Too Much of a Good Thing

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Too Much of a Good Thing

Lee Goldman
चार जेनेटिक म्यूटेशन्स, जो कभी हमारे सर्वाइव करने के लिए जरूरी थे, अब हमें नुकसान पंहुचा रहे हैं।

दो लफ्ज़ों में
हमारे पूर्वज जिस तरह के वातावरण में रहते थे वह पूरी तरह बदल चुका है। इस किताब में यह समझाया गया है कि मार्डनाइजेशन की वजह से किस तरह हमारी हेल्थ पर बुरा असर पड़ रहा है और इससे कैसे बचा जा सकता है। 

यह किताब किनको पढ़नी चाहिए?
- जिनको मोटापा, हाई बीपी जैसे लाइफस्टाइल डिसआर्डर हैं
- जो लोग मेडिकल फील्ड से जुड़े हैं
- जो लोग साइंस की जेनेटिक्स या इवॉल्यूशन ब्रांच में रुचि रखते हैं 

लेखक के बारे में
ली गोल्डमैन कोलम्बिया यूनिवर्सिटी मेडिकल सेंटर में प्रोफेसर हैं। वे जाने माने कार्डियोलाॅजिस्ट और पब्लिक हेल्थ विशेषज्ञ हैं। उन्होंने गोल्डमैन क्राइटेरिया क्रिएट किया है। इसमें कुछ ऐसे लक्षण दिए गए हैं जिनसे यह डिसाइड करने में मदद मिलती है कि हार्ट पेशेंट्स को कब प्रायोरिटी ट्रीटमेंट की जरूरत होती है।हमारा शरीर आज की मार्डन लाइफस्टाइल के लिए नहीं बना है।
पहले लोगों की लाइफ बहुत सिम्पल होती थी। वो मेहनत करते थे और खा-पीकर सो जाते थे। उनके पास भरपूर समय होता था। धीरे-धीरे उनकी जरूरतें बढ़ीं, और उसे पूरा करने के लिए तरह-तरह के इन्वेंशन हुए। 19वीं सदी में हुई औद्योगिक क्रांति इसी का नतीजा थी। इसके साथ ही दुनियाभर में बदलाव की लहर चल पड़ी। जो चीज कम होती गई वह था समय। हमारी सुस्त जिंदगी अचानक भागने लगी और हर रोज इसकी रफ्तार तेज होती जा रही है। 

हमारा शरीर भी एक मशीन ही है जो इस रफ्तार से तालमेल नहीं बिठा पा रहा है। 
दरअसल हमारा शरीर आज भी उसी पुराने जमाने का आदी बना हुआ है। 

हमारे पूर्वज जल्दी सो जाते थे, जल्दी उठ जाते थे और किसी काम के लिए टाइम बाउंड नहीं थे। आज हमारा हर काम घड़ी की सुई की टिक-टिक के हिसाब से तय होता है और आज इतने चैलेंजेस हैं कि यह 24 घंटे भी कम पड़ने लगते हैं और मजबूरन हमें भागना पड़ता है। स्मार्टफोन और टीवी जैसे गैजेट्स के भी अपने नुकसान हैं। और इन सबकी वजह से हमारे सोने-जागने, खाने-पीने जैसी हर आदत बदलती जा रही है। लेकिन हमारा शरीर तो वही है ना।

इस समरी में आप पढ़ेंगे कि किस तरह से हमारा शरीर मार्डन लाइफस्टाइल से तालमेल बिठाने के लिए जूझता है और बीमारियों का शिकार होने लगता है। आप यह भी जानेंगे कि इन सबसे बचने का रास्ता क्या है। 

इसके अलावा आप यह भी जानेंगे कि हमारे पूर्वजों का खान-पान कैसा था और क्यों वो एक ही बार में बहुत सारा खाना खा लिया करते थे? कैसे पुराने दौर में एक छोटी सी चोट भी जानलेवा साबित होती थी? और, जापान में किस तरह से लोग अपनी फिटनेस और स्वास्थ्य को लेकर जागरूक रहते हैं?

