Angela Duckworth
धैर्य और लगन की ताकत।
दो लफ्जों में -:
ग्रिट ( Grit ) में हम एक व्यक्ति की उस खूबी के बारे में जानेंगे जो उसे कामयाब बनाने में बहुत ज्यादा मायने रखती है। हम देखेंगे कि दृढ़ संकल्प का महत्व क्या होता है। यह किताब हमें बताती है कि कामयाब होने के लिए सिर्फ हुनर होना ही काफी क्यों नहीं है। यह किताब हमें मेहनत और लगन के महत्व के बारे में जानकारी देती है।
यह किसके लिए है -:
-वे जो हुनर को ही सब कुछ मानते हैं।
-वे जो लगन के महत्व के बारे में जानना चाहते हैं।
-वे जो एक अच्छे टीचर या पैरेंट बनना चाहते हैं।
लेखिका के बारे में -:
एंजेला डकवर्थ ( Angela Duckworth ) अमेरिका की एक साइकोलॅाजिस्ट और लेखिका हैं। यूनिवर्सिटी ऑफ पेनसाइल्वेनिया में साइकोलॅाजी की प्रोफेसर भी हैं। वे ज्यादातर धैर्य और आत्म-नियंत्रण के ऊपर रीसर्च करती हैं और उसे समझने की कोशिश करती हैं।
यह किताब आपको क्यों पढ़नी चाहिए
बहुत बार जब हम खुद से ज्यादा कामयाब लोगों को देखते हैं या फिर कामयाब लोगों की गाथाएँ सुनते हैं तो हमें लगता है कि वे ना जाने ऐसा कैसे कर पाते हैं। हम सोचते हैं कि जरूर उनके अंदर कोई पैदाइशी हुनर होगा जिसकी वजह से वे कम समय में इतना कुछ हासिल कर ले जाते हैं। लेकिन ऐसा सोचकर हम सिर्फ उनकी ऊँचाइयों को देखते हैं, उनके पाँव के छालों को नहीं। एक व्यक्ति की कामयाबी की चमक के पीछे क्या है ये हम अक्सर नहीं देख पाते और शायद इसलिए हम उनसे कुछ सीख नहीं पाते।
यह किताब हमें बताती है कि एक व्यक्ति की वो कौन सी खूबी है जो हर मुश्किल को हराने में उसकी मदद करती है। हम देखेंगे कि क्यों हुनर के साथ साथ मेहनत, लगन और अपनी मंजिल को हासिल करने की जिद्द के बगैर एक व्यक्ति कभी कामयाब नहीं हो सकता। यह किताब हमें पहले से ज्यादा बेहतर व्यक्ति, ज्यादा बेहतर पैरेंट और ज्यादा बेहतर टीचर बनना सिखाती है।
-मेहनत या हुनर में से क्या ज्यादा मायने रखता है।
-अपने काम से प्यार करने के क्या फायदे हैं।
-बच्चों के नतीजों की तारीफ ना कर के उनकी मेहनत की तारीफ क्यों करनी चाहिए।
कामयाब होने के लिए मेहनत के साथ साथ हुनर की भी जरूरत होती है।
हमने अक्सर सुना है कि कामयाब हर कोई बन सकता है, इसके लिए बस हमें मेहनत चाहिए। लेकिन क्या वाकई मेहनत से ही एक व्यक्ति कामयाब हो सकता है? अगर ऐसा है तो एक व्यक्ति जो मेहनती है, उसे हर जगह कामयाब होना चाहिए। लेकिन हम ऐसे बहुत से लोगों को देखते हैं जो सिर्फ एक खास जगह पर ही कामयाब हैं। एक्ज़ाम्पल के लिए सचिन तेंदुलकर या महेन्द्र सिंह धोनी बहुत ज्यादा मेहनती खिलाड़ी हैं और वे क्रिकेट के मामले में कामयाब भी हैं। लेकिन अपने स्कूल के दिनों में वे क्लास के कमजोर बच्चों में से एक माने जाते थे।
