Know Yourself, Know Your Money... ____😉👉😊___🤔___💷

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Know Yourself, Know Your Money

Rachel Cruze
Discover Why You Handle Money The Way You Do, And What To Do About It!

दो लफ्ज़ों में 
साल 2021 में रिलीज़ हुई किताब “Know Yourself, Know Your Money” पर्सनल फाइनेंस के इर्द गिर्द घूमती है. इस किताब की मदद से आपको पर्सनल फाइनेंस के कई महत्वपूर्ण नियम सीखने को मिलने वाले हैं. ये किताब आपको केवल बजट मेकिंग और सेविंग नहीं सिखाएगी बल्कि ये डिसीजन मेकिंग की साइकोलॉजी को भी समझाएगी. अगर आपको अपनी फाइनेंशियल हेल्थ सुधारनी है. तो आपको समझना होगा कि आखिर आपसे ग़लती कहाँ हो रही है? और क्यों हो रही है? तो फिर देर ना करिए और अपने मनी माइंडसेट को बेहतर समझने की कोशिश शुरू करिए. 

ये किताब किसके लिए हैं?
- फाइनेंस के स्टूडेंट्स के लिए 
- ऐसे लोगों के लिए जो कुछ नया सीखना चाहते हों 
- ऐसे लोग जो पैसों के बारे में जानना चाहते हों 

लेखिका के बारे में 
आपको बता दें कि इस किताब का लेखन “Rachel Cruze” ने किया है. इनका लेखन की दुनिया में काफी बड़ा नाम है. ये लेखिका होने के साथ-साथ पर्सनल फाइनेंस कोच भी हैं. इन सभी के साथ ये “New York Times best sellers” किताब “Love Your Life, Not Theirs and Smart Money, Smart Kids” की ऑथर भी हैं.

इंसान की पैसों को लेकर सोच का रिलेशन उसके बचपन से होता है
अमेरिकन सेल्समैन और मोटिवेशनल स्पीकर Zig Ziglar ने पैसों को लेकर बहुत अच्छी बात कही है. उन्होंने कहा है कि “बेशक पैसा दुनिया की सबसे अच्छी चीज़ नहीं है, लेकिन फिर भी ये ऑक्सीजन से कम भी नहीं है..” इस लाइन से आपको लाइफ में पैसों के महत्व के बारे में पता चल चुका है. 

अगर आप इस महत्व को और करीब जानना चाहते हैं. तो ये किताब आपके ही लिए लिखी गई है. इस किताब की मदद से आप अपनी मनी जर्नी को बेहतर बना सकते हैं. इसी के साथ-साथ अगर आप भी पर्सनल फाइनेंस की समस्या का सामना कर रहे हैं. तो भी आपको इस किताब की समरी को “येबुक” एप पर ज़रूर सुनना और पढ़ना चाहिए. इसके अलावा इस समरी में आप जानेंगे कि फाइनेंशियल आदत और बचपन का क्या रिलेशन होता है? और फाइनेंशियल दिक्कतों से बाहर कैसे आ सकते हैं?

तो चलिए शुरू करते हैं! 

इस बुक समरी के सफर की शुरुआत हो गई है. शुरुआत में ही लेखिका “Rachel Cruze’s” अपनी दोस्त Amanda की कहानी शेयर करती हैं. वो बताती हैं कि उनकी सहेली को शॉपिंग का काफी ज्यादा शौक हुआ करता था. वो शॉपिंग को इसलिए नहीं करती थी कि उसे कोई अच्छी डील मिल रही होती थी. बल्कि वो शॉपिंग को खेल की तरह लिया करती थी. 

सभी सोचते थे कि समय के साथ उसकी आदत ठीक हो जाएगी, लेकिन जैसे-जैसे समय बीत रहा था. उसकी आदत खराब होती जा रही थी. अब एक ऐसा समय आ चुका था, जब उसके पास अच्छी जॉब भी थी. वो अच्छे पैसे कमाया करती थी. लेकिन उसकी शॉपिंग की आदत इतनी ज्यादा बढ़ चुकी थी कि वो अपनी कमाई से ज्यादा पैसे खर्च करने लगी थी. इसलिए महीने के अंत में तो उसके पास पैसे ही नहीं बचते थे. 