जिस तरह बुज़ुर्गों को कम्प्यूटर जैसे किसी नए गैजेट को समझने और उसका इस्तेमाल करने में वक्त लगता है उसी तरह हमारे शरीर को भी नए बदलावों के मुताबिक खुद को ढालने में वक्त लगता है। 

आज से करीब 60,000 साल पहले तक लोग अफ्रीकन इलाकों में रहते थे और उनकी स्किन डार्क थी। उनको अच्छी सनलाइट मिलती थी। जिसकी मदद से उनकी बॉडी में विटामिन डी पर्याप्त मात्रा में बनता था। जब लोगों ने माइग्रेट करना शुरु किया और ऐसे इलाकों में गए जहां सूरज की रोशनी कम होती थी तो उनमें विटामिन डी की कमी होने लगी। 

विटामिन डी हमारी हड्डियों की ग्रोथ और मजबूती के लिए जरूरी होता है। और इसकी कमी सर्वाइवल के लिए एक चैलेंज बनने लगी। धीरे-धीरे उनका शरीर इस बदलाव को अडॉप्ट करने लगा और इस कमी को दूर करने के लिए जेनेटिक चेंज हुए। जिससे उनका स्किन टोन लाइटर हो गया। 

विटामिन डी प्रोडक्शन का संबंध स्किन कलर से है। लाइट स्किन ज्यादा विटामिन डी बनाती है। इस तरह ये जेनेटिक बदलाव उस वक्त बहुत जरूरी था और ये खूबी नेक्स्ट जेनरेशन्स तक ट्रांसफर होती गई लेकिन इसके लिए वक्त लगा। 

औद्योगिक क्रांति के बाद दुनिया इतनी तेजी से बदलती जा रही है कि हमारे शरीर को उसके मुताबिक ढलने के लिए वक्त ही नहीं मिल पा रहा है। 

आदिकाल में इंसान भोजन की खोज में भटकता था। मेहनत करके पसीना बहाता था। जंगलों में रहने के अपने खतरे थे जिनसे निपटने के लिए फिजिकल फिटनेस जरूरी हुआ करती थी। आज हर चीज एक बटन के क्लिक पर मिल जाती है। शारीरिक श्रम की जगह मानसिक श्रम ने ले ली है। और हमारे शरीर पर इस बदलाव का सीधा असर पड़ रहा है।

एक जमाना था जब भोजन की तलाश में मीलों भटकना पड़ता था और आज इतनी चीजें मिल जाती हैं कि आप डिसाइड नहीं कर पाते कि क्या खाएं।
जीने के लिए भोजन जरूरी है। और उससे भी जरूरी है इसको सही अमाउंट में खाना। आज तो हर चीज इंस्टेंटमिल जाती है। आप बाजार जाइये और बना-बनाया खाना ले लीजिए। घर बैठे खाना आर्डर कर दीजिए। लेकिन आज से हजारों साल पहले कंडीशन अलग थी। 

लोगों को खाने की तलाश में इधर-उधर भटकना पड़ता था। जब तक खेती की शुरुआत नहीं हुई थी, तब तक भोजन का मेन सोर्स जानवरों का मीट हुआ करता था। जो कभी मिलता और कभी नहीं मिलता क्योंकि इसके लिए शिकार करना पड़ता था। उस वक्त शरीर की कैलोरी रिक्वायरमेंट को पूरा करने के लिए फैट एक अच्छा आप्शन था। हालांकि तब कैलोरी जैसी चीज का कोई कांसेप्ट नहीं था पर भोजन से ताकत मिलती है, इतनी बेसिक सी बात समझना भी मुश्किल नहीं था। यही वजह है कि हमारे पूर्वज एक दिन में 9 पाउंड तक मीट खा लिया करते थे ताकि आने वाले कुछ दिनों तक के लिए काम चल जाए। 

जब भी खाना मिल जाए तब खा लो यही उस वक्त का रुल था। फैट ज्यादा खाने की वजह से यह उनके शरीर में एक एनर्जी रिजर्व की तरह स्टोर होती थी और उनकी हिप्स, पेट और जांघों पर जमा होती रहती थी। 

ये एक तरह का सर्वाइवल मेथड था। ठंडे इलाकों में रहने वाले लोगों को इस फैट डिपाॅजिशन की वजह से गर्माहट भी मिलती रहती थी। 