दुनिया भर के सर्वे में यह बात सामने आई कि ज्यादातर लोग मेहनत को कामयाबी का जरिया मानते हैं। एक कंपनी किसी कर्मचारी को काम पर रखने से पहले यह देखती है कि वो कितना मेहनती है। इसके अलावा शिया जंग से नाम के एक साइकोलॅाजिस्ट ने बहुत से म्यूजिक एक्सपर्ट से यह सवाल किया कि वे टैलेंट और मेहनत में से किसे चुनते हैं। ज्यादातर लोगों ने मेहनत को चुना।
लेकिन उसी स्टडी में जब उन म्यूजिक एक्सपर्ट को दो टेप सुनाए गए और उन से कहा गया कि एक टेप को प्राकृतिक हुनर रखने वाले म्यूजिशिन ने बजाया है और एक को मेहनत से अपने अंदर हुनर पैदा करने वाले म्यूजिशिन ने बजाया है। इसके बाद उनसे पूछा गया कि उन्हें कौन सा म्यूजिक ज्यादा अच्छा लगा। ज्यादातर एक्सपर्ट्स ने प्राकृतिक हुनर रखने वाले म्यूजिशिन को अच्छा कहा। लेकिन असल में उन से झूठ कहा गया था। वो दोनों टेप एक ही म्यूजिशिन ने बजाया था और वो भी एक ही पियानो पर।
लोग खुद को इस वहम में डाल लेते हैं कि वे मेहनत को ज्यादा पसंद करते हैं, लेकिन असल बात यह है कि हम अंदर से हुनर को ज्यादा पसंद करते हैं।
मेहनत हुनर से दोगुना मायने रखती है।
कामयाब होने के लिए आपके अंदर एक प्राकृतिक हुनर होना चाहिए। जैसे एक कंपनी के सेल्समैन को ले लीजिए। कुछ लोग बहुत कम समय में एक के बाद एक हर टार्गेट को पूरा कर के बहुत ऊपर तक पहुँच जाते हैं बल्कि कुछ लोगों को वह करने में बहुत समय लग जाता है और कुछ लोग ऐसा कभी नहीं कर पाते। इससे यह साफ है कि जो व्यक्ति प्राकृतिक रूप से लोगों से अच्छा संबंध बना सकता है, वो इस काम में ज्यादा कामयाब होगा।
लेकिन कामयाबी के लिए सिर्फ हुनर ही मायने नहीं रखता। भले ही वे ज्यादा हुनर रखते हों, लेकिन ऊँचाइयों तक पहुंचने के लिए मेहनत सबको करनी पड़ती है। अगर हम इसे एक इक्वेशन की तरह देखें तो यह होगा - मेहनत * हुनर = कौशल। हुनर होने के बाद भी, अगर आप मेहनत बहुत कम या ना के बराबर कर रहे हैं तो आप बिल्कुल कुशल नहीं बन पाएंगे।
अब इसके बाद बारी आती है नतीजों की। अच्छे नतीजे पाने के लिए आपको फिर से अपने कौशल को अपनी मेहनत से मल्टिप्लाई करना होगा यानी -:
कौशल * मेहनत = अच्छे नतीजे।
फिर से, अगर आप किसी काम में बहुत कुशल हैं, लेकिन मेहनत ना के बराबर कर रहे हैं, तो आपको नतीजे भी ना के बराबर ही मिलेंगे। इससे यह साफ है कि मेहनत हुनर से दोगुना ज्यादा मायने रखती है। आपके अंदर हुनर भले ही बहुत ज्यादा हो, लेकिन बिना मेहनत के वो किसी काम का नहीं है।
इतिहास में बहुत से ऐसे लोग हैं जो बिना किसी हुनर के पैदा हुए थे, लेकिन अपनी मेहनत की मदद से उन्होंने बहुत कामयाबी हासिल की। इसके अच्छे एक्साम्पल हैं मेमोरी मास्टर केविन हार्सली। बचपन में उन्हें कुछ भी याद करने में परेशानी होती थी। वे मानसिक रूप से बहुत कमजोर थे। लेकिन बाद में अपनी मेहनत से उन्होंने अपनी मेमोरी को मजबूत बनाया और पाई के 10000 अंकों को याद कर के मेमोरी मास्टर का खिताब हासिल किया।
छोटी मंजिलों को हासिल कर के आप एक दिन अपनी बड़ी मंजिल हासिल कर सकते हैं।