धीरे-धीरे समय और बीतता गया, उसकी शादी भी हो गई. वो 40 साल के आस पास  पहुँच रही थी. लेकिन उसकी शॉपिंग की आदत उसी तरह थी. अब तो उसकी आदत से उसका पार्टनर भी परेशान हो चुका था. इस मैटर को लेकर उनके बीच कई बार लड़ाई भी होती. इस आदत की वजह से उसकी शादी में भी दिक्कतें शुरू हो गई थी.

फिर उन्होंने काउंसलर से सलाह लेने का फैसला किया, जिसके बाद उन लोगों को पता चला कि  Amanda की इस आदत की वजह उनका बचपन है. दरअसल,Amanda के माता-पिता बहुत ही ज्यादा कंजूस हुआ करते थे. उनका पूरा बचपन पैसों की हद से ज्यादा कंजूसी में बीता था. जिसकी वजह से उनकी पर्सनालिटी में इस तरह के बदलाव देखने को मिले थे. 

इसलिए हमें समझना चाहिए कि फाइनेंशियल डिसीजन वैक्यूम में जन्म नहीं लेते हैं. इन फैसलों के पीछे कई सारे फैक्टर्स काम करते हैं. जैसे कि आपकी मंथली इन्कम कितनी है? आपका फैमिली बैकग्राउंड कैसा रहा है?

इसलिए किसी के फाइनेंशियल डिसीजन को समझने के लिए कई सारे फैक्टर्स पर गौर करना चाहिए. उसी के बाद कोई जजमेंट पास करना चाहिए. 

अगर आप अपने पर्सनल फाइनेंस को इम्प्रूव करना चाहते हैं तो सबसे पहले आपको ये समझना होगा कि आपका पैसों के प्रति ये रवैया क्यों है? आप अपने पैसों को ऐसे क्यों खर्च कर रहे हैं? इस क्यों के जवाब की तलाश शुरू कर दीजिए  

ज्यादातर लोग पैसों के बारे में वैसा ही सोचते रहते हैं. जैसा उन्होंने बचपन में सीखा होता है. याद रखिए कि पैरेंट्स का पैसों के प्रति जैसा रवैया है. उसी से बच्चों की हैबिट भी डेवलप होगी. अगर किसी बच्चे के पैरेंट्स पर्सनल फाइनेंस को लेकर अच्छे रहेंगे. तो इस बात की पूरी उम्मीद की जा सकती है कि उसके बच्चें भी पर्सनल फाइनेंस को लेकर अच्छे रहेंगे. 

यहीं से मनी क्लासरूम कांसेप्ट का जन्म भी होता है. इसका सीधा सा मतलब है कि फाइनेंस की बेसिक जानकारी किसी को भी इसी क्लासरूम से होती है. 

याद रखने वाली बात ये है कि अलग-अलग घरों में अलग-अलग तरह की क्लासरूम होती हैं. कई पैरेंट्स ऐसे भी होते हैं, जिन्होंने कभी बच्चों के सामने पैसों को लेकर कोई डिस्कशन की ही नहीं होती है. इस तरह के घर क्लोसड क्लासरूम तैयार करते हैं. 

वहीं कई घर ऐसे भी होते हैं, जहाँ पैसों की बात के साथ ही स्ट्रेस और एंग्जायटी का जन्म भी हो जाता है. उस घर के बच्चे पैसों को टेंशन के रूप में देखने लगते हैं. 

अगर आप भी चाहते हैं पता लगाना कि आपकी पैसों के साथ ये रिलेशनशिप कैसे बनी? तो एक बार अपने बचपन के घर की यादों में ज़रूर घूमने जाइएगा. आपको पता चल जाएगा कि किसी भी बच्चे की पहली फाइनेंशियल क्लासरूम उसके घर से ही शुरू होती है.

Anxious Classroom में डर का जन्म होता है
लेखिका की एक और दोस्त ने अपने बचपन के बारे में उनसे बातें साझा की थी. उसने बताया था कि जब वो बड़ा हो रहा था. तब वो अपनी मम्मी के साथ किराने के स्टोर में सामान खरीदने जाया करता था. 

