Brainstorm

0
Brainstorm

Daniel J. Siegel
टीनेज ब्रेन की ताकत और उसका असर

दो लफ्जों में
साल 2014 में रिलीज हुई किताब ‘ब्रेन स्टॉर्म’ टीनेज उम्र के दिमागी अवस्था के ऊपर केन्द्रित है. किशोरावस्था को लेकर कई सारे मिथ समाज में फैले हुए हैं. इस किताब के माध्यम से आप जवानी की दहलीज में कदम रखने वाले दिमाग को और नज़दीक से पहचान पायेंगे. इसके साथ ही आपको पता चलेगा कि उम्र का ये पड़ाव सिर्फ हॉर्मोनल चेंज के लिए नहीं होता है बल्कि इस समय इंसानी दिमाग भी काफी तेजी से बदल रहा होता है.

ये किताब किसके लिए उपयोगी है
- पैरेंट्स और गार्जियन के लिए 
- टीनेजर्स के लिए 
- साईकोलॉजी में इंटरेस्ट लेने वालों के लिए 

लेखक के बारे में
Daniel J. Siegel ने हार्वर्ड विश्वविद्यालय से पढ़ाई की है. साथ ही साथ लेखक ने यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफोर्निया में रिसर्च भी की है. मौजूदा समय में लेखक UCLA में मेडिसिन के प्रोफेसर हैं. इसके साथ ही ये साइकोथेरेपी की प्रैक्टिस भी करते हैं. इन्होने कई किताबें ब्रेन और एजुकेशन के ऊपर लिखी हैं.

टीनेजर्स का बिहेवियर एक दम नॉर्मल होता है
आप इस बात से तो वाकिफ होंगे ही कि टीनेज का समय कैसा होता है? हर तरफ से उस उम्र से गुजर रहे इंसान को सवालों का सामना करना पड़ता है. उसके शरीर में भी काफी बदलाव हो रहे होते हैं. शायद, आज भी आपको याद हो वो किस्सा जब आप टीनेज के दौर से गुजर रहे थे. अगर आप टीनेज बच्चे के पिता या माता हैं. एक बार इस किताब को ज़रूर पढ़ियेगा. 

किशोरावस्था को लेकर समाज में इतनी सारी भ्रांतियां फैली हुई हैं. लेकिन हम भूल जाते हैं या फिर हम ध्यान नहीं देना चाहते कि इस बारे में न्यूरो साइंस क्या कहता है? अगर आपको ग्रोनअप लाइफ के बारे में समझना है तो फिर आपको न्यूरो साइंस के ऊपर भी नज़र दौड़ानी ही पड़ेगी.

इस समरी को पढ़कर आपको इंसानी दिमाग के बेसिक साइंस के बारे में भी पता चल जायेगा. उस उम्र के पड़ाव को समझने की समझ भी आपके अंदर विकसित होगी. 

इस बात में कोई संदेह नहीं है कि उम्र के पड़ावों में से टीनेज का समय काफी कठिन होता है. इस बात से भी कोई गुरेज नहीं है कि ये समय उसके लिए भी कठिन होता है. जो इससे गुजर रहा होता है और उसके लिए भी जो इसे मॉनिटर कर रहा होता है. इसीलिए कई बार ये देखा जाता है कि टीचर्स और पैरेंट्स अपनी आँखे चढ़ा लेते हैं, जब उनसे टीनेज की बात की जाती है. 

टीनेजर्स से बात करना कठिन हो सकता है. लेकिन फिर भी आप उनसे इस तरीके से बात ना करें जैसे कि आप कोई जंग में जा रहे हों. नॉर्मल रहिये हमेशा.

छोटे बच्चे अपने माता-पिता से काफी प्रभावित होते हैं. लेकिन जब वो बड़े होने लगते हैं. यानी टीनेज के पड़ाव में पहुँचते हैं तो अधिकत्तर देखा गया है कि वो अपने माता-पिता से परहेज करने लगते हैं. कई बार ये सिचुएशन पैरेंट्स के लिए काफी कठिन भी हो जाती है. अगर इसी समय पैरेंट्स ये समझ जाएँ कि उनके बच्चे के बिहेवियर में ये बदलाव आने के पीछे का कारण क्या है? तो काफी हद तक प्रॉब्लम सॉल्व हो सकती है. 

इसको आप इस एग्जाम्पल से भी समझ सकते हैं. चिड़िया अपने बच्चे को घोंसले में रखती है. लेकिन एक वक्त आता है जब उन बच्चों को आकाश में उड़ जाना पड़ता है. यही चीज टीनेजर्स के साथ भी होती है. वो खुद को इस दुनिया के लिए तैयार कर रहे होते हैं.

पैरेंट्स को समझना चाहिए कि इस दौर में इंसानी शरीर में काफी ज्यादा उर्जा रहती है. तो अगर आपका बच्चा थोड़ा रिस्क भी ले रहा है तो वो कुछ गलत नहीं कर रहा है. आप बस उसका साथ देते हुए उसे गाइड करते रहिये.

