी थी.
इसी तरह दूसरों के बारे में राय बनाने से पहले हमें ये देख लेना चाहिए कि हम उन्हें किस खिड़की से देख रहे हैं.
लेखक कहते हैं कि दुनिया में पांच प्रकार के लोग होते हैं और पाँचों का दूसरों को देखने का अपना-अपना नजरिया होता है.
पहले वो लोग जो दुसरों में केवल बुराईयाँ हीं देखते हैं. ये लोग नफरत और असुरक्षा यानि Insecurity से भरे होते हैं. लोगों की छोटी से छोटी बुराई भी इन्हें बड़ी लगती है और उनका बड़े से बड़ा गुण भी इन्हें नज़र नहीं आता. ये लोग कुछ इस प्रकार होते हैं कि अगर उनकी खिड़की साफ़ भी कर दें तो भी उन्हें कपडे गंदे हीं लगेंगे.
दुसरे किस्म के लोगों को अच्छाई और बुराई दोनों नज़र तो आती है पर उनका मन बुराई की तरफ थोडा ज्यादा ध्यान देता है. उनके चारों तरफ कितनी भी अच्छी चीज़ें क्यूँ न हो रही हों वो बुराई की तरफ ज्यादा आकर्षित महसूस करते हैं.
तीसरी तरह के लोग भी लगभग दुसरे किस्म के लोगों जैसे हीं होते हैं बस फर्क ये है कि इन्हें बुराई हो या अच्छाई दोनों हीं से कुछ खास फर्क नहीं पड़ता.
चौथे किस्म के लोगों को अच्छाई और बुराई दोनों का ज्ञान तो होता है पर वो अपना ध्यान केवल अच्छाई के तरफ केन्द्रित रखते हैं. ये लोग मानते हैं कि इंसानों का मूल स्वाभाव हीं है बुराईयों को पकड़ के बैठे रहने का. इन लोगों को ऐसा करने के लिए काफी मेहनत भी करनी पड़ती है. लेकिन ये मेहनत उन्हें सही निर्णय लेने और रिश्तों को संजो कर रखने में काफी हद तक मदद करती है.
जैसे आप हिंडाल्को (Hindalco) इंडस्ट्रीज और आदित्य बिरला ग्रुप के सीईओ को हीं ले लीजिये अपने किसी भी एम्प्लोयी के बारे में कोई भी निर्णय लेने से पहले वो उसकी अच्छाईओं की लिस्ट बनाते हैं जिसके कारण कंपनी को फायदा होता आया है. ऐसा करने से वो अपने गुस्से पर काबू पा लेते हैं और सही फैसले ले पाते हैं.
और पांचवें किस्म के लोग तो बहुत कम हीं पाए जाते हैं. इन लोगों को किसी में बुराई बिलकुल नज़र हीं नहीं आती. किसी व्यक्ति में अच्छाई की झलक मात्र को वो अपने ह्रदय में कई गुना बढ़ा लेते हैं. लेकिन हम में से ज्यादातर के लिए ऐसा कर पाना संभव नहीं है, केवल कुछ महाज्ञानी और साधक व्यक्ति हीं ऐसा कर पाते हैं.
हम साधारण लोगों को कम से कम चौथे किस्म का व्यक्ति बनाने का प्रयास करना चाहिए. अगर हम ऐसा कर पाते हैं तो हम यकीनन अपने रिश्तों में मधुरता और प्रेम ला सकते हैं.
किसी को भी फीडबैक देनें से पहले सोच समझ लें, और लोगों को माफ़ करना सीखें.
इस अध्याय में लेखक नें हमें बताया है कि हम चौथे प्रकार के व्यक्ति कैसे बन सकते हैं? एक ऐसा व्यक्ति जो दूसरों की अच्छाईओं और बुराईयों दोनों को जानते हुए भी अच्छाई पर हीं ध्यान केन्द्रित करें और दूसरों को हमेश दया और सम्मान से देखे.
