Gary Ferguson
ज़िन्दगी को खुशहाल बनाने के नुस्ख़े “नेचर” से सीखिए!
दो लफ्ज़ों में
साल 2019 में रिलीज हुई किताब “Eight Master Lessons of Nature” बताती है कि हम नेचर से ज़िन्दगी के बारे में कितना कुछ सीख सकते हैं. फूलों के बाग़ से लेकर हाथियों के झुण्ड तक से हम ज़िन्दगी की बारीकियों को सीख सकते हैं. ये किताब बताती है कि नेचर के अंदर ही खुशियों का पिटारा है. बस देर इस बात की है कि हम लगातार इस पिटारे को नज़र अंदाज़ कर रहे हैं. ये किताब किसके लिए है?
- सभी फील्ड के स्टूडेंट्स के लिए
- ऐसे लोगों के लिए जिन्हें नेचर के बारे में जानना अच्छा लगता हो
- ऐसे लोग जो मेट्रो सिटीज की लाइफ से बोर हो गए हों
- ऐसे लोग जिनके लिए घूमना ही सबकुछ है
लेखक के बारे में
आपको बता दें कि इस किताब का लेखन “Gary Ferguson” ने किया है. ये अवॉर्ड विनिंग लेखक होने के साथ-साथ रिसर्चर और पब्लिक स्पीकर भी हैं. इन्होंने 25 किताबों से भी अधिक किताबों का लेखन किया है.
नेचर के रहस्यों को अपनाकर दुनिया को नए सिरे से देखें
अगर आपको भी जानना है कि पेड़ पौधे कैसे आपकी ज़िन्दगी को खुशियों से भर सकते हैं. तो इस किताब के चैप्टर्स आपके लिए ही लिखे गए हैं. जैसे-जैसे आप इस किताब के चैप्टर्स को सुनते या पढ़ते जाएंगे. आपको पता चल जाएगा कि आपने आर्टिफीशियल लाइफ को ही असल ज़िन्दगी मान लिया है.
तो फिर अब ज़िन्दगी को करीब से देखने और समझने क समय आ गया है. देर ना करें और प्रकृति को समझने के सफर की शुरुआत करें. इस समरी में आप यह भी जानेंगे कि पेड़ पौधे एक दूसरे से कैसे बात करते हैं? और कैसे प्रक्रति या नेचर हमें ज़िन्दगी से प्रेम करना सिखाते हैं?
तो चलिए शुरू करते हैं!
ये उन दिनों की बात है, जब अल्बर्ट आइन्स्टीन अपने शोध में व्यस्त रहा करते थे. कभी-कभी ऐसा उनके साथ भी होता था कि वो अपने काम से दिमागी तौर पर थक जाया करते. तब वो ब्रेक लेने के लिए नेचर के करीब जाने की कोशिश करते थे. इस तकनीक से उनके मेंटल ब्लॉक्स खत्म होते, जिससे उन्हें मानसिक और शारीरिक तौर पर सुकून मिलता.
मेंटल ब्लॉक्स को खत्म करने के लिए अल्बर्ट आइन्स्टीन यूनिवर्सिटी कैम्पस में टहलने के लिए निकल जाया करते. जहाँ वो खुद को प्रकृति के पास महसूस करते, इस दौरान वो अपने आस-पास की चीज़ों को ओब्सर्व किया करते थे.
अल्बर्ट आइन्स्टीन ने कहीं अपने दोस्त से कहा भी था कि मेरे मन में बार बार ये सवाल उठता है. "क्या हमारे आसपास के बिना साँसों के माने गए पहाड़, नदियां, बादल भी कुछ सोचते हैं?” क्या उनमें भी हमारी तरह जागरूकता है?" मैं जब भी किसी ज़मीन पर पड़े पत्थर को उठा कर दूर फेंकता हूँ, तो फिर ये सवाल मेरे अंदर और तेजी से आता है?
लेकिन मैं यानि अल्बर्ट नेचर के पास इस सवाल का जवाब तलाशने नहीं जाता हूँ. मैं उसके पास, बस उसकी सुन्दरता को निहारने जाता हूँ.
मैं नेचर के पास उसे समझने भी नहीं जाता हूँ. मेरा लक्ष्य तो अपने दिमाग को क्लियर करने का है. मुझे ये एहसास है कि दुनिया का रहस्य नेचर के पास ही छुपा हुआ है.