युवा रिस्क लेने से नहीं डरते लेकिन उन्हें पता नहीं होता है कि रुकना कहां है
लेखक की एक पेशंट हैं. टीनेज ही हैं. नाम है कैटी. स्कूल में इनके बिहेवियर के कारण इन्हें लेखक के पास ले आया गया. कैटी ने अपने स्कूल की पार्टी में शराब पीने की शुरुआत की थी. ये आदत इतनी बढ़ गई कि कैटी को अस्पताल तक जाना पड़ा.

नशा उतरने के बाद कैटी काफी आचम्भित दिख रही थी कि वो हॉस्पिटल कैसे पहुंच गई? कई लोग सोचते हैं कि टीनेजर्स को परिणाम का पता नहीं होता है. लेकिन ये सोच पूरी तरह से सत्य नहीं है. सत्य तो ये है कि टीनेजर्स को पता होता है कि उनके इस कदम से क्या हो सकता है? लेकिन वो बस अपनी क्षमता को परखना चाहते हैं.

यही चीज कैटी भी कर रही थी. कैटी को मालुम था कि स्कूल में शराब पीने से क्या हो सकता है? लेकिन फिर भी उसने वो किया क्योंकि उसे वो करना था.

कैटी का बिहेवियर दिखाता है कि कैटी रिस्क लेने से नहीं डरती है. लेकिन उसे पता नहीं था कि रुकना कहाँ है. इसके पीछे एक साइंटिफिक रीजन है. वो रीजन है डोपामाइन हॉर्मोन जो कि दिमाग में रिलीज होता है. इसी हॉर्मोन से इंसान को ख़ुशी का एहसास होता है.

बड़ों की अपेक्षा ये हॉर्मोन टीनेजर्स के ब्रेन में ज्यादा रिलीज होता है. उसी की वजह है कि टीनेजर्स बहुत ज्यादा उत्तेजित भी हो जाते हैं.

टीनेजर्स को समझने के लिए आपको पहले उनके दिमाग की केमेस्ट्री को समझना पड़ेगा. इस एनर्जी का गलत असर भी हो सकता है. इसलिए सबसे पहले आप उन्हें समझने की कोशिश करिए फिर उन्हें समझाइये. इसी पर हम आगे बात करने वाले हैं.

हमने देखा भी है और पढ़ा भी है कि टीनेजर्स रिस्क लेने से नहीं डरते हैं. कई बार वो रिस्क फायदे दे जाता है तो कई बार नुकसान भी देता है. उन्हें अच्छे से पता होता है कि इस रिस्क के बाद क्या-क्या परिणाम आ सकते हैं? लेकिन जब उन्होंने मन बना लिया तो बना लिया. अब सवाल उठता है कि वो फैक्टर क्या है जिसकी वजह से वो रिस्क ले पाते हैं. आपको बता दें कि वो है दोस्ती और फ्रेंड्स.

टीनएज में बच्चों की सोशल इंगेजमेंट काफी ज्यादा बढ़ जाती है. एक स्टडी में कई युवा बच्चों से कहा गया कम्प्यूटर गेम खेलने के लिए. ये गेम कार ड्राइविंग का था. इस अध्ययन में ये निकलकर सामने आया कि बच्चे जब अपने दोस्तों के साथ खेल रहे थे तो उनकी ड्राइविंग काफी रिस्की थे. यानी आप समझ सकते हैं कि बच्चों के अंदर अपने दोस्तों को देखकर रिस्क लेने की क्षमता आती है. 

अब छोटा सा किस्सा आपको सुनाते हैं. लेखक के दोस्त का एक बच्चा है. उसका नाम बेंजी है. बेंजी जब 13 साल का था तब कहीं वो दूसरों के साथ घूमने गया था. वहां पर सब ऊपर से समंदर में छलांग लगा रहे थे. उन्होंने बेंजी को भी बोला. बेंजी ने छलांग भी लगा दी लेकिन उसे नहीं मालुम था कि पैर को मोड़ना भी है. जिसके कारण उसके दाएं पैर में फ्रैक्चर हो गया था. बाद में बेंजी ने बताया कि वो बिल्कुल छलांग नहीं लगाता अगर दूसरे बच्चे प्रेशर ना डालते तो, इसे कहते हैं पीयर प्रेशर.

इसी एवोल्यूशन से बच्चों का सोशल कनेक्शन भी जुड़ा रहता है. इसी का कनेक्शन उनका घर छोड़ने से भी रहता है.

याद करिए जब आप पहली बार घर से बाहर रहने के लिए गये थे. तब आपने क्या किया था? सबसे पहले तो इंसान ये कोशिश करते है कि उसकी कुछ जान पहचान हो जाए. उसी को न्यू सोशल बॉन्डिंग भी कहा जाता है.

आज के दौर में भी एक बेसिक प्रिंसिपल सच है. वो प्रिंसिपल ये है कि अगर टीनएजर घर से बाहर जाते हैं तो वो अपना एक सोशल कनेक्शन भी बनाते हैं. इसी सोशल कनेक्शन से उनकी एक अपनी पहचान बनती है. ये पहचान सफलता के मार्ग में जाने के लिए सहायक भी बन सकती है. जब वो अपने कम्फर्ट जोन से बाहर निकलकर काम करेंगे तभी वो जीवन का सही मतलब भी जान पायेंगे. चिड़िया के बच्चे को भी उड़ने के लिए घोंसला छोड़ना ही पड़ता है. तो ये तो इंसान हैं. अगर लॉन्ग रन में देखा जाए तो घर से बाहर जाना अच्छा ही होता है. इस सफर में युवा अच्छी एजुकेशन के साथ नौकरी भी पाते हैं. साथ ही साथ उन्हें जीवन के संघर्ष का भी पता चलता है.