इसके लिए सबसे पहले ये जानना जरुरी है कि किसी को कोई बात कहते हुए हमें किन शब्दों का इस्तेमाल करना चाहिए खासतौर पर जब हम किसी को उसके काम का फीडबैक दे रहे हों.
अंग्रेजी की एक पुरानी कहावत है कि Sticks and stones can break my bones but words will never hurt me?” जिसका मतलब है कि पत्थरों और डंडों से तुम मेरी हड्डियाँ तोड़ सकते हो, पर अपने शब्दों से मेरे हौसले को नहीं. लेकिन लेखक का मानना है कि ये बात सच नहीं है क्यूंकि शब्द एक ऐसा हथियार हैं जिसके प्रयोग से हम लोगों को ऐसे जख्म दे जाते हैं जो उनकी आत्मा को चोट पहुंचाते हैं, उन घावों को भरने में बहुत समय लगता है. तो अगर आप किसी से कोई जरुरी और संवेदनशील बात कहने जा रहे हैं तो एक बार खुद से ये चार सवाल जरुर पूछ लें.
पहला सवाल है कि क्या आप जो कहने जा रहे हैं, उसे कहने के लिए आप सही व्यक्ति हैं या नहीं? इसका मतलब है क्या आप उस इंसान को अच्छे से जानते हैं, क्या आप उसके जीवन में इतना मायने रखते हैं या वो आपके जीवन में इतना मायने रखता है?
अगर इन सवालों का जवाब हाँ में मिले तो आप दुसरे सवाल की ओर जा सकते हैं, दूसरा सवाल है कि क्या मेरे पास ये बातें कहने का सही मकसद है? लेखक कहते हैं कि अक्सर लोग दूसरों की आलोचना इसलिए नहीं करते कि वो उनका दिल से भला चाहते हैं बल्कि इसलिए करते हैं क्यूंकि उनके मन में उस व्यक्ति के प्रति दुर्भावना या नाराज़गी होती है.
किसी से बदला लेने के लिए उसकी आलोचना कभी ना करें. अगर आप इस बात के लिए आश्वस्त हैं कि आपका इरादा नेक है तो आप अगले सवाल की ओर जा सकते हैं.
अगला सवाल है कि ‘क्या मुझे पता है कि फीडबैक देते हुए कैसे शब्दों का इस्तेमाल करना है?’ कई बार असल मुद्दे से ज्यादा आपके द्वारा इस्तेमाल किये हुए शब्द लोगों को चोट पहुंचती हैं. किसी पर बेवजह चीखने चिल्लाने ना लगें. बात करते समय अपना लहजा, अपने चेहरे का भाव और आपने शब्दों का इस्तेमाल ऐसा रखें कि उसमें दया और विनम्रता की झलक हो.
और आखरी सवाल है कि ‘क्या ये समय इस फीडबैक के लिए सही है?’ जैसे कि आपकी बीवी नें अभी अभी इतनी मेहनत से आपके लिए खाना बनाया है और आप तुरंत ये कह दें कि खाना अच्छा नहीं बना तो ये ठीक नहीं. इसकी बजाये वक़्त देख कर आप आराम से उसे बताएं ताकि आप उसकी भावनाओं को चोट पहुंचाए बिना अपनी बात रख सकें.
रिश्तों में दूसरी बड़ी चीज़ है माफ़ कर देना. आप व्यक्ति को समस्या से अलग कर के देखें तो आपको माफ़ करने में आसानी होगी. ये सब मेरे कारण हुआ सोच कर खुद को कोसने या ये सब उसके कारण हुआ सोच कर दुसरे पर नाराज़ होने कि बजाये ये सोचें कि ये सब कैसे हुआ.
अगर आप व्यक्ति को समस्या से अलग करने में सफल हो गए तो आप एक-दुसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने से बच जायेंगे और आपके लिए समस्या का समाधान निकालना आसान होगा. ऐसा करने से आपके लिए माफ़ करना भी आसान हो जायेगा.