आपको बता दें कि अल्बर्ट आइन्स्टीन केवल एक साइंटिस्ट नहीं थे, जो कि नेचर के रहस्यों से प्रभावित थे. अगर आप वैज्ञानिकों की लिस्ट देखेंगे तो आपको एक लंबी फेहरिस्त नज़र आएगी. उनमें से कुछ नाम एस्ट्रोनॉमर Carl Sagan,physicist Edward Witten, और जानेमाने बिहेवियर साइंटिस्ट Jane Goodall का भी है. इन सभी ने माना है कि इनके शानदार करियर के पीछे नेचर का बहुत बड़ा योगदान है. इन्होने नेचर की मदद से अपने काम को बेहतर से बेहतरीन बनाया है.
इन वैज्ञानिकों ने कहा है कि “काम के दौरान जब भी उन्हें तनाव का सामना करना पड़ा, उन्होंने खुद को प्रकृति यानि नेचर के प्रति आकर्षित पाया. उनके भीतर एक गहरी लालसा जाग उठी, घंटों तक घांस में लेटकर आसमान और बादलों को देखने की लालसा, समुद्र की लहरों की तरह अपनी चढ़ती और उतरती सांसों को महसूस करने की लालसा, ऊंचे पेड़ों और पहाड़ों की तरह स्तब्ध रहने की लालसा, नदी की धारा की तरह बहने की लालसा और छोट- छोटे बीजों की तरह अंकुरित होने की लालसा. इन्हीं लालसा की वजह से उन्होंने नेचर को और करीब से देखा. जिसकी वजह से उनके दिमाग को सुकून भी मिला और उनका काम की तरफ फोकस भी बेहतर हुआ.
American Institutes for Researchमें हुई शोध भी बताती है कि “जो बच्चे बाहर मैदानों में खेलते हैं. उनकी मानसिक स्थति दूसरों के मुकाबले बेहतर होती है. और उनके साइंस में स्कोर भी दूसरों की अपेक्षा 27 परसेंट बेहतर आते हैं.”
आप भी इन शक्तियों से अपने काम और ज़िन्दगी को बेहतर कर सकते हैं. आपको बस खुद को नेचर के करीब लेकर जाना है. इसलिए देर ना करें और खुद को नेचर के पास लेकर जाएँ.
सभी चीज़ें इंटररिलेटेड और इंटरडिपेंडेंट हैं
जाने माने जेन टीचर हैं, जिनका नाम Thich Nhat Hanh है. वो अधिकत्तर अपने स्टूडेंट्स के साथ एक खेल खेलते हैं. वो उन्हें खुले मैदान में लेकर जाते हैं. फिर एक हाँथ से एक पेपर को टुकड़े को पकड़ लेते हैं. और स्टूडेंट्स से पूछते हैं कि उन्हें क्या दिखाई दे रहा है?
कई स्टूडेंट्स को आसमान नज़र आता है तो कई स्टूडेंट्स को केवल पेपर का टुकड़ा. लेकिन जेन टीचर को पूरा विश्व नज़र आता है. इस बात को वो अपने स्टूडेंट्स को एक्सप्लेन करते हुए बताते हैं कि “पेपर पेड़-पौधों से बना है. लेकिन पेड़-पौधे मिट्टी और सूर्य की रौशनी की वजह से ज़िन्दा हैं. इन्हीं पेड़ों की मदद से पेपर बनाने में कई कारीगरों की मदद ली जाती है. उन कारीगरों की स्किल की बदौलत इन पेड़ों को पेपर में तब्दील किया जाता है. और इन कारीगरों का शरीर भोजन से चलता है. जिसे किसान मिट्टी की मदद से उगाते हैं.”
इसलिए ये पेपर का टुकड़ा सिर्फ और सिर्फ पेपर का टुकड़ा नहीं है. बल्कि इसमें पूरे विश्व का सारांश छुपा हुआ है.
आपको जेन टीचर का पेपर गेम काफी आम सा लग सकता है. इसलिए काफी लम्बे समय तक साइंस भी इसे मानने से इंकार करता रहा. लेकिन समय के साथ-साथ Descartes, Newton, और Galileoजैसे विचारक आए जिन्होंने नेचुरल वर्ल्ड के ऊपर अध्ययन किया. इसके बाद साइंस ने भी विश्वास करना शुरू किया कि नेचर के पास अद्भुत शक्तियाँ हैं.