आज हालात अलग हैं। आज न तो हमें भोजन की कमी है कि हम एक बार में एनर्जी स्टोर करने के लिए बहुत ज्यादा खा लें और न ही शरीर को गर्म रखने के लिए इसकी जरूरत है क्योंकि उसके लिए कपड़े और घर हैं। 

हमारा मेटाबाॅलिज्म और जेनेटिक मेकअप इस तरह का है कि हम वजन जल्दी बढ़ा तो लेते हैं पर इसे कम करना मुश्किल होता है। वजन कम होते जाने के साथ हमारी डेली कैलोरी रिक्वायरमेंट भी कम होती जाती है। अगर हमारे वजन का एक परसेंट कम हो जाए तो हमें 20 कैलोरी कम कर देनी चाहिए। यानि अगर हम वजन कम करना चाहते हैं तो कुछ हफ्तों का नहीं पूरी जिंदगी के लिए एक सही डाइट प्लान फॉलो करना होगा। 

2012 में डॉक्टर प्रिया सुमित्रन ने एक रिसर्च में यह पाया कि जब हम वजन कम करते हैं तो हमारी बॉडी एक हार्मोन रिलीज करती है जो हमें ज्यादा खाने के लिए प्रेरित करता है। जब भोजन की कमी रहा करती थी तब यह मैकेनिज्म सही था पर आज इस वजह से मोटापा बढ़ रहा है। 

एक समय था जब हमारे शरीर में पानी और सोडियम की कमी हो जाया करती थी और अब इनकी अधिकता बुरी बन रही है। हमने हमेशा सुना है कि जॉगिंग, मार्निंग वॉक, दौड़ना अच्छी आदतें हैं जो हमें फिट रखती हैं पर रेगिस्तानी और सूखे इलाकों में जहां पानी की कमी होती है, वहां यह नुकसानदायक है। 

जब मानव सभ्यता विकसित हो रही थी तब से लेकर मध्य काल तक डिहाइड्रेशन एक बहुत आम बात थी क्योंकि तब लोग मेहनत और फिजिकल एक्टिविटी ज्यादा किया करते थे पर पीने के लिए साफ पानी की कमी होती थी। 

इतिहास में इससे जुड़ी एक घटना मिलती है। 490 BC में ग्रीस और ईरान के बीच लड़ाई हुई जिसमें ग्रीस की जीत हुई। उस समय संदेश भेजने के लिए लोग पैदल ही जाया करते थे। यह संदेश लेकर फीडिपिडस नाम का एक आदमी एथेंस की तरफ गया। यह खबर जल्द सुनाना जरूरी था इसलिए वह लगातार दौड़ता रहा। रेगिस्तानी इलाकों से गुजरने और वातावरण की गर्मी की वजह से उसके शरीर से बहुत ज्यादा पसीना बहता गया। इसकी वजह से उसे सीवियर डिहाइड्रेशन हो गया। 

पानी और सोडियम की बचत करने के लिए उसके शरीर से पसीना निकलना बंद हो गया और उसका बॉडी टेम्परेचर बढ़ने लगा। कहा जाता है कि जैसे ही उसने मैसेज डिलीवर किया, दिल का दौरा पड़ने की वजह से उसकी मृत्यु हो गई। 

हमारा शरीर का एक मैकेनिज्म होता है जो पानी, सोडियम, ग्लूकोज या ऐसी ही किसी और कमी को पूरा करने के लिए एक्टिवेट हो जाता है पर इसके नुकसान भी हैं। 

जब कभी हमारे शरीर से पानी निकलता है जैसे यूरिनेशन, स्वेटिंग या डायरिया में तो पानी के साथ सोडियम भी निकलता है। इसकी वजह से ब्लड लेवल भी प्रभावित होता है और बीपी कम होने लगता है। और इसके विपरीत जब पानी और सोडियम की मात्रा बढ़ती है तो बीपी बढ़ जाता है। 

हमारी पहली जेनरेशन्स के लिए डिहाइड्रेशन एक बड़ा खतरा था इसलिए जेनेटिक बदलाव हुए और ऐसे हार्मोन बने जिनकी वजह से हमारे सिस्टम में सोडियम ज्यादा बना रहता था। उस वक्त ये एक ब्लेसिंग थी पर आज ये चीज हमारा नुकसान कर रही है। आज हमारा सोडियम इनटेक वैसे भी बहुत ज्यादा है। अमेरिका में हाई बीपी से होने वाली मृत्युदर 15% है।