आगे लेखक कहते हैं कि वर्कप्लेस पर कम्पटीशन का होना लाज़मी है, लेकिन आपको हमेशा एक हेअलथी कम्पटीशन का हिस्सा बनना चाहिए. अब जबकि आपने निजी जीवन और रिश्तों को सुधार लिया तो जीवन की गाड़ी के अगले पहिये कि ओर चलते हैं जो है आपका ‘काम’. वर्कप्लेस पर कम्पटीशन का होना स्वाभाविक है और इसमें कुछ गलत भी नहीं. लेकिन अगर आप तनाव मुक्त वातावरण चाहते हैं तो आपको हेअलथी और अनहेअलथी कम्पटीशन में फर्क करना आना चाहिए.
एक अनहेअलथी कम्पटीशन को हम इस उदाहरण से समझते हैं.
लेखक का जेमिन नाम का दोस्त था. वो एक बहुत ही होनहार और बेहतरीन फोटोग्राफर था और एक लोकप्रिय मैगज़ीन के लिए काम करता था. उसका HR डायरेक्टर उसके काम से काफी खुश था और उसे उसपर पूरा विश्वास था. इसलिए उसने जेमिन को अपने हिसाब से काम करने की आजादी दे रखी थी.
लेकिन जेमिन के साथ काम करने वाली स्टाइलिस्ट उसके रुतबे और सफलता से काफी जलती थी. इस जलन के मारे उसने कई बार जेमिन की बैकअप फोटोज डिलीट कर दी थी. जेमिन नें पांचवीं बार उसे फोटो डिलीट करते हुए पकड़ा, वो इस बात को लेकर मेनेजर के पास गया. लेकिन कहानी में एक ट्विस्ट था कि मेनेजर भी जेमिन से जलता था. मेनेजर और स्टाइलिस्ट दोनों नें मिलकर उल्टा उसे ही नाकारा और झूठा साबित कर दिया. जब ये बात डायरेक्टर को पता चली तो उसने सच का पता लगाया. डायरेक्टर नें जेमिन से काफी मिन्नतें की पर वो उस जगह पर अब काम नहीं करना चाहता था. उसने काम छोड़ अपना स्टूडियो खोल लिया.
इसलिए लेखक कहते हैं कि इर्ष्या और जलन में किया गया कार्य केवल नुक्सान हीं पहुंचता है. आईये जानें कि कैसे हम हेल्दी कम्पटीशन का हिस्सा बन सकते हैं.
आपका कम्पटीशन हमेशा अपने आपसे होना चाहिये दूसरों से नहीं. दूसरों की सफलता और तरक्की देख कर उनसे आगे निकलने कि रेस में लगने कि बजाये खुद को दिनों दिन बेहतर बनाने का प्रयास करें.
एक्टर मैथ्यू मैक्कनौगी (Matthew McConaughey) नें 2014 में ऑस्कर लेते हुए अपने स्पीच में ऐसे हीं कम्पटीशन का जिक्र किया था. उन्होंने बताया कि 15 साल कि उम्र में उनसे किसी नें पूछा कि उनका हीरो कौन है, थोडा सोच कर उन्होंने कहा कि ‘आज से 10 साल का मैं’. फिर लगभग 10 साल बाद उसी पत्रकार नें उनसे पूछा कि अब तो आप अपने हीरो बन , उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा नहीं बिलकुल नहीं अब मेरा हीरो है ’35 साल का मैथ्यू मैक्कनौगी है’.
खुद से कम्पटीशन करके न सिर्फ आप इर्ष्या और दुश्मनी की भावना से दूर रह सकते हैं बल्कि आप अपने आप को निखार कर अपने अन्दर छुपी काबिलियत को ढूंढ सकते हैं.
इकीगाई (Ikigai) के जापानीज मॉडल से आप अपने जीवन के मकसद को ढूंढ सकते हैं, ताकि आप जो करें उससे आपको प्यार हो, और जिससे आपको प्यार हो वही आप कर सकें.
खुद से कम्पटीशन करने का सिद्धांत सीधा-साधा है. पर इससे पहले कि आप इसे शुरू करें अपने जीवन के असल उद्देश्य को खोज लें. अगर ये काम आपको बहुत कठिन लग रहा हो तो जापानीज द्वारा बनाया इकिगाई मॉडल इसमें आपकी मदद कर सकता है.