भारत में गौतम बुद्ध और कई संतों ने जंगलों में पेड़ों के तले तपस्या करके, निर्वाण को प्राप्त किया है तो अगली बार आपको कोई बड़ा पीपल का वृक्ष दिखे तो कुछ समय उसके नीचे बैठकर ध्यान ज़रूर लगाएं. शायद ये कुछ पल आपको हमेशा के लिए बदल दें.
हालांकि, नेचर को समझने के लिए विज्ञान इकोलॉजिकल माइंडसेट को मानता है. इसका मतलब वो नेचर को इसी सिधान्त से समझने की कोशिश करता है. ये सिधान्त बताता है कि नेचर में सभी चीज़ें आपस में जुड़ी हुई हैं. उदाहरण के लिए ज़रा सोचिए कि एक ओक का पेड़ कैसे ज़िन्दा रहता है? केवल मिट्टी और सूर्य किरण की मदद से? लेकिन ये पूरा सच नहीं है. उसके जीवित रहने में दूसरे जीव-जन्तु का भी योगदान रहता है. ओक के पेड़ की जड़ में mycorrhizal fungi पाए जाते हैं. पेड़ फंगी को जिन्दा रहने के लिए भोजन देता है. वहीं बदले में उसे भी nitrogen और phosphorus गैस मिलती हैं. जिनकी मदद वो सर्वाइव करता है.
कनेक्शन का मायजाल यहीं खत्म नहीं होता है. अंडर ग्राउंड ही फंगी की वजह से rhizomatic network बनता है. जिसकी वजह से जंगल के पेड़ आपस में कम्युनिकेशन करते हैं. जब किसी भी पेड़ को बढ़ने में मुश्किलें आती हैं. तो वो फंगी की मदद से केमिकल सिग्नल भेजता है. इसके बाद उसके पास प्रॉपर मदद पहुँचती है.
आज के समय में इंसान इंटरनेट में कैद है और जंगलों से दूर है. लेकिन अगर आपको समय मिले तो phytoncides प्रोसेस के बारे में गूगल करिएगा. आपको पता चलेगा कि जंगलों की ओर जाने से और वहां सांस लेने से आप अपना इम्यून सिस्टम बेहतर कर सकते हैं.
पूरा जंगल एक दूसरे की मदद करता रहता है. इस पूरे कांसेप्ट को Ubuntu कहते हैं. हम खुद को समझदार मानते हैं. लेकिन हमें ये कांसेप्ट बहुत कुछ सिखा सकता है. इसलिए दूसरों की मदद करते रहें और आगे बढ़ते रहें.
डायवर्सिटी (विविधता) किसी भी सिस्टम को मज़बूत बनाती है।
चलिए इडाहो के सॉवोथ पर्वत की यात्रा पर चलते हैं. इस सपनों के जैसे सुंदर पर्वत की यात्रा पर पैदल चलते हैं. मान लेते हैं कि अभी बसंत ऋतु चल रही है. इस मौसम में ये यात्रा हमें ज़िन्दगी की नई खुशियों से मिलवाएगी.
वहां चोटियों के बीच घाटियों में जंगली फूलों से भरे घास के मैदान हैं. वहां जेरेनियम, बटरकप, तूलिका, ब्लूबेल समेत सैकड़ो फूल मौजूद हैं. इतनी ज्यादा वैरायटी क्यों हैं? हर एक वैरायटी की अपनी अलग ताकत और कमज़ोरी है.
अलग-अलग वैरायटी ईको सिस्टम को मज़बूत बनाती हैं. इसलिए कहा जाता है कि डायवर्सिटी ही सिस्टम को सेफ रखती है.
आप खुद सोचिए, इस वातावरण ने पेड़ पौधों के कितनी जनरेशन को देखा होगा. एक के बाद एक पीढ़ी आती रहती है. अलग-अलग पीढ़ियों के साथ संतुलन बनाने के लिए नेचर ने कितनी स्ट्रेटजीज़ बदली और बनाई होंगी. आज के दौर के मैनेजमेंट कॉलेज में स्टूडेंट्स को स्ट्रेटजी बनाना ही सिखाया जाता है. जिसके लिए मोटी-मोटी फीस लेते हैं. लेकिन उसी मैनेजमेंट स्किल को आप फ्री में नेचर से भी सीख सकते हैं.
आपको देने के लिए नेचर के पास बहुत कुछ है. अब आपको खुद से सवाल करना है कि क्या आपके पास नेचर के करीब जाने का समय है?