बहुत से लोगों का मानना है कि हम जितना ज्यादा बड़ा ख्वाब देखकर उसके लिए मेहनत करना शुरू कर दें, उतना ही अच्छा होता है। कुछ लोग कहते हैं कि अगर आपको अपने सपनों से डर नहीं लगता, तो आपके सपने बहुत छोटे हैं। लेकिन इस तरह की बातों में हम यह भूल जाते हैं कि हम छोटे छोटे कदम उठा कर ही आगे बढ़ सकते हैं।
एक्ज़ाम्पल के लिए अगर आप चाहते हैं कि आप एक कामयाब लेखक बनें, तो आप सीधा एक नॅावेल लिखकर रातों रात कामयाब बनने के बारे में मत सोचिए। इस तरह की ख्वाब, ख्वाब ही रह जाते हैं।
आप सबसे पहले एक छोटी कहानी किसी सोशल मीडिया पर पब्लिश कीजिए और उसपर 100 लाइक्स पाने की कोशिश कीजिए। यह एक छोटी मंजिल है। जब आप इसे पा लेंगे तो आपको आगे जाने के लिए हौसला मिलेगा। इसके बाद आप कहानियाँ लिखकर , लोगों से फीडबैक लेकर बहुत सी छोटी छोटी मंजिलों को बनाइए और एक बार में एक को हासिल कीजिए। देखते ही देखते आप एक दिन बहुत कामयाब लेखक बन जाएंगे।
जब आप सीधा बड़ी मंजिल को हासिल करने के पीछे भागेंगे तो आपको लगेगा कि वो आप से बहुत ज्यादा दूर भाग जा रही है। लेकिन आप अपने साथ एक काम करने की वजह को जरूर रखिए। यह आपको आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा देगा और आपकी जिन्दगी को एक मतलब देगा। इससे आपको यह पता रहेगा कि आपको जाना कहाँ हैं। इससे आप रास्ता कभी नहीं भटकेंगे।
वो काम कीजिए जो आपको अच्छा लगता हो।
टेस्ला और सोलर सिटी के फाउन्डर इलॅान मस्क ने कहा कि अगर आपको अपना काम करने के लिए प्रेरणा की जरूरत पड़ती है, तो आपको दूसरा काम खोज लेना चाहिए। 2014 के गैलप पोल में पाया गया कि सिर्फ 13% लोग ही अपने काम से प्यार करते हैं। ज्यादातर लोग काम पर सिर्फ इसलिए जाते हैं ताकि वे अपने फ्रिज में खाना और सिर पर छत रख सकें।
जब लोग अपने काम से प्यार करते हैं , तब वे ज्यादा मन लगा कर, ज्यादा समय तक काम कर पाते हैं। इसके अलावा वे नए नए आइडियाज़ खोज निकालते हैं और साथ ही अपने काम में बेहतर बनने की कोशिश लगातार करते हैं। इस तरह से वे समय के साथ कामयाब हो जाते हैं।
दूसरी तरफ जो लोग अपने काम को किसी मजबूरी की वजह से कर रहे होते हैं, वे ज्यादा देर तक उसे करना नहीं चाहते। उनके काम करने की लगन समय के साथ खत्म हो जाती है। इन सबसे एक बात साफ है, अगर आप कामयाब होना चाहते हैं तो वो काम कीजिए जो आपको अच्छा लगता हो।
साइकोलॅाजिस्ट बैरी श्वार्ट्स पिछले 45 साल से बहुत से स्टुडेंट्स पर स्टडी कर रहे हैं। उन्होंने देखा कि ज्यादातर स्टुडेंट्स को लगता है कि यूनिवर्सिटी के बाहर एक नौकरी उनका इंतजार कर रही है जो सिर्फ उनके लिए बनाई गई है। उनका मानना है कि दुनिया में सिर्फ वो एक ही चीज़ है जो उनके लिए बनाई गई है। वे उसे छोड़कर बाकी हर एक चीज़ को अन्देखा कर देते हैं।
नौकरी को छोड़ दें, तो बहुत से स्टुडेंट्स अपने लाइफ पार्टनर को लेकर कुछ ऐसी ही उम्मीदें रखते हैं। और जब उन्हें वो चीज़ नहीं मिलती तो वे निराश हो जाते हैं और उन्हें लगने लगता है कि दुनिया खत्म हो गई है। इस तरह से वे हार मान जाते हैं और कुछ नहीं कर पाते।