टीनेजर्स को गाइड करिए
आज के दौर में जब बात पैरेंटिंग की आती है तो अधिकतर पेरेंट्स ये कोशिश करते हैं कि उनके बच्चों को वो टीनेज की उम्र में अकेला छोड़ दें. इसके पीछे का रीजन यह होता है कि पैरंट्स सोचते हैं कि बच्चे अपने रास्ते को खुद तलाश करें. यहां पर हम सवाल यह करना चाहते हैं कि आप इस एप्रोच को सही मानते हैं या गलत मानते हैं?

इस तरह की सोच रखने में कोई बुराई नहीं है लेकिन तब भी कुछ पैरेंटल इंवॉल्वमेंट होना जरूरी है. लेखक इस बारे में ऐसे ही नहीं बोल रहे हैं बल्कि लेखक का एक पर्सनल एक्सपीरियंस भी है.

लेखक के दोस्त का एक टीनेज लड़का है. जिसे ड्राइविंग का बहुत शौक है. उसके पैरेंट्स ने उसको खुली छूट दे दी थी कि जैसे मन हो वैसे गाड़ी चलाओ. एक दिन उसने अपनी गाड़ी को पेड़ से ठोक दिया था. उस एक्सीडेंट में बस गाड़ी का ही नुकसान हुआ था. इस पर उसके पेरेंट्स का रिस्पांस था कि वो उसे नई कार दिलवा देंगे.

उसके पैरेंट्स ने उसे दूसरी कार भी गिफ्ट में दी. लेकिन इस बार हादसा बड़ा था. इस बार उस बच्चे ने कार को दूसरी कार से ठोका था. बच्चे की कई पसलियाँ टूट चुकी थी और वो हॉस्पिटल में एडमिट था.

आपको बता दें कि कई सारे तरीके हैं जिनकी मदद से आप अपने बच्चों की हेल्प कर सकते हैं. आप उन्हें बता सकते हैं कि कैसे वो रिस्क लें? रिस्क लेते समय उन्हें किन चीजों का ख्याल रखना है. सबसे ज़रूरी बात आप उन्हें बताइए कि अगर वो रिस्क लेते हैं तो उन्हें रुकना कहां है. महाभारत के युद्ध में जो गलती अभिमन्यु के माता-पिता ने की थी. वो गलती आप ना करिए. 

चलिए इस कांसेप्ट को तेज ड्राइविंग से ही समझते हैं. तेज़ ड्राइविंग के समय ब्रेन से डोपामाइन रिलीज होता है. इसी डोपामाइन के कारण इंसान को काफी बेहतर लगता है. लेकिन तेज़ ड्राइविंग से आप सिर्फ अपनी ही जान को रिस्क में नहीं डालते हैं बल्कि सामने वाले की जान के साथ भी आप खिलवाड़ कर रहे होते हैं.

इसीलिए अगर आपके बच्चे को स्पीड पसंद है तो उसे बताइए कि और भी ऑप्शन हैं. जिसमे रिस्क कम है. स्पीड के लिए आपका बच्चा एथलेटिक का सहारा ले सकता है. गो-कार्ट रेसिंग का ऑप्शन भी उसके पास है. लेकिन टीनेज बच्चे को आपको इन सब चीजों की खूबियों से रूबरू करवाना पड़ेगा.

लेखक ने खुद इस टेकनिक का उपयोग अपने बच्चे के साथ किया था. बता दें कि लेखक का बेटा भी टीनेज उम्र का ही है. लेखक उसके साथ स्केट बोर्डिंग करने गये थे. इस तरीके से उन्होंने अपने बेटे को भी बेहतर ढ़ंग से समझने की कोशिश की थी.

अगर टीनेजर्स को मौका मिलता है सेफ्टी के साथ किसी रिस्की एक्टिविटी में भाग लेने का, तो एक्टिविटी से नो डाउट उनको काफी ज्यादा फायदा ही होता है. इसलिए उन्हें थ्रिल एक्सपीरियंस करने से मत रोकिये. बस उन पर ध्यान रखिये कि वो जो कर रहे हैं उसमें सेफ्टी मेजर्स का यूज हुआ है कि नहीं, अगर नहीं हुआ है तो आप उनके सामने कोई दूसरा ऑप्शन रखिये.

सचाई की बात करें तो सबके दिमाग में टीनेजर्स को लेकर एक इमेज रहती है. आपके दिमाग में भी होगी. मुद्दे की बात ये है कि ये इमेज सही नहीं रहती है. अगर कोई टीनेजर आपको दिखता है तो आप उसके बारे में क्या सोचते हैं? पहला ख्याल आपके दिमाग में आता है कि ये आलसी होगा, ये रात भर पार्टी करता होगा. लोग टीनेजर्स को काफी जल्दी जज कर लेते हैं.