डर और घबराहट कभी एक सर्वाइवल ट्रेट था जो हमारी रक्षा करता था पर आज इसकी वजह से मानसिक तनाव बढ़ रहा है।
लोग छोटी-छोटी बातों पर घबरा जाते हैं और अपना स्वास्थ्य बिगाड़ लेते हैं। पहले मानव एक घुमंतु प्रजाति था तब जंगलों में रहने और यहां-वहां भटकने की वजह से हमेशा खतरा बना रहता था। ये खतरा नेचुरल डिजास्टर का हो सकता था, बीमारियों का भी और जानवरों और दूसरी टोलियों के आक्रमण का भी। हालांकि आज भी कुछ ऐसे समूह हैं जो इसी तरह जी रहे हैं जैसे पैराग्वे में रहने वाले शिकारी कबीले जहां आपसी लड़ाई में ही अनेक मौतें हो जाती हैं। 

उस वक्त डरना एक तरह का डिफेंस मैकेनिज्म होता था। लोग खतरा महसूस करते थे और उससे डरते थे इस वजह से जल्द से जल्द अपने बचाव का रास्ता ढूंढते थे। और यह गुण भी उन्होंने अपनी आने वाली पीढ़ियों को ट्रांसफर किया। 

2004 में रैन्डोल्फ नेसे नाम के एक साइकिएट्रिस्ट ने अपनी स्टडी में बताया कि जब लोग अपनी जान बचाने के लिए डरकर भागते थे तो सिर्फ 200 कैलोरी खर्च होती थी पर किसी चोट या हादसे का शिकार होने पर अगले कुछ ही दिनों में 20,000 कैलोरी तक खर्च हो जाती थी क्योंकि तब वो खाना नहीं ढूंढ पाते थे। यानि डरकर भागना सर्वाइव करने के लिए जरूरी था। 

ये आदत हममें आज भी है जबकि अब हमारे पास इस तरह के खतरे नहीं हैं। हम एक आरामदायक घर में रहते हैं। कोई समूह दूसरे पर यूं ही हमला नहीं करता। अब घबराने की यह आदत हमें एन्जाइटी और डिप्रेशन की तरफ ले जा रही है। आज हमारे पास अलग तरह के चैलेंजेस हैं जो उतने बड़े नहीं हैं पर इतनी ज्यादा चिंता करने की आदत हमें नुकसान पंहुचा रही है। 

हमारी मार्डन लाइफस्टाइल स्ट्रेस हार्मोन को और बढ़ा रही है। हमारे पास काम की टार्गेट और डेडलाइन होती हैं। हम हर जगह एक दूसरे से कॉम्पीट कर रहे हैं। हमें असफलता का डर है और इसकी वजह से हम लगातार चिंता और तनाव में जीते रहते हैं। यह एक और ऐसा जेनेटिक बदलाव है जो हमारी जान बचाने के लिए ही हुआ था पर आज हमारे लिए नुकसानदायक साबित हो रहा है। 

ब्लड क्लाटिंग का फायदा यह है कि यह ब्लीडिंग रोककर हमारी जान बचाती रही है पर इसकी वजह से हार्ट अटैक का खतरा बढ़ रहा है।

आपने ऑब्जर्व किया होगा कि जब चोट लगती है तो जल्दी ही ब्लड क्लॉट हो जाता है। इससे ज्यादा खून नहीं बहता और कंडीशन क्रिटिकल नहीं होने पाती। 

जब तक मेडिकल साइंस इतना एडवांस नहीं था, ब्लड लॉस फेटल हुआ करता था। डिलीवरी के वक्त या फिर शिकार करते हुए चोट लगने की वजह से होने वाला डेथ रेट बहुत ज्यादा हुआ करता था। ब्लड क्लॉटिंग उस वक्त एक एडवांटेज थी।

खून की एक बूंद में लगभग डेढ़ करोड़ प्लेटलेट्स होती हैं। ये चोट की जगह पर जम जाती हैं और खून बहना रोक देती हैं। इनसे एक केमिकल सिग्नल भी रिलीज होता है जो हमारे ब्लड सर्कुलेशन की दूसरी प्लेटलेट्स को एक्टिवेट कर देता है। 