कभी समय मिले तो अपने पास मेडिकल स्टोर में जाइएगा और देखिएगा कि आपकी दवाइयों में नेचर का कितना योगदान है?
बहुत सारी इंसानी दवाइयों में नेचर के ही species का उपयोग किया जाता है. उदाहरण के लिए हर्ट अटैक से बचाने वाला ड्रग Coumadin नेचर की SPECIES sweet clover से लिया जाता है. HIV-AIDS की थैरेपी में उपयोग किए जाने वाला केमिकल marine sponges से लिया जाता है.
डायवर्सिटी एक ऐसा पहलू है, जो कि नेचर के साथ-साथ सोसाइटी के लिए भी बहुत ज़रूरी है. इसकी मदद से हम विश्व को एक अलग नज़रिए से देख पाते हैं. सिम्पल सी बात है जितने ज्यादा दिमाग साथ में आकर सोसाइटी के लिए काम करेंगे, सोसाइटी में क्रिएटिविटी उतनी ही ज्यादा दिखेगी.
नेचर और समाज के लिए स्त्री-पुरुष दोनों की एनर्जी ज़रूरी हैं
केन्या में स्थित ट्सावो नेशनल पार्क की बात करें तो वहां के एनिमल किंगडम में कई प्रभावशाली species हैं. अगर आप वहां के जंगलों में मौजूद मैमल्स की कम्युनिटी को गौर से ओब्सर्व करेंगे. तो हमें एहसास होगा कि वहां का पैटर्न कुछ अलग सा है.
आप गौर करेंगे कि पूरे एनिमल किंगडम में फीमेल जेंडर का प्रभाव ज्यादा है.
उस जंगल के हाथियों की लीडर फीमेल हाथीहै. इसी के साथ शेरों और बाघों को भी फिमेल ही लीड करती हैं. नेचर के इस हाव भाव को समझने के बाद आपको एहसास हो जाएगा कि इस संसार के लिए औरतों की भूमिका कितनी ज्यादा ज़रूरी है? कोई भी समाज तब तक शक्तिशाली नहीं हो सकता है. जब तक उस समाज की औरतें शक्तिशाली नहीं होंगी.
इसलिए बैलेंसड ईकोसिस्टम के लिए मेल और फिमेल दोनों की भूमिका ज़रूरी है.
इस चैप्टर में लेखक masculine और feminine एनर्जी की बात कर रहे हैं. लेकिन आखिर इस एनर्जी का मतलब क्या होता है?
आमतौर पर लोग इस एनर्जी को जेंडर या सेक्स से जोड़ते हैं. लेकिन ये खूबियाँ हैं, और ये खूबियाँ एक दूसरे के बिना अधूरी हैं. अगर Masculine एनर्जी शौर्य का प्रतीक है. तो feminine एनर्जी शक्ति की, इन दोनों को मिलाकर ही शौर्य=शक्ति का समावेश हो सकता है.
ह्यूमन हिस्ट्री को तैयार करने में भी इन दोनों एनर्जी का बहुत बड़ा योगदान रहा है. मानव इतिहास बताता है कि इन दोनों एनर्जी नें मिलकर ही धरती में जीवन को तैयार किया है.
हम नेचर से सीख सकते हैं कि सामने वाले का सम्मान कैसे किया जाता है? हमें सीखना होगा कि इस दुनिया के लिए बस हम ही ज़रूरी नहीं है. बल्कि सामने वाला जेंडर भी हमसे ज्यादा ज़रूरी है. इसलिए अब वक्त आ गया है कि जेंडर समानता की बात बड़े-बड़े मंचों से बार-बार करें.
सभी का सम्मान करना भी नेचर से सीखा जा सकता है
15वीं शताब्दी के शुरुआत में फ्रेंच फिलॉसफर Michel de Montaigne को अपने काम को टालने की आदत लग गई थी. एजुकेशन और लिटरेचर सिस्टम के ऊपर लिखने के बजाए वो अपनी बिल्ली के साथ खेलने में व्यस्त रहा करते थे.
तब उनके मन में ख्याल आया कि “मैं तो बिल्ली के साथ टाइम पास कर रहा हूँ, मुझे मज़ा भी आ रहा है. क्या मेरी बिल्ली को भी खेलने में मज़ा आ रहा होगा?”
अब लोग ऐसा सोचते हैं लेकिन उस दौर में ऐसा वैज्ञानिक भी नहीं सोचा करते थे. किसी को फर्क ही नहीं पड़ता था कि जानवरों की भी फीलिंग और इमोशनस होते हैं. तब के समय में कई लोग तो जानवरों को कुछ समझते ही नहीं थे.
