Co-Active Coaching

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Co-Active Coaching

Henry Kimsey-House, Karen Kimsey-House, Phillip Sandahl, Laura Whitworth
बिजनेस और जिन्दगी दोनों बदलीं - वो किताब जिसने प्रोफेशनल कोचिंग के फील्ड को परिभाषित करने में मदद की।

दो लफ्जों में
को-एक्टिव कोचिंग ( Co-Active Coaching ) में हम देखेंगे कि किस तरह से एक कोच अपने क्लाइंट से बेहतर रिश्ते बनाकर उसकी समस्याओं को सुलझा सकता है। यह किताब को-एक्टिव कोचिंग के कान्सेप्ट को समझाते हुए हमें बताती है कि किस तरह से एक कोच को अपने क्लाइंट से बात करनी चाहिए, किस तरह से उसकी परेशानियों को सुनना चाहिए और अंत में किस तरह से उसका समाधान बताना चाहिए।

यह किसके लिए है
-वे जो एक बिजनेस कोच हैं या बनना चाहते हैं।
-वे जो क्लाइंट्स के साथ काम करते हैं और उनसे बात करना सीखना चाहते हैं।
-वे जो किसी व्यक्ति को समझने के तरीके जानना चाहते हैं।

लेखक के बारे में
हेन्री किंसी-हाउस ( Henry Kimsey-House ), कैरेन किंसी-हाउस ( Karen Kimsey-House ) और लौरा विटवर्थ ( Laura Whitworth ) कोचिंग ट्रेनिंग इंस्टिट्यूट के को-फाउंडर्स हैं। वे दुनिया के सबसे पहले कोच-ट्रेनिंग स्कूल्स के फाउंडर्स रहे हैं और पिछले 30 सालों से लोगों को ट्रेनिंग देते आए हैं। 
फिलिप संदह्ल ( Phillip Sandahl ) टीम कोचिंग इंटरनेशनल के को-फाउंडर हैं जो कि कोचिंग ट्रेनिंग इंस्टिट्यूट के सीनियर मेंबर रह चुके हैं।

यह किताब आपको क्यों पढ़नी चाहिए
बिजनेस करना कोई आसान काम नहीं है। एक बिजनेस में बहुत से डिपार्टमेंट होते हैं और कोई भी एक व्यक्ति हर डिपार्टमेंट को बेहतर तरीके से नहीं चला सकता। ऐसे में उन्हें एक कोच की जरूरत होती है जो उन्हें यह बता सके कि उन्हें किस तरह से अपने बिजनेस को संभालना है। और एक कोच की यह जिम्मेदारी होती है कि वो अपने क्लाइंट को उसकी समस्या से बाहर निकाल सके।

यह किताब एक कोच के लिए लिखी गई है। यह किताब बताती है कि को-एक्टिव कोचिंग किसे कहते हैं और किस तरह से इसकी मदद से आप अपने क्लाइंट की बेहतर तरीके से मदद कर सकते हैं। यह किताब बताती है कि किस तरह से आप अपने क्लाइंट से बात कर के उसकी समस्या को समझ सकते हैं।

 

-को-एक्टिव कोचिंग क्या है और इसका मकसद क्या है।

-अपने क्लाइंट की जिन्दगी में जिज्ञासा रखने से किस तरह से आप उसे अच्छे से समझ सकते हैं। 

-किस तरह से आप अपने क्लाइंट की वैल्यूज़ को खोजने में उसकी मदद कर सकते हैं।

को-एक्टिव कोचिंग में आप सिर्फ समस्या नहीं सुलझाते, बल्कि अपने क्लाइंट से अच्छे से बात कर के उसे समझने की कोशिश करते हैं।
अगर आप किसी बिजनेस के लिए एक कंसल्टेंट की तरह काम कर रहे हैं तो आपका सबसे पहला फोकस होना चाहिए अपने क्लाइंट से अच्छे से बात कर के उसके हालात को समझना। इसमें सिर्फ आपका ही नहीं, बल्कि आपके क्लाइंट का भी रोल होना चाहिए। 