इकिगाई का मतलब है ‘जीने का मकसद’ . ये मॉडल जीवन के चार पहलुओं पर आधारित है, हर पहलु से जुड़े कुछ सवाल है जिनका जवाब ढूढ़ते हुए आप अपने जीवन के उद्देश्य तक पहुँच जाएंगे. जैसे ‘आपको क्या पसंद है? किस काम को करने में आप बेहतर हैं? दुनिया को किस काम की जरुरत है? ऐसा कौनसे काम हैं जिनके लिए आपको पैसे भी मिल सकते हैं?
जब आप इन सभी क्षेत्रों को बराबरी से हासिल कर लेंगे तो आप इकिगाई को प्राप्त कर लेंगे. इनमें से एक की भी कमी आपके जीवन में अधूरापन ला सकती है.
जैसे कि मान लें आप कुछ ऐसा कर रहे हैं जो आपको पसंद हो और आप इसे करने में अच्छे भी हैं और दुनिया को इसकी जरुरत भी है, लेकिन अगर आपको उसके पैसे नही मिलेंगे तो थोड़े दिनों में हीं पैसों की कमी के कारण आपको नाकारा जैसा महसूस होने लगेगा.
वहीँ दूसरी ओर आप यदि कुछ ऐसा कर रहे हैं जिसे करना आपको पसंद भी हो, दुनिया को उसकी जरुरत भी हो और आपको उसके पैसे भी मिलते हैं. लेकिन अगर आप उसे करने में बेहतर नहीं हैं तो आप हमेशा अपने काम को लेकर अनिश्चित महसूस करेंगे.
यकीनन इकिगाई की खोज जीवन के मकसद को ढूंढने का अचूक तरीका है. लेकिन अगर आप इसे अपने जीवन के शुरुवाती सालों में ढूंढ लें तब तो आप आसानी से अपना करियर बदल सकते हैं लेकिन अगर आपको इसे समझने में देर हो जाए तब क्या करें?
अगर आपने अपना करियर बना लिया है और आपने उस कार्य में महारत भी हासिल कर ली है आपको उसके पैसे भी मिलते हैं. ऐसी परिस्थिति में आपके पास दो रास्ते हैं. पहला कि आप जो काम करते हैं उससे ही प्यार करना शुरू कर दें. कोई भी व्यक्ति अपने जीवन का 80% हिस्सा अपने काम में लगाता है इसलिए ये बहुत जरुरी है कि आपको अपने काम से प्यार होना चाहिए.
अगर आप जो करते हैं वो आपका ड्रीम जॉब नहीं है तब भी आपके पास आपके समय का 20% बचा है जिसे आप व्यर्थ की बातों और आलस से भरे पलों में न बिता कर जो काम आपको पसंद है उसे करने में बिताएं.
आगे लेखक कहते हैं की निःस्वार्थ बनने के लिए पहले थोडा स्वार्थी बनना भी जरुरी है और सामाजिक योगदान से हम आनंद प्राप्त कर सकते हैं. अब बारी आती है जीवन की गाड़ी के आखरी पहिये यानी सामाजिक योगदान की. इसके लिए आपको ये जानना जरुरी है कि आप मोमबत्ती की तरह हैं या आइस क्रीम की तरह.
लेखक कहते हैं कि आइस क्रीम की फिलोसोफी कुछ इस तरह होती है कि- पिघलने से पहले जीवन का पूरा आनंद उठा लो. ठंडी और मीठी आइस क्रीम जीवन को सुख लेने का जरिया मानती है और ऐसे लोग आत्म सुख को बाकि सब चीज़ों से ऊपर रखते है.
वहीँ दूसरी तरफ मोमबत्ती कि फिलोसोफी है कि पिझालने से पहले अपने चारों तरफ रौशनी फैला दो. मोमबत्ती खुद पिघल कर अपने आस-पास के वातावरण को रोशन कर देती है.