एक दिन उसने ओब्सर्व किया कि उसकी मम्मी ब्रेड कुछ पुराना लिया करती थीं. इस बात का पता उसे ऐसे चला कि एक दिन वो अपनी दोस्त की माँ के साथ भी उस दूकान में चला गया था. उसनें देखा कि दोस्त की माँ फ्रेश ब्रेड ही खरीद रही है. वो पुरानी ब्रेड्स को दूर करते जा रही थी. ये देखकर उसे थोड़ा सा अजीब लगा क्योंकि उसकी माँ तो पुरानी ब्रेड ही खरीदा करती थी. 

उसनें घर आकर यही सवाल अपनी माँ से किया, सवाल सुनते ही माँ के चेहरे में टेंशन के भाव आ गए. कुछ देर रुककर उन्होंने जवाब दिया कि बेटा,,एक दिन पुरानी ब्रेड काफी ज्यादा सस्ती मिल जाती है. इसी के साथ उन्होंने ये भी बताया था कि इससे पैसों की काफी बचत हो जाती है. जिससे महीने के आखिरी में बिल्स पेमेंट में मदद मिलती है. 

उस समय उसे एहसास हो गया था कि उसके घर में पैसों की दिक्कत रहती है. 

आपको बता दें कि इस तरह के घर के माहौल को anxious classroom भी कहा जाता है, लेखिका  का दोस्त इसी क्लासरूम में बड़ा हो रहा था. इस तरह के माहौल से बच्चों के दिल में डर का जन्म भी हो जाता है. 

इसलिए लेखिका सलाह देती हैं कि पैरेंट्स को इन बातों का ख्याल रखना चाहिए कि उनका बच्चा कैसे माहौल में बड़ा हो रहा हैं. अगर वो किसी भी तरह के डर के बीच में बड़ा होगा तो उसकी ग्रोथ पूरी तरह से नहीं हो पाएगी. अगर आप चाहते हैं कि आपके बच्चों की फाइनेंशियल पोजीशन अच्छी रहे. तो उन्हें कभी भी किसी भी तरह के डर के माहौल से दूर रखने की कोशिश करिए.

अनस्टेबल क्लासरूम से उदासीनता आती है, इसलिए माहौल अच्छा रखने की कोशिश करिए
अभी तक हम लोगों ने चर्चा कर ली है और जान लिया है कि पैसों को लेकर कई तरह बिहेवियर देखने को मिलते हैं. 

कई घर पैसों के मामले साइलेंट होते हैं तो कई घरों में काफी हल्ला होता है. हमें इस बात को समझना चाहिए कि अगर किसी भी घर में हमेशा लड़ाई का माहौल रहेगा. तो उस घर के बच्चों के पैसों के साथ कभी भी अच्छा रिश्ता नहीं बन सकता है. 

इसलिए अगर हम चाहते हैं कि हमारे बच्चों का पैसों के साथ अच्छा रिश्ता कायम रहे, तो हमें अपने घर के माहौल को बेहतरीन बनाकर रखना होगा. 

अधिकत्तर पैरेंट्स गलती ये करते हैं कि वो पैसों को लेकर अपनी सारी परेशानी गुस्से के रूप में बच्चों के सामने रख देते हैं. इससे बच्चों के दिमाग में काफी बुरा असर पड़ता है. इसलिए घर के माहौल को लेकर हमें बहुत ज्यादा केयरफुल रहने की ज़रूरत है. 

इसी तरह के माहौल को अनस्टेबल क्लासरूम भी कहा जाता है. याद रखिएगा कि अनस्टेबल क्लासरूम की वजह से ही लोगों के दिमाग में उदासीनता का जन्म होता है. 

इसलिए आज से ही पैसों के मामले में काफी ज्यादा केयरफुल हो जाइए. 