को-एक्टिव कोचिंग में आप सबसे पहले अपने क्लाइंट को पूरी तरह से समझ कर उसकी समस्याओं को महसूस करने की कोशिश करते हैं। ऐसा करने के लिए आपको उसके साथ अच्छे से बात करना होगा। इसलिए आपको को-एक्टिव कोचिंग माडल के 4 पिलर को जानना होगा, जिसकी मदद से आप इसका इस्तेमाल कर सकेंगे -:

सबसे पहला यह कि आपको मानना होगा कि हर कोई समझदार है और समस्याओं का समाधान निकाल सकता है। आपको किसी भी व्यक्ति को बेवकूफ नहीं समझना है, बल्कि यह समझना है कि हर कोई अच्छे फैसले ले सकता है और अपनी गलतियों से सीख सकता है।

दूसरा यह कि आपको सिर्फ अपने क्लाइंट के बिजनेस को ही ठीक करने के बारे में नहीं सोचना, बल्कि उसकी जिन्दगी में चल रही दूसरी चीजों के ऊपर भी ध्यान देना है। उसके काम पर, उसके परिवार पर और उसकी भावनाओं पर।

तीसरा यह कि आपको सिर्फ अपने क्लाइंट की बातों पर ही नहीं,  बल्कि उसके बर्ताव पर भी ध्यान देना है। आपको उसके मूड पर, उसके टोन पर और उसकी बाडी लैंग्वेज पर ध्यान देकर यह समझना है कि आपको उससे किस तरह से बात करनी चाहिए। को-एक्टिव कोचिंग तभी काम करती है जब आप अपने क्लाइंट को यह आजादी देते हैं कि वो खुलकर अपनी सारी परेशानियों को और अपनी कमजोरियों को अपने सामने रख सके। 

और चौथा यह कि आप अपने क्लाइंट की जिन्दगी को बदलने की कोशिश कीजिए। भले ही आपके क्लाइंट ने आपको सिर्फ एक डिपार्टमेंट में काम करने के लिए हायर किया हो, आपको उनके दूसरे कामों को देखना होगा और उसमें अच्छे बदलाव लाने होंगे। 

को-एक्टिव कोचिंग का मतलब यह नहीं है कि आप अपने क्लाइंट को ठीक करने दें, इसका मतलब यह है कि आप उसकी जिन्दगी में एक अच्छा बदलाव लाएं।

अपने क्लाइंट से अच्छे रिश्ते बनाने के लिए आपको उसे एक ऐसा माहौल देना होगा जिसमें वो सुरक्षित महसूस करे।
को-एक्टिव कोचिंग में आपका मकसद होना चाहिए कि आप अपने क्लाइंट को रिस्क लेने के लिए धक्का दें। लेकिन रिस्क वही लोग ले सकते हैं जो सुरक्षित महसूस करते हैं। इसलिए आपको अपने क्लाइंट को एक ऐसा माहौल देना होगा जिसमें वो आपके साथ अपने राज़ बाँट सके, आप पर भरोसा कर सके। आपको उसके साथ ईमानदारी दिखानी होगी।

जब तक आपका क्लाइंट आप पर भरोसा नहीं करेगा, वो आप से अपनी हर बात खुलकर नहीं कह पाएगा। इसलिए आपको उसका भरोसा जीतना होगा। साथ ही आपको उसके साथ ईमानदारी दिखानी होगी और उसे वो बताना होगा जो उसके लिए अच्छा है, ना कि वो जो उसे अच्छा लग रहा है। 

साथ ही आपको अपने क्लाइंट को सोचने के लिए थोड़ा समय और थोड़ी आजादी देनी होगी ताकि वो खुद से कुछ एक्सपेरिमेंट कर सके और अपनी पिछली गलतियों से सीख सके।

एक अच्छा माहौल बनाने के साथ साथ आपको अपने क्लाइंट से अपने शर्तों के बारे में बात कर लेनी चाहिए। आपके क्लाइंट को आपके साथ काम करने से पहले यह पता होना चाहिए कि आपको उससे क्या उम्मीदें हैं। अपने क्लाइंट को यह बातें अच्छे से समझाने के लिए आपको उसके साथ पहले ही एक सेशन में बात कर लेनी चाहिए। इसमें आप उससे कुछ इस तरह के सवाल पूछ सकते हैं -: आप अपनी जिन्दगी के किस हिस्से को पहले से बेहतर बनाना चाहेंगे? अगर आप इस काम में नाकाम हो जाएंगे, तो इसका आपके ऊपर क्या असर होगा?