इन सब बातों के अलग अगर बात करें तो टीनएज वो समय होता है. जब किसी बच्चे का सबसे ज्यादा स्पीड से विकास हो रहा होता है. इस विकास की रफ़्तार आपको उनके रवैये से भी पता चाल जाती होगी. यही वो समय होता है जब उसके अंदर सबसे ज्यादा प्रोडक्टिविटी होती है. अगर इस प्रोडक्टिविटी को वो सही जगह इस्तेमाल करता है तो उसका भविष्य भी उज्जवल होता है. इसी के विपरीत अगर इसी प्रोडक्टिविटी का इस्तेमाल सही से ना हो तो इसके परिणाम काफी भयानक भी हो सकते हैं.

किशोरावस्था में ब्रेन के अंदर एक प्रोसेस की शुरुआत होती है. इस प्रोसेस को ‘प्रनिंग’ कहते हैं. 

बचपन में इंसान का दिमाग काफी ज्यादा मात्रा में न्योरोंस का प्रोडक्शन करता है. जिसे सीनैप्सेस कहते हैं. जब किशोरावस्था आती है तब दिमाग को सीनैप्सेस की ज़रूरत नहीं रहती है. इसी वजह से कुछ न्यूरल सर्कट भी कमजोर पड़ जाते हैं.

इससे एक सवाल का भी जन्म होता है कि आखिर ब्रेन को कैसे पता चलता है कि उसे अब नयूरोंस की ज़रुरत नही है. इसका जवाब ये है कि ये पहले के एक्सपीरियंस पर डिपेंड करता है.

अगर बच्चा ये दिखाए कि उसे म्यूजिक में इंटरेस्ट है. तो ये कोशिश करनी चाहिए कि किशोरावस्था में पहुँचने से पहले ही वो म्यूजिक इंस्ट्रूमेंट बजाना सीख जाए.

अगर वो बचपन में ही इंस्ट्रूमेंट सीख जाता है. तो उसका दिमाग भी मान लेगा कि ये चीज ज़रूरी है. इसको मैं नहीं भूल सकता हूँ. एक बात समझ लीजिये दिमाग के खेल में पूरी चीज मानने की ही होती है. 

‘प्रनिंग’ की पूरी प्रोसेस टीनएज से शुरू होती है और एडल्टहुड तक चलती है. इस प्रोसेस से बच्चों का फोकस और कंसंट्रेशन अच्छा होता है. ‘प्रनिंग’ की प्रोसेस टीनेजर्स को फोकस करने में मदद करती है. अब ये पॉइंट ऑफ़ फोकस कुछ भी हो सकता है. ये कोई खेल या म्यूजिक भी हो सकता है. जब बच्चे अपनी रूचि में फोकस करते हैं तब दिमाग अपने नयूरोंस को आदेश देता है कि वो बॉडी में इस तरीके से काम करें जिससे बच्चों की मदद हो सके. दिमाग की केमिस्ट्री पहाड़ चढ़ने से भी ज्यादा काम्प्लेक्स है.

अब आपके मन में एक सवाल आ रहा होगा कि क्या प्रनिंग की प्रोसेस सभी के दिमाग में होती है और अगर ये प्रोसेस ना हो तो क्या होगा? आपको बता दें कि अगर ये प्रोसेस नहीं होती है तो दूसरी प्रोसेस होती है. दूसरी प्रोसेस का नाम है माईलिनेशन. इस प्रोसेस से इंसानी दिमाग और मज़बूत होता है. इस फेज में नयूरोंस से माइलीन नाम का फैटी पदार्थ मिलता है. वो फैटी पदार्थ नयूरोंस की कोटिंग कर देता है. कोटिंग करने से फायदा ये होता है कि एक नयूरोंस से दूसरे नयूरोंस तक मैसेज काफी जल्दी-जल्दी ट्रान्सफर होते हैं.

किशोरावस्था में दिमाग में हो रही ये क्रिया इतनी महत्वपूर्ण है कि इसी की वजह से बच्चे की कंसंट्रेशन बेहतर होती है. इसीलिए कहा गया है कि जीवन का सबसे महत्वपूर्ण समय वो होता है जब आपको कोई महत्वपूर्ण नहीं समझता है. इसका सीधा मतलब टीनेज से है. टीनेज के समय ना ही बच्चों का कोई सम्मान करता है और ना ही उन्हें महत्त्व दिया जाता है. लेकिन कई अध्ययन में ये बात साबित हो चुकी है कि जीवन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा टीनेज ही होता है. इसके पीछे का एक कारण ये भी है कि इसी समय इंसान अपने भविष्य का निर्माण कर रहा होता है. इसलिए अगर आपके आस-पास कोई टीनेज है या फिर आप टीनेज के पैरेंट्स हैं तो अपने बच्चों से दोस्ती कर लीजिये. इस समय आपके बच्चों को एक दोस्त की ज़रूरत है. जो उन्हें समझ सके और उनको उनकी राह दिखा सके.