हम में कोई भी पूरी तरह मोमबत्ती कि फिलोसोफी पर नहीं चल सकता क्यूंकि किसी के लिए भी बस देते रहना मुमकिन नहीं है. इसलिए हम लोग मोमबत्ती और आइस क्रीम के बीच कि फिलोसोफी में अटके हैं. लेखक कहते हैं कि दूसरों को कुछ देने से पहले हमें खुद को एक मजबूत व्यक्ति बनाना बहुत ज़रूरी है. इसके लिए हमें जीवन के पहले तीन पहियों को मजबूत करना होगा तभी हम इस चौथे पहिये पर ध्यान दे सकते हैं. इसलिए हमें निःस्वार्थ भाव से सेवा करने से पहले थोडा स्वार्थी होकर खुद पर भी ध्यान देना होगा. अक्सर आपने फ्लाइट में लिखा हुआ देखा होगा किसी दुसरे को ऑक्सीजन मास्क पहनाने से पहले खुद का मास्क पहन लें, क्यूंकि आप खुद होश में रहेंगे तभी दूसरों कि मदद कर पाएंगे. इसलिए अपना जीवन और व्यक्तितिव सशक्त करने के बाद हीं हम सामाजिक योगदान की तरफ बढ़ सकते हैं. जीवन का अंतिम पहिया यानी सामाजिक योगदान, आन्तरिक शांति और आनंद के लिए बहुत हीं जरुरी है.
लेखक के अनुसार योगदान का काम हमें सबसे पहले अपने घर से शुरू करना चाहिए. हमने ऐसे कई लोग देखे हैं जो चैरिटी में तो खूब दान करते हैं लेकिन अपने हीं घर के लोगों की जरूरतों कि तरफ ध्यान नहीं देते. सबसे पहले हमें अपने घर के लोगों को अपना समय देना होगा उनकी भावनात्मक और शारीरिक जरूरतों को समझना होगा तभी किसी भी प्रकार की चैरिटी हमें शोभा देगी.
परिवार को संतुष्ट करने के बाद बाहरी योगदान देना भी बहुत जरुरी है, संस्कृत में इसे सेवा कहते हैं. सेवा किसी भी प्रकार की हो सकती है जैसे प्रकृति कि रक्षा, देश सेवा या जरुरतमंदों की मदद. अंत में लेखक कहते हैं कि जीवन के चारों पहियों को बैलेंस में रख के चलना चाहिए ताकि हमें जीवन के सफ़र का सही और आनंद ले सकें और उसे सार्थक बना सकें.
कुल मिलाकर
जीवन के चार महत्वपुर्ण पहलु हैं हमारी निजी जिंदगी, हमारा काम, रिश्ते-नाते और सामाजिक योगदान ये चारों जीवन की गाड़ी के चार पहिये हैं. जीवन की गाड़ी चलाने के लिए सबका संतुलन बनाये रखना बहुत जरुरी है. इसके साथ हीं आध्यात्म इस गाडी का स्टीयरिंग व्हील है. तो बस अपना स्टीयरिंग व्हील हाथ में रख कर चारों पहियों का सतुलन बनाएं और जीवन के सफ़र का आनंद लें.
सही कार्य, सही उद्देश्य और सही भाव
सेवा करने से पहले हमें ये जानना जरुरी है कि हम दूसरों की मदद क्यूँ करन चाहते हैं. इससे पहले कि बस बिना सोचे समझे दूसरों की देखा देखी करें, खुद से ये तीन सवाल जरुर पूछ लें. क्या मैं जो करने जा रहा हूँ वो सही है? इसका मतलब है कि आपकी सेवा का तरीका आपके आध्यात्मिक सिधान्तों से मेल खाना चाहिए. दूसरा कि क्या मेरा उद्देश्य सही है? अगर आप आप सेवा कर के नाम या दाम पाने की आशा रखते हैं तो बेहतर है कि आप ना हीं करें. और तीसरा कि क्या मेरा भाव सही है? क्यूंकि बस करना है इसलिए अगर आप सेवा कर रहे हैं तो आपको वो अनुभव नहीं होगा जो सच्चे हृदय से की जाने वाली सेवा से होता है.