इस तरह के सवाल से आपके क्लाइंट को यह पता लगेगा कि वो इस समय कहाँ पर है और वो कहाँ पर पहुंचना चाहता है। इससे उसे पता लगेगा कि उसकी खूबियां और खामियां क्या हैं। 

इसके साथ ही आपको अपने क्लाइंट से हर उस बात के बारे में पहले ही बात कर लेनी चाहिए जिससे आगे चलकर आप लोगों में गलतफहमी हो सकती है।

अपने क्लाइंट को लेवेल 3 पर जाकर सुनने की कोशिश कीजिए।
जब कोई हमारी परेशानी को सुनता है, तो हमें बहुत अच्छा महसूस होता है। हमें लगता है कि कोई है जो हमारा दर्द समझ रहा है। अपने क्लाइंट को अच्छे से समझने के लिए आपको उसे लेवेल 3 पर जाकर सुनना होगा। इसके लिए आपको तीन सुनने के लेवेल्स के बारे में जानना होगा।

लेवेल 1 पर आप क्लाइंट को सुनते हैं और उसे अपने नजरिए के हिसाब से समाधान बताते हैं। एक्ज़ाम्पल के लिए, अगर आपका क्लाइंट को काफी मेहनत के बाद भी कोई नतीजे नहीं मिल रहे हैं, तो आप उसे बता सकते हैं कि किस तरह से आपकी जिन्दगी में भी एक ऐसा समय आया था और आप उससे बाहर निकल कर आए थे।

दूसरे लेवेल पर सुनने का मतलब आप अपने क्लाइंट की समस्या को सुनकर उसे उसके हालात के हिसाब से एक समाधान बताते हैं। अगर आपके क्लाइंट को नतीजे नहीं मिल रहे हैं, तो आप उसे अपनी कहानी ना सुनाकर उसे उसकी जिन्दगी में चल रही चीजों के हिसाब से एक समाधान बताते हैं। आप उसे यह समझा सकते हैं कि किस वजह से वो फँसा हुआ महसूस कर रहा है और किस तरह से वो उससे बाहर निकल सकता है।

इसके बाद तीसरे लेवेल पर सुनने का मतलब है क्लाइंट की भावनाओं को और उसके अंदर चल रहे युद्ध को अच्छे से समझना। इसमें आप यह देखते हैं कि वो कैसा महसूस कर रहा है। आप वो बातें भी पता करते हैं जो वो नहीं बता रहा है और आप दुनिया को उसकी नजर से देखने की कोशिश करते हैं।

इस तरह से आप क्लाइंट के गोल्स को समझ सकते हैं और उनके उसूलों को जान सकते हैं। को-एक्टिव कोचिंग में आप हमेशा लेवेल 2 और लेवेल 3 पर रहकर अपने क्लाइंट की बात सुनते हैं और फिर समाधान तक पहुंचने में उनकी मदद करते हैं।

कोचिंग सेशन के वक्त अपने इंट्यूशन को दबाने की कोशिश मत कीजिए।
बहुत बार हमारे दिमाग में कुछ इस तरह की बातें आती हैं जो कि सच लगती हैं लेकिन हमारे पास उसे साबित करने के लिए कुछ नहीं होता। कभी कभी आप एक व्यक्ति को देखकर यह बता सकते हैं कि वो उदास है या किसी बात से परेशान है, लेकिन क्या देखकर आप ने ऐसा कहा, यह आपको खुद नहीं पता होगा।