टीनेज के समय ही बच्चा बचपन में सीखी गई स्किल को परफेक्ट भी बना सकता है. टीनेजर्स के दिमाग में काफी ज्यादा ऊर्जा रहती है. अगर वो इस उर्जा का इस्तेमाल सही दिशा में कर दें तो उनका जीवन निखर जाए. एक और महत्वपूर्ण बात ये है कि इसी समय टीनेजर्स अपने अंदर क्रिटिकल थिंकिंग भी पैदा करते हैं. इसका मतलब साफ़ है कि बच्चे से बड़े बनने के बीच की ये प्रक्रिया काफी ज्यादा महत्वपूर्ण है.

टीनेजर्स को माफ़ करना भी आपको सीखना पड़ेगा
बाजार में टीनएज के ऊपर बहुत सी किताबें मौजूद हैं. इस समाज में भी कई गलतफहमियां तैर रही है कि टीनएज में बच्चे कैसे हो जाते हैं? इनके साथ कैसे डील करना चाहिए? 

लेकिन सबसे जरूरी बात जो हम जानते हैं कि जो बच्चा टीनेज में है वह अपनी स्वतंत्रता के लिए अपने आप को आगे ढ़केल रहा होता है और कई बार यही स्वतंत्रता की मांग उसके आड़े आती है. लोगों को ये मांग पसंद नहीं आती है. 

 अधिकत्तर बार आपको ये भी देखने को मिलेगा कि फ्रीडम की चॉइस में कई बार बच्चे काफी रयूड भी हो जाते हैं.

अगर आपने अभी तक इन सब बातों के बारे में नहीं सोचा है तो अब सोचना चाहिए. हमें टीनएजर्स को सीरियसली लेना चाहिए क्योंकि टीनएजर्स ही सोसाइटी का फ्यूचर हैं. सोसाइटी को कुछ देना है तो बड़े नहीं दे सकते हैं टीनएजर्स ही दे सकते हैं. इसलिए अब ये ज़िम्मेदारी हमारी बनती है कि हम इनका बेहद ख्याल रखें. आज जितना हम इनका ख्याल रखेंगे हमारा कल और हमारे समाज की रूपरेखा उतनी ही बेहतर बनेगी.

बच्चों से टीनएजर्स अलग होते हैं इसके पीछे कारण यह है कि बच्चे स्पंज की तरह होते हैं. जो अपने टीचर और अपने पैरंट्स से इंफॉर्मेशन को गेन करते हैं और उन्हें जो सिखाया जाता है वह ठीक उसी पद चिन्हों में उस चीज को करते हैं.

 वो ये नहीं सोचते कि इससे अलग भी दुनिया हो सकती है.

लेकिन टीनेजर्स का दिमाग ऐसा नहीं होता है. टीनेजर्स का दिमाग थोड़ा रिबेल की तरह होता है. वो थोड़े बागी तेवर के हो जाते हैं क्योंकि उनके दिमाग में न्यूरॉन्स का संचार बढ़ जाता है. इसलिए उनको अगर कोई कुछ सीखाता है. तो वो उस सीख के बाहर भी सोचते हैं कि इसके अलावा भी दुनिया हो सकती है.

किशोरावस्था में बच्चे सब से अलग हो जाते हैं इसका कारण यह है कि उनके अंदर एब्स्ट्रैक्ट थिंकिंग का डेवलपमेंट होता है और इसी डेवलपमेंट के कारण उनके अंदर क्रिएटिविटी आती है. वो अपने अस्तित्व को पहचानने लगते हैं. उनके अंदर एक ऐसी सोच का निर्माण होता है जिससे वह अपने नजरिए का डेवलपमेंट कर पाते हैं वह समझ जाते हैं कि किसी भी प्रॉब्लम का सलूशन वह खुद भी ढूंढ सकते हैं. इसका एग्जांपल हम डिजिटल क्रांति से भी समझ सकते हैं. समाज में देखिए सोशल मीडिया का प्रभाव कितनी तेजी से बढ़ रहा है. सबसे पहले टीनेजर्स ने ही इस प्रभाव बढ़ाया था. 

इसलिए आप देख सकते हैं कि आज के समय पर सोशल मीडिया में कम्युनिकेशन के लिए कितनी बड़ी तादाद में टीनेजर्स मौजूद है. उन्हें पता है कि इंटरनेट का पोटेंशियल क्या है. इसके साथ ही उन्हें ये भी पता है कि सोशल मीडिया से क्या-क्या हो सकता है? 

इसी के साथ आप यूट्यूब की क्रांति को देखिए. यूट्यूब के ट्रेंड लीडर्स में कई टीनेजर्स हैं.

हम ये समझते हैं कि उनके पैरेंट्स को मुश्किल होती है ये समझने में कि उनके बच्चे क्या चाहते हैं? लेकिन आज के दौर की ये ज़रूरत है कि समझे कि इस समाज के टीनेजर्स क्या चाहते हैं? कई बार देखा गया है कि टीनेजर्स ने बड़ों से बेहतर सुझाव दिए हैं. कई बार ऐसा देखा गया है कि टीनेजर्स ने सुझाव तो सही दिया है लेकिन लोगों ने उन्हें गलत समझ लिया है. इस बारे में लेखक का निजी एक्सपीरियंस भी रहा है. 