एक जमाने में ये क्वालिटी हमारी जान बचाती थी पर आज ये हमारे दिल के लिए खतरा बन रही है। अनहेल्दी डाइट इसे और बढ़ा रही है। अगर अनसैचुरेटेड फैट और आर्टिफिशियल ट्रांस फैट ज्यादा कन्ज्यूम की जाए तो आर्टरीज में कोलेस्ट्राल जमा होने लगता है और उनके फटने का खतरा बढ़ने लगता है।

जब ये वैसल्स फटती हैं तो प्लेटलेट्स एक्टिवेट होकर क्लॉट बनाने लगती हैं ताकि ये चोट सील की जा सके। जब ये क्लॉट कोलेस्ट्राल लेयर के ऊपर बन जाता है तो ब्लड फ्लो में रुकावट आने लगती है और दिल का दौरा होने का रिस्क बढ़ने लगता है। 

ब्लड क्लाटिंग की प्रॉपर्टी भी हमारे इवॉल्यूशन का हिस्सा रही है और जीन्स में ट्रांसफर हुई है लेकिन आज ये हमारे लिए खतरा बन रही है। अब तक हमने पढ़ा कि किस तरह समय-समय पर हमारा जेनेटिक मेकअप बदला जो उस वक्त के हिसाब से जरूरी था लेकिन आज इनके नुकसान भी नज़र आ रहे हैं। हमारा शरीर इस नई चुनौती का सामना कैसे करेगा? इसे अगले चैप्टर में समझाया गया है।

जरूरत के मुताबिक हमारी जीन्स में बदलाव आता रहा है पर इसे आधुनिक दौर की बीमारियों से निपटने के लिए तैयार होने में अभी बहुत देर है।
अगर बदलती लाइफस्टाइल के साथ एक ऐसा जीन इवॉल्व हो जाता जो कैंसर, डायबिटीज या दिल की बीमारियों से हमें सुरक्षित रखता तो कितना अच्छा होता। जेनेटिक इंजीनियरिंग के क्षेत्र में इसकी संभावना खोजी जा रही है पर प्राकृतिक तौर पर ऐसा जेनेटिक म्यूटेशन असंभव लगता है। 

नेचुरल सलेक्शन के प्रोसेस में उन जीन्स का ट्रांसफर नेक्सट जेनरेशन्स में धीरे-धीरे खत्म होता जाता है जो किसी इंसान के सर्वाइवल या रिप्रोडक्शन को नेगेटिवली प्रभावित करती हैं। मोटापा या डायबिटीज इस सर्वाइवल प्राॅब्लम क्राइटेरिया में नहीं आते। 

स्टडीज बताती हैं कि मोटापा और डायबिटीज से फर्टिलिटी कम होती है पर इन विट्रो फर्टिलाइजेशन जैसे एडवांस तरीकों से इसका हल ढूंढा जा चुका है। यानि ये बीमारियां हमारी नार्मल लाइफ में रुकावट डालती हैं पर ऑफस्प्रिंग तक ट्रांसफर भी होती हैं। 

एक ग्लोबल जेनेटिक म्यूटेशन का चांस भी लगभग नामुमकिन है। इमिग्रेन्ट्स की वजह से किसी क्षेत्र का जेनेटिक पूल बदलता जरूर है पर एक खास जीन का इतनी बड़ी आबादी में हर एक व्यक्ति तक ट्रांसफर हो पाना मुमकिन नहीं है। 

यहां फिर वही तेजी से बदलते वातावरण के अनुसार बॉडी के धीमे अडॉप्टेशन की बात आ जाती है। अगर कोई जेनेटिक बदलाव होना भी है तो इसमें बहुत समय चाहिए। कुछ ट्रेट बहुत आसानी से जेनरेशन्स में पास भी हो जाते हैं। उदाहरण के लिए ऐसे बच्चे जिनका सनलाइट से एक्सपोजर कम होता है, उनको मायोपिया होने का चांस ज्यादा होता है और यह उनकी आने वाली पीढ़ियों में भी देखा जाता है। 

एक थ्योरी यह भी कहती है कि एक दिन ऐसा हो सकता है कि हमारी किडनी, एक्सेस सोडियम को ब्लड से फिल्टर करके हमारे सिस्टम से बाहर करने लगे और यह गुण हमारी आने वाले जेनरेशन्स में भी पास हो जाए। 