इस बात को समझाने के लिए लेखिका आपको अपने दोस्त की कहानी से रूबरू करवाना चाहती हैं. वो बताती हैं कि उनके एक दोस्त के घर का माहौल भी काफी ज्यादा अनस्टेबल ही था. उसके पैरेंट्स लगातार पैसों को लेकर चिंता में रहते थे. वो इस चिंता को अपने बच्चों के साथ भी शेयर किया करते थे. जब भी पैसों को लेकर उनका समय बुरा चलता तो वो लोग काफी ज्यादा गुस्से वाले बन जाते, वहीं जब समय थोड़ा सही हो जाता, तो वही लोग ठीक हो जाते थे. 

बच्चों की स्पेशल डिमांड्स को भी वो लोग डांटते हुए नकार देते थे कि अभी उनका परिवार ये सब अफोर्ड नहीं कर सकता है. 

इसलिए हमें अपने घर के माहौल पर विशेष ध्यान देना चाहिए, और अनस्टेबल क्लासरूम से भी बचना चाहिए. क्योंकि किसी भी इंसान के सीखने की शुरुआत उसके घर से ही होती है.

पैसे कैसे काम करते हैं? इस कांसेप्ट को समझना भी बहुत ज़रूरी है
“Anxious” और “unstable classrooms” का जन्म पैसों की कमी के कारण होता है. लेकिन दिक्कतें केवल पैसों की कमी की वजह से नहीं होती हैं. बल्कि बहुत ज्यादा पैसे होने की वजह से भी कई इश्यु क्रिएट हो सकते हैं. 

और वहीँ से ‘unaware classroom’ की भी शुरुआत होती है. अगर आपकी परवरिश इस तरह के क्लासरूम में होगी, तो इस बात के बहुत ज्यादा चांस हैं कि आपको पैसों को लेकर कोई चिंता ही नहीं होगी. इस तरह के क्लासरूम में बड़े होने वालों के लिए पैसों का महत्व खत्म सा हो जाता है. 

एक बहुत फेमस कहावत है कि “ignorance is bliss” लेकिन ये कहावत यहाँ अप्लाई नहीं हो सकती है. लाइफ में एक ऐसा समय ज़रूर आता है. जब आपको अपने पैसों की ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए. साथ ही साथ आपसे अपने पैसों को कंट्रोल करते भी आना चाहिए. 

आपको बता दें कि ‘unaware classroom’ में बच्चें दो वजहों से बड़े होते हैं. 

पहली वजह- कई फैमलीज़ तो ऐसी होती हैं, जिनके आपस वाकई पैसों की कोई कमी नहीं होती, जिन पैरेंट्स को कभी पैसों की दिक्कत नहीं आती, उनके बच्चों को भी पैसों के बारे में ज्यादा सोचने की ज़रूरत नहीं पड़ती है. इस तरह की फैमलीज़ में बड़े बिजनेसमैन या फिर शाही परिवार आते हैं. या फिर कोई ऐसा परिवार जिसनें शानदार इन्वेस्टमेंट से एक बड़ा वेल्थ क्रिएट किया हो. 

दूसरी वजह- इस कैटगरी में उस तरह के परिवार आते हैं, जो अपने बच्चों के लिए हद से ज्यादा प्रोटेकटिव होते हैं. उनके नेचर में ही होता है कि बच्चों को पैसों की दिक्कत से दूर रखना. वो खुद काफी टेंशन झेल लेते हैं. लेकिन अपने बच्चों के ऊपर टेंशन की आंच भी नहीं आने देते. 

कुछ भी हो, भले ही आपके पास बहुत पैसा हो या नहीं हो, लेकिन बच्चों को पैसों के बारे में सही जानकारी देना ही आपकी ज़िम्मेदारी है. आपको उन्हें बताना होगा कि पैसे कैसे कमाए जाते हैं? इसी के साथ-साथ ये भी बताना होगा कि इस दुनिया में सर्वाइव करने के लिए पैसों की कितनी ज़रूरत पड़ती है? बिना पैसों के कोई भी इस दुनिया में अच्छे से नहीं जी सकता है. इसलिए बड़े होने के बाद बच्चों को पैसों के मामले में दिक्कत ना हो, इसलिए उसकी नींव बचपन में ही डालना ज़रूरी है.