लेखक का बेटा है. वो भी टीनेज ही है. एक बार की बात है उनका बेटा अपने स्कूल के बेसमेंट में अपने बैंड के साथ प्रैक्टिस करने पहुंचा था. प्रैक्टिस के दौरान उन्होंने सभी स्विच को ऑन करके अपने सिस्टम को लगा दिया और वॉल्यूम तेज कर दिया. वॉल्यूम तेज करने से उनकी प्रैक्टिस बढ़िया होती थी. लेकिन स्कूल की खिड़कियों के कुछ ग्लास टूटे हुए थे. जिसके कारण आवाज क्लास में भी जाने लगी थी.

अब स्कूल टीचर की एंट्री होती है. उन्होंने ये नहीं देखा कि स्कूल की खिड़कियाँ टूटी हुई बल्कि उस बच्चे को डांट लगाने लगीं कि तुमने जान बूझकर क्लास को डिस्टर्ब किया है. हालाँकि, बाद में टीचर का ध्यान खिड़कियों पर गया और उनको अपनी गलती का एहसास भी हुआ. लेकिन इस किस्से से ये तो पता चलता है कि हम जज भी गलत करते हैं. कई बार टीनेजर्स सही होते हैं. लेकिन हम अपनी ईगो के कारण उन्हें सही मानने से इंकार करते रहते हैं.

इस अध्याय का सार ये है कि टीनेजर्स को समझना थोड़ा मुश्किल ज़रूर होता है. लेकिन असंभव नहीं होता है. इसलिए हमें कोशिश करते रहना चाहिए कि हमारे समाज का कल बेहतर हो. कल बेहतर करने के लिए हमें आज उसके ऊपर काम करना पड़ेगा. समाज का कल और आज टीनेजर्स ही हैं. इसलिए पूरी कोशिश करिए इनका सही मार्गदर्शन करने का, आप अगर इन्हें सही मार्ग दिखाते हैं तो ये उसपर चलकर आपको कभी निराश नहीं होने देंगे.

टीनेजर्स को इनकरेज करते रहिये
टीनएजर्स का समय बहुत दुविधाओं से भरा हुआ होता है. एक तरफ तो टीनेजर्स ये चाहते हैं कि उनका अपने माता-पिता से कनेक्शन अच्छा रहे तो वहीं दूसरी तरफ वो जिम्मेदारी से भी थोड़ा दूर ही भागते हैं. उन्हें हमेशा ये भी लगता है कि लोग उन्हें एक्सेप्ट नहीं कर रहे हैं. इस बात का फ्रस्टटेशन भी उनके अंदर रहता है कि आखिर लोग उनको जैसे वो हैं वैसे ही क्यों नहीं एक्सेप्ट कर रहे हैं. 

इसलिए हमेशा टीनेजर्स की मदद के लिए आगे आना चाहिए. उनकी चुप्पी में भी कई सारे सवाल छुपे हुए होते हैं. उनकी मदद करिए, ये मदद उनके रिलेशनशिप को लेकर भी हो सकती है. कई बार तो ये देखने को मिला है कि पहले प्यार में धोखा खाए बच्चे काफी दुखी रहने लगते हैं. यही वो समय है जब आप उनकी मदद कर सकते हैं. उनको ज्यादा कुछ नहीं चाहिए बस एक बड़े की सलाह और साथ चाहिए. अगर कोई बच्चा आपके आस-पास टीनेज का हो तो उसे आप एक्सेप्ट करिए ठीक वैसे ही जैसा वो है. अगर आप उसके पास जाकर कहते हैं कि तुम मुझे पसंद हो जैसे तुम हो, फिर देखिएगा उसके चेहरे की दमक ही बदल जाएगी.

एक तरीका और है. इस तरीके का नाम है ‘रेफ्लेक्टिव कन्वर्सेशन’. अब अगर आप सोच रहे हों कि ये किस चिड़िया का नाम है? तो आपको बता दें कि ये भी बातचीत ही है. बस इसका ये मतलब होता है कि आप उनसे बात करिए बिना फ़िल्टर के, टॉपिक कोई भी हो सकता है. उसे वैसा ही रखिये जैसा वो है. 

बिना फिल्टर के बात करते समय आपको फर्क नहीं पड़ना चाहिए कि सामने वाला आपके बारे में क्या सोचता है. आपको बस ये कोशिश करनी है कि सामने वाला आपको सुने और अपनी पूरी बात आपको बता दे. समझ लीजिये कि आपको उसके सारे राज़ जानने की कोशिश करनी है, ये रेफ्लेक्टिव कन्वर्सेशन इतना आसान नहीं है. इसके लिए आपको काफी चतुर होना पड़ेगा.

ये आईडिया बस बेहतर बातचीत के लिए था. तो अगर कभी आपका मूड ऑफ़ रहता है. तो आप उनसे सीधे बता दीजिये कि आज आपका मूड थोड़ा खराब है. कई लोग उनको इग्नोर कर देते हैं या फिर रुड तरीके से जवाब देते हैं. 