हालांकि यह थ्योरी अपनी प्राइमरी स्टेज पर है और अभी तक इस पर ज्यादा काम नहीं हुआ है। आज हम जो अच्छी तरह जानते हैं वह यह है कि लाइफस्टाइल डिसआर्डर से निपटने में अभी हमारे पास किसी तरह का नेचुरल सलेक्शन प्रोसेस नहीं है जो जेनेटिक म्यूटेशन कर सके। 

अगर आप अपनी फूड हैबिट चेंज करना चाहते हैं तो ऐसे किसी ग्रुप में शामिल होकर ज्यादा अच्छा रिजल्ट मिल सकता है।

जानीमानी टीवी पर्सन ओपरा विनफ्रे ने जब 1988 में अपना वजन 67 पाउंड कम किया था तो ये खबर सुर्ख़ियों में थी। इसके बाद उनका वजन घटता-बढ़ता रहा जो 2008 में 200 पाउंड के लेवल तक पंहुच गया। एक मेहनती और मजबूत इरादों वाली महिला होने के बावजूद वो अपना वजन कंट्रोल क्यों नहीं कर पाईं? 

आप इसका एक आसान सा जवाब सोच लेंगे कि उनमें विलपावर की कमी है। हालांकि ये पूरी तरह सच नहीं है। ओपरा की ही तरह यूएस के प्रेसिडेंट रहे विलियम हावर्ड टैफ्ट भी ओवरवेट थे। 1909 में जब वो राष्ट्रपति बने तब उनका वजन 354 पाउंड था। उन्होंने भी इसे कम करने की बहुत कोशिश की थी। सच कहा जाए तो सिर्फ पक्का इरादा करना या मजबूत विल पावर होना ही काफी नहीं है। 

इसके लिए एक रेग्युलर मोटिवेशन की भी जरूरत होती है। जो हमें अपने आस-पास के फिट और हेल्थ को लेकर जागरूक रहने वाले लोगों से मिल सकता है। यानि अगर हम मिलकर कोशिश करें तो बेहतर नतीजे मिलते हैं। इसमें सरकारें एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। 

ब्रिटिश सरकार ने अपने फूड प्रोडक्ट बनाने वालों को इस बात के लिए राजी किया कि वो अपने प्रोडक्ट्स में नमक की मात्रा 20-30% कम कर दें। इसी तरह फिनलैंड में भी एक अवेयरनेस ड्राइव की मदद से लोगों को खाने में सोडियम कंटेंट 25% कम करने के लिए तैयार किया गया। इसकी वजह से वहां के लोगों में हाई बीपी या उससे होनी वाली दूसरी बीमारियों में कमी आने लगी। 

मोटापे से लड़ने में कल्चरल बिलीफ भी एक मेजर रोल प्ले कर सकते हैं।
आप जापान का उदाहरण ले लीजिए जहां मोटापे की दर सिर्फ 5% है। वहां सरकार ने 2008 में एक कानून बनाया था जिसके अनुसार 40 से 70 साल के बीच के लोगों को हर साल अपनी कमर का नाप लेना जरूरी होता है। पुरुषों के लिए इसकी मैक्सिमम लिमिट 33.5 इंच और महिलाओं के लिए 35.4 इंच रखी गई है। इससे ज्यादा होने पर उनकी डाइट काउंसिलिंग की जाती है।

दवा कंपनियां बहुत सी रिसर्च को फंड करती हैं और इसके अच्छे रिजल्ट भी मिलते हैं।
आज के दौर में होने वाली बीमारियां बहुत बड़ी जरूर हैं पर इनको मैनेज भी किया जा रहा है। बिल क्लिंटन को देख लीजिए, उनको दो बार हार्ट अटैक आ चुके हैं पर सही दवाइयों और एडवांस मेडिकल टेक्नॉलॉजी के दम पर वो एक अच्छी लाइफ जी रहे हैं। 