धीरे-धीरे समय आगे बढ़ता चला गया, फिर एक कांसेप्ट का जन्म हुआ, जिसे ह्यूमनिज्म कहा गया. इस कांसेप्ट में कुछ खूबियों को अलग किया गया. जिससे ये पता चलता था कि कौन सा इंसान जीनियस है? और कौन से लोग जीनियस नहीं हैं.
राइटर कहते हैं कि “हम लोगों ने जिन खूबियों को जीनियस होने के मापदंड बनाया था. वो सभी खूबियाँ नेचर में पहले से मौजूद हैं.”
अगर आप जानवरों को ध्यान से ओब्सर्व करेंगे. तो आपको पता चलेगा कि उनकी बौद्धिक क्षमता बहुत अधिक होती है. उदाहरण के लिए मधुमख्खियाँ अपनी साथियों को खाने की जगह और लोकेशन डांस की मदद से बता देती हैं. वहीं ऐसे कई सारे जानवर हैं जो फेशियल एक्सप्रेशन से एक दूसरे से कम्यूनिकेट कर लेते हैं. आपको ये जानकर आश्चर्य भी हो सकता है कि व्हेल्स और डॉल्फिन्स के नाम होते हैं. वैज्ञानिकों ने ओब्सर्व किया है कि ये लोग whoopsऔर whistles तकनीक की मदद से एक दूसरे को पहचानते हैं.
तो ये बात शत प्रतीशत सच है कि जानवर बहुत होशियार होते हैं. लेकिन अब सवाल ये उठता है कि क्या उनके पास भी इंसानों की तरह इमोशन होते हैं? इस बात के भी प्रूफ मौजूद हैं. जानवरों के स्वभाव पर हुई रिसर्च बताती है कि “जब भेड़ीये या खरगोश अपने पार्टनर्स की तलाश करते हैं. तो उनके दिमाग में ऑक्सीटोसीन नाम का हॉर्मोन रिलीज़ होता है. ये हॉर्मोन इंसानों में भी मौजूद होता है. जब हम प्यार, मोहब्बत, ख़ुशी में होते हैं तो हमारे दिमाग में भी यही हॉर्मोन रिलीज़ होता है. ऐसा देखा गया है कि हाथियों के झुण्ड में अगर किसी की मौत हो जाए. तो बाकी लोग उसके जाने का शोक यानि दुःख मनाते हैं.
लेकिन अब ऐसा समय आ गया है कि हम लोग नेचर की कद्र नहीं कर रहे हैं. यही कारण है कि नेचर में कुछ भयानक बदलाव हो रहे. जिन्हें पर्यावरण परिवर्तन कहा जाता है. हमें समझना होगा कि नेचर में बदलाव एक कटु सत्य है जिससे आंखे चुराना शुतुर्मुर्ग की तरह अपना सिर रेत में छुपा लेने के बराबर होगा.
पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है, ये सच है. ग्लेशियर पिघल रहे हैं ये सच है. ऐंटार्कटिक की बर्फ़ीली परतें तीव्र गति से पिघल रही हैं जिससे समुद्रों का जलस्तर चढ़ रहा है, ये भी सच है. और ये सब हो रहा है हमारी आपकी ज़रूरतों के कारण. इसलिए अब समय आ गया है कि हम लोग अपनी-अपनी ज़रूरतों पर लगाम लगाएं. और खुद को नेचर के करीब लाने का प्रयास करें.
ज़िन्दगी में क्या सबसे ज़रूरी है? इसकी पहचान करें और उसके लिए शक्ति बचाकर रखें
अब आप सोच सकते हैं कि “गुरु” क्या हम सभी जानवरों से कुछ ना कुछ सीख सकते हैं? अब बताओ हम आलसी जानवर “हम्बल स्लोथ” से क्या सीख सकते हैं? ये तो दिन भर पेड़ से लटका रहता है. चलता भी बहुत धीमे है और अपना काम भी धीमे-धीमे ही करता है.
तो क्या इससे हम आलसी होना सीख सकते हैं? ऐसा बिल्कुल नहीं है. भले ही हम स्लोथ को आलसी समझते हैं. लेकिन असलियत में उसके अंदर बहुत फुर्ती होती है. उसके शरीर की बनावट ऐसी है कि वो हमेशा अपने एनर्जी का यूज नहीं कर सकता है. इसलिए जब उसे सबसे ज्यादा ज़रूरत पड़ती है. तभी वो अपनी पूरी एनर्जी का उपयोग करता है.