इसी के साथ अगर आपको और पर्सनल मैटर पर बात करनी है तो भी आप उनको सीधा बोलिए कि मुझे ये चीज जानना है. उनसे आप उनके सपनों के बारे में, रिलेशनशिप के बारे में, प्यार और सेक्स के बारे में भी बात कर सकते हैं. यहां पर ये ज़िम्मेदारी पैरेंट्स की होती है कि वो अपने बच्चे को बताएं कि रेफ्लेक्टिव कन्वर्सेशन काम कैसे करता है? अगर आप इस बातचीत के बारे में अपने बच्चों को समझाने में कामयाब हुए तो आप खुद देखेंगे कि आपके बच्चों का रिलेशन आपसे काफी बेहतर हो गया है.

इस बातचीत के बाद बच्चों को ऐसा लगेगा ही नहीं कि अब मुझे कोई बात अपने माता-पिता से छुपानी चाहिए. इसी के साथ उन्हें ये भी पता चल जाएगा कि कोई भी बात अच्छे तरीके से कैसे की जा सकती है? रेफ्लेक्टिव कन्वर्सेशन से एक फंडामेंटल समझ पैदा होती है कि बड़ी-बड़ी बात को आराम से भी किया जा सकता है.

रेफ्लेक्टिव कन्वर्सेशन के कई फायदे भी हैं. इसका पहला फायदा : ‘द क्रिएशन ऑफ़ एम्प्थी’

इसके पीछे साइंस काम करता है. इसके ऊपर कई रिसर्च भी हुई हैं. अधिकतर अध्ययन में ये निकलकर सामने आया है कि रेफ्लेक्टिव कन्वर्सेशन से ब्रेन में अच्छा प्रभाव पड़ता है. ब्रेन के प्रीफ्रन्टल कोर्टेक्स में इसका अच्छा प्रभाव पड़ता है. 

अब आप सोचेंगे कि प्रीफ्रन्टल कोर्टेक्स आखिर होता क्या है? 

आपको बता दें कि ये ब्रेन का वही हिस्सा होता है. जहाँ पर प्लानिंग और प्रॉब्लम सॉल्विंग टास्क होता है. इसके साथ ही ये हमारे दिमाग को ये भी बताता है कि दूसरों से बात कैसे करें? एग्जाम्पल के लिए समझिये कि आप किसी को सुनते हैं. आप उसको सिर्फ सुनने के लिए नहीं सुन रहे हैं. बल्कि आप उसकी बातों में छुपी हुई भावनाओं को भी समझ रहे हैं. 

अब आप सोचिये हमारा दिमाग कितना काम करता है? आप सोते भी हैं तो भी आपका दिमाग काम कर रहा होता है. इसलिए कहा जाता है कि शरीर में सबसे ज्यादा ख्याल दिमाग का ही रखना चाहिए.

इसका मतलब साफ़ है कि अगर टीनेजर्स रेफ्लेक्टिव कन्वर्सेशन में हिस्सा लेंगे. तो वो अपने दिमाग में द क्रिएशन ऑफ़ एम्प्थी को भी जन्म देंगे. एम्प्थी बस किसी से बॉन्डिंग के लिए ही ज़रूरी नहीं है बल्कि ये एक ऐसी नॉबल चीज है जो हमारे पास होनी ही चाहिए. 

अब आती है एक और मुद्दे की बात कि आखिर टीनेजर्स को गाईड कैसे करें? इसका जवाब सिंपल सा है कि पहले तो आप उनको ओब्सर्व करिए. जब एक बार आप उनको जानते रहेंगे कि उनकी रूह में क्या चल रहा है, तब आप उनसे बेहतर कनेक्ट हो सकेंगे. इस समाज के कल का निर्माण आज के टीनेज के ऊपर है. इसलिए टीनेजर्स के टीचर्स और माता-पिता के ऊपर काफी बड़ी ज़िम्मेदारी है. अब इस ज़िम्मेदारी को उन्हें कैसे पूरा करना है? इसका जवाब आपको ऊपर के अध्यायों में मिला चुका है. 

एक एग्जाम्पल से समझते हैं, उससे पहले आप खुद से एक सवाल करिए कि क्या बिना मजबूत नींव के कोई ईमारत बन सकती है? और अगर बन भी गई तो कितनों की जान खतरे में रहेगी? जब एक ईमारत बिना ठोस नींव के नहीं बन सकती है. तो फिर एक समाज और देश कैसे बनेगा बिना टीनेज को सही मार्ग दर्शन मिले हुए.

इसलिए टीनेजर्स अपनी ज़िम्मेदारी समझते हैं. वो अपना काम बेहतर तरीके से कर लेंगे लेकिन क्या आप अपनी ज़िम्मेदारी समझते हैं? आपकी ज़िम्मेदारी बस अपनी आँखे और कान खुली रखने की हैं. आपको उन्हें इतना बताना है कि इस सफर की स्पीड में स्पीड ब्रेकर आए तो गाड़ी धीमी कर लें. गाड़ी धीमी करने के लिए ब्रेक की ज़रूरत होती है. उन्हें बस आप वो ब्रेक बता दीजिये. उसके बाद वो खुद इतने काबिल हैं कि अपनी जिंदगी की रफ़्तार कम नहीं होने देंगे.