किसी काम में माहिर बनने के लिए अपनी गलतियों पर खास ध्यान दीजिए।
हम में से बहुत से लोग जिस तरह से अपना काम करते हैं , हमें अपना काम उसी तरह से करने की आदत पड़ जाती है। फिर हम अपना काम उसी तरह से करने लग जाते हैं और बार बार वही गलतियाँ करने लगते हैं।
प्रैक्टिस करने वाले लोग बिना यह समझे कि उनसे क्या गलती हो रही है, प्रैक्टिस किए जाते हैं। वे यह जानने की कोशिश नहीं करते कि वो क्या है जो वे बार बार गलत कर रहे हैं। वे सोचते हैं कि उन्हें उनकी मेहनत का फल जल्दी मिलेगा, लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि गलत तरह से की जाने वाली मेहनत का फल बहुत कड़वा होता है।
बहुत से कामयाब एथलेटिक्स प्रैक्टिस करते वक्त एक खास मंजिल पर ध्यान देते हैं। वे हर दिन पिछले दिन से ज्यादा दूर भागने की, या फिर पिछले दिन का रिकॉर्ड तोड़ने की कोशिश करते हैं। ऐसे करते हुए वे यह देखते हैं कि पिछले दिन उन्होंने क्या गलती की थी, जिसे आज ना कर के वे अपनी उस मंजिल को हासिल कर सकते हैं।
इस तरह से प्रैक्टिस करने को इंटेलिजेंट प्रैक्टिस कहते हैं। इसकी खोज एंडर्स एरिकसन नाम के साइकोलॅाजिस्ट ने की थी।
एरिकसन ने एक प्रोग्राम बनाया था जिसमें उन्होंने डाक्टरों को फीडबैक देकर उन्हें पहले से बेहतर बनाने की कोशिश की थी। इस प्रोग्राम में डाक्टरों को बताया जाता था कि वे क्या गलत कर रहे हैं और उन्हें क्या सुधारने की जरूरत है।
लेकिन इस बीच एक डाक्टर फीडबैक को अन्देखा कर रहा था और बार बार वही गलती दोहरा रहा था। असल में वो अपनी गलती को ही बार बार प्रैक्टिस किए जा रहा था जिसकी वजह से वह समय के साथ उसी गलती को और अच्छे से करने लगा। लेकिन उस डाक्टर को अलग कर के उससे कहा गया कि वो सोचे कि उससे क्या गलती हो रही है। उससे कहा गया कि वो इस बारे में थोड़ी देर सोचे। ऐसा करने के बाद वो डाक्टर पहले से कम गलतियां करने लगा और समय के साथ सबकी तरह अच्छे से काम करने लगा।
अपने काम को करने की इच्छा आपके अंदर अपने आप आ जाएगी अगर आप लोगों की मदद करने के लिए काम करेंगे।
क्या आप भी इस बात से परेशान हैं कि आपको क्या करना चाहिए? बहुत से लोगों को नहीं पता होता कि उन्हें क्या करना पसंद है, इसलिए वे वही काम करते हैं जो उन्हें दूर से अच्छा लगता है।
दूर से देखने में एक डाक्टर की नौकरी सबको अच्छी लगती है , लेकिन दुनिया के बहुत से डाक्टर अपने काम को पसंद नहीं करते। उन्हें एक जगह पर बैठ कर दिन भर मरीजों को देखना अच्छा नहीं लगता। लेकिन साथ ही, उन्हें यह भी नहीं पता है कि उन्हें असल में क्या करना पसंद है। इसलिए वे बेमन से वही काम करते रहते हैं।
अगर आप चाहते हैं कि आपको काम करने की प्रेरणा अपने आप मिले तो आपको वो काम करना होगा जिसे करने के लिए आपके अंदर से आवाज आती हो। आप ने बहुत से लोगों को यह कहते हुए सुना होगा - मुझे भगवान ने धरती पर इसलिए भेजा है ताकि मैं यह काम कर सकुँ। इस तरह के लोग अपने काम को अपनी जिन्दगी मानते हैं और अपनी जिन्दगी से कौन प्यार नहीं करता।