पूरे नेचर में हर कोई बेसिक प्रिंसिपल को फॉलो करता है. नेचर में कोई भी आपको एफर्ट्स और एनर्जी की बर्बादी करते नहीं दिखेगा. सभी एनर्जी को बचाने की कोशिश करते हैं. हम इंसान होते हुए नेचर से ये सीख ले सकते हैं. हमें भी अपने रिसोर्सेस की कद्र करनी होगी. हमें समझना होगा कि इन रिसोर्सेस को आने वाली पीढ़ी भी यूज करेगी. इसलिए ये हमारी ज़िम्मेदारी है कि हम इन रिसोर्सेस को बचाकर उपयोग करें.
ऑथर कहते हैं कि “हर सेकंड धरती में एनर्जी के रूप में सूर्य किरण आती रहती है. हम सोच भी नहीं सकते हैं कि इस एनर्जी में कितनी ताकत है? सिर्फ एक घंटे की सूर्यकिरण की एनर्जी को पूरा विश्व 6 महीनों तक उपयोग कर सकता है.”
इसलिए अब समय आ गया है कि हम लोग एनर्जी की कद्र करना सीख जाएँ. बिना एनर्जी के मानव जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है. हमारा वातावरण हमें सब कुछ दे रहा है. लेकिन समस्या ये है कि हम और ज्यादा लालची होते जा रहे हैं. हमें भी नेचर में मौजूद जानवरों के बेसिक प्रिंसिपल को अपनाना होगा. हमें नेचुरल रिसोर्स को बचाने की कोशिश करनी होगी. अगर हम ऐसा नहीं करेंगे तो फिर हमारी आने वाली पीढ़ियों के पास मौत के अलावा कोई रास्ता नहीं बचेगा.
इन सबके अलावा हम अपनी खुद की एनर्जी और एफर्ट्स भी बहुत ज्यादा बर्बाद करते हैं. हमको पता भी नहीं चलता है कि हम दूसरों की बुराई करने में कितना समय बर्बाद कर देते हैं? हम अपने लुक्स पर बहुत समय बर्बाद करते हैं. इन सबके अलावा हम नेगेटिव थॉट्स, डिप्रेशन, एंग्जायटी, ओवर थिंकिग के ऊपर अपना समय और एफर्ट्स बर्बाद करते रहते हैं. हमें इस बात का एहसास होना चाहिए कि ये सब फ़ालतू की चीज़ें हैं. इनसे हम खुशियों तक कभी नहीं पहुँच पाएंगे.
इसलिए बर्बादी के रास्ते को छोड़कर, क्रिएट करने की दुनिया में कदम रखने का प्रयास करें. पूरा खेल ही माइंड सेट का है. जानवरों से माइंड सेट सीखने की कोशिश करें. ऐसा करने से आप असल मायनें में इंसान बन जाएंगे.
कुल मिलाकर
हम अपनी ज़िन्दगी को कैसी बनाते जा रहे हैं? इस सवाल को हमें खुद से पूछना होगा. हम अपना नाता नैचुरल रिसोर्स से क्यों तोड़ते जा रहे हैं? इन सवालों के जवाब ही हमें हमारे बेसिक्स के पास लेकर जायेंगे.
क्या करें?
अगर दिमाग में थकान लगे तो एक छोटी सी वॉक करें. पेड़ पौधों को देखें, उन्हें समझने की कोशिश करें. हो सके तो कभी जंगलों की ओर सैर के लिए जाएँ. बच्चे बनकर सबसे कुछ ना कुछ सीखने की कोशिश करें.
येबुक एप पर आप सुन रहे थे Eight Master Lessons of Nature By Gary Ferguson
ये समरी आप को कैसी लगी हमें yebook.in@gmail.com पर ईमेल करके ज़रूर बताइये.
आप और कौनसी समरी सुनना चाहते हैं ये भी बताएं. हम आप की बताई गई समरी एड करने की पूरी कोशिश करेंगे.
अगर आप का कोई सवाल, सुझाव या समस्या हो तो वो भी हमें ईमेल करके ज़रूर बताएं.
और गूगल प्ले स्टोर पर ५ स्टार रेटिंग दे कर अपना प्यार बनाएं रखें.
Keep reading, keep learning, keep growing.