कुल मिलाकर
टीनेजर्स को कई बुरे दौर से गुजरना पड़ता है. उन्हें अपने शरीर के बदलावों से भी जूझना पड़ता है. इसी के साथ लोग उन्हें आलसी और ना जाने क्या-क्या ताने भी मारते हैं. इन सबके अलावा इस उम्र में उनको काफी यौन आकर्षण भी होता है. जिसका उनको सामना करना पड़ता है. उम्र के इस पड़ाव में टीनेजर्स का मन काफी विचलित रहता है. पढ़ाई में मन लगाना मुश्किल होता है. लेकिन इन सबके बीच ये देखा गया है कि टीनेजर्स कई बेहतरीन स्किल्स भी सीख लेते हैं. ये स्किल्स उनके बड़े होने पर उन्हें एक बेहतर इंसान बनने में मदद करती हैं. कई बच्चे टीनएज में ही गलत रस्तों में भी चले जाते हैं. अब यहां सवाल यही उठता है कि वो गलत रास्ते पर क्यों चले जाते हैं?

जवाब ये है कि जब उनके अंदर ऊर्जा का प्रभाव रहता है. लेकिन उन्हें कोई मार्ग दर्शक नहीं मिलता है. तो उर्जा को जो रास्ता मिला वो उसी रास्ते पर चल देती है. लेकिन जो उस उर्जा को संभाल लेते हैं उनके अंदर कई खूबियाँ भी आ जाती हैं. जैसे कि कई बच्चे काफी क्रिएटिव हो जाते हैं. कई काफी क्रिटिकल थिंकर बन जाते हैं. क्योंकि उनके पीछे हमेशा उनके माता-पिता या टीचर्स का सपोर्ट रहता है. घूम फिरकर बात वहीं आ गई कि आपको मार्ग दर्शन देना ही पड़ेगा.

अगर आपने अपने बच्चों का सही मार्ग दर्शन कर दिया तो इतना विश्वास रखिये कि इनके अंदर समाज को देने के लिए बहुत कुछ है.

 

आज के दौर में भी एक बेसिक प्रिंसिपल सत्य है. वो प्रिंसिपल ये है कि अगर किशोर घर से बाहर जाते हैं तो वो अपना एक सोशल कनेक्शन भी बनाते हैं. इसी सोशल कनेक्शन से उनकी एक अपनी पहचान बनती है. ये पहचान सफलता के मार्ग में जाने के लिए सहायक भी बन सकती है.

अगर आपको अपने बच्चे की किसी हरकत पर गुस्सा आ रहा है तो भी आपको कंट्रोल करना पड़ेगा. आप सोचिये कि किस तरीके से आप इसे समझा सकते हैं? या फिर अगर आपने उसे डांट ही दिया है तो खुद से पूछिए कि क्या डांटना इतना ज़रूरी था? आपको अपना जवाब मिल जाएगा. टीनेज एक ऐसी उम्र होती है जब सब कुछ बच्चों के हाँथ में नहीं होता है. कुछ चीजें अपने से हो जाती हैं. आपको ये समझना पड़ेगा.  

ये बात आपको समझनी चाहिए कि टीनेज उम्र काफी सेंसटिव होती है. आप तो उनको जज कर लेते हैं. लेकिन इस बीच आपकी हरकतें उनके दिल में बैठ जाती हैं. इसलिए अगर आप नहीं चाहते हैं कि आपके बच्चे से आपका रिश्ता खराब हो तो थोड़ा समझदारी से उनके साथ व्यवहार कीजिये. अगर कहीं ज़रूरी लगे कि आपको सॉरी बोल देना चाहिए, तो वो भी कर दीजिये. आप खुद देखेंगे कि आप और आपके बच्चे के बीच एक दोस्ती का रिश्ता भी डेवलप हो रहा है. 

अगर आपकी अपने बच्चे से अच्छे से बात होती है तो आप खुद महसूस करते होंगे कि हर प्रॉब्लम कितनी आसानी से सॉल्व भी हो जाती है. इस उम्र के बच्चों के साथ डील करने के लिए आप बस उनको ये एहसास दिला दीजिये कि उनका महत्त्व आपके लिए बहुत ज्यादा है. उन्हें आप उनकी ज़िम्मेदारी का भी एहसास दिलाइये.

yebook एप पर आप सुन रहे थे Brainstorm By Daniel J. Siegel

ये समरी आप को कैसी लगी हमें yebook.in@gmail.com पर ईमेल करके ज़रूर बताइये.

आप और कौनसी समरी सुनना चाहते हैं ये भी बताएं. हम आप की बताई गई समरी एड करने की पूरी कोशिश करेंगे.

अगर आप का कोई सवाल, सुझाव या समस्या हो तो वो भी हमें ईमेल करके ज़रूर बताएं.

और गूगल प्ले स्टोर पर ५ स्टार रेटिंग दे कर अपना प्यार बनाएं रखें.

Keep reading, keep learning, keep growing.


Post a Comment

0Comments
* Please Don't Spam Here. All the Comments are Reviewed by Admin.
Post a Comment (0)

YEAR WISE BOOKS

Indeals

BAMS PDFS

How to download

Adsterra referal

Top post

marrow

Adsterra banner

Facebook

#buttons=(Accept !) #days=(20)

Accept !