इस तरह के लोग अपने काम को ना करने के बहाने बिल्कुल नहीं खोजते, ना ही अपने काम को कल के लिए टालते हैं। वे अपने काम को पूरे मन से करते रहते हैं। अनाथ आश्रम में मुफ्त में पढ़ाने वाली बूढ़ी महिलाएं बच्चों को इसलिए पढ़ाकर खुश रहती हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि ऐसा कर के वे अपनी जिन्दगी का मकसद पूरा कर रही हैं। उन्हें ऐसा करने के ना तो पैसे मिलते हैं और ना ही कोई सरकारी सुविधा, लेकिन वे फिर भी यह काम बहुत मन से किया करती हैं।
लेकिन जरूरी नहीं है कि हर किसी को अपने मन पसंद का काम मिल जाए। ऐसे में आपको वो काम करने की कोशिश करनी चाहिए जिससे आप किसी की मदद कर सकें। दुनिया का हर एक व्यक्ति जो दूसरों की मदद कर उन्हें खुश रखने की कोशिश करते हैं, वे सबसे खुश हैं। ऐसा कर के उन्हें एक संतोष की भावना मिलती है।
हमें बच्चों के नतीजों को ना देखकर उनकी मेहनत को देखना चाहिए।
कुछ बच्चे दूसरों से जल्दी सीखते हैं। इस तरह के बच्चे टीचरों के प्यारे होते हैं। इन्हें कहा जाता है कि ये दिमाग के तेज हैं। लेकिन इस बीच हम उन बच्चों पर ध्यान नहीं देते हैं जो ज्यादा मेहनत करते हैं। ज्यादा मेहनत करने वाले बच्चे समय के साथ बहुत ज्यादा बेहतर बन सकते हैं, लेकिन जब वे देखते हैं कि उन पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है और सारी तारीफ तेज़ बच्चों को मिल रही है तो उनके दिमाग में यह मानसिकता बनने लगती है कि वे चाहे कुछ भी कर लें, उनकी तरह कभी नहीं बन सकते। इस तरह के सोच की कीमत हमारे देश की तरक्की को चुकानी पड़ रही है।
जब स्कूल के टीचर एक क्लास के बच्चों को दो भागों में बाँट देते हैं, जिसमें एक भाग तेज बच्चों का होता है और दूसरा कमजोर बच्चों का, तो दूसरे भाग वाले बच्चे मेहनत करना छोड़ देते हैं। उन्हें लगने लगता है कि सब कुछ हुनर पर निर्भर करता है।
इस हालात को बदलने की जिम्मेदारी अमेरिका के दो टीचर्स ने ली जिनका नाम था - माइक फीनबर्ग और डेव लेविन। 1994 में में उन्होंने एक प्रोग्राम लाँच किया जिसका नाम था - नालेज इज़ पावर। इसमें वे ज्यादा मेहनत करने वाले बच्चों की तारीक करते थे। वे इस बात को महत्व नहीं देते थे कि ज्यादा नंबर कौन ला रहा है। वे इस बात पर ध्यान दे रहे थे कि ज्यादा पढ़ाई कौन कर रहा है।इसका नतीजा यह हुआ कि उन बच्चों के ग्रेड पहले के मुकाबले काफी सुधर गए।
अगर आप एक माता या पिता हैं, तो आप अपने बच्चों को उनके नंबर के लिए मत डाँटिए। बल्कि उन्हें यह एहसास दिलाइए कि अगर वे पहले से ज्यादा मेहनत करें तो वे ज्यादा बेहतर कर सकते हैं। इस तरह से वे यह सोचेंगे कि उनमें और कामयाबी में सिर्फ मेहनत का अंतर है और वे इस अंतर को खत्म करने की पूरी कोशिश करेंगे।
कुछ जगहों पर जिद्द को एक अच्छी नजर से देखा जाता है।