कोचिंग को दौरान इस भावना को अनदेखा मत कीजिए। बहुत से लोगों के दिमाग में इस तरह के खयाल आते हैं लेकिन वे इस संकोच से उसे बाहर नहीं निकालते क्योंकि उन्हें लगता है कि कहीं उनका सोचना गलत ना हो। अगर आपको लग रहा है कि कुछ गलत है, तो आपको यह समझना होगा कि आपको क्या गलत लग रहा है। आपको अपने मन से उसका मतलब नहीं निकालना है, बल्कि अपने क्लाइंट से पूछना है कि आपका सोचना सही है या नहीं।

एक्ज़ाम्पल के लिए मान लीजिए आप अपने क्लाइंट से बात कर रहे हैं और वो आप से अपनी समस्याओं के बारे में बात कर रहा है। यहाँ पर आपको एक बार के लिए यह लग सकता है कि वो अपनी सारी परेशानियों के बारे में आपको नहीं बता रहा है। अगर आपको ऐसा लगता है , तो आप इससे तुरंत यह पूछ लीजिए कि आप सही हैं या नहीं।

आपको ना तो अपने अंदर की इस आवाज को सही मानना है और ना ही गलत, और साथ ही इससे डरना भी नहीं है कि कहीं आप गलत हो गए तो क्या होगा। यहाँ पर आपको अपनी इस भावना का इस्तेमाल करना है ताकि आप अपने क्लाइंट की बात को पूरी तरह से समझ सकें। कभी कभी आपको अपने विचारों को खुलकर सामने रखना होगा, ताकि एक बात को साफ और छोटे शब्दों में कहा जा सके।

अपने क्लाइंट को जानने की जिज्ञासा की मदद से आप उससे काम की फिर जान सकते हैं।
जब कोई हमारे काम में और हमारी जिन्दगी में दिलचस्पी लेता है, तो हमें बहुत अच्छा लगता है। इसलिए जब आप अपने क्लाइंट की जिन्दगी में दिलचस्पी लेंगे तो वो आप से अपनी बात को खुलकर कह पाएगा और आप उसके बारे में अच्छे से जान पाएंगे।

बहुत से कोच अपने क्लाइंट से इंटरव्यू स्टाइल में सवाल पूछते हैं, जिससे कि क्लाइंट को अपने कोच के साथ कनेक्शन महसूस नहीं होता। आपको अपने क्लाइंट से कुछ इस तरह के सवाल पूछने हैं जिससे आपके क्लाइंट को लगे कि वो अपने किसी दोस्त से बात कर रहा है। आपको एक सवाल इस तरह से पूछना है जिससे यह लगे कि आप क्लाइंट के काम से ज्यादा उसकी जिन्दगी में और उसमें दिलचस्पी रखते हैं।

एक्ज़ाम्पल के लिए, आप उससे यह मत पूछिए कि इस प्रोजेक्ट को पूरा करने के बाद उसकी कंपनी कहाँ पर जाएगी। बल्कि उनसे यह पूछिए कि इस प्रोजेक्ट को पूरा करने के बाद उसकी जिन्दगी कैसे बेहतर बन जाएगी।

इसके अलावा आपको उससे इस तरह के सवाल पूछने हैं जिससे कि मतलब की बातें होना शुरू हो सकें। बहुत बार क्लाइंट्स अपनी जिन्दगी की समस्याओं को लेकर शिकायतें करने लगते हैं, जो कि मतलब की बातें नहीं हैं। आपको उनसे कुछ इस तरह के सवाल पूछने हैं जिससे वो समस्या पर ध्यान देना छोड़कर समाधान पर ध्यान देना शुरू कर सके। आपको उससे पूछना होगा कि किस तरह से वो इससे बाहर निकल सकता है। 

जब आप इस तरह के सवाल पूछेंगे तो आपका क्लाइंट सोच में पड़ जाएगा और कुछ देर के लिए चुप हो जाएगा। आपको उसे सोचने का समय देना होगा। बहुत बार कुछ आसान से सवाल भी आपके क्लाइंट को सोच में डाल देंगे। लेकिन यही आसान से सवाल उसे रास्ता दिखाने का काम भी करेंगे। एक्ज़ाम्पल के लिए आप अपने क्लाइंट से पूछ सकते हैं कि वो कल क्या करेगा या उनका अगला कदम क्या होगा।