अब बात इमरजेंसी फंड की होगी, इसकी मदद से आप पैसों के डर को भगा सकते हैं
फियर का मुख्य काम बॉडी को ये बताना होता है कि हम खतरे में हैं. ये भी एक तरह का ह्यूमन इमोशन ही है. 

बिना डर के हमें पता ही नहीं चलेगा कि कब हमें सावधान होने की ज़रूरत है? 

जब आप डरे हुए होते हैं तो आपका दिमाग हॉर्मोन्स रिलीज़ करता है. जिससे आपका नज़रिया बेहतर बनता है. इस नज़रिए की मदद से आप खतरे से लड़ पाते हैं. इसी कांसेप्ट को “fight-or-flightresponse” भी कहते हैं. 

लेकिन कहा जाता है ना कि इस दुनिया में हर चीज़ की कीमत चुकानी पड़ती है. फ्री में कुछ भी नहीं मिलता, इसलिए ज्यादा डर भी शरीर के लिए नुकसानदायक साबित होता है. इसी डर की वजह से शरीर को एंग्जायटी जैसी दिक्कत का भी सामना करना पड़ता है. 

चलिए इसे समझने की कोशिश करते हैं- सोचिए...सोमवार का दिन है, आप ऑफिस पहुंचने में लेट हो रहे हैं, मेट्रो स्टेशन पर पैर रखने की जगह नहीं है, और तभी काफ़ी इंतज़ार के बाद एक मेट्रो आती है...दरवाजे खुलते ही आप ट्रेन में दाख़िल हो जाते हैं. और तभी आपके ज़हन में आता है कि आपने ग़लत ट्रेन पकड़ ली है.

अब आप क्या करेंगे?

जिस पल आपको अहसास होगा कि आप ग़लत मेट्रो में चढ़ गए हैं आप उसी पल बाहर निकलने की कोशिश करेंगे.

अगर दरवाजे बंद हो गए होंगे तो आप पता करेंगे कि अगला स्टेशन कौन सा है, और किस स्टेशन पर उतरकर वहां से ऑफिस जाने के लिए मेट्रो मिलेगी. अगली मेट्रो कितनी देर में ऑफिस पहुंचाएगी. और इस तरह आप कितने मिनट की देरी से अपने दफ़्तर पहुंचेंगे

ये सब करने में आपको कुछ सैकेंड का टाइम लगेगा. इसके बाद आप ये सोचेंगे कि ऑफिस लेट पहुंचने पर क्या होगा और किसे मैसेज़ किया जा सकता है...आदि आदि. आख़िरकार आप सही मेट्रो पकड़कर ऑफिस पहुंच जाएंगे.

लेकिन क्या आप जानते हैं कि ग़लत मेट्रो में चढ़ने से लेकर सही मेट्रो पकड़ने के बीच आपने जिस तनाव को झेला उसका असर आपके शरीर में क्या हुआ होगा?

क्यों आपका दिमाग़ इतनी तेजी से काम कर रहा था या क्यों आप इतनी फुर्ती से भागकर सही दिशा में जाने वाली मेट्रो पकड़ पाए?

इस दौरान आपके शरीर में जो कुछ हुआ, वो सब कुछ उस हिरन के शरीर में भी होता है जब एक चीता उसका पीछा कर रहा होता है. आपका दिमाग़ भी ठीक यही करता है – जब आपको अपनी जान बचाने के लिए तेज दौड़ने की ज़रूरत होती है तो आप तेज दौड़ते हैं, जब आपको हिम्मत की ज़रूरत होती है तो आपमें हिम्मत आती है और जब आपको अंधेरे में देखना होता है तो आपकी पुतलियों बड़ी हो जाती हैं.

सरल शब्दों में कहें तो जब दिमाग़ के सामने एक तनावभरी स्थिति पैदा होती है तो वह शरीर की ऊर्जा को दूसरी जगहों से हटाकर तनावभरी स्थिति से निपटने में लगाता है.

लेकिन अगर यही सब बार बार होने लगे तो मन को डर सा लगने लगता है. इसी के बाद एंग्जायटी जैसी बीमारी का जन्म होता है. कई सर्वे में निकलकर सामने आया है कि ज्यादातर लोगों को एंग्जायटी की दिक्कत पैसों की टेंशन की वजह से होती है. 