अक्सर ही आप ने देखा होगा कि जब एक व्यक्ति कुछ नया करने जाता है तो बहुत से लोग उसे मना करने लगते हैं। लोग उससे कहने लगते हैं कि यह नहीं किया जा सकता या ऐसा कर पाना सबके बस की बात नहीं है। लेकिन वह व्यक्ति बहुत ज्यादा जिद्दी निकलता है और सबकी बात को अन्देखा कर के अंत में वो काम कर के दिखाता है। लेकिन फिनलैंड के लोग ऐसा नहीं करते।
फिनलैंड में दृढ़ संकल्प ( आसान शब्दों में - कुछ हासिल करने की जिद्द ) को बहुत ज्यादा महत्व दिया जाता है। वहाँ पर दृढ़ संकल्प को सीसु कहा जाता है। रशिया से समय समय पर युद्ध की वजह से सीसु यहाँ की सभ्यता का एक हिस्सा बन गया है।
फिनलैंड की साइकोलॅाजिस्ट एमीलिया लहती ने फिनलैंड के हजारों लोगों पर रीसर्च किया और पाया कि सीसु एक ऐसी खूबी है जिसे हम सीख सकते हैं। कोई व्यक्ति इसके साथ पैदा नहीं होता है।
इसके अलावा कुछ कंपनियों में भी दृढ़ संकल्प को बहुत ज्यादा महत्व दिया जाता है। जेपीमॅार्गन चेज़ के सीईओ जेमी डाइमन ने अपनी कंपनी के हर एक कर्मचारी में इस खूबी को विकसित किया है कि अगर वो चाहे तो वह कुछ भी कर सकता है। इसकी वजह से 2008 के फाइनैंशियल क्राइसिस में इस कंपनी ने 5 अरब डॉलर के मुनाफे कमाए जबकि दूसरे बैंक डूब गए।
डाइमन अपनी कंपनी के हर कर्मचारी में इस खूबी को इसलिए डाल पाए क्योंकि वे इसके महत्व को बहुत पहले ही समझ गए थे। जब वे हाई स्कूल में थे तो उनके स्कूल के कैल्कुलस के टीचर को हल्ट अटैक आ गया और वे मर गए। तब उनके स्कूल को दूसरा टीचर खोजने में बहुत ज्यादा समस्या होने लगी जिसकी वजह से आधे बच्चे स्कूल से निकल गए। लेकिन बचे हुए आधे बच्चों ने खुद से कैल्कुलस सीखा। डाइमन उनमें से एक थे।
इस तरह की जिद्द ही हमें कामयाबी की तरफ लेकर जा सकती है। जब हाथ में पत्ते अच्छे हों तो हर कोई खेल जीत सकता है, लेकिन जो खराब पत्तों से भी बाजी मार ले जाता है, लोग उसे खिलाड़ी कहते हैं। अच्छे हालात कभी महान लोगों को पैदा नहीं करते। बुरे वक्त से निकल कर खुद को कामयाब बनाने की जिद्द ही एक व्यक्ति को कामयाब बनाती है।
कुल मिलाकर
कामयाब होने के लिए हुनर की जरूरत पड़ती है। लेकिन उससे दोगुना ज्यादा जरूरत होती है लगन और मेहनत की। अगर हम लगातार किसी काम में खुद को बेहतर बनाने की कोशिश करते रहे, अपनी गलतियों को पहचान कर इंटेलिजेंट प्रैक्टिस करते रहें और मुश्किल वक्त में अपनी जिद्द को लेकर आगे बढ़ते रहें तो हम एक ना एक दिन जरूर कामयाब होंगे। हमें अपने बच्चों को यह बातें सिखानी चाहिए ताकि वे यह ना सोचें कि सब कुछ हुनर पर ही निर्भर करता है।
खुद को चुनौती दीजिए और अपने जिद्दी स्वभाव को बढ़ावा दीजिए।
आप चाहें तो एक महीने तक खुद से खाना बनाने की चुनौती ले सकते हैं या फिर कुछ नया सीखने की। उसका काम को पूरा करने के लिए खुद को एक समय दीजिए और उसे दिए गए समय के अंदर पूरा करने की कोशिश कीजिए। इस तरह से आप अपने जिद्द को बढ़ा सकते हैं।