अपने क्लाइंट के उसूलों को जानकर यह पता करने की कोशिश कीजिए कि इसके लिए क्या मायने रखता है।
जैसा कि हमने कहा, को-एक्टिव कोचिंग में आप अपने क्लाइंट को पूरी तरह से समझने की कोशिश करते हैं। आप उसे एक अच्छा बिजनेस नहीं बल्कि एक अच्छी जिन्दगी देने की कोशिश करते हैं। इसके लिए आपको यह पता करना होगा कि आपके क्लाइंट के लिए किस तरह की चीजें मायने रखती हैं। तभी आप उसे वो सलाह दे सकते हैं जिसे अपना कर वो खुशी और संतुष्टि हासिल कर सके।

अपने क्लाइंट के उसूलों को जानने के लिए आपको यह जानना होगा कि वो किस चीज़ को अहमियत देता है। अगर वो परिवार को अहमियत देता है तो उसे वो काम करने चाहिए जिसमें रिस्क कम हो और उसे परिवार और काम के बीच एक तालमेल बना कर चलना चाहिए। लेकिन अगर वो एडवेंचर पसंद करता है, तो उसे रिस्क लेने की कोशिश करनी चाहिए।

उसूलों का लेना देना संतुष्टि से होता है। अब सवाल यह उठता है कि किस तरह से आप अपना क्लाइंट के उसूलों को पता कर सकते हैं। इसके लिए आपको यह देखना होगा कि वो किस तरह के फैसले लेता है। उसके लिए गए फैसले यह दिखाते हैं कि उसके लिए क्या मायने रखता है। एक क्लाइंट के लिए क्या मायने रखता है यह वो खुद अपने अनुभवों से जान सकता है। 

एक कोच की तरह आपका काम होना चाहिए कि आप अपने क्लाइंट को पास्ट में ले जाकर उसे उसके अनुभवों से मिलाएँ और उसे दिखाएँ कि उसके लिए क्या मायने रखता है। इसके बाद आप उसे यह समझा पाएंगे कि उसे किस तरह के फैसले लेने चाहिए। बिना उसूलों को जाने आप कभी वो फैसला नहीं ले पाएंगे जो कि आपको खुश रख सके। 

एक बार जब आपको अपने क्लाइंट की वैल्यूज़ पता लग जाएं, तो आप उससे कहिए कि वो उन उसूलों में से सबसे जरूरी उसूलों को सबसे ऊपर लिखे और उनके हिसाब से काम करना शुरू करे।

कुल मिलाकर
को-एक्टिव कोचिंग का मकसद सिर्फ समस्या सुलझाना नहीं है। इसका मकसद है अपने क्लाइंट की बातों की गहराई में जाकर उसे समझना और इसके बाद उसकी समस्या सुलझाने की कोशिश करना। आपको अपने क्लाइंट का भरोसा जीतना होगा और उसके साथ ईमानदारी दिखानी होगी ताकि वो आप से हर बात खुल कर कर सके और आप उसकी समस्या को अच्छे से समझ कर उसे सुलझा सकें।

 

किसी रेस्तरां में जाकर लोगों को पढ़ने की कोशिश कीजिए।

एक रेस्तरां में जाकर लोगों को देखिए और यह पता लगाने की कोशिश कीजिए कि उनकी पसंद क्या होगी, उनके उसूल क्या होंगे, वो किस तरह की समस्या से परेशान होंगे और उनके सपने क्या हैं। आधे घंटे किसी व्यक्ति को देखने के बाद आप उनके पास जाइए और उनसे सवाल जवाब कीजिए। यह देखिए कि आप किस हद तक सही थे। यह देखिए कि वो व्यक्ति आपकी इस हरकत पर किस तरह से रिएक्ट करता है और उससे सीखने की कोशिश कीजिए।


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