कई लोगों की लाइफ सैलरी टू सैलरी चलती रहती है. इसका मतलब साफ़ है कि अगर उनके पास किसी एक महीनें की सैलरी ना आए तो उनकी लाइफ ट्रेन पटरी से उतर जाएगी. इंटरनेशनल सर्वे में इस बात का पता चला है कि हर 10 में से 4 अमेरिकन्स पैसों की दिक्कत का सामना कर रहे हैं. अब आप खुद सोचिए कि अगर ये हाल अमेरिकन्स का है. तो बाकी देशों की क्या हालत होगी? 

इसलिए ऑथर सलाह देते हैं कि अगर आपको एंग्जायटी से दूर रहना है. तो आपको अपने परिवार के लिए इमरजेंसी फंड बनाकर रखना चाहिए. इस तकनीक से आप अपनी बहुत दिक्कतों को दूर कर सकते हैं. इसलिए मिनिमम 1000 डॉलर का इमरजेंसी फंड तैयार रखने की कोशिश करिए.

कर्ज़ से मुक्ति ही आपको ख़ुशियों तक लेकर जा सकती है
ऑथर की एक सहेली जिसका नाम एलीजाबेथ था, उन्होंने 40 हज़ार डॉलर का क़र्ज़ ले लिया था. वो एक स्कूल टीचर थीं, अच्छी इन्कम भी थी. पेमेंट भी समय से कर रहीं थीं. लेकिन फिर भी क़र्ज़ से मुक्ति नहीं मिल पा रही थी. 

ऐसा सिर्फ और सिर्फ ज्यादा इंटरेस्ट की वजह से हो रहा था. 

फिर लेखिका ने उन्हें साइड इन्कम की सलाह दी, फिर एलीजाबेथ ने भी कुछ साइड इन्कम की व्यवस्था की, जिसकी मदद से वो अपने क़र्ज़ से मुक्त हो पायीं. 

एलिजाबेथ ने “tried-and-true strategy” की मदद से अपने कर्ज़ को खत्म किया था. इसी को स्नोबॉल मेथड भी कहते हैं. 

आपको बता दें कि स्नोबॉल मेथड एक सिम्पल सी मेथड होती है, जिसकी मदद से आप अपने ऊपर लदे कर्ज़ों को खत्म कर सकते हैं. 

इसके लिए सबसे पहले अपने कर्ज़ों की लिस्ट तैयार करिए, इसमें आपको पता होना चाहिए कि किस इंसान से आपने कितना पैसा उधार लिया हुआ है? 

इसके बाद आपको एक गोल बनाना है कि किसी भी तरह से सभी कर्ज़ों को खत्म करना है. आप इसकी शुरुआत सबसे छोटे कर्ज़ से भी कर सकते हैं. 

एक कर्ज़ को खत्म करने के बाद, आपको दूसरे कर्ज़ की तरफ बढ़ना चाहिए. याद रखिए कि अगर आप सही कोशिश करते रहेंगे. तो आप अपने कर्ज़ों को ज़रूर खत्म कर देंगे.

केवल अपनी जरूरत की चीजें खरीदें, खर्चों में कटौती करें और कर्ज़ से बचें
साल 2019 की बात है न्यू यॉर्क टाइम्स ने कई न्यूली वेड्स कपल के इंटरव्यू किए थे. उन्हें ये पता लगाना था कि लोग अपने हनीमून एक्सपीरियंस से दुखी क्यों हो रहे हैं? 

काफी कोशिश के बाद उन्हें जवाब मिला, जवाब थोड़ा चौकाने वाला था. 

न्यू यॉर्क टाइम्स को पता चला कि लोग काफी कर्ज़ लेकर हनीमून में जाते हैं. फिर किसी महंगी जगह जाने के बाद, वो चीज़ों को एन्जॉय करने में कम और सोशल मीडिया में तस्वीरें पोस्ट करने में ज्यादा ध्यान देते हैं. 