दवा कंपनियां लगातार रिसर्च करवाती रहती हैं और चिकित्सा क्षेत्र को अपडेटेड बनाती रहती हैं। उनको बहुत क्रिटिसाइज भी किया जाता है। जैसे एचआईवी को ले लीजिए जिस पर काफी सालों से रिसर्च की जा रही है पर अभी तक इसकी कोई क्योर या प्रिवेंशन नहीं मिल पाया है। लेकिन एक महत्वपूर्ण जानकारी तो फिर भी मिल गई है कि लगभग 1% इंसानों में म्यूटेशन से HIV रेजिस्टेंट जीन डेवलप हो चूका है। 

इससे जुड़ी एक घटना 2007 में सामने आई थी। टिमोथी रे ब्राउन (जिन्हें बर्लिन पेंशेंट कहा गया था) नाम के एक मरीज को ब्लड कैंसर और एड्स था। अपने आखिरी दिनों में उन्हें एक डोनर मिला जिसमें HIV रेजिस्टेंट जीन डेवलप हो चुकी थी। जब ब्राउन को बोन मेरो ट्रांसप्लांट किया गया तब न सिर्फ उनका कैंसर ठीक हो गया बल्कि उनमें भी HIV से इम्यूनिटी आ गई। इस तरह के ट्रीटमेंट इन कंपनियों की फंडिंग से ही संभव हो पाते हैं जिसके लिए उनका आभार मानना चाहिए। 

ये कंपनियां मार्डन टेक्नोलॉजी वाली लैब सेटअप करती हैं जहां लगातार प्रयोग किए जाते हैं। डॉक्टर सुसुमु टोनेगावा और उनकी टीम ने चूहों पर एक रिसर्च की और देखा कि टार्गेटेड मेमोरी डिलीट की जा सकती है। यानि कोई ऐसी खास बात जिसकी याद आपको तनाव या अवसाद से भर देती है, उसे भुलाया जा सकता है। इस ऑप्टोजेनेटिक्स कहा गया क्योंकि इसमें लाइट का इस्तेमाल किया गया था। 

इसमें पहले मेल चूहों को एक कमरे में रखकर लगातार शॉक दिया गया ताकि इस खास कमरे से वो डरने लगें। उसके बाद उनको एक अलग कमरे में फीमेल चूहों के साथ रखा गया ताकि वो शॉक वाली घटना से बाहर आ सकें। इस कंडीशन में उनके दूसरे ब्रेन सेल एक्टिवेट हुए। इन्हें हैप्पी सेल कहा गया। 

इसके बाद उनको वापस पहले कमरे में रखा गया लेकिन अब एक लेजर बीम की मदद से उनके ब्रेन के हैप्पी सेल को एक्टिवेट कर दिया गया। अब उनको किसी तरह का डर नहीं लग रहा था। इस तरह उनकी शॉक वाली मेमोरी डिलीट करने में कामयाबी मिली।

कुल मिलाकर
मानव सभ्यता के विकास में बहुत से जेनेटिक म्यूटेशन्स हुए हैं जिनका आधार नेचुरल सलेक्शन रहा है। इनकी वजह से हमारे शरीर में फैट स्टोर होने लगी, हमने खतरे को समझना और डरना सीखा, हमारी बॉडी सोडियम और वॉटर रिटेंशन करने लगी और ब्लड क्लाटिंग का मैकेनिज्म बना। लेकिन आज ये सब मॉडिफिकेशन हमें नुकसान करने लगे हैं। हो सकता है कि जेनेटिक्स पर होने वाली रिसर्च शायद एक दिन इसका हल ढूंढ पाए और हम आज के वातावरण के मुताबिक खुद को ढाल पाएं लेकिन अभी हमारे हाथ में कुछ नहीं है। हम हेल्दी लाइफस्टाइल अपनाकर जरूर इसको कुछ हद तक कंट्रोल कर सकते हैं। 

 

ऐसा सोचिए कि आप भी अपने पूर्वजों की तरह शिकार करके और भोजन को स्टोर करके जी रहे हैं, औरउनकीतरहलाइफस्टाइलफॉलोकरें।

फल, सब्जियों, मीट और मेवों का सेवन कीजिए क्योंकि ये भोजन का नेचुरल सोर्स है। हम यही खाने के लिए बने हैं। रिफाइंड और प्रोसेस्ड फूड से दूर रहिए। खुद को फिट रखने के लिए फिजिकल एक्टिविटी भी जरूर करते रहें।

 

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