कई बार तो वो महंगे होटल्स में एक्सपीरियंस के लिए नहीं बल्कि लोगों को दिखाने के लिए चेक इन करते हैं. इसलिए ये हनीमून उनका नहीं बल्कि सोशल मीडिया का होता है. और बिल भी उनकी फाइनेंशियल हेल्थ को खराब से बद्दत्तर करता जाता है. 

इसलिए इस किताब की ऑथर सलाह देती हैं कि इंसान को पैसों को लेकर समझ विकसित करनी चाहिए. अगर आपके पास बहुत ज्यादा पैसे हैं. तो कोई बात नहीं लेकिन अगर आप मिडिल क्लास हैं. तो अपनी ज़रूरतों पर लगाम लगाना भी आपकी ही ज़िम्मेदारी है. इसलिए पहले ये देखिए कि आपके ऊपर आलरेडी कितना कर्ज़ा है? जब तक उस कर्ज़ से मुक्ति ना मिले , तब तक नया कर्ज़ नहीं लेना चाहिए. 

अगर हम लोग इस छोटी सी आदत को अपने अंदर लागु करने की कोशिश करें. तो हम बहुत बड़ी-बड़ी दिक्कतों से बच सकते हैं. हमें समझना चाहिए कि पैसों की नकल नहीं की जा सकती है. इसलिए पड़ोसी या रिश्तेदारों को दिखाने के लिए लाइफ को जीना बन करिए. ऐसा करके आप अपने लिए ही मुश्किलें खड़ी कर रहे हैं.

“penny-pinching” और “overspending” के बीच का ख़ुशहाल रास्ता अपनाने की कोशिश करिए
पैसों को लेकर गलतियाँ हम सभी करते हैं. लेकिन हमें अपनी गलतियों से सीखने की ज़रूरत है. जब तक हम अपनी गलतियों से सीखना शुरू नहीं करेंगे. 

तब तक हम मुश्किलों का सामना करते ही रहेंगे. 

हमे याद रखना चाहिए कि बुरे फैसले हमारी फाइनेंशियल हेल्थ को बुरी तरह से तबाह कर सकते हैं. इसलिए किसी भी फैसले को सोच समझकर करिएगा. 

लेकिन इसका मतलब ये भी नहीं है कि आपको बुरी तरह से कंजूस बन जाना है. यहीं पर बैलेंस का रोल आता है. लाइफ में हर चीज़ को बैलेंस में रखना बहुत ज़रूरी है. 

आपको पैसों के मामले में भी बैलेंस बनाकर चलना चाहिए. याद रखिए कि आपको ना ही कंजूस बनना है और ना ही फ़िज़ूलखर्च करना है. 

अगर आप बैलेंस के साथ फाइनेंशियल डिसीज़न लेंगे तो आप कभी भी दिक्कत में नहीं फंस सकते हैं. 

इसलिए अगर आप कोई बड़ी चीज़ खरीदना चाहते हैं तो 5 ईयर रूल का इस्तेमाल करिए. 

किसी भी चीज़ को खरीदने से पहले खुद से सवाल करिए कि क्या ये चीज़ अगले 5 सालों में भी आपके लिए ज़रूरी रहेगी? अगर जवाब नहीं में आए तो उसे भूल जाइए और आगे बढ़िये.. 

इस तरह की छोटी-छोटी टिप्स को फॉलो करके आप बेहतर फाइनेंशियल डिसीजन ले सकते हैं.

अपने ड्रीम्स से खुद को कनेक्ट करने की कोशिश करिए और खूब सारी सेविंग्स करिए
किसी ने क्या खूब कहा है कि “बचाया गया हर एक रुपया, कमाए गए हर एक रुपये के बराबर होता है..” 

अगर हम अपनी लाइफ में इस फिलॉसफ़ी को एड ऑन कर दें तो हम अपनी फाइनेंशियल पोजीशन को बहुत ज्यादा बेहतर बना सकते हैं. 

इसी के साथ हम ये भी जानते हैं कि हम जो कमाते हैं उसके आधार पर नहीं बल्कि हम जो बचाते हैं उसके आधार पर इस बात का पता चलता है कि हम अपने फाइनैंशल लक्ष्यों को पूरा करने में कितना कामयाब रहे हैं या नहीं? 

लेकिन हम सबको कभी न कभी इस बात का एहसास जरूर होता है कि हमारी आमदनी चाहे जितनी भी बढ़ क्यों न जाए, हमारी सेविंग्स का महत्व कम नहीं होता है. 

याद रखें, आप क्यों सेविंग कर रहे हैं?

आपको पता होना चाहिए कि हर एक गोल अलग होता है, एक नई कार खरीदने के लिए सेविंग करना एक ब्लैक फ्राइडे शॉपिंग की मौज मस्ती के लिए सेविंग करने के समान नहीं होता है.

इन दोनों लक्ष्यों का महत्व भी अलग-अलग हो सकता है, आप अलग-अलग टाइमलाइन पर काम कर सकते हैं, और आप जितना अमाउंट सेव करना चाहते हैं वह भी अलग-अलग हो सकता है.

इसलिए अपने लक्ष्यों का पता लगाएं और अपने आपसे पूछें कि आप क्यों सेविंग कर रहे हैं, सेविंग्स फंड में हर महीने कुछ अमाउंट रखने के बजाय अपने प्रत्येक लक्ष्य के लिए एक अलग सेविंग प्लान बनाएं.

इस तरह, आप अच्छी तरह जान पाएंगे कि आप किस लिए पैसे रख रहे हैं जिससे आपको अपने लक्ष्य पर बने रहने में काफी मदद मिल सकती है.

ये सबसे ज़रूरी है कि रियलिस्टिक लक्ष्य बनाएं?

जबकि आप जितना चाहे उतना बड़ा लक्ष्य बना सकते हैं लेकिन एक बात याद रखें कि आप लगातार अपनी सैलरी का 80% सेव नहीं कर सकते हैं.

 सेविंग तब होती है जब आप लम्बे समय के लिए नियमित रूप से सेव करते हैं.

इसलिए आपको हर महीने एक ख़ास अमाउंट अलग रखने की जरूरत है, इसी के साथ ये भी याद रखें कि किसी काम या मकसद पर टिके रहना उस समय ज्यादा आसान होता है जब आप यह देख सकते हैं कि आपने कितना काम पूरा किया है और अपने टारगेट तक पहुंचने के लिए आपको और कितना करने की जरूरत है?

याद रखिएगा कि ऑथर कहती हैं कि “सेविंग्स का दूसरा नाम ही सैक्रीफाईस होता है. क्योंकि इसमें आप अपने फ्यूचर के लिए पैसे अलग रखते हैं. और आपको अपने प्रेजेंट में कुछ कटौती करनी पड़ती है..” इसलिए लाइफ में सही फाइनेंशियल हेल्थ के लिए इस तरह की कुर्बानी बहुत ज़रूरी है. आज से ही सेविंग्स की शुरुआत कर दीजिए. 

अगर सेविंग करने का मन ना करे तो अपने लॉन्ग टर्म ड्रीम से अपने आपको कनेक्ट करने की कोशिश करिए. इससे आपको काफी ज्यादा मोटिवेशन मिलेगा. याद रखिएगा कि आपको सिर्फ और सिर्फ आप ही मोटिवेट रख सकते हैं.

कुल मिलाकर
अपने बच्चों को पैसों के बारे में सही जानकारी देने की कोशिश करिए, क्योंकि पैसों के बारे में इंसान सबसे ज्यादा अपने घर के माहौल से ही सीखता है. यही साइकोलॉजी ऑफ़ मनी भी है. जिसकी शुरुआत हमेशा अपने घर से ही होती है. इसलिए आज से पैसों को सीरियस लीजिए और उन्हें बचाने की कोशिश करिए. 

 

येबुक एप पर आप सुन रहे थे Know Yourself, Know Your Money By Rachel Cruze. 

ये समरी आप को कैसी लगी हमें yebook.in@gmail.com  पर ईमेल करके ज़रूर बताइये.

आप और कौनसी समरी सुनना चाहते हैं ये भी बताएं. हम आप की बताई गई समरी एड करने की पूरी कोशिश करेंगे.

अगर आप का कोई सवाल, सुझाव या समस्या हो तो वो भी हमें ईमेल करके ज़रूर बताएं